09/06/2026
18वीं और 19वीं सदी में लोगों को सच में ज़िंदा दफ़न हो जाने का बहुत बड़ा डर था। इस डर को टैफोफोबिया (Taphophobia) कहा जाता है।
उस समय मेडिकल साइंस आज जितनी एडवांस नहीं थी। कई बार डॉक्टर गहरे कोमा, लकवे (Paralysis), कैटालेप्सी जैसी बीमारियों या ऐसी हालत को, जिसमें सांस और नब्ज़ बहुत धीमी हो जाती थी, मौत समझ बैठते थे।
अखबारों में कभी-कभी ऐसी डरावनी खबरें भी छपती थीं कि कुछ कब्रों के अंदर से ताबूत खरोंचे हुए मिले, जिससे लोगों का डर और बढ़ गया।
इसी डर को कम करने के लिए कुछ आविष्कारकों ने "सेफ्टी कॉफिन" (Safety Coffin) बनाए। इन खास ताबूतों में घंटियां लगी होती थीं, जो अंदर पड़े व्यक्ति के हाथ से बंधी रस्सी से जुड़ी रहती थीं। अगर कोई व्यक्ति गलती से ज़िंदा दफ़न हो जाता और होश में आ जाता, तो वह घंटी बजाकर ऊपर मौजूद लोगों को संकेत दे सकता था।
कुछ सेफ्टी कॉफिन में हवा आने-जाने के लिए पाइप, कांच की खिड़कियां, और यहां तक कि छोटे झंडे या सीढ़ियां भी लगाई जाती थीं, ताकि अंदर मौजूद व्यक्ति मदद मांग सके।
कहा जाता है कि कुछ कब्रिस्तानों में रात के समय चौकीदार भी रखे जाते थे, जो घंटियों की आवाज़ सुनने के लिए निगरानी करते थे।
हालांकि, "Saved by the Bell" मुहावरे को इन सेफ्टी कॉफिन से जोड़ने का दावा काफी मशहूर है, लेकिन इतिहासकारों के अनुसार इसका सीधा और पक्का सबूत नहीं मिला है।