07/06/2026
*पत्रकारिता और पत्रकार की फ़क़ीरी*
पत्रकारिता में मैंने कभी धन, वैभव, पद या प्रतिष्ठा खोजने का प्रयास नहीं किया। मेरी तलाश तो केवल मन के उस सुकून की थी जो सत्य के मार्ग पर चलने वालों को प्राप्त होता है। परंतु सत्य की राह भी बड़ी विचित्र होती है। कभी वह सम्मान देती है, कभी अपमान; कभी ताली दिलाती है तो कभी तन्हाई। फिर भी पत्रकार का मन उसी राह पर चलता रहता है, क्योंकि उसे मंज़िल से अधिक अपने सफ़र पर विश्वास होता है।
सच तो यह है कि इस संसार में आने वाला हर व्यक्ति खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही लौट जाता है। फिर भी मनुष्य शान, शौकत, प्रसिद्धि और स्वार्थ के पीछे ऐसा भागता है मानो यही जीवन का अंतिम सत्य हो। पत्रकार भी इस मोहजाल से अछूता नहीं है। कभी पहचान की चाह, कभी प्रभाव का आकर्षण और कभी सत्ता के निकट पहुँचने की लालसा उसे अपनी मूल साधना से दूर कर देती है।
मित्र पत्रकार, कभी स्वयं से पूछना कि आखिर पत्रकारिता में तुम क्या तलाश रहे हो? धन? पद? प्रसिद्धि? या फिर समाज के लिए कुछ सार्थक करने का संतोष? क्योंकि जो चीज़ें आज बहुत बड़ी लगती हैं, समय की धारा में वे भी बह जाती हैं। प्रेम, मोह, संबंध, प्रशंसा और आलोचना सब कुछ क्षणिक है। कोई किसी का स्थायी साथी नहीं होता। जीवन के इस विशाल मेले में हर व्यक्ति अपनी भूमिका निभाकर आगे बढ़ जाता है।
जब यह सत्य समझ में आने लगता है तब दिखावे की दुनिया फीकी लगने लगती है। तब पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं रह जाती, वह साधना बन जाती है। फिर समाचार केवल खबर नहीं रहते, वे समाज के दर्द और उम्मीदों की आवाज़ बन जाते हैं। तब पत्रकार अपने नाम से नहीं, अपने कर्म से पहचाना जाता है।
मन का सुकून बाहरी उपलब्धियों में नहीं, भीतर की ईमानदारी में छिपा होता है। जिस दिन पत्रकार अपने कर्तव्य में रम जाता है, उसी दिन उसे वह शांति मिलती है जिसकी तलाश वह वर्षों से कर रहा होता है। जैसे खिड़की की मुंडेर पर बैठा कबूतर बिना किसी स्वार्थ के अपना गुटरगूँ करता रहता है, वैसे ही पत्रकार को भी सत्य का जाप करते रहना चाहिए। उसका धर्म है लिखना, प्रश्न करना और समाज के सामने सच को रखना।
जीवन का अंतिम सत्य भी यही है कि एक दिन सब कुछ यहीं रह जाएगा। पद, प्रतिष्ठा, संपत्ति, पुरस्कार और परिचय सब समय की धूल बन जाएंगे। अंततः हर मनुष्य का ठिकाना वही श्मशान है जहाँ सभी भेद मिट जाते हैं। वहाँ न कोई बड़ा होता है, न छोटा; न अमीर, न गरीब; न प्रसिद्ध, न गुमनाम।
इसलिए यदि कुछ बचता है तो केवल कर्मों की सुगंध। पत्रकार के लिए वही सुगंध उसकी निष्पक्षता, उसकी निर्भीकता और उसकी कलम की ईमानदारी है। जब जीवन की अंतिम यात्रा पूरी हो, तब ऐसा लगे कि यह देह अग्नि को समर्पित होकर भस्म बनी और वह भस्म सत्य तथा पत्रकारिता के चरणों में अर्पित हो गई।
पत्रकार की असली फ़क़ीरी यही है कि वह सबके बीच रहकर भी किसी लोभ का दास न बने, सब कुछ देखकर भी सत्य से आँख न चुराए, और सब कुछ खोकर भी अपनी कलम की गरिमा न खोए। यही पत्रकारिता की साधना है, यही उसका तप है और यही उसकी सबसे बड़ी संपत्ति है।
साभार-
लेखक – राजेन्द्र सिंह जादौन