News Now India

News Now India दैनिक लाइव न्यूज़ कवरेज के लिए देखते रह

*हिमाचल पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी फिर तलब, कनिष्ठ पुलिस अधिकारी पर अत्याचार के आरोपों पर  राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग...
01/09/2026

*हिमाचल पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी फिर तलब, कनिष्ठ पुलिस अधिकारी पर अत्याचार के आरोपों पर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग सख्त।*

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग अनुच्छेद 338 ,द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अन्तर्गत, हिमाचल प्रदेश पुलिस के उप पुलिस अधीक्षक विजय कुमार रघुवंशी की ओर से लगाए गए कथित जातिगत अत्याचारों और भेदभाव के आरोपों को लेकर एक बार फिर हिमाचल प्रदेश के पुलिस महानिदेशक तथा अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह एवं सतर्कता) को तलब किया है। आयोग के 1 सितंबर 2026 के पत्र के अनुसार, 20 अगस्त को हुई सुनवाई के कार्यवृत्त के आधार पर कार्रवाई रिपोर्ट तथा संबंधित अभिलेखों के साथ दोनों अधिकारियों को 10 सितंबर 2026 को सुबह 11:30 बजे नई दिल्ली स्थित आयोग के मुख्यालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने को कहा गया है। आयोग ने संबंधित केस फाइल, केस डायरी तथा अन्य प्रासंगिक अभिलेख भी प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

विवाद की शुरुआत हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा जारी स्थानांतरण आदेश के बाद हुई, जिसके पश्चात आरोप है कि पुलिस महानिदेशक अशोक तेवारी द्वारा उक्त स्थानांतरण आदेश के क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न की गई। इसके बाद विजय रघुवंशी के विरुद्ध निलंबन और विभागीय जांच की कार्रवाई किए जाने का आरोप है। मामले का सबसे गंभीर पहलू यह बताया जा रहा है कि समान परिस्थितियों में स्थानांतरित अन्य अधिकारियों ने भी उसी समय कार्यभार ग्रहण किया, लेकिन उनके विरुद्ध ऐसी कार्रवाई नहीं की गई और केवल विजय रघुवंशी को निशाना बनाया गया। इसी आधार पर मामले में कथित मनमानी, चयनात्मक कार्रवाई और भेदभाव को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

मामले में सरकारी वाहन को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि पुलिस महानिदेशक से संबद्ध वाहन भी विजय रघुवंशी से वापस ले लिया गया, जबकि समान कार्यालय में तैनात दो आईपीएस अधिकारियों को स्कॉर्पियो-एन जैसे वाहन उपलब्ध कराए गए। दूसरी ओर, पुलिस अधीक्षक शिमला की ओर से वाहन अथवा अन्य सुविधाओं के संबंध में दिए गए तर्कों पर भी सवाल उठाए गए हैं। विजय रघुवंशी द्वारा प्रस्तुत वेतन विवरण में कथित रूप से संलग्न वाहन के लिए प्रतिमाह लगभग 750 रुपये की कटौती दर्शाए जाने से वाहन संबंधी रिपोर्ट और वास्तविक वेतन अभिलेखों के बीच कथित विरोधाभास का मुद्दा भी सामने आया है। उप पुलिस अधीक्षक मुख्यालय का पद जिला पुलिस में महत्वपूर्ण पद माना जाता है, इसलिए इस पद से जुड़े अधिकारों और सुविधाओं से वंचित किए जाने के कारणों पर भी आयोग के समक्ष स्पष्टीकरण अपेक्षित है।

