Nawaneet Dixit Journalist

Nawaneet Dixit Journalist नवनीत दीक्षित,उत्तर प्रदेश शासन द्वारा मान्यता प्राप्त, सचिव उत्तर प्रदेश प्रेस एसोसिएशन जर्नलिस्टस(उपजा) ब्यूरो हेड कैनविज टाइम्स लखनऊ

कैनविज टाइम्स राष्ट्रीय दैनिक व साप्ताहिक अख़बार लखनऊ से प्रकाशित

🚨 यूपी पंचायत चुनाव: 'प्रधान जी' की कुर्सी पर हाई कोर्ट का ब्रेक! 🚨"👉कार्यकाल खत्म तो खत्म- प्रशासक बनकर 'बैकडोर' एंट्री...
07/06/2026

🚨 यूपी पंचायत चुनाव: 'प्रधान जी' की कुर्सी पर हाई कोर्ट का ब्रेक! 🚨"

👉कार्यकाल खत्म तो खत्म- प्रशासक बनकर 'बैकडोर' एंट्री नहीं चलेगी!"

इलाहाबाद हाई कोर्ट (लखनऊ खंडपीठ) ने सरकार के उस जुगाड़ू आदेश पर सख्त रुख अपनाया है, जिसमें कार्यकाल खत्म होने के बाद भी पूर्व प्रधानों को ही 'प्रशासक' बनाकर गांव की चाबी सौंप दी गई थी।शॉर्ट में समझिए पूरा मामला:नो शॉर्टकट: कोर्ट ने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 243-E का सीधा उल्लंघन है।बैकडोर एंट्री बंद: फिल्म खत्म होने के बाद हीरो थिएटर में नहीं रुक सकता। पूर्व प्रधानों को प्रशासक बनाना असंवैधानिक है।कोर्ट का तीखा सवाल: चुनाव में देरी पर जब सरकार ने ओबीसी आरक्षण आयोग का हवाला दिया, तो कोर्ट ने पूछा— "ओबीसी आरक्षण याद आने में इतनी देर क्यों लगी?"प्रधानों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, लेकिन अब कोर्ट की इस फटकार के बाद लखनऊ से लेकर गांवों तक हड़कंप मच गया है!

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*पत्रकारिता और पत्रकार की फ़क़ीरी*पत्रकारिता में मैंने कभी धन, वैभव, पद या प्रतिष्ठा खोजने का प्रयास नहीं किया। मेरी तला...
07/06/2026

*पत्रकारिता और पत्रकार की फ़क़ीरी*

पत्रकारिता में मैंने कभी धन, वैभव, पद या प्रतिष्ठा खोजने का प्रयास नहीं किया। मेरी तलाश तो केवल मन के उस सुकून की थी जो सत्य के मार्ग पर चलने वालों को प्राप्त होता है। परंतु सत्य की राह भी बड़ी विचित्र होती है। कभी वह सम्मान देती है, कभी अपमान; कभी ताली दिलाती है तो कभी तन्हाई। फिर भी पत्रकार का मन उसी राह पर चलता रहता है, क्योंकि उसे मंज़िल से अधिक अपने सफ़र पर विश्वास होता है।

सच तो यह है कि इस संसार में आने वाला हर व्यक्ति खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही लौट जाता है। फिर भी मनुष्य शान, शौकत, प्रसिद्धि और स्वार्थ के पीछे ऐसा भागता है मानो यही जीवन का अंतिम सत्य हो। पत्रकार भी इस मोहजाल से अछूता नहीं है। कभी पहचान की चाह, कभी प्रभाव का आकर्षण और कभी सत्ता के निकट पहुँचने की लालसा उसे अपनी मूल साधना से दूर कर देती है।

मित्र पत्रकार, कभी स्वयं से पूछना कि आखिर पत्रकारिता में तुम क्या तलाश रहे हो? धन? पद? प्रसिद्धि? या फिर समाज के लिए कुछ सार्थक करने का संतोष? क्योंकि जो चीज़ें आज बहुत बड़ी लगती हैं, समय की धारा में वे भी बह जाती हैं। प्रेम, मोह, संबंध, प्रशंसा और आलोचना सब कुछ क्षणिक है। कोई किसी का स्थायी साथी नहीं होता। जीवन के इस विशाल मेले में हर व्यक्ति अपनी भूमिका निभाकर आगे बढ़ जाता है।

जब यह सत्य समझ में आने लगता है तब दिखावे की दुनिया फीकी लगने लगती है। तब पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं रह जाती, वह साधना बन जाती है। फिर समाचार केवल खबर नहीं रहते, वे समाज के दर्द और उम्मीदों की आवाज़ बन जाते हैं। तब पत्रकार अपने नाम से नहीं, अपने कर्म से पहचाना जाता है।

