रूहानियत से सराबोर (Ruhaniyat se Sraabor

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रूहानियत से सराबोर (Ruhaniyat se Sraabor आध्यात्म + समाज कल्याण + राष्ट्रवाद + स्

सेवा हमारा धर्म है, सेवा हमारा कर्म है,
धरती हिले, बदल फटे, आए सुनामी,
नदी की बहती धार या सूखे दरार, मुश्किल में
प्राण हो, सेलाब हो, या आग हो,

 शाह मस्ताना जी नूर उपाया, आलम जगमगाया दो जहां का मालिक सतगुरु, बेड़े तारण आया भूले भटके जीवों को है सीधा राह दिखाया, ना...
01/11/2025


शाह मस्ताना जी नूर उपाया, आलम जगमगाया दो जहां का मालिक सतगुरु, बेड़े तारण आया भूले भटके जीवों को है सीधा राह दिखाया, नाम का सौदा, सच्चा सौदा, सच्चा धर्म चलाया।
Saint Gurmeet Ram Rahim Singh Ji

 #रूहानियत_से_सराबोर यह मैसेज जितनी बार पढे उतना कम ही है ।  एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे...
25/10/2025

#रूहानियत_से_सराबोर
यह मैसेज जितनी बार पढे उतना कम ही है । एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं ... उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची ... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ ... आवाज आई ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये धीरे - धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये , फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ ... कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ .. अब तो पूरी भर गई है .. सभी ने एक स्वर में कहा .. सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी सी जगह में सोख ली गई ... प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो .... टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और शौक हैं , छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और रेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है .. अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी ... ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है ... यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा ... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ , घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक - अप करवाओ ... टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है ... पहले तय करो कि क्या जरूरी है ... बाकी सब तो रेत है .. छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे .. अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि " चाय के दो कप " क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया ... इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिए।

■◆आज की Moral Story◆■      ★◆अच्छे की कमी◆★ #रूहानियत_से_सराबोर एक कालेज का छात्र था जिसका नाम था रवि। हमेशा वह बहुत चुप...
17/10/2025

■◆आज की Moral Story◆■
★◆अच्छे की कमी◆★
#रूहानियत_से_सराबोर
एक कालेज का छात्र था जिसका नाम था रवि। हमेशा वह बहुत चुपचाप सा रहता था। किसी से ज्यादा बात नहीं करता था इसलिए उसका कोई दोस्त भी नहीं था। वह हमेशा कुछ परेशान सा रहता था। पर लोग उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे।

एक दिन वह क्लास में पढ़ रहा था। उसे गुमसुम बैठे देख कर अध्यापक महोदय उसके पास आये और क्लास के बाद मिलने को कहा।

क्लास खत्म होते ही रवि अध्यापक महोदय के कमरे में पहुंचा।

रवि मैं देखता हूँ कि तुम अक्सर बड़े गुमसुम और शांत बैठे रहते हो, ना किसी से बात करते हो और ना ही किसी चीज में रूचि दिखाते हो, इसलिए इसका सीधा असर तुम्हारी पढ़ाई में भी साफ नजर आ रहा है! इसका क्या कारण है ?” अध्यापक महोदय ने पूछा।

रवि बोला, मेरा भूतकाल का जीवन बहुत ही खराब रहा है, मेरी जिन्दगी में कुछ बड़ी ही दुखदायी घटनाएं हुई हैं, मैं उन्ही के बारे में सोच कर परेशान रहता हूँ, और किसी चीज में ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता हूँ।

अध्यापक महोदय ने ध्यान से रवि की बातें सुनी और मन ही मन उसे फिर से सही रास्ते पर लाने का विचार करके रविवार को घर पे बुलाया।

रवि निश्चित समय पर अध्यापक महोदय के घर पहुँच गया।
रवि क्या तुम नीम्बू शरबत पीना पसंद करोगे? अध्यापक ने पूछा।

जी। रवि ने झिझकते हुए कहा।
अध्यापक महोदय ने नीम्बू शरबत बनाते वक्त जानबूझ कर नमक अधिक डाल दिया और चीनी की मात्रा कम ही रखी।
शरबत का एक घूँट पीते ही रवि ने अजीब सा मुंह बना लिया।
अध्यापक महोदय ने पूछा, क्या हुआ, तुम्हे ये पसंद नहीं आया क्या?

जी, वो इसमे नमक थोड़ा अधिक पड़ गया है…. रवि अपनी बात कह ही रहा था की अध्यापक महोदय ने उसे बीच में ही रोकते हुए कहा, ओफ़-ओ, कोई बात नहीं मैं इसे फेंक देता हूँ, अब ये किसी काम का नहीं रहा…

ऐसा कह कर अध्यापक महोदय गिलास उठा ही रहे थे कि रवि ने उन्हें रोकते हुए कहा, नमक थोड़ा सा अधिक हो गया है तो क्या, हम इसमें थोड़ी और चीनी मिला दें तो ये बिलकुल ठीक हो जाएगा।