हिमाचल प्रदेश सरकार पर भी गंभीर आरोप हैं कि सरकार ने विजय रघुवंशी के विरुद्ध कथित अत्याचार करने वाले अधिकारियों को संरक्षण प्रदान किया। अन्यथा यह सवाल उठता है कि किसी सेवारत पुलिस अधिकारी का वाहन कथित रूप से छीनने तथा आयोग अथवा सक्षम प्राधिकारी के समक्ष भ्रामक संचार प्रस्तुत किए जाने के लिए जिम्मेदारी आखिर क्यों निर्धारित नहीं की गई। यदि संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई नियमों के अनुरूप थी, तो उसके समर्थन में स्पष्ट अभिलेख और उत्तरदायित्व निर्धारित करने में सरकार को कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। लेकिन यदि ऐसे मामलों में भी जिम्मेदारी तय नहीं होती, तो इससे कथित संरक्षण और चयनात्मक कार्रवाई के आरोपों को और बल मिलता है।

मामले का एक अन्य गंभीर पहलू वेतन से जुड़ा है। स्रोतों के अनुसार विजय रघुवंशी को अगस्त 2026 का वेतन भी जारी नहीं किया गया, जबकि वह चिकित्सकीय प्रतिबंधों के बीच उपचाराधीन बताए जा रहे हैं। ऐसे समय में वेतन तथा वैध सेवा सुविधाओं से कथित वंचित किए जाने का मामला और अधिक गंभीर हो जाता है। पूरे घटनाक्रम को लेकर कोली समाज की ओर से भी हिमाचल प्रदेश सरकार को प्रतिनिधित्व देकर कार्रवाई की मांग किए जाने की बात सामने आई है। राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जातियों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े संवैधानिक आयोग के समक्ष मामला पहुंचने के कारण अब राज्य सरकार और पुलिस मुख्यालय की कार्रवाई पर विशेष निगाहें टिकी हैं।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग द्वारा पुनः सुनवाई निर्धारित किया जाना इस मामले में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। आयोग ने प्रथम दृष्टया आरोपों पर विचार करते हुए संबंधित अधिकारियों से व्यक्तिगत उपस्थिति, कार्रवाई रिपोर्ट और सभी प्रासंगिक दस्तावेज मांगे हैं। ऐसे में 10 सितंबर की सुनवाई में पुलिस महानिदेशक अशोक तेवारी तथा अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह एवं सतर्कता) के समक्ष यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा कि समान परिस्थितियों में कार्यभार ग्रहण करने वाले अन्य अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं हुई, जबकि विजय रघुवंशी के विरुद्ध निलंबन और विभागीय जांच जैसी कठोर कार्रवाई क्यों की गई। यदि आरोपों और अभिलेखों में वर्णित विरोधाभासों का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया जाता है, तो यह प्रकरण हिमाचल प्रदेश पुलिस में कथित चयनात्मक कार्रवाई, भेदभाव और अनुसूचित जाति के अधिकारी के साथ कथित अत्याचार के आरोपों को लेकर और गंभीर रूप ले सकता है।

*दलित सामाजिक कार्यकर्ता की गिरफ्तारी और थाने में जबरन तस्वीर  खींची और प्रसारित करने पर उठे सवाल* पुलिस जवानों के समर्थ...
30/08/2026

*दलित सामाजिक कार्यकर्ता की गिरफ्तारी और थाने में जबरन तस्वीर खींची और प्रसारित करने पर उठे सवाल*

पुलिस जवानों के समर्थन में आवाज उठाने वाले करम चंद भाटिया पर कार्रवाई; सदर थाना शिमला में सिर झुकाकर और घुटनों के बल बैठाने का आरोप

शिमला। पुलिस जवानों के समर्थन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार पोस्टर के माध्यम से अपनी चिंता व्यक्त करने वाले दलित सामाजिक कार्यकर्ता करम चंद भाटिया की गिरफ्तारी ने पुलिस की कार्यप्रणाली और गिरफ्तार व्यक्ति की गरिमा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि उन्हें केवल एक ऐसे पोस्टर के संबंध में गिरफ्तार किया गया, जिसके माध्यम से वह पुलिस जवानों के पक्ष में अपनी बात रख रहे थे। गिरफ्तारी के बाद सदर थाना शिमला में उनके साथ कथित तौर पर ऐसा व्यवहार किया गया, जिसने उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत गरिमा को प्रभावित किया।