मन का सुकून बाहरी उपलब्धियों में नहीं, भीतर की ईमानदारी में छिपा होता है। जिस दिन पत्रकार अपने कर्तव्य में रम जाता है, उसी दिन उसे वह शांति मिलती है जिसकी तलाश वह वर्षों से कर रहा होता है। जैसे खिड़की की मुंडेर पर बैठा कबूतर बिना किसी स्वार्थ के अपना गुटरगूँ करता रहता है, वैसे ही पत्रकार को भी सत्य का जाप करते रहना चाहिए। उसका धर्म है लिखना, प्रश्न करना और समाज के सामने सच को रखना।

जीवन का अंतिम सत्य भी यही है कि एक दिन सब कुछ यहीं रह जाएगा। पद, प्रतिष्ठा, संपत्ति, पुरस्कार और परिचय सब समय की धूल बन जाएंगे। अंततः हर मनुष्य का ठिकाना वही श्मशान है जहाँ सभी भेद मिट जाते हैं। वहाँ न कोई बड़ा होता है, न छोटा; न अमीर, न गरीब; न प्रसिद्ध, न गुमनाम।

इसलिए यदि कुछ बचता है तो केवल कर्मों की सुगंध। पत्रकार के लिए वही सुगंध उसकी निष्पक्षता, उसकी निर्भीकता और उसकी कलम की ईमानदारी है। जब जीवन की अंतिम यात्रा पूरी हो, तब ऐसा लगे कि यह देह अग्नि को समर्पित होकर भस्म बनी और वह भस्म सत्य तथा पत्रकारिता के चरणों में अर्पित हो गई।

पत्रकार की असली फ़क़ीरी यही है कि वह सबके बीच रहकर भी किसी लोभ का दास न बने, सब कुछ देखकर भी सत्य से आँख न चुराए, और सब कुछ खोकर भी अपनी कलम की गरिमा न खोए। यही पत्रकारिता की साधना है, यही उसका तप है और यही उसकी सबसे बड़ी संपत्ति है।
साभार-
लेखक – राजेन्द्र सिंह जादौन

अभिषेक गुप्ता  भईया व भाभी बेबी अभिषेक गुप्ता जी को ढेरो शुभकामनाएं ।हमारे भतीजा व भतीजी पर प्रभु श्रीराम जी का आशीर्वाद...
30/05/2026

अभिषेक गुप्ता भईया व भाभी बेबी अभिषेक गुप्ता जी को ढेरो शुभकामनाएं ।
हमारे भतीजा व भतीजी पर प्रभु श्रीराम जी का आशीर्वाद बना रहे।
यशश्वी व दीर्घायु जीवन की मंगलकामना करते है।

28/05/2026
*मैं पत्रकार थोड़े दूसरे किस्म का हूँ .....?* लेख  राजेंद्र सिंह जादौनमुझे पत्रकारिता करते हुए दो दशक लगभग का समय हो गया...
21/05/2026

*मैं पत्रकार थोड़े दूसरे किस्म का हूँ .....?*

लेख राजेंद्र सिंह जादौन

मुझे पत्रकारिता करते हुए दो दशक लगभग का समय हो गया है। इतने लंबे समय में मैंने पत्रकारिता के कई मौसम देखे हैं। साइकिल पर खबर ढोने वाले पत्रकार भी देखे हैं और आज मोबाइल से “ब्रेकिंग न्यूज़” चिल्लाने वाले एंकर भी देख रहा हूँ। पहले पत्रकार खबर के पीछे भागता था, अब खबर पत्रकार के पीछे भागती है और पूछती है “भाई साहब, मुझे किस पार्टी के हिसाब से चलाना है?”

लेकिन मैं थोड़ा पुरानी मिट्टी का आदमी हूँ। मुझे आज तक “पीछू वाली पत्रकारिता” समझ नहीं आई। मतलब वो पत्रकारिता जिसमें नेता जी जहाँ जाएँ, पत्रकार उनके पीछे ऐसे घूमे जैसे बरसात में मच्छर ट्यूबलाइट के पीछे घूमते हैं।

आजकल पत्रकारिता में सबसे बड़ा गुण ईमानदारी नहीं, “नजदीकी” माना जाता है। जो जितना सत्ता के करीब, वो उतना बड़ा पत्रकार। कई पत्रकार तो इतने करीब हो गए हैं कि जनता उन्हें पत्रकार कम, सरकारी रिश्तेदार ज्यादा समझने लगी है।