बिलकुल ठीक रवि यही तो मैं तुमसे सुनना चाहता था…. अब इस स्थिति की तुम अपनी जिन्दगी से तुलना करो, शरबत में नमक का ज्यादा होना जिन्दगी में हमारे साथ हुए बुरे अनुभव की तरह है….और अब इस बात को समझो, शरबत का स्वाद ठीक करने के लिए हम उसमे में से नमक नहीं निकाल सकते, इसी तरह हम अपने साथ हो चुकी दुखद घटनाओं को भी अपने जीवन से अलग नहीं कर सकते, पर जिस तरह हम चीनी डाल कर शरबत का स्वाद ठीक कर सकते हैं उसी तरह पुरानी कड़वाहट और दुखों को मिटाने के लिए जिन्दगी में भी अच्छे अनुभवों की मिठास घोलनी पड़ती है।

यदि तुम अपने अतीत का ही रोना रोते रहोगे तो ना तुम्हारा वर्तमान सही होगा और ना ही भविष्य उज्ज्वल हो पाएगा। अध्यापक महोदय ने अपनी बात पूरी की।

रवि को अब अपनी गलती का एहसास हो चुका था, उसने मन ही मन एक बार फिर अपने जीवन को सही दिशा देने का प्रण लिया।

★अक्सर बंद होते हुए दरवाजे की तरफ इतनी देर तक देखते रहते हैं कि हमें खुलते हुए अच्छे दरवाजों की भनक तक नहीं लगती और हमारा जीवन दुखों के सागर में ही डूबा रह जाता है, जरुरी है कि हम अपनी पुरानी गलतियों या फिर तकलीफ़ों को भूलना सीखें और जिंदगी को फिर से नयी दिशा की और मोड़ें।।

15/10/2025

■◆आज की Moral Story◆■
#रूहानियत_से_सराबोर
★◆●छोटा कद●◆★

पीपल के पेड़ के नीचे चम्पा नामक एक चींटी का बिल था। वह मिसरी की एक मोटी डली खींचकर अपने बिल की तरफ लाने का प्रयास कर रही थी। डली बड़ी होने से चंपा को काफी तकलीफ हो रही थी। उसका बिल भी काफी दूर था।

और कई दिनों से चंपा बीमार चल रही थी। इसलिए वह आने वाले बरसात के मौसम के लिये अपना भोजन इकट्ठा नहीं कर सकी थी। तब वह अपने लिए भोजन खोजने निकली थी, तो कुछ दूर जाने पर उसे एक मोटी सी मिसरी की डली मिल गयी थी।

इतनी बड़ी मिसरी की डली को देखकर वह प्रसन्न हो गई थी और मन ही मन सोच रही थी कि यह डली कई दिनों तक क्या बल्कि महीनों तक उसके भोजन में काम आयेगी।

चंपा बड़ी मुश्किल से उस डली को मुंह में दबाई खींच रही थी। अचानक आकाश में बादल घिर आये। तेज हवा चलने लगी। हवा की ठंडी फुहार को देखकर चंपा समझ गई थी कि कुछ ही देर बाद बारिश शुरू होने वाली है। और अभी उसका बिल बहुत दूर है।

अतः उसने पूरी ताकत जुटाकर जल्दी-जल्दी उस डली को खींचने की कोशिश की, परंतु तभी मोटी-मोटी बूंदे गिरने लगी। चंपा हताश हो गयी।

उसने जान लिया था कि मिसरी की डली को अब वह अपने बिल तक नहीं ले जा सकती। बारिश के पानी से जल्दी ही गल जाएगी। उस समय उसे अपना छोटा कद होने पर बढ़ा दुःख हो रहा था।

वहीं एक अन्य पेड़ पर बैठी गुल नामक एक बुलबुल बड़ी देर से चंपा चींटी को मिसरी की डली खींचते देख रही थी और अब बारिश होते देख वह समझ गयी कि पानी में मिसरी गल जायेगी और चंपा चींटी की मेहनत बेकार हो जायेगी।

वह तुरंत उसके पास आयी और सहानुभूति पूर्ण स्वर में बोली- “चंपा, तुम कहो तो इस डली को मैं तुम्हारे बिल तक पहुंचा दूँ, वरना यह बारिश के पानी से गल जायेगी।”

“बहन बुलबुल, यदि तुम मेरी सहायता कर दो, तो मैं सचमुच तुम्हारा यह उपकार जीते जी नहीं भूलूंगी।” फिर चंपा के कहने पर बुलबुल ने डली को अपनी चोंच में दबाया और उसके बिल पहुँचा आई।

तब चंपा खुश होकर बोली- “तुम बहुत अच्छी हो गुल, सदा सबकी सहायता करने को तैयार रहती हो। बहन, एक मैं हूं, इतनी छोटी सी हूं कि किसी के काम नहीं आ सकती।”

इस पर गुल झट से बोली- “नहीं चंपा, ऐसा नहीं कहते, तुम अपने आप को छोटा क्यों समझती हो, जबकि तुम्हारा दिल तो बहुत बड़ा है और तुम्हारे विचार भी बहुत अच्छे हैं। देखो बहन, शरीर के छोटा होने से कुछ नहीं होता, दिल बड़ा होना चाहिए।” और फिर गुल अपने घर चली गयी।

चंपा ने धीरे-धीरे मिसरी की उस मोटी डली को अपने बिल में खींच लिया।

समय गुजरता रहा। बरसात के मौसम में चींटी मिसरी की डली को खाती रही और मन ही मन बुलबुल का आभार व्यक्त करती रही।

बरसात का मौसम गुजर गया। सितंबर के महीने में मौसम साफ होने लगा। स्कूल, कॉलेज खुल गये।

