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16/10/2026
16/10/2026
16-10-26= 'नगरयात्राÓ की आवाज पर जागा खाद्य सुरक्षा विभाग- 15 सितंबर के अंक में मिलावटी खाद्य पदार्थों की बिक्री पर जताई...
16/10/2026

16-10-26

= 'नगरयात्राÓ की आवाज पर जागा खाद्य सुरक्षा विभाग
- 15 सितंबर के अंक में मिलावटी खाद्य पदार्थों की बिक्री पर जताई थी चिंता
- महाराष्ट्र एफडीए के कमीशनर तुकाराम मुंडे की भांति एक्शन की जताई थी अपेक्षा
- सरकार ने जिला में मोबाइल टेस्टिंग वैन भेजने का दिया आश्वासन
नगरयात्रा न्यूज, सिरसा। त्योहारी सीजन में मिलावटी व घटिया खाद्य पदार्थों की बिक्री की आशंका जताते हुए 'नगर यात्राÓ ने अपने 15 सितंबर के अंक में महाराष्ट्र के एफडीए के कमीशनर तुकाराम मुंडे की भांति सिरसा में भी एक्शन की अपेक्षा की थी। सरकार की ओर से एक माह के भीतर ही शुद्ध खाद्य पदार्थों की बिक्री सुनिश्चित करने के लिए मोबाइल वैन भेजने की योजना बनाई है। इस मोबाइल वैन की मदद से मौके पर ही 10 मिनट में मिलावट का पता चल सकेगा। मामले में खाद्य सुरक्षा विभाग अब जाग गया प्रतीत होता है। हालांकि विभागीय अधिकारियों के एक्शन से ज्ञात हो पाएगा कि मोबाइल वैन का कितना उपयोग होता है।
अन्यथा सिरसा में मिलावटी व घटिया खाद्य पदार्थों की बिक्री खुलेआम है। कोई रोकटोक नहीं है। प्रतिबंधित केमिकल का खाद्य पदार्थ बनाने में धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है। न केवल स्ट्रीट फूड बल्कि बड़े होटलों, ढाबों व रेस्टारेंट में भी शुद्धता का ध्यान नहीं रखा जाता। अनेक जगह तो रसोईघर ही किसी शौचालय से अधिक गंदे है। जहां न तो किसी प्रकार का वेंटिलेशन है, न साफ सफाई है, कोकरॉचों की भरमार है, चूहे घूमते है। मिठाई बनाने वाले कारीगरों द्वारा भी साफ-सफाई का जरा भी ध्यान नहीं रखा जाता। गंदे हाथ-पैरों से काम करते है। सिर पर भी कपड़ा नहीं ढंका जाता।
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- घटिया घी-तेल का इस्तेमाल
सिरसा में न केवल त्यौहारी सीजन में बल्कि वर्षभर जो खाद्य तेल का इस्तेमाल किया जाता है, वह बेहद निम्र दर्जें का ही उपयोग किया जाता है। देसी घी और रिफाइंड के नाम पर भी घटिया दर्जे का तेल-घी प्रयोग किया जाता है। एक ही तेल को कई बार इस्तेमाल किया जाता है। बरनाला रोड की रेहड़ी मार्केट हो या गीता भवन वाली। हर जगह एक जैसा ही हाल है।
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- नकली मावा की आपूर्ति
जानकार बताते है कि त्यौहारी सीजन में मावे की इतनी मांग होती है, जितनी की उत्पादन नहीं होता। ऐसे में मावे की मांग की पूर्ति के लिए नकली मावा मार्केट में बिकता है। अचरज की बात यह है कि यह मावा असली के मुकाबले काफी सस्ती दर पर बिकता है। यानि खरीददारों को भी यह ज्ञात रहता है कि यह घटिया मावा है। लेकिन अनेक दुकानदारों द्वारा अपना मुनाफा कमाने के लिए त्यौहार सीजन में घटिया व मिलावटी मावे का इस्तेमाल मिठाई बनाने में किया जाता है। यदि जांच हो तो सारी पोलपट्टी खुलकर सामने आ सकती है।
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- सिंथेटिक दूध की बिक्री
सिरसा में सिंथेटिक दूध भारी मात्रा में खपाया जाता है। विभागीय अधिकारियों की कथित मिलीभगत की वजह से ऐसे दुग्ध विक्रेताओं को आजतक चिह्नित तक नहीं किया गया। जबकि मिल्क प्लांट पर पहुंचे ऐसे नकली दूध को मिल्क प्लांट प्रशासन द्वारा मौके पर ही नष्ट कर दिया जाता है। मिल्क प्लांट पर विभिन्न गांवों से दूध पहुंचता है। कुछ लोग सिंथेटिक दूध बनाकर उसे आगे बेच देते है। जब ऐसा दूध मिल्क प्लांट पहुंचता है और मौके पर केमिकल जांच होती है, तब सिंथेटिक दूध का पता चल जाता है। ऐसे में दूध को नष्ट ही किया जाता है लेकिन सिंथेटिक दूध के स्त्रोत के बारे में कभी जानकारी नहीं जुटाई जाती अथवा उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है।
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- बिक्री के बाद आते ही रिपोर्ट?
खाद्य सुरक्षा विभाग की ओर से अब तक जिन खाद्य पदार्थों के सैंपल लिए जाते रहे है, उनकी रिपोर्ट महीनों बाद आती थी। तब तक दुकानदार मिलावटी व घटिया माल की बिक्री कर चुका होता था। दुकान से मिठाई का, पनीर का, दूध का घी का अथवा अन्य खाद्य पदार्थ का सैंपल लिया जाता था, उसकी रिपोर्ट आने तक वह बिक जाता था। ऐसे में पब्लिक को तो घटिया व मिलावटी खाद्य पदार्थ परोसा जा चुका होता है। रिपोर्ट आने के बाद भले ही कोई एक्शन लिया जाए, नोटिस दिया जाए, जुर्माना लगाया जाए? उसका उपभोक्ता को क्या फायदा? उसकी सेहत से खिलवाड़ हुआ सो हुआ।
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- सेंपल लेने में भी आनाकानी?
आमआदमी की ओर से कदम-कदम पर घटिया व मिलावटी खाद्य पदार्थों की बिक्री को लेकर आवाज उठाई जाती है। लेकिन सैंपल लेने वालों को शायद सुनाई नहीं पड़ती। यही वजह है कि पूरे-पूरे साल तक विभाग की उपस्थिति दिखाई नहीं देती। केवल त्यौहार के सीजन में ही विभागीय अधिकारी राऊंड लगाते है और उसके बाद आमजन को घटिया व मिलावटी खाद्य पदार्थों के सेवन के लिए छोड़ दिया जाता है। सूत्र दावा करते है कि सैंपल लेने वालों को सैंपल न लेने के बदले 'मंथलीÓ हासिल होती है? इसलिए देखकर भी अनदेखा किया जाता है।

डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी मामले में ईडी की बड़ी कार्रवाई, 2 बुजुर्गों से 2.95 करोड़ रुपये की ठगी50 से अधिक म्यूल बैंक खातो...
16/10/2026

डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी मामले में ईडी की बड़ी कार्रवाई, 2 बुजुर्गों से 2.95 करोड़ रुपये की ठगी

50 से अधिक म्यूल बैंक खातों के जरिए रकम ठिकाने लगाने का खुलासा, 396 साइबर अपराध शिकायतों से जुड़े मिले खाते

अहमदाबाद, 16 अक्टूबर। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर लोगों को डराकर करोड़ों रुपये की ठगी करने वाले साइबर अपराधियों के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बड़ी कार्रवाई की है। ईडी के अहमदाबाद जोनल कार्यालय ने इस मामले में अहमदाबाद की विशेष पीएमएलए अदालत के समक्ष अभियोजन शिकायत दाखिल की है। जांच में सामने आया कि ठगों ने खुद को सीबीआई और पुलिस अधिकारी बताकर दो बुजुर्गों को निशाना बनाया और उन्हें फर्जी गिरफ्तारी का भय दिखाकर करोड़ों रुपये अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया।

ईडी की 16 अक्टूबर 2026 की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, अहमदाबाद और मुंबई की साइबर क्राइम पुलिस द्वारा दर्ज कई एफआईआर के आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की गई थी। जांच में दो बुजुर्ग पीड़ितों से क्रमशः 1.15 करोड़ रुपये और 1.80 करोड़ रुपये की ठगी का मामला सामने आया। इस प्रकार दोनों पीड़ितों से कुल 2.95 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की गई।

फर्जी गिरफ्तारी का डर दिखाकर वसूली

जांच एजेंसी के अनुसार, आरोपियों ने खुद को सीबीआई और पुलिस अधिकारी बताकर पीड़ितों पर दबाव बनाया। उन्हें गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाया गया। इस मानसिक दबाव में पीड़ितों को रकम ऐसे बैंक खातों में भेजने के लिए मजबूर किया गया, जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर ठगी की रकम को इधर-उधर करने के लिए किया जा रहा था। ऐसे खातों को आम तौर पर म्यूल बैंक खाते कहा जाता है।

50 से अधिक खातों के जरिए रकम का लेन-देन

ईडी की जांच में पता चला कि ठगी से प्राप्त रकम को 50 से अधिक म्यूल खातों के जरिए कई स्तरों पर घुमाया गया। इसके बाद अलग-अलग स्थानों पर नकदी निकाली गई। एजेंसी के मुताबिक, रकम की निकासी भारत के विभिन्न स्थानों के साथ दुबई में भी की गई। जांच में इन बैंक खातों के संबंध में भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के पोर्टल पर दर्ज 396 लंबित साइबर अपराध शिकायतों से संबंध सामने आया है।

जांच एजेंसी का मानना है कि कई खातों के माध्यम से रकम को बार-बार स्थानांतरित करने और नकदी निकालने का उद्देश्य उसके वास्तविक स्रोत तथा लाभार्थियों की पहचान को छिपाना था।

क्रिप्टोकरेंसी और बीमा पॉलिसियों के जरिए रकम खपाने का आरोप

ईडी के मुताबिक, ठगी की रकम को नकदी निकासी, अंगड़िया चैनलों और क्रिप्टोकरेंसी की खरीद जैसे तरीकों से आगे बढ़ाया गया। इससे पैसों के लेन-देन की कड़ी का पता लगाना मुश्किल हो गया। जांच में बीमा पॉलिसियों के भुगतान के लिए क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल का मामला भी सामने आया।

एजेंसी के अनुसार, करीब 30 लाख रुपये एक ऐसे क्रेडिट कार्ड से जुड़े लेन-देन में लगाए गए, जिसे एक बीमा एजेंट से संबद्ध बताया गया है। यह कार्ड किसी तीसरे व्यक्ति के नाम पर जारी था, लेकिन इसका संचालन कथित तौर पर कोई अन्य व्यक्ति कर रहा था। प्राप्त रकम का इस्तेमाल तीसरे पक्ष की बीमा पॉलिसियों के प्रीमियम भरने के लिए किया गया। जांच एजेंसी इसे कथित अवैध धन को वैध वित्तीय व्यवस्था में शामिल करने की प्रक्रिया का हिस्सा मान रही है।