किसी मंत्री के साथ फोटो आ जाए तो अगले दिन फेसबुक पर पोस्ट “आज माननीय के साथ राष्ट्रहित पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई।” अब राष्ट्रहित क्या था, ये कभी पता नहीं चलता। लेकिन फोटो देखकर इतना जरूर समझ आ जाता है कि चर्चा चाय, समोसे और विज्ञापन के बीच कहीं हुई होगी।

मगर मेरी बीमारी थोड़ी अलग है। मैं किसी विभाग पर उंगली उठाने से पहले उसकी पूरी विभागीय संरचना पढ़ता हूँ। हाँ साहब… वही मोटी फाइलें, जिन्हें देखकर बड़े-बड़े अफसरों को एलर्जी हो जाती है।

मैं पहले विभाग का गठन पढ़ता हूँ।
फिर उसके नियम पढ़ता हूँ।
फिर उसका बजट देखता हूँ।
फिर उसकी शाखाएँ समझता हूँ।
फिर उसकी जिम्मेदारियाँ देखता हूँ।
फिर फील्ड में जाकर मुआयना करता हूँ।
फिर कर्मचारियों से बात करता हूँ।
फिर जनता से पूछता हूँ।
फिर वापस आकर संरचना दोबारा पढ़ता हूँ।

और उसके बाद विभाग और मेरे बीच एक कागज़ी युद्ध शुरू हो जाता है। क्योंकि विभाग को लगता है कि ये पत्रकार खबर लिखने नहीं आया… ये तो खानदानी दुश्मनी निकालने आया है।

पहले बड़े प्यार से फोन आता है “सर, आप ऑफिस आ जाइए… बैठकर बात कर लेते हैं…”

मतलब साफ होता है कि खबर को समझाने की कोशिश नहीं होगी, पत्रकार को समझाने की कोशिश होगी।

फिर दूसरा चरण शुरू होता है “इतना गहराई में मत जाइए… ऊपर तक मामला चला जाएगा…” जैसे मैं कोई कुआँ खोद रहा हूँ और नीचे नागदेवता बैठे हों।

फिर तीसरा चरण आता है
“आप अपने परिवार का भी सोचिए…”

अब साहब, ये संवाद भारत के हर ईमानदार पत्रकार का राष्ट्रीय गीत बन चुका है। जिसे देखो वही परिवार की चिंता में दुबला हुआ जा रहा है। जिस अधिकारी ने पूरी जनता का पैसा खा लिया, उसे मेरी पत्नी और बच्चों की चिंता रातभर जगाए रखती है। और जब कुछ काम नहीं चलता तो आखिरी हथियार निकलता है “देख लेंगे…”

मुझे आज तक समझ नहीं आया कि ये लोग आखिर देखते क्या हैं? क्योंकि मैंने तो ज्यादातर ऐसे लोगों को कुर्सी जाते ही जमीन देखते देखा है।

असल समस्या ये है कि मैं खबर को “इवेंट” की तरह नहीं देखता। मैं उस सड़क को देखता हूँ जो तीन महीने में उखड़ जाती है। मैं उस अस्पताल को देखता हूँ जहाँ मशीनें सिर्फ उद्घाटन के दिन चलती हैं। मैं उस स्कूल को देखता हूँ जहाँ बच्चों से ज्यादा बकरियाँ बैठती हैं।

लेकिन आजकल ऐसी खबरें लिखना “नकारात्मक पत्रकारिता” कहलाता है। अगर आप सवाल पूछो तो आपको देशद्रोही, विरोधी, बिकाऊ, एजेंट, दलाल कुछ भी घोषित किया जा सकता है।

अब नया जमाना है साहब।
पत्रकारिता भी दो हिस्सों में बँट चुकी है।

एक वो पत्रकार हैं जो सवाल पूछते हैं।
दूसरे वो जो सवाल पूछने वालों पर सवाल उठाते हैं।

पहले वाले पत्रकार धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं।
दूसरे वाले एयरकंडीशन स्टूडियो में राष्ट्र बचा रहे हैं।

आज पत्रकारिता का हाल ऐसा है कि खबर कम, अभिनय ज्यादा हो गया है। टीवी खोलो तो लगता है कोई न्यूज चैनल नहीं, कुश्ती प्रतियोगिता चल रही है। एंकर ऐसे चिल्लाता है जैसे अगर उसने पाँच मिनट आवाज धीमी कर दी तो देश टूट जाएगा।

मगर जमीन की सच्चाई ये है कि गाँव का किसान अब भी खाद की लाइन में खड़ा है। बेरोजगार अब भी फॉर्म भर रहा है। आम आदमी अब भी बिलों और टैक्स के बीच पिस रहा है।

लेकिन इन मुद्दों पर चर्चा कम होती है, क्योंकि इनमें स्पॉन्सर नहीं मिलते।

कई लोग मुझसे पूछते हैं
“तुम्हें डर नहीं लगता?”