एक दिन स्कूल के बच्चे पिकनिक मनाने के उद्देश्य से जंगल में आये। उन्होंने बुलबुल के पेड़ के नीचे ही अपना डेरा जमा लिया। अचानक शरारती लड़के की नजर बुलबुल के घोंसले पर पड़ गयी।

वह खुशी से चिल्लाया- “ऐ बच्चों ! वह देखो बुलबुल का घोंसला! मैं पेड़ पर चढ़कर अभी उसके अंडे लाता हूँ।”

उसकी बात सुनकर घोसले में बैठी गुल बुलबुल का दिल दहलने लगा। वह दु:खी मन से अपने अंडों की तरफ देखने लगी। कई दिनों से वह उन्हें ‘सेक’ रही थी और अब तो एक-दो दिन बाद ही उनमें से बच्चे भी निकलने वाले थे।

उस शरारती लड़के की बात चंपा चींटी ने भी सुन ली थी। उसे लगा जल्दी ही कुछ ना किया तो गुल बुलबुल के अंडे वह लड़का फोड़ देगा। परंतु चंपा चींटी अपने छोटे कद का ख्याल कर सोचने लगी- ‘वह कैसे गुल के अंडों की रक्षा करें ?’

लड़का जब पेड़ पर चढ़ने लगा तो चंपा को अचानक एक युक्ति याद आ गयी। उसने अपनी सहेली चींटी को इकट्ठा किया और बोली- “बहनों ! आज एक मानव हमारी बिरादरी के एक पक्षी को क्षति पहुँचाने की कोशिश कर रहा है, कल वह हमें भी क्षति पहुंँचा सकता है। इसलिये उसको आज ऐसा सबक सिखाया जाये की कल वह हममें से किसी को भी कोई नुकसान न पहुँचाये। अतः मेरा आपसे निवेदन है कि हमें उस पर टूट पड़ना चाहिए।”

इतना सुनते ही चींटीयों के झुंड के झुंड पेड़ पर चढ़े और उस लड़के को काटने लगे।

लडका चीख मारता पेड़ से नीचे उतर गया और फिर तिलमिलाकर बोला- “अरे बाप रे ! इस पेड़ पर तो बहुत चिंटिया हैं। मुझे जगह-जगह से काट लिया।” काटे हुए निशान को वह अपने साथियों को दिखा-दिखा कर कहने लगा।

सब बच्चों ने अपना डेरा उस पेड़ के नीचे से उठा लिया और उस स्थान से दूर जाकर डेरा जमा लिया।

चंपा चींटी की होशियारी देखकर गुल बुलबुल कृतज्ञता से बोली- “चंपा बहन, अगर आज तुमने मेरी सहायता न की होती, तो वह लड़का मेरे सारे अंडे फोड़ देता। तुम्हें मैं किस तरह धन्यवाद दूँ ?”

“इसमें धन्यवाद की भला क्या बात है, बहन ? दु:ख और मुसीबत में एक-दूसरे के काम आना ही हमारा कर्तव्य है।” चंपा चींटी ने तुरंत बुलबुल के मन को समझाया।

फिर बुलबुल बोली- “चंपा बहन ! अब तो तुम्हारा वह वहम दूर हो गया होगा न, कि तुम छोटे कद की हो, इसलिए किसी की मदद नहीं कर सकती।”

“हाँ बुलबुल बहन ! तुम सही कहती हो, प्राणी का कद यदि छोटा हो तो उसे अपने कद को देखकर हिम्मत नहीं हारना चाहिए। बल्कि दिमाग से काम लेकर वह बड़े-बड़ों को धूल चटा सकता है। अब चंपा को अपने छोटे कद से कोई शिकायत नहीं रही थी।

★शिक्षा:-
मित्रों! “कद का भी अपना अलग महत्व है। यदि किसी प्राणी का कद छोटा है, तो उसे अपने कद को देखकर किसी भी काम से नहीं घबराना चाहिए। एक छोटा प्राणी भी बड़े से बड़ा काम कर सकता है। जिस प्रकार छोटे से जीव ने अपने साथियों की सहायता से उस छात्र को बुलबुल के अंडे उतारने से रोक लिया।

♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️ #रूहानियत_से_सराबोर        !! शेर और व्यक्ति !!~~~~~~~~~~~~~~~~~~एक गाँव था, उस गाँव के रास्ते...
05/10/2025

♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️
#रूहानियत_से_सराबोर
!! शेर और व्यक्ति !!
~~~~~~~~~~~~~~~~~~

एक गाँव था, उस गाँव के रास्ते में बहुत घना जंगल था. जंगल घना होने के कारण तरह तरह के पशु-पक्षी जंगल में रहते थे. एक शेर भी रहता था. शेर कभी-कभी गाँव में घुसकर काफी तहलका मचाता था. इसी वजह से गाँव वाले जंगल के रास्ते में एक पिंजड़ा रख दिए थे. रात हुई सभी अपने-अपने घरों के अन्दर हो गये. गाँव शांत हो गयी. तभी शेर उसी रास्ते से गाँव की ओर जा रहा था. रास्ते में लगा पिंजड़ा में उसका पैर फंसा और भारी शरीर होने के कारण शेर पिंजड़े में बंद हो गया. अब वह उस पिंजड़े में बुरी तरह से फंस चुका था. काफी कोशिश करने के बावजूद भी वह वहाँ से नहीं निकल पाया. पूरी रात शेर पिंजड़े में ही कैद रहा.

सुबह हुई कुछ समय बाद उसी रास्ते से गाँव में एक व्यक्ति जा रहा था. तभी शेर बोला - "ओ भाई! ओ भाई!" वह व्यक्ति शेर को पिंजड़े में देखकर डर गया. शेर को काफी तेज़ की भूख लगी थी.

शेर ने उस व्यक्ति से कहा - "मेरी सहायता करो. मुझे बहुत तेज़ प्यास लगी है. कृपया कुछ पानी पिला दो."

व्यक्ति बोला - "नहीं! नहीं! मैं तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता. तुम एक मांसाहारी जीव हो, अगर मुझे ही अपना शिकार बना लिए तो!" शेर बोला - "नही भाई! मैं ऐसा नहीं करूंगा."

शेर की लाचारी देखकर उस व्यक्ति को शेर पर दया आ गयी और वह बगल के तालाब से पानी ले आया और शेर को पानी पिलाया. शेर पानी पी लिया उसके बाद फिर से उस व्यक्ति को बोला - "प्यास तो बुझ गयी अब पूरी रात से भूखा हूँ कुछ खाने को दे दो न." उस व्यक्ति ने शेर के भोजन की व्यवस्था में जुट गया और कहीं कहीं से उसका भोजन ले आया. शेर भोजन भी किया.

शेर ने फिर से आवाज लगायी - "ओ भले इन्सान! मैं इस पिंजड़े में बुरी तरह से फंस चुका हूँ. कृपा करके इस पिंजड़े से मुझे आजाद करा दो." वह व्यक्ति बोला - "नहीं! नहीं! मैं तुम्हारी और सहायता नहीं कर सकता. तुम एक मांसाहारी जीव हो. पिंजड़े के बाहर आते ही तु अपनी रूप में आ जाएगा.

शेर बोला - "मैं तुम्हें कुछ नहीं करूंगा. तुम्हारे परिवार को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा."

वह व्यक्ति उसकी बात मान कर पिंजड़ा का दरवाजा खोल दिया और शेर बाहर आ गया. शेर बहार आते ही पहले चैन की साँस ली और बोला मेरी अभी तक भूख मिटी नहीं है और भोजन भी सामने है. सो भोजन तलाशने का भी जरुरत नही है. अब झट से तुझे अपना शिकार बना लेता हूँ.

इतना सुन वह व्यक्ति डर से काँपने लगा और बोला - "तुम बेईमानी नहीं कर सकते. तुमने पहले ही बोला था की मैं तुम्हें नहीं खाऊंगा और तुम्हारे परिवार को भी नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा, तो अब ऐसा क्यों कर रहे हो."

शेर बोला - मैं प्राणी ही उसी तरह का हूँ. मुझे बहुत जोर से भूख लगी है तो अब कुछ नहीं. संयोग से ये सब घटना पास के एक पेड़ पर बैठे बन्दर देख रहा था. शेर और उस व्यक्ति में बहस चल ही रही थी तभी बीच में से बन्दर बोल पड़ा - "क्या बात है! क्या बहस हो रही है? उस व्यक्ति ने बन्दर को सारी बात बताई। बन्दर बोला - अच्छा! तो ये बात है. वैसे मुझे एक बात समझ नहीं आई इतना बड़ा शेर इस छोटे से पिंजड़े में कैसे आ सकता है? नहीं ! नहीं ! ये हो ही नहीं सकता!"

शेर को अपनी बेइज्जती होते देख रहा नहीं गया और शेर बोला - "ये पंडित ठीक कह रहा है, मैं इस पिंजड़े में पूरी रात कैद था." बन्दर बोला - "मैं कैसे यकीन करूं?"

शेर बोला - "मैं अभी दिखा देता हूँ, इस पिंजड़े में फिर से जा कर." और इतना कह शेर फिर से उस पिंजड़े में चला जाता है और पिंजड़ा का दरवाजा बंद हो जाता है और उसके बाद शेर बोला - "देखो मैं इसी तरह पिंजड़े में था."

बन्दर उस व्यक्ति से बोला - "अब देख क्या रहे हो तुरंत अपनी जान बचा कर भाग लो!" और पंडित वहाँ से भाग जाता है. शेर फिर से पिंजड़े में कैद हो जाता है.

*शिक्षा:-*
दोस्तों! कभी भी किसी की मदद करें तो सोच समझ कर करें. विश्वास उसी पर करें जो सचमुच में विश्वास करने लायक हो. बहुत से लोग सच बोलने का दिखावा करते हैं और सामने वाला व्यक्ति उन पर पहली बार भरोसा कर लेते हैं. ऐसे दुष्ट लोगों से दूर रहने में ही भलाई है.