38 लाख रुपये की संपत्ति जब्त करने की कार्रवाई

ईडी ने मामले में आरोपियों से संबंधित सूरत स्थित करीब 30 लाख रुपये मूल्य का एक फ्लैट और 8 लाख रुपये की तीन सावधि जमा (एफडी) पहले ही अटैच कर दी हैं। इन संपत्तियों का कुल मूल्य लगभग 38 लाख रुपये बताया गया है।

जांच अभी जारी

ईडी के अनुसार, यह मामला साइबर ठगी, म्यूल बैंक खातों, क्रेडिट कार्ड के कथित दुरुपयोग, नकदी निकासी और क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से धन छिपाने के जटिल तरीके को दर्शाता है। एजेंसी ने विशेष पीएमएलए अदालत में अभियोजन शिकायत दाखिल कर दी है, जबकि मामले में आगे की जांच जारी है।

साइबर सुरक्षा संदेश

किसी भी अनजान व्यक्ति के वीडियो कॉल या फोन पर खुद को पुलिस, सीबीआई अथवा अन्य जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर गिरफ्तारी का डर दिखाने पर घबराकर पैसे ट्रांसफर न करें। किसी भी एजेंसी की कथित जांच के नाम पर बैंक विवरण, ओटीपी या धनराशि साझा करने से पहले संबंधित विभाग से स्वतंत्र रूप से पुष्टि करें। साइबर ठगी होने पर तुरंत 1930 हेल्पलाइन या राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं।

16/10/2026

शिकायतों को दबाने नहीं, न्याय दिलाने की मिसाल बन रहा सिरसा का प्रशासन

उपायुक्त श्री शांतनु शर्मा के नेतृत्व में जवाबदेही और पारदर्शिता से मजबूत हो रहा आमजन का विश्वास

नगरयात्रा न्यूज, सिरसा। लोकतंत्र की असली ताकत केवल सरकारी योजनाओं, बड़े-बड़े दावों और प्रशासनिक बैठकों में नहीं, बल्कि उस भरोसे में छिपी होती है जो आम नागरिक को सरकारी व्यवस्था से न्याय मिलने की उम्मीद देता है। जब कोई व्यक्ति अपनी समस्या लेकर किसी सरकारी कार्यालय में पहुंचता है, तो वह केवल शिकायत दर्ज नहीं करवाता, बल्कि व्यवस्था पर अपना विश्वास भी जताता है। ऐसे में यदि उसकी शिकायत फाइलों में दबकर रह जाए, अधिकारी सुनवाई करने के बजाय टालमटोल करें और बार-बार चक्कर लगाने के बावजूद समाधान न मिले, तो यह स्थिति निश्चित रूप से चिंताजनक होती है।

सिरसा में शिकायतों के निस्तारण को लेकर प्रशासन द्वारा अपनाया जा रहा सख्त रुख इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। उपायुक्त श्री शांतनु शर्मा के नेतृत्व में शिकायतों के समाधान और अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर दिखाई जा रही गंभीरता आमजन के लिए उम्मीद की किरण बन सकती है। प्रशासन की प्राथमिकता केवल शिकायतों को दर्ज करना नहीं, बल्कि उनकी वास्तविक स्थिति की जांच करवाना, संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करना और निर्धारित समय सीमा में समाधान सुनिश्चित करना होनी चाहिए।

शिकायतकर्ता की आवाज को गंभीरता से सुनना ही सुशासन की पहली शर्त है। प्रशासनिक व्यवस्था में अक्सर यह देखने को मिलता है कि एक विभाग से दूसरे विभाग तक फाइलें घूमती रहती हैं। शिकायतकर्ता को कभी एक अधिकारी के पास भेजा जाता है, तो कभी दूसरे कार्यालय में जाने की सलाह दी जाती है। कई बार समस्या का समाधान करने के बजाय शिकायत को बंद करने या उसकी गंभीरता कम करके दिखाने पर जोर दिया जाता है। ऐसी कार्यशैली आम नागरिक को निराश करती है और सरकारी व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करती है।

ऐसे माहौल में उपायुक्त श्री शांतनु शर्मा का नेतृत्व जिला प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण है। शिकायतों के निस्तारण में समयबद्धता, पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर दिया जाना आवश्यक है, ताकि अधिकारियों तक यह स्पष्ट संदेश पहुंचे कि जनता की समस्याओं को नजरअंदाज करना उचित नहीं है। शिकायतों को फाइलों में दबाकर रखने के बजाय उनका निष्पक्ष समाधान सुनिश्चित करना ही प्रशासनिक जिम्मेदारी का वास्तविक प्रमाण है।

शुक्रवार को लघु सचिवालय में शिकायतों के समाधान की प्रगति की समीक्षा से संबंधित खबर प्रशासनिक जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित करती है। खबर के अनुसार, चंडीगढ़ मुख्यालय स्तर पर भी शिकायतों की समीक्षा की गई और जिला स्तर पर लंबित शिकायतों की स्थिति पर ध्यान दिया गया। संबंधित अधिकारियों को मामलों को गंभीरता से लेते हुए समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।

इस तरह की पहल तभी सार्थक होगी, जब बैठकों में दिए गए निर्देश धरातल पर दिखाई देंगे। शिकायतों की समीक्षा केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि शिकायतकर्ता को वास्तव में राहत मिली या नहीं, समस्या का स्थायी समाधान हुआ या नहीं और संबंधित विभाग ने अपनी जिम्मेदारी पूरी की या नहीं। किसी शिकायत को निस्तारित घोषित कर देना और उसका वास्तविक समाधान कर देना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।