आरोप है कि पुलिस थाने में करम चंद भाटिया को सिर नीचे करके बैठने के लिए मजबूर किया गया। उन्हें कथित तौर पर घुटनों के बल बैठाया गया और उनके पीछे तीन से चार पुलिसकर्मी खड़े रहे। इसी अवस्था में उनकी तस्वीर खींचे जाने का भी आरोप है। मामला तब और गंभीर हो गया, जब आरोप के अनुसार शिमला के पुलिस अधीक्षक गौरव सिंह ने उनकी उक्त तस्वीर को थोड़ा धुंधला करके पुलिस से जुड़े मीडिया समूहों में साझा किया। तस्वीर के साथ कथित तौर पर बड़े-बड़े दावे किए गए और करम चंद भाटिया को ‘अफवाह फैलाने वाला’ बताया गया।

पुलिस से जुड़े कई मामलों पर उठाते रहे हैं सवाल

करम चंद भाटिया हाल के समय में पुलिस और पुलिस जवानों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों को सार्वजनिक रूप से उठाते रहे हैं। उन्होंने मानव भारती विश्वविद्यालय मामले में प्राथमिकी दर्ज करने में कथित देरी पर सवाल उठाए। इसके अलावा वर्ष 2022 के पुलिस भर्ती कांस्टेबल मामले में कथित घोटाले को लेकर भी उन्होंने अपनी चिंताएं सार्वजनिक कीं। उप पुलिस अधीक्षक विजय कुमार रघुवंशी से संबंधित वाहन छीने जाने के मामले को लेकर भी उन्होंने सवाल उठाए और संबंधित घटनाक्रम को सामने रखने का प्रयास किया।

18 जुलाई 2023 के आरडीएक्स मामले में भी दर्ज कराई थी प्राथमिकी

करम चंद भाटिया ने 18 जुलाई 2023 को हिमाचल राशि मामले में गैस विस्फोट से जुड़े कथित रूप से गढ़े गए आरडीएक्स मामले को लेकर भी प्राथमिकी दर्ज करवाई थी। उन्होंने इस मामले में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग की थी। ऐसे में अब उनकी गिरफ्तारी और गिरफ्तारी के बाद पुलिस थाने के भीतर उनकी कथित तस्वीर खींचे जाने तथा पुलिस से जुड़े समूहों में प्रसारित किए जाने को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।

गिरफ्तारी पर नहीं, तरीके पर सवाल

पूरे मामले में महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि किसी व्यक्ति के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज क्यों की गई अथवा उसे गिरफ्तार क्यों किया गया। यदि किसी व्यक्ति ने कानून का उल्लंघन किया है तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। असली सवाल यह है कि गिरफ्तारी के बाद उसे कथित रूप से सिर झुकाकर और घुटनों के बल बैठाकर उसकी तस्वीर क्यों खींची गई और वह तस्वीर पुलिस से जुड़े समूहों तक कैसे पहुंची।

किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति की कानूनी स्थिति अपनी जगह है, लेकिन उसकी मानवीय गरिमा और सामाजिक सम्मान भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। विशेष रूप से तब, जब संबंधित व्यक्ति दलित समुदाय से आता हो और उसने स्वयं को पुलिस जवानों के मुद्दों को उठाने वाला सामाजिक कार्यकर्ता बताया हो। किसी व्यक्ति के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई को सही ठहराने के लिए उसे कथित रूप से अपमानजनक अवस्था में प्रदर्शित करना अलग विषय है और इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

पुलिस जवानों की आवाज उठाने वाले के साथ ऐसा व्यवहार क्यों?

इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि करम चंद भाटिया पुलिस जवानों के समर्थन में आवाज उठाने और उनके मुद्दों को सार्वजनिक करने का दावा करते रहे हैं, जबकि अब उन्हीं के साथ पुलिस थाने में कथित तौर पर अपमानजनक व्यवहार किए जाने के आरोप सामने आए हैं।

किसी व्यक्ति द्वारा कोई गलती या कानून-विरुद्ध कृत्य किया गया हो तो उसके लिए विधि सम्मत कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन दो गलतियां मिलकर एक सही नहीं बनातीं। प्राथमिकी और गिरफ्तारी कानून की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है, लेकिन किसी गिरफ्तार व्यक्ति को कथित रूप से सिर झुकाकर या घुटनों के बल बैठाकर उसकी तस्वीर खींचना और फिर उसे पुलिस से जुड़े समूहों में प्रसारित करना गंभीर सामाजिक और मानवीय प्रश्न खड़े करता है।

अब यह जांच का विषय है कि सदर थाना शिमला में तस्वीर किस परिस्थिति में खींची गई, किसके निर्देश पर खींची गई, इसे पुलिस से जुड़े समूहों में किसने प्रसारित किया और तस्वीर के साथ करम चंद भाटिया को कथित रूप से ‘अफवाह फैलाने वाला’ बताने का आधार क्या था। इन प्रश्नों का निष्पक्ष उत्तर ही यह स्पष्ट कर सकेगा कि मामला केवल कानूनी कार्रवाई तक सीमित था या गिरफ्तार व्यक्ति की गरिमा और सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ भी गंभीर चूक हुई जो वास्तविक घटनाक्रम से अथिक अपमानित करने की कार्रवाई प्रतिशोध स्वरूप दिख रही है, ऐसा आमजन कह रहे है ।

लो जी, अब तलाशी अभियान और मोबाइल जब्ती!वाहन छीनने का मामला पहले ही राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष सुनवाई में है। ...
22/08/2026

लो जी, अब तलाशी अभियान और मोबाइल जब्ती!

वाहन छीनने का मामला पहले ही राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष सुनवाई में है। इस पूरे प्रकरण में शिमला पुलिस अधीक्षक कार्यालय की मंशा, उद्देश्य और कार्रवाई के औचित्य को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। इसी बीच आज एक नया और नाटकीय घटनाक्रम सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया है।

सेवानिवृत्त पुलिस निरीक्षक दिवाकर शर्मा, जो वर्ष 2025 में पुलिस अधीक्षक कार्यालय शिमला से ही सेवानिवृत्त हुए थे, अपनी बीमार पत्नी के चिकित्सा बिल जमा करवाने के लिए कार्यालय पहुंचे। लेकिन आरोप है कि पुलिस अधीक्षक शिमला के निर्देश पर उनकी तलाशी ली गई, उनका मोबाइल फोन जब्त कर लिया गया और उन्हें कार्यालय में ही रोककर रखा गया।

एक सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी, जो अपनी बीमार पत्नी के चिकित्सा बिल जमा करवाने के लिए अपने ही पुराने कार्यालय पहुंचा हो, उसके साथ अचानक “तलाशी अभियान” और “मोबाइल जब्ती” की कार्रवाई होना कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दिवाकर शर्मा के पास ऐसा कौन-सा आधार था कि उनके बैग की तलाशी ली गई, मोबाइल फोन जब्त किया गया और उन पर गोपनीय दस्तावेज चोरी करने जैसे आरोप लगाए गए?

यदि कोई वैधानिक कार्रवाई आवश्यक थी तो उसका स्पष्ट कानूनी आधार क्या था? क्या कोई लिखित आदेश था? क्या तलाशी की विधिवत प्रक्रिया अपनाई गई? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या एक सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी को उसके ही पूर्व कार्यालय में इस प्रकार अपमानित और भयभीत करने की आवश्यकता थी?

यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब विजय रघुवंशी का वाहन छीने जाने का मामला राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष सुनवाई में है और आयोग के समक्ष शिमला पुलिस के अधिकारियों की भूमिका को लेकर पहले ही गंभीर प्रश्न उठ चुके हैं।

ऐसे में आज का यह नया घटनाक्रम स्वाभाविक रूप से शिमला पुलिस अधीक्षक कार्यालय की मंशा और कार्रवाई के पीछे के उद्देश्य पर और सवाल खड़े करता है।
लो जी, वाहन जब्ती के बाद अब तलाशी अभियान और मोबाइल जब्ती!
क्या यह महज संयोग है या किसी बड़े दबाव की रणनीति का हिस्सा?
सरकार को इस पूरे घटनाक्रम का गंभीर संज्ञान लेकर यह स्पष्ट करना चाहिए कि दिवाकर शर्मा की तलाशी क्यों ली गई, उनका मोबाइल किस अधिकार के तहत जब्त किया गया, उन्हें किस आधार पर रोका गया और गोपनीय दस्तावेज चोरी करने का आरोप किस तथ्य अथवा शिकायत के आधार पर लगाया गया?

यह मामला केवल एक सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार का नहीं है। यह सवाल पुलिस संस्थान की कार्यप्रणाली, सेवानिवृत्त अधिकारियों की गरिमा और सत्ता के दुरुपयोग की संभावनाओं से जुड़ा हुआ है।

एसपी और डीजीपी के जवाब में वाहन को लेकर विरोधाभास, राष्ट्रीय आयोग को गुमराह करने का आरोप शिमला। उप पुलिस अधीक्षक विजय रघ...
20/08/2026

एसपी और डीजीपी के जवाब में वाहन को लेकर विरोधाभास, राष्ट्रीय आयोग को गुमराह करने का आरोप

शिमला। उप पुलिस अधीक्षक विजय रघुवंशी से वाहन छिनने के मामले में पुलिस अधीक्षक शिमला गौरव सिंह और पुलिस महानिदेशक द्वारा राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष प्रस्तुत जवाब पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

आयोग के समक्ष प्रस्तुत जवाब में यह कहा गया कि विजय रघुवंशी के पास संबंधित वाहन आधिकारिक रूप से संलग्न वाहन नहीं था। लेकिन सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त सरकारी अभिलेख इस दावे के विपरीत तथ्य सामने रखते हैं। कार्यालयीय रिकॉर्ड के अनुसार वाहन विजय रघुवंशी के साथ संलग्न था और वाहन सुविधा के लिए उनके वेतन से ₹750 प्रतिमाह की कटौती की जाती थी।

विशेष रूप से महत्वपूर्ण यह है कि वाहन छिनने के बाद भी ₹750 प्रतिमाह की कटौती जारी रहने का उल्लेख वेतन आहरण संबंधी कार्यालय अभिलेखों में मिलता है। इससे एसपी और डीजीपी द्वारा आयोग के समक्ष दिए गए जवाब की तथ्यात्मक विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़ा होता है।

अब मूल सवाल यह है कि जब सरकारी रिकॉर्ड में वाहन के संलग्न होने और ₹750 प्रतिमाह की कटौती का स्पष्ट उल्लेख था, तो राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष वाहन को संलग्न न होने की बात क्यों कही गई?

क्या आयोग को जवाब भेजने से पहले संबंधित वेतन एवं वाहन अभिलेखों की जांच नहीं की गई? या फिर इन अभिलेखों की जानकारी होने के बावजूद आयोग के समक्ष अलग तथ्य प्रस्तुत किए गए?

यह विरोधाभास महज प्रशासनिक चूक नहीं माना जा सकता, क्योंकि मामला एक संवैधानिक आयोग के समक्ष चल रही कार्यवाही से जुड़ा है। यदि आरटीआई से प्राप्त सरकारी रिकॉर्ड और एसपी-डीजीपी द्वारा आयोग के समक्ष दाखिल जवाब में स्पष्ट अंतर है, तो यह जांच का विषय है कि आयोग के समक्ष तथ्यात्मक स्थिति क्यों प्रस्तुत नहीं की गई।

अब राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