*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।*

♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️ #रूहानियत_से_सराबोर        !! मृतक का उम्र !!~~~~~~~~~एक बार एक आदमी किसी गाँव के पास से गुजर ...
05/10/2025

♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️
#रूहानियत_से_सराबोर
!! मृतक का उम्र !!
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एक बार एक आदमी किसी गाँव के पास से गुजर रहा था। उस रास्ते में श्मशान भूमि थी, उसने श्मशान भूमि में पत्थरों के ऊपर मरने वाले की उम्र लिखी हुई देखी 5 वर्ष, 8 वर्ष, 10 वर्ष और 20 वर्ष।

उस आदमी ने सोचा कि इस गांव में सभी की मृत्यु अल्प आयु में ही हो जाती है। वह आदमी गांव में गया तो गांव वालों ने उस आदमी की बहुत सेवा सत्कार किया। वह आदमी कुछ दिन उस गांव में ठहरने के बाद वहां से जाने के लिए तैयार हुआ और गांव वालों को बताया कि मैं कल जा रहा हूँ।

उसकी बात सुनकर गांव वाले बहुत दुखी हुए और कहने लगे हमारे से कोई गलती हुई है तो बताओ लेकिन आप यहाँ से न जाओ, आप इसी गाँव में रुक जाओ। वह आदमी कहने लगा कि इस गांव में, मैं और अधिक नहीं रह सकता, क्योंकि इस गांव में इंसान की अल्प आयु में ही मृत्यु हो जाती है।

उसकी बात सुनकर गांव वाले हँसने लगे और बोले देखो- हमारे बीच में भी कोई 60 वर्ष, 70 वर्ष औऱ 85 वर्ष का भी है। तो उस आदमी ने पूछा कि श्मशान भूमि के पत्थरों पर लिखी मृतक की आयु का क्या कारण है ?

गांव वाले कहने लगे कि हमारे गांव में रिवाज़ है कि आदमी सारा दिन काम काज करके, फिर भगवान का भजन कीर्तन, जीव की सेवा करके, रात को भोजन करने के बाद, जब वह सोने जाता है, तब वो अपनी डायरी के अंदर यह बात लिखता है कि आज कितना समय भगवान का सत्संग, भजन - सुमिरन किया।

जब उस आदमी की मृत्यु होती है, तब उसकी लिखी हुई डायरी लेकर उसके किये हुए भजन सिमरन के समय को जोड़ कर हम उसे महीने और साल बनाकर उसे पत्थरों पर लिख देते हैं। क्योंकि इंसान की असली आयु तो वही है जो उसने भगवान के भजन - सुमिरन में बिताई है।

इंसान का बाकी जीवन तो दुनियाँ में ही व्यर्थ चला गया..!!

*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।*

♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️ #रूहानियत_से_सराबोर        !! बुझी मोमबत्ती !!~~~~~~~~~~~~~~~~~~एक पिता अपनी चार वर्षीय बेटी म...
01/10/2025

♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️
#रूहानियत_से_सराबोर
!! बुझी मोमबत्ती !!
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एक पिता अपनी चार वर्षीय बेटी मिनी से बहुत प्रेम करता था। ऑफिस से लौटते वक़्त वह रोज़ उसके लिए तरह-तरह के खिलौने और खाने-पीने की चीजें लाता था। बेटी भी अपने पिता से बहुत लगाव रखती थी और हमेशा अपनी तोतली आवाज़ में पापा-पापा कह कर पुकारा करती थी। दिन अच्छे बीत रहे थे की अचानक एक दिन मिनी को बहुत तेज बुखार हुआ, सभी घबरा गए, वे दौड़े भागे डॉक्टर के पास गए, पर वहां ले जाते-ले जाते मिनी की मृत्यु हो गयी।

परिवार पर तो मानो पहाड़ ही टूट पड़ा और पिता की हालत तो मृत व्यक्ति के समान हो गयी। मिनी के जाने के हफ़्तों बाद भी वे ना किसी से बोलते ना बात करते… बस रोते ही रहते। यहाँ तक की उन्होंने ऑफिस जाना भी छोड़ दिया और घर से निकलना भी बंद कर दिया।

आस-पड़ोस के लोगों और नाते-रिश्तेदारों ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की पर वे किसी की ना सुनते, उनके मुख से बस एक ही शब्द निकलता… मिनी..!!

एक दिन ऐसे ही मिनी के बारे में सोचते-सोचते उनकी आँख लग गयी और उन्हें एक स्वप्न आया।

उन्होंने देखा कि स्वर्ग में सैकड़ों बच्चियां परी बन कर घूम रही हैं, सभी सफ़ेद पोशाकें पहने हुए हैं और हाथ में मोमबत्ती ले कर चल रही हैं। तभी उन्हें मिनी भी दिखाई दी।

उसे देखते ही पिता बोले, “मिनी, मेरी प्यारी बच्ची, सभी परियों की मोमबत्तियां जल रही हैं, पर तुम्हारी बुझी क्यों हैं, तुम इसे जला क्यों नहीं लेती?”

मिनी बोली, “पापा, मैं तो बार-बार मोमबत्ती जलाती हूँ, पर आप इतना रोते हो कि आपके आंसुओं से मेरी मोमबत्ती बुझ जाती है…”

ये सुनते ही पिता की नींद टूट गयी। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया वे समझ गए की उनके इस तरह दुखी रहने से उनकी बेटी भी खुश नहीं रह सकती और वह पुनः सामान्य जीवन की तरफ बढ़ने लगे।