उपायुक्त श्री शांतनु शर्मा के समक्ष अवसर है कि वे शिकायत निवारण व्यवस्था को सिरसा जिले में सुशासन की एक प्रभावी मिसाल बनाने की दिशा में आगे बढ़ाएं। प्रत्येक विभाग की लंबित शिकायतों की नियमित समीक्षा, अनावश्यक देरी के कारणों की जांच, लापरवाही प्रमाणित होने पर नियमानुसार कार्रवाई और शिकायतकर्ता को स्पष्ट जानकारी देने की व्यवस्था इस दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

जिला प्रशासन का नेतृत्व करने वाले उपायुक्त की भूमिका केवल सरकारी योजनाओं की निगरानी तक सीमित नहीं होती। आमजन की समस्याओं को सुनना, विभागों के बीच समन्वय स्थापित करना और अधिकारियों को जवाबदेह बनाना भी उनकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल है। जब जिला प्रशासन का नेतृत्व स्पष्ट प्राथमिकताएं तय करता है, तो उसका सकारात्मक असर पूरे प्रशासनिक तंत्र पर पड़ सकता है। इससे ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों का मनोबल बढ़ता है और जिम्मेदारी से बचने वालों को भी अपनी कार्यशैली सुधारने का संदेश मिलता है।

एक आम नागरिक की सबसे बड़ी अपेक्षा यही होती है कि उसकी बात सुनी जाए और उसे उचित समय में न्याय मिले। किसी गरीब व्यक्ति, छोटे व्यापारी, बुजुर्ग या आर्थिक परेशानी से जूझ रहे परिवार के लिए बार-बार सरकारी कार्यालय जाना आसान नहीं होता। हर चक्कर के साथ उसका समय, पैसा और मानसिक शांति प्रभावित होती है। इसलिए प्रशासन को ऐसी व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जिसमें शिकायतकर्ता को अपनी समस्या के समाधान के लिए अनावश्यक रूप से भटकना न पड़े। शिकायत की स्थिति की जानकारी उपलब्ध हो, जिम्मेदार अधिकारी की पहचान स्पष्ट हो और कार्रवाई की समय सीमा तय हो।

प्रशासनिक सख्ती का उद्देश्य केवल अधिकारियों पर दबाव बनाना नहीं, बल्कि व्यवस्था को अधिक प्रभावी और जनहितकारी बनाना होना चाहिए। प्रत्येक शिकायत की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जहां अधिकारी की लापरवाही प्रमाणित हो, वहां नियमानुसार कार्रवाई हो और जहां शिकायतकर्ता को राहत देने के लिए सुधारात्मक कदम आवश्यक हों, वहां उन्हें प्राथमिकता से उठाया जाए। किसी अधिकारी के विरुद्ध केवल आरोप लगने के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय तथ्यों, रिकॉर्ड और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर निर्णय लेना भी जरूरी है। यही निष्पक्ष प्रशासन की पहचान है।

सिरसा के नागरिकों को उम्मीद है कि उपायुक्त श्री शांतनु शर्मा के नेतृत्व में शिकायतों के निस्तारण को लेकर गंभीरता लगातार बनी रहेगी। लंबित मामलों की पहचान होगी, विभागीय जवाबदेही तय होगी और शिकायतकर्ताओं को वास्तविक राहत मिलेगी। प्रशासनिक बैठकों में लिए गए निर्णय तभी सार्थक होंगे, जब उनका असर आम आदमी के जीवन में दिखाई देगा।

उपायुक्त श्री शांतनु शर्मा के नेतृत्व में सिरसा प्रशासन यदि शिकायतों के समाधान, पारदर्शिता और जवाबदेही को सर्वोच्च प्राथमिकताओं में रखता है, तो यह जिले में सुशासन की मजबूत मिसाल बन सकता है। किसी भी प्रशासन की सफलता का वास्तविक पैमाना यह नहीं है कि कितनी बैठकें हुईं या कितने आदेश जारी किए गए। उसकी असली पहचान इस बात से होती है कि कितने लोगों की समस्याओं का समाधान हुआ, कितने जरूरतमंदों को राहत मिली और कितने नागरिक सरकारी कार्यालय से न्याय मिलने का भरोसा लेकर लौटे।

जनता को आश्वासन से अधिक परिणाम चाहिए। अब समय है कि शिकायतों के निस्तारण में दिखाई जा रही गंभीरता का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और सिरसा प्रशासन ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करे, जहां शिकायतकर्ता की आवाज को दबाया नहीं, बल्कि गंभीरता से सुना जाए। उपायुक्त श्री शांतनु शर्मा के नेतृत्व में इस दिशा में निरंतर प्रयास सिरसा में जनता और प्रशासन के बीच विश्वास के रिश्ते को और मजबूत कर सकते हैं।

— संपादक
हरिप्रसाद मुदगिल

16-10-26- ये कैसा पब्लिक हेल्थ का सिस्टम है?= आरओ वॉटर की सप्लाई का दावा और कैंपर का पानी पीने को मजबूर पब्लिक?= सीवर पर...
16/10/2026