मैं कहता हूँ
“डरता हूँ साहब… खूब डरता हूँ।”

रात को अंजान नंबर से धमकी आए तो डर लगता है।
पीछे कोई गाड़ी लगातार चले तो डर लगता है। कोई अधिकारी मुस्कुराकर कह दे “बहुत उड़ रहे हो” तो भी डर लगता है।

लेकिन उससे बड़ा डर उस दिन लगेगा जिस दिन मैं सच देखकर चुप हो जाऊँगा। क्योंकि पत्रकार अगर सत्ता के सामने घुटने टेक देगा, तो जनता किसके पास जाएगी? फिर लोकतंत्र सिर्फ चुनाव तक सीमित रह जाएगा।

और मजेदार बात देखिए… जिन लोगों की पोल मैंने खबरों में खोली, वही लोग बाद में बड़े सम्मान से कहते हैं *“नवनीत दीक्षित अलग किस्म के पत्रकार हैं…”*

अलग तो होना ही पड़ेगा साहब। भीड़ में शामिल होकर सिर्फ तालियाँ बजाई जा सकती हैं, इतिहास नहीं लिखा जाता।

मैं जानता हूँ मेरी भाषा कई लोगों को चुभती है।
मेरे सवाल कई कुर्सियों की नींद खराब करते हैं।
मेरी खबरें कई टेबलों पर रखी चाय ठंडी कर देती हैं।

पर क्या करूँ…मैं पत्रकारिता को आज भी “धंधा” नहीं मान पाया। मेरे लिए पत्रकारिता अब भी जनता और सत्ता के बीच खड़ी वो आखिरी दीवार है, जो पूरी तरह गिरनी नहीं चाहिए।

ऊपर से मैं ब्राह्मण आदमी… मतलब जिद मुफ्त में मिली है।
एक बार किसी फाइल में घुस गया तो फिर सच निकाले बिना चैन नहीं आता।

लोग समझाते हैं “थोड़ा व्यवहारिक बनो… सिस्टम से लड़कर क्या मिलेगा?” अब उन्हें कौन समझाए कि अगर पत्रकार भी व्यवहारिक होकर चुप बैठ गया, तो फिर भ्रष्टाचार का पोस्टमार्टम कौन करेगा?

इसलिए साहब…
धमकियाँ भी आएँगी,
लालच भी आएँगे,
दोस्त दुश्मन बनेंगे,
और दुश्मन मुस्कुराकर दोस्ती का हाथ बढ़ाएँगे।

लेकिन जब तक हाथ में कलम है और दिमाग में सवाल, तब तक मैं वही करूँगा जो करता आया हूँ। क्योंकि मैं पत्रकार थोड़ा दूसरे किस्म का हूँ। और शायद यही मेरी सबसे बड़ी कमजोरी भी है… और सबसे बड़ी पहचान भी।
साभार-राजेन्द्र सिंह जादौन

चप्पलें घिस जाती हैंपत्रकारिता में,हर कोईसरस्वती की उपासनानहीं करता.....बहुत कुछ सुनना पड़ता हैसमाज से,परिवार से,अपनों स...
17/05/2026

चप्पलें घिस जाती हैं
पत्रकारिता में,
हर कोई
सरस्वती की उपासना
नहीं करता.....

बहुत कुछ सुनना पड़ता है
समाज से,
परिवार से,
अपनों से भी
निकम्मा,
नकारा,
निठल्ला...

पर हम ने क्या पाया,
क्या खोया,
कितनी रातें
सच की तलाश में काट दीं,
कितनी बार
अपनी भूख से पहले
खबर को रखा
ये सिर्फ
एक पत्रकार की
अंतरात्मा जानती है।

भीड़ तालियाँ देखती है,
पर संघर्ष नहीं,
लोग खबर पढ़ लेते हैं,
पर उसके पीछे
घिसी हुई चप्पलें,
टूटी उम्मीदें
और जली हुई आत्मा
नहीं देख पाते।

पत्रकारिता
कभी-कभी पेशा नहीं,
एक ऐसा अकेलापन होती है
जहाँ आदमी
धीरे-धीरे खुद को
समाज के लिए लिख देता है।

रचना — राजेन्द्र सिंह जादौन

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