*शिक्षा:-*
मित्रों, किसी करीबी के जाने का ग़म शब्दों से बयान नहीं किया जा सकता। पर कहीं ना कहीं हमें अपने आप को मजबूत करना होता है और अपनी जिम्मेदारियों को निभाना होता है। और शायद ऐसा करना ही मरने वाले की आत्मा को शांति देता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जो हमसे प्रेम करते हैं वे हमे खुश ही देखना चाहते हैं, अपने जाने के बाद भी..!!

*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।*

♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️ #रूहानियत_से_सराबोर     !! नया नज़रिया !!~~~~~~~~~एक बालक अब्दुल के मन में नई-नई बातों को जानन...
30/09/2025

♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️
#रूहानियत_से_सराबोर
!! नया नज़रिया !!
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एक बालक अब्दुल के मन में नई-नई बातों को जानने की जिज्ञासा थी। उस बालक के मोहल्ले में एक मौलवी रहते थे। एक दिन अब्दुल उनके पास गया और बोला, 'मैं कामयाब बनना चाहता हूं, कृपया बताएं कि कामयाबी का रास्ता क्या है?'

हंसते हुए मौलवी साहब बोले, 'बेटा, मैं तुम्हें कामयाबी का रास्ता बताऊंगा, पहले तुम मेरी बकरी को सामने वाले खूंटे से बांध दो, कह कर उन्होंने बकरी की रस्सी बालक को दे दी। वह बकरी किसी के काबू में नहीं आती थी।

अतः जैसे ही बालक ने रस्सी थामी कि वह छलांग लगा, हाथ से छूट गई। फिर काफी मशक्कत के बाद बालक अब्दुल ने चतुराई से काम लेते हुए तेजी से भाग कर बकरी को पैरों से पकड़ लिया। पैर पकड़े जाने पर बकरी एक कदम भी नहीं भाग पाई और अब्दुल उसे खूंटे से बांधने में कामयाब हुआ।

यह देख मौलवी साहब बोले, 'शाबाश, यही है कामयाबी का रास्ता। जड़ पकड़ने से पूरा पेड़ काबू में आ जाता है। अगर हम किसी समस्या की जड़ पकड़ लें, तो उसका हल आसानी से निकाल सकते हैं।

बालक ने इसी सूत्र को आत्मसात कर लिया और जीवन में आगे बढ़ता गया। बड़े होकर यही बालक अब्दुल गफ्फार खां के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जिन्हें सीमांत गांधी के नाम से भी जाना जाता है।

*शिक्षा:-*
हमें किसी भी समस्या का हल तब तक नहीं मिलता जब तक हम उसकी जड़ को नहीं पकड़ लेते। अत: हर समस्या का समाधान उसकी जड़ काबू में आने पर ही होता है।

*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।*

♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️ #रूहानियत_से_सराबोर       !! दान और सम्मान !!~~~~~~~~~~~~~~~~~~           एक समय की बात है। एक...
29/09/2025

♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️
#रूहानियत_से_सराबोर
!! दान और सम्मान !!
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एक समय की बात है। एक नगर में एक कंजूस राजेश नामक व्यक्ति रहता था।

उसकी कंजूसी सर्वप्रसिद्ध थी। वह खाने, पहनने तक में भी कंजूस था।

एक बात उसके घर से एक कटोरी गुम हो गई। इसी कटोरी के दुःख में राजेश ने 3 दिन तक कुछ न खाया। परिवार के सभी सदस्य उसकी कंजूसी से दुखी थे।

मोहल्ले में उसकी कोई इज्जत न थी, क्योंकि वह किसी भी सामाजिक कार्य में दान नहीं करता था।

एक बार उस राजेश के पड़ोस में धार्मिक कथा का आयोजन हुआ। वेदमंत्रों व् उपनिषदों पर आधारित कथा हो रही थी। राजेश को सद्बुद्धि आई तो वह भी कथा सुनने के लिए सत्संग में पहुँच गया।

वेद के वैज्ञानिक सिद्धांतों को सुनकर उसको भी रस आने लगा क्योंकि वैदिक सिद्धान्त व्यावहारिक व वास्तविकता पर आधारित एवं सत्य-असत्य का बोध कराने वाले होते है।

कंजूस को ओर रस आने लगा। उसकी कोई कदर न करता फिर भी वह प्रतिदिन कथा में आने लगा।

कथा के समाप्त होते ही वह सबसे पहले शंका पूछता। इस तरह उसकी रूचि बढती गई।

वैदिक कथा के अंत में लंगर का आयोजन था इसलिए कथावाचक ने इसकी सूचना दी कि कल लंगर होगा। इसके लिए जो श्रद्धा से कुछ भी लाना चाहे या दान करना चाहे तो कर सकता है।

अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार सभी लोग कुछ न कुछ लाए। कंजूस के हृदय में जो श्रद्धा पैदा हुई वह भी एक गठरी बांध सर पर रखकर लाया।

भीड़ काफी थी। कंजूस को देखकर उसे कोई भी आगे नहीं बढ़ने देता। इस प्रकार सभी दान देकर यथास्थान बैठ गए।