16-10-26

- ये कैसा पब्लिक हेल्थ का सिस्टम है?
= आरओ वॉटर की सप्लाई का दावा और कैंपर का पानी पीने को मजबूर पब्लिक?
= सीवर पर टे्रक्टर पंप फिट और बैक मार रही सीवर लाइन?
- कागजों में हर माह बनाए जा रहे लाखों के बिल?
नगरयात्रा न्यूज, सिरसा। सिरसा में बड़े स्तर पर गोलमाल चल रहा है। लगता है जैसे सिरसा को लूटने-खसूटने का ठेका लिया है। विभिन्न विभागों की कारगुजारियों से तो ऐसा ही प्रतीत होता है कि सिरसा में छांट-छांट के अधिकारियों को भेजा गया है। ऐसे अधिकारी पूरे मामले पर आंखें मूंदे हुए है या फिर उन्हें निर्धारित मंथली हासिल हो रही है। पब्लिक हेल्थ विभाग के घपले-घोटाले किसी से छिपे नहीं है? फर्जी फिनोलेक्स केबल मामले में आधा दर्जन अधिकारियों पर पहले ही मामला दर्ज हो चुका है। लैबोरेट्री की जांच रिपोर्ट में नए ट्यूबवेल पर लगाई गई केबल नकली पाई गई थी।
पब्लिक हेल्थ विभाग द्वारा जलघर बनाए गए, इसमें भी गोलमाल किया गया। जांच के बाद मामले में विभाग के जेई, एसडीओ व एक्सईएन पर मामले दर्ज हुए। लेकिन यह सिलसिला आज भी थमा नहीं है। शहरवासियों को आरओ जैसा पेयजल उपलब्ध करवाने का दावा किया जाता है, जबकि जमीनी हकीकत मैला और बदबूदार पानी पीने को मिल रहा है?
शहर की विभिन्न कालोनियों में जो जलापूर्ति की जा रही है, उसमें बदबू आती है। लोग चीखते-चिल्लाते है, लेकिन अनसुना कर दिया जाता है। टोल फ्री नंबर पर दर्ज शिकायतें कागजों में ही हल कर दी जाती है। आलम यह रहा कि सिरसा के विधायक गोकुल सेतिया को मामला अपने हाथ में लेना पड़ा। फिर भी सुधार नहीं हुआ।
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- स्वच्छ पेयजल के नाम पर करोड़ों फूंके
सरकार की ओर से सिरसा के निवासियों को स्वच्छ पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए करेाड़ों रुपये की ग्रांट जारी की गई। विभागीय अधिकारियों की ओर से पानी की भांति पैसा खर्चा गया। लेकिन आज भी बड़ी आबादी ट्यूबवेल का पानी पीने को मजबूर है, जिसका टीडीएस बढ़ा हुआ बताया जाता है। सवाल यह है कि स्वच्छ पेयजल के लिए जब नए जलघर बन चुके, नई पाइप लाइन बिछ चुकी तब स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति क्यों नहीं? आखिर ये किसकी जवाबदेही है?
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- बोतलबंद पानी पीने को मजबूर लोग
शहर में प्रदूषित जलापूर्ति की वजह से शहर में बोतलबंद पानी की सर्वाधिक बिक्री होती है। कैंपर वॉटर तो सिरसा में एक बड़ा उद्योग ही बन चुका है। लोग ठंडे पानी के लिए नहीं बल्कि स्वच्छ पीने के पानी के लिए कैंपर मंगवाते है। यदि लोगों को स्वच्छ पानी मिलें तो वे कैंपर पर आश्रित ही क्यों हो?
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- उफान मार रहे सीवरेज
पब्लिक हेल्थ के लिए सीवरेज भी कमाई का रास्ता बन चुका है। पहले सीवर लाइन बिछाने में गोलमाल,फिर सीवर लाइन की सफाई के नाम पर गोलमाल। शहर में विभाग द्वारा सीवर लाइन की सफाई के लिए अनेक जगहों पर स्थायी रूप से पंप लगाए हुए है, कई जगह ट्रेक्टर सहित पंप भी लगा रखे है। हैरानी की बात यह है कि इसके बावजूद जगह-जगह पर सीवर बैक मार रहा है। सीवर का मलयुक्त पानी सड़कों पर फैल रहा है? सवाल यह है कि आखिर सीवर लाइन सफाई के नाम पर रोजाना खर्चें जा रहे लाखों रुपये किधर जा रहे है?
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- स्वतंत्र एजेंसी करें ऑडिट
पेयजल और सीवरेज व्यवस्था के संचालन, सफाई, मरम्मत तथा अन्य कार्यों पर सरकारी खजाने से राशि खर्च की जाती है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि इन कार्यों पर होने वाले खर्च के अनुपात में शहरवासियों को राहत क्यों नहीं मिल रही? यदि नियमित रूप से सफाई, मरम्मत और रखरखाव के बिल तैयार किए जा रहे हैं, तो विभाग को उनका कार्यवार विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। किन क्षेत्रों में कितनी राशि खर्च हुई, कितनी सीवर लाइनों की सफाई की गई, कितनी शिकायतों का निपटारा हुआ और कितनी जगह नई पाइपलाइन बिछाई गई—इन सवालों का जवाब जनता को मिलना चाहिए। पूरे मामले की किसी स्वतंत्र एजेंसी से ऑडिट करवाए जाने की नितांत आवश्यकता है।
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- पब्लिक मांगे जवाब
अब जरूरत इस बात की है कि पब्लिक हेल्थ विभाग शहर के उन क्षेत्रों की पहचान करे, जहां पेयजल दूषित होने या सीवर बैक मारने की शिकायतें लगातार मिल रही हैं। पानी के नमूनों की जांच करवाई जाए, रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए और आवश्यकता के अनुसार पाइपलाइनों की मरम्मत अथवा बदलाव किया जाए। साथ ही सीवर सफाई और रखरखाव पर हुए खर्च का भी पारदर्शी हिसाब सामने आना चाहिए।
आखिर सवाल आम आदमी की सेहत और सरकारी धन के सदुपयोग का है। यदि शहरवासियों को स्वच्छ पानी उपलब्ध करवाना और सीवरेज व्यवस्था को दुरुस्त रखना विभाग की जिम्मेदारी है, तो फिर इन बुनियादी सुविधाओं के लिए लोगों को बार-बार शिकायतें क्यों करनी पड़ रही हैं? सिरसा की जनता को कागजी दावों से नहीं, धरातल पर सुधार से मतलब है। सिरसा की जनता जवाब चाहती है, कोरे आश्वासन नहीं?