अब कंजूस की बारी आई तो सभी लोग उसे देख रहे थे। कंजूस को विद्वान की ओर बढ़ता देख सभी को हंसी आ गई क्योंकि सभी को मालूम था कि यह महाकंजूस है।

उसकी गठरी को देख लोग तरह-तरह के अनुमान लगाते ओर हँसते, लेकिन कंजूस को इसकी परवाह न थी।

कंजूस ने आगे बढ़कर विद्वान ब्राह्मण को प्रणाम किया। जो गठरी अपने साथ लाया था, उसे उसके चरणों में रखकर खोला तो सभी लोगों की आँखें फटी-की-फटी रह गई।

कंजूस के जीवन की जो भी अमूल्य संपत्ति गहने, जेवर, हीरे-जवाहरात आदि थे उसने सब कुछ को दान कर दिया।

उठकर वह यथास्थान जाने लगा तो विद्वान ने कहा, “महाराज! आप वहाँ नहीं, यहाँ बैठिये।”

कंजूस बोला, “पंडित जी! यह मेरा आदर नहीं है, यह तो मेरे धन का आदर है, अन्यथा मैं तो रोज आता था और यही पर बैठता था, तब मुझे कोई न पूछता था।”

ब्राह्मण बोला, “नहीं, महाराज! यह आपके धन का आदर नहीं है, बल्कि आपके महान त्याग (दान) का आदर है।

यह धन तो थोड़ी देर पहले आपके पास ही था, तब इतना आदर-सम्मान नहीं था जितना की अब आपके त्याग (दान) में है इसलिए आप आज से एक सम्मानित व्यक्ति बन गए है।

*शिक्षा :-*
मनुष्य को कमाना भी चाहिए और दान भी अवश्य देना चाहिए। इससे उसे समाज में सम्मान और इस लोक तथा परलोक में पुण्य मिलता है।

♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️ #रूहानियत_से_सराबोर       !! तीन मूर्तियाँ !!~~~~~~~~~~~~~~~~~~एक राजा था जिसे शिल्प कला अत्यं...
28/09/2025

♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️
#रूहानियत_से_सराबोर

!! तीन मूर्तियाँ !!
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एक राजा था जिसे शिल्प कला अत्यंत प्रिय थी। वह मूर्तियों की खोज में देश-प्रदेश जाया करता था। इस प्रकार राजा ने कई मूर्तियाँ अपने राज महल में लाकर रखी हुई थी और स्वयं उनकी देख रेख करवाते। सभी मूर्तियों में उन्हें तीन मूर्तियाँ जान से भी ज्यादा प्यारी थी। सभी को पता था कि राजा को उनसे अत्यंत लगाव है।

एक दिन जब एक सेवक इन मूर्तियों की सफाई कर रहा था तब गलती से उसके हाथों से उनमें से एक मूर्ति टूट गई। जब राजा को यह बात पता चली तो उन्हें बहुत क्रोध आया और उन्होंने उस सेवक को तुरन्त मृत्युदंड दे दिया। सजा सुनने के बाद सेवक ने तुरन्त अन्य दो मूर्तियों को भी तोड़ दिया। यह देख कर सभी को आश्चर्य हुआ। राजा ने उस सेवक से इसका कारण पूछा, तब उस सेवक ने कहा - "महाराज! क्षमा कीजियेगा, यह मूर्तियाँ मिट्टी की बनी हैं, अत्यंत नाजुक हैं। अमरता का वरदान लेकर तो आई नहीं हैं। आज नहीं तो कल टूट ही जाती अगर मेरे जैसे किसी प्राणी से टूट जाती तो उसे अकारण ही मृत्युदंड का भागी बनना पड़ता। मुझे तो मृत्यु दंड मिल ही चुका हैं इसलिए मैंने ही अन्य दो मूर्तियों को तोड़कर उन दो व्यक्तियों की जान बचा ली।

यह सुनकर राजा की आँखें खुली की खुली रह गई उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने सेवक को सजा से मुक्त कर दिया। सेवक ने उन्हें साँसों का मूल्य सिखाया, साथ ही सिखाया की न्यायाधीश के आसन पर बैठकर अपने निजी प्रेम के चलते छोटे से अपराध के लिए मृत्युदंड देना उस आसन का अपमान हैं। एक उच्च आसन पर बैठकर हमेशा उसका आदर करना चाहिये। राजा हो या कोई भी अगर उसे न्याय करने के लिए चुना गया हैं तो उसे न्याय के महत्व को समझना चाहिये। मूर्ति से राजा को प्रेम था लेकिन उसके लिए सेवक को मृत्युदंड देना न्याय के विरुद्ध था। न्याय की कुर्सी पर बैठकर किसी को भी अपनी भावनाओं से दूर हट कर फैसला देना चाहिये।

राजा को समझ आ गया कि मुझसे कई गुना अच्छा तो वो यह सेवक था जिसने मृत्यु के इतना समीप होते हुए भी परहित का सोचा! राजा ने सेवक से पूछा कि अकारण मृत्यु को सामने पाकर भी तुमने ईश्वर को नही कोसा, तुम निडर रहे, इस संयम, समस्वस्भाव तथा दूरदृष्टि के गुणों के वहन की युक्ति क्या है? सेवक ने बताया कि आपके यहाँ काम करने से पहले मैं एक अमीर सेठ के यहां नौकर था। मेरा सेठ मुझसे तो बहुत खुश था लेकिन जब भी कोई कटु अनुभव होता तो वह ईश्वर को बहुत गालियाँ देता था।

एक दिन सेठ ककड़ी खा रहा था । संयोग से वह ककड़ी कड़वी थी। सेठ ने वह ककड़ी मुझे दे दी। मैंने उसे बड़े चाव से खाया जैसे वह बहुत स्वादिष्ट हो। सेठ ने पूछा – “ककड़ी तो बहुत कड़वी थी। भला तुम ऐसे कैसे खा गये ?” तो मैने कहा – “सेठ जी आप मेरे मालिक है। रोज ही स्वादिष्ट भोजन देते है। अगर एक दिन कुछ कड़वा भी दे दिए तो उसे स्वीकार करने में क्या हर्ज है?" राजा जी इसी प्रकार अगर ईश्वर ने इतनी सुख–सम्पदाएँ दी है, और कभी कोई कटु अनुदान दे भी दे तो उसकी सद्भावना पर संदेह करना ठीक नहीं। जन्म, जीवनयापन तथा मृत्यु सब उसी की देन है।

शिक्षा:-
असल में यदि हम समझ सके तो जीवन में जो कुछ भी होता है, सब ईश्वर की दया ही है। ईश्वर जो करता है अच्छे के लिए ही करता है! यदि सुख दु:ख को ईश्वर का प्रसाद समझकर संयम से ग्रहण करें तथा हर समय परहित का चिंतन करें।

सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।
जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।

2️⃣2️⃣❗0️⃣9️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣5️⃣♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️        !! सोच का फर्क !! #रूहानियत_से_सराबोर ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~...
22/09/2025

2️⃣2️⃣❗0️⃣9️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣5️⃣

♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️

!! सोच का फर्क !!
#रूहानियत_से_सराबोर
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एक बार एक पिता और उसका पुत्र जलमार्ग से कहीं यात्रा कर रहे थे और तभी अचानक दोनों रास्ता भटक गये। फिर उनकी नौका भी उन्हें ऐसी जगह ले गई, जहाँ दो टापू आस-पास थे और फिर वहाँ पहुंच कर उनकी नौका टूट गई।

पिता ने पुत्र से कहा, "अब लगता है, हम दोनों का अंतिम समय आ गया है, दूर-दूर तक कोई सहारा नहीं दिख रहा है।"

अचानक पिता को एक उपाय सूझा, अपने पुत्र से कहा कि, "वैसे भी हमारा अंतिम समय नज़दीक है, तो क्यों न हम ईश्वर की प्रार्थना करें।"

उन्होंने दोनों टापू आपस में बाँट लिए। एक पर पिता और एक पर पुत्र, और दोनों अलग-अलग टापू पर ईश्वर की प्रार्थना करने लगे।

पुत्र ने ईश्वर से कहा, ''हे भगवन, इस टापू पर पेड़-पौधे उग जाए जिसके फल-फूल से हम अपनी भूख मिटा सकें।''

ईश्वर द्वारा प्रार्थना सुनी गयी, तत्काल पेड़-पौधे उग गये और उसमें फल-फूल भी आ गये। उसने कहा ये तो चमत्कार हो गया।

फिर उसने प्रार्थना कि, "एक सुंदर स्त्री आ जाए जिससे हम यहाँ उसके साथ रहकर अपना परिवार बसाएँ।"

तत्काल एक सुंदर स्त्री प्रकट हो गयी।

अब उसने सोचा कि मेरी हर प्रार्थना सुनी जा रही है, तो क्यों न मैं ईश्वर से यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता माँग लूँ ? उसने ऐसा ही किया।

उसने प्रार्थना कि, एक नई नाव आ जाए जिसमें सवार होकर मैं यहाँ से बाहर निकल सकूँ।

तत्काल नाव प्रकट हुई और पुत्र उसमें सवार होकर बाहर निकलने लगा।

तभी एक आकाशवाणी हुई, बेटा तुम अकेले जा रहे हो? अपने पिता को साथ नहीं लोगे ?

पुत्र ने कहा, उनको छोड़ो, प्रार्थना तो उन्होंने भी की, लेकिन आपने उनकी एक भी नहीं सुनी। शायद उनका मन पवित्र नहीं है, तो उन्हें इसका फल भोगने दो ना ?

आकाशवाणी ने कहा, 'क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे पिता ने क्या प्रार्थना की ?

पुत्र बोला, नहीं।

आकाशवाणी बोली तो सुनो, तुम्हारे पिता ने एक ही प्रार्थना की... "हे भगवन! मेरा पुत्र आपसे जो भी माँगे, उसे दे देना क्योंकि मैं उसे दुःख में हरगिज़ नहीं देख सकता औऱ अगर मरने की बारी आए तो मेरी मौत पहले हो" और जो कुछ तुम्हें मिल रहा है उन्हीं की प्रार्थना का परिणाम है।

पुत्र बहुत शर्मिंदा हो गया।

*शिक्षा:-*
सज्जनों! हमें जो भी सुख, प्रसिद्धि, मान, यश, धन, संपत्ति और सुविधाएं मिल रही है उसके पीछे किसी अपने की प्रार्थना और शक्ति जरूर होती है लेकिन हम नादान रहकर अपने अभिमान वश इस सबको अपनी उपलब्धि मानने की भूल करते रहते हैं और जब ज्ञान होता है तो असलियत का पता लगने पर सिर्फ़ पछताना पड़ता है। हम चाह कर भी अपने माता-पिता का ऋण नहीं चुका सकते हैं। एक पिता ही ऐसा होता है जो अपने पुत्र को ऊच्चाईयों पर पहुँचाना चाहता है। पर पुत्र मां बाप को बोझ समझते हैं। इसलिए आप हमेशा जरुरतमंदों की सहायता करते रहिये।

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