16/10/2026

रिलायंस पावर की 2,032 करोड़ रुपये की परिसंपत्तियां ईडी ने कीं जब्त

विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के तहत बड़ी कार्रवाई, विदेश में रखी गई संपत्तियों और संदिग्ध लेन-देन की जांच तेज

2006 में विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड के जरिए जुटाए गए थे 300 मिलियन डॉलर, सिंगापुर की सहायक कंपनी में निवेश और विदेश में धन रखने के मामले की पड़ताल जारी

नई दिल्ली। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की मुख्यालय अन्वेषण इकाई ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा), 1999 की धारा 37ए के तहत बड़ी कार्रवाई करते हुए रिलायंस पावर लिमिटेड (आरपीएल) की 2,032.81 करोड़ रुपये मूल्य की परिसंपत्तियां जब्त की हैं। ईडी की 14 अक्टूबर 2026 की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, जब्त की गई परिसंपत्तियों में कंपनी के बैंक खातों में उपलब्ध शेष राशि तथा सासन पावर लिमिटेड में उसकी शेयरधारिता शामिल है। एजेंसी के मुताबिक, ये परिसंपत्तियां भारत के बाहर रखी गई विदेशी मुद्रा के समतुल्य मूल्य की हैं और फेमा की धारा 4 के कथित उल्लंघन से संबंधित हैं।

ईडी ने यह जांच भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) से प्राप्त जानकारी के आधार पर शुरू की थी। जांच का केंद्र रिलायंस पावर की लेखा पुस्तकों में दर्ज लगभग 2,101.46 करोड़ रुपये की राशि को बट्टे खाते में डालने अथवा उसके लिए प्रावधान किए जाने से जुड़ा मामला रहा। एजेंसी के अनुसार, ये राशियां ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स (बीवीआई) और केमैन आइलैंड्स में स्थित कंपनियों में किए गए विदेशी निवेश तथा उन्हें दिए गए अग्रिम से संबंधित थीं।

2,032 करोड़ रुपये से अधिक की परिसंपत्तियों पर कार्रवाई

प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, ईडी ने फेमा की धारा 37ए के अंतर्गत रिलायंस पावर की 2,032.81 करोड़ रुपये की परिसंपत्तियों को जब्त किया है। इस कार्रवाई में कंपनी के बैंक खातों में उपलब्ध धनराशि और सासन पावर लिमिटेड में उसकी हिस्सेदारी शामिल है।

फेमा की धारा 37ए विदेश में रखी गई ऐसी परिसंपत्तियों के विरुद्ध कार्रवाई का प्रावधान करती है, जिनके संबंध में भारत से बाहर विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूतियों या अचल संपत्ति रखने के मामले में अधिनियम की धारा 4 के उल्लंघन का संदेह हो। इस मामले में ईडी की कार्रवाई विदेशी निवेश और संबंधित वित्तीय लेन-देन की जांच से जुड़ी है।

सेबी से मिली जानकारी के बाद शुरू हुई जांच

ईडी के मुताबिक, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड से प्राप्त सूचना के आधार पर मामले की पड़ताल शुरू की गई। जांच में रिलायंस पावर की लेखा पुस्तकों में लगभग 2,101.46 करोड़ रुपये की राशि को बट्टे खाते में डालने अथवा उसके लिए प्रावधान किए जाने से जुड़े लेन-देन सामने आए।

एजेंसी के अनुसार, इन रकमों का संबंध ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स और केमैन आइलैंड्स में स्थित कंपनियों में किए गए निवेश तथा उन्हें दिए गए अग्रिम से था। जांच एजेंसी इन वित्तीय लेन-देन की वास्तविक प्रकृति, धनराशि के उपयोग और संबंधित कंपनियों के बीच संबंधों की पड़ताल कर रही है।

मार्च 2026 में तलाशी, कई दस्तावेज जब्त

प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि ईडी ने 6 मार्च 2026 से 8 मार्च 2026 तक तलाशी अभियान चलाया था। इस दौरान कई अपराध-संकेतक साक्ष्य जब्त किए गए और अनेक व्यक्तियों के बयान दर्ज किए गए।

तलाशी के दौरान प्राप्त दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर विदेशी निवेश, संबंधित कंपनियों को दिए गए अग्रिम तथा धनराशि के इस्तेमाल से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जांच की गई। एजेंसी का कहना है कि मामले में वित्तीय लेन-देन की कड़ियों को जोड़ने और धन के वास्तविक उपयोग का पता लगाने के लिए आगे की पड़ताल जारी है।

2006 में 300 मिलियन डॉलर जुटाने का मामला

ईडी की जांच में रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज लिमिटेड (आरएनआरएल), जिसका बाद में आरपीएल में विलय हो गया था, से जुड़ा एक महत्वपूर्ण वित्तीय लेन-देन भी सामने आया। प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, वर्ष 2006 में विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड के माध्यम से 300 मिलियन अमेरिकी डॉलर जुटाए गए थे।

इसमें से 275 मिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि सिंगापुर स्थित पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज (सिंगापुर) प्राइवेट लिमिटेड (आरएनआरएल-एस) में निवेश की गई थी। ईडी इस निवेश के आगे के इस्तेमाल और उससे जुड़े वित्तीय लेन-देन की भी जांच कर रही है।

स्विस बैंक खाते और विदेशी कंपनियों को दिए गए ऋण जांच के दायरे में

प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, आरएनआरएल-एस ने संबंधित धनराशि को स्विट्जरलैंड के जिनेवा स्थित डॉन्चे बैंक (एसए) में जमा किया था। इस जमा राशि का इस्तेमाल ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स में निगमित संस्थाओं को दिए गए ऋणों के लिए संपार्श्विक के रूप में किया गया।

ईडी की जांच में यह भी सामने आया कि इन बीवीआई संस्थाओं का नियंत्रण और प्रबंधन रिलायंस अनिल अंबानी समूह (आरएजी) द्वारा भारत से ऐसे मुखौटा व्यक्तियों के माध्यम से किया जा रहा था, जो समूह के निर्देशों के अनुसार कार्य करते थे। एजेंसी इन कंपनियों की भूमिका और उनके जरिए हुए लेन-देन की जांच कर रही है।

विदेश से धन भारत लाने के बजाय बाहर रखने की आशंका

ईडी के अनुसार, आगे की जांच में यह भी सामने आया कि ऋण से प्राप्त धनराशि का इस्तेमाल विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया गया। इनमें मॉरीशस स्थित विदेशी संस्थाओं के माध्यम से धनराशि को अस्थायी रूप से घुमाकर भारत वापस लाने से संबंधित गतिविधियां भी शामिल थीं।

प्रेस विज्ञप्ति में एजेंसी ने आरोप लगाया है कि इस धनराशि का उपयोग रिलायंस अनिल अंबानी समूह के लाभ के लिए किया गया और इसे भारत के बाहर रखा गया। जांच एजेंसी इस बात का पता लगा रही है कि धनराशि किन संस्थाओं के माध्यम से स्थानांतरित हुई, इसका वास्तविक लाभार्थी कौन था और संबंधित लेन-देन का उद्देश्य क्या था।

ऋण के पुनर्भुगतान में विफलता और दस्तावेजों की भूमिका

ईडी की प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, बीवीआई संस्थाएं डॉन्चे बैंक द्वारा दिए गए ऋणों का पुनर्भुगतान करने में विफल रहीं। एजेंसी का कहना है कि इन लेन-देन को छिपाने के प्रयास के तहत ऐसे दस्तावेज तैयार किए गए, जिनमें यह दर्शाया गया कि आरएनआरएल-एस और आरपीएल की इंडोनेशिया स्थित सहायक कंपनियों ने बीवीआई संस्थाओं को कथित तौर पर वास्तविक व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए अग्रिम राशि दी थी।

जांच के दौरान एजेंसी को ऐसे दस्तावेजों के पूर्व दिनांकित होने और लेन-देन को वास्तविक व्यावसायिक गतिविधियों के रूप में प्रस्तुत करने के उद्देश्य से तैयार किए जाने के संकेत मिले। ईडी इन दस्तावेजों की प्रामाणिकता, धनराशि के प्रवाह और संबंधित कंपनियों की भूमिका की जांच कर रही है।

आगे भी जारी रहेगी जांच

ईडी ने स्पष्ट किया है कि मामले में आगे की जांच जारी है। अब जांच के महत्वपूर्ण पहलुओं में विदेशी कंपनियों के माध्यम से हुए वित्तीय लेन-देन, स्विस बैंक खाते में रखी गई धनराशि, ऋणों के पुनर्भुगतान, कथित मुखौटा कंपनियों की भूमिका और भारत के बाहर रखी गई परिसंपत्तियों का पता लगाना शामिल है।

2,032.81 करोड़ रुपये की परिसंपत्तियों को जब्त किए जाने की यह कार्रवाई विदेशी निवेश और सीमा-पार वित्तीय लेन-देन से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, मामले में लगाए गए आरोपों और जांच के निष्कर्षों को अंतिम न्यायिक निर्णय से अलग समझना जरूरी है। ईडी की जांच पूरी होने और संबंधित कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ने के बाद ही मामले के सभी पहलुओं की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

14/10/2026

NSEIT मामले में बड़ा खुलासा: ₹3,464 करोड़ की संपत्तियां कुर्क, 5,682 निवेशकों को ₹1,950 करोड़ लौटाने का रास्ता साफविशेष ...
14/10/2026

NSEIT मामले में बड़ा खुलासा: ₹3,464 करोड़ की संपत्तियां कुर्क, 5,682 निवेशकों को ₹1,950 करोड़ लौटाने का रास्ता साफ

विशेष पीएमएलए अदालत ने पुनर्स्थापन आदेश जारी किया, भुगतान में चूक से जुड़े मामले में निवेशकों को राहत मिलने की उम्मीद

नगरयात्रा न्यूज। नेशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड (एनएसईएल) से जुड़े NSEIT मामले में निवेशकों को राहत देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। मुंबई की विशेष धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) अदालत ने 12 अक्टूबर 2026 को पुनर्स्थापन संबंधी आदेश जारी करते हुए 5,682 निर्धारित निवेशकों को करीब 1,950 करोड़ रुपये की धनराशि लौटाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ किया है। इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) अब तक लगभग 3,464 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्तियां कुर्क कर चुका है। मामले में हजारों निवेशकों की रकम फंसने के बाद से ही भुगतान और वसूली को लेकर कानूनी प्रक्रिया जारी थी।

उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार, मुंबई स्थित विशेष पीएमएलए अदालत ने पीएमएलए विशेष मामला संख्या 4/2015 तथा ईसीआईआर संख्या 169/2026 से संबंधित प्रकरण में 8 अक्टूबर 2026 को पारित अपने आदेश के आधार पर यह कार्रवाई की। आदेश के तहत कुर्क की गई संपत्तियों के पुनर्स्थापन और निवेशकों को भुगतान सुनिश्चित करने के लिए निर्धारित व्यवस्था को आगे बढ़ाया गया है। अदालत के इस कदम को लंबे समय से भुगतान की प्रतीक्षा कर रहे निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

13 हजार निवेशकों को हुआ था नुकसान

एनएसईएल से जुड़े इस मामले की जड़ वर्ष 2013 में सामने आए भुगतान संकट से जुड़ी है। दस्तावेज में उल्लेख है कि वास्तविक स्टॉक की उपलब्धता के बिना कमोडिटी बाजार में कारोबार करने की अनुमति दिए जाने के आरोपों के बाद हजारों निवेशक प्रभावित हुए थे। इस मामले में करीब 13,000 निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ा और लगभग 5,600 करोड़ रुपये की बकाया राशि का मामला सामने आया।

मामले में एनएसईएल प्लेटफॉर्म प्रदाता, उसके निदेशकों, प्रमुख अधिकारियों, 25 चूककर्ता सदस्यों तथा अन्य व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी, आपराधिक न्यासभंग और जालसाजी जैसे आरोप दर्ज किए गए थे। आरोपों की जांच के दौरान वित्तीय लेन-देन और संपत्तियों की पड़ताल की गई। हालांकि, किसी भी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण संबंधित न्यायिक कार्यवाही के अधीन है।

ईडी ने कुर्क की 3,464 करोड़ रुपये की संपत्तियां

प्रवर्तन निदेशालय ने धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 के तहत मामले की जांच करते हुए अब तक 35 अनंतिम कुर्की आदेश जारी किए हैं। इन आदेशों के माध्यम से करीब 3,464.03 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्तियों को कुर्क किया गया है। इसके अतिरिक्त, ईडी ने विशेष अदालत के समक्ष अभियोजन शिकायतें और अनुपूरक शिकायतें भी दायर की हैं।

जांच एजेंसी की कार्रवाई का उद्देश्य कथित वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित संपत्तियों का पता लगाना और कानून के तहत उपलब्ध प्रक्रिया के माध्यम से प्रभावित निवेशकों के हितों की रक्षा करना है। कुर्की का अर्थ संपत्तियों पर कानूनी प्रतिबंध लगाना है; संपत्तियों की कुर्की और निवेशकों को वास्तविक भुगतान दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।

5,682 निवेशकों के लिए बनी थी समझौता योजना

दस्तावेज के मुताबिक, राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (एनसीएलटी), मुंबई ने 28 नवंबर 2025 को कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 230 से 232 के तहत एक समझौता योजना को मंजूरी दी थी। इस योजना के तहत 5,682 निर्धारित ऋणदाताओं के लिए कुल 1,950 करोड़ रुपये की समझौता राशि तय की गई थी।

योजना को 92 प्रतिशत से अधिक ऋणदाताओं की स्वीकृति प्राप्त हुई थी। इसके तहत प्रत्येक पात्र ऋणदाता को उसके सत्यापित दावे की कम से कम 42 प्रतिशत राशि वापस मिलने का प्रावधान बताया गया। इस योजना का उद्देश्य उपलब्ध राशि और निर्धारित शर्तों के आधार पर पात्र निवेशकों को भुगतान करना है।

हालांकि, योजना को लेकर कानूनी चुनौती भी दी गई थी। राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (एनसीएलएटी) ने 15 जनवरी 2026 को योजना की मंजूरी को चुनौती देने वाली अपील खारिज कर दी थी। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत चुनौती भी खारिज किए जाने का उल्लेख दस्तावेज में है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद आगे बढ़ी प्रक्रिया

दस्तावेज के अनुसार, 13 अप्रैल 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधित न्यायालयों और प्राधिकारियों को निर्देश दिया था कि पात्र निवेशकों को भुगतान सुनिश्चित करने के उद्देश्य से योजना के क्रियान्वयन के लिए उचित आदेश पारित किए जाएं। इसके बाद भुगतान और पुनर्स्थापन से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का आधार तैयार हुआ।

अब अक्टूबर 2026 में विशेष पीएमएलए अदालत द्वारा जारी पुनर्स्थापन आदेश को इसी प्रक्रिया की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। इससे कुर्क संपत्तियों और निर्धारित समझौता योजना के बीच कानूनी समन्वय स्थापित कर निवेशकों को राहत पहुंचाने की संभावना मजबूत हुई है।

क्या सभी निवेशकों को पूरी रकम वापस मिलेगी?

यह मामला निवेशकों के लिए राहत की उम्मीद जरूर जगाता है, लेकिन इसे सभी प्रभावित निवेशकों को पूरी रकम वापस मिलने की गारंटी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। दस्तावेज में 5,682 निर्धारित ऋणदाताओं के लिए 1,950 करोड़ रुपये की समझौता राशि का उल्लेख है। वास्तविक भुगतान पात्रता, सत्यापित दावों, योजना की शर्तों और अदालत के आदेश के क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।

वहीं, मूल भुगतान संकट में प्रभावित निवेशकों की संख्या करीब 13,000 बताई गई है। इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि निर्धारित योजना के तहत भुगतान किस प्रकार और कितने समय में किया जाता है तथा शेष प्रभावित निवेशकों के दावों का निस्तारण किस प्रक्रिया से होगा।

2013 से जारी है कानूनी लड़ाई

एनएसईएल भुगतान संकट वर्ष 2013 में सामने आया था। इसके बाद आर्थिक अपराध शाखा और प्रवर्तन निदेशालय सहित विभिन्न एजेंसियों ने मामले की जांच की। वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों, संपत्तियों की कुर्की, अदालतों में कानूनी चुनौतियों और समझौता योजना की मंजूरी के बीच यह मामला लंबे समय से चर्चा में रहा है।

करीब 13 वर्ष बाद भी निवेशकों की रकम की वसूली और भुगतान इस प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बना हुआ है। अब विशेष पीएमएलए अदालत के ताजा आदेश के बाद निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि तय प्रक्रिया के तहत भुगतान कब शुरू होता है और उन्हें वास्तविक रूप से कितनी राहत मिलती है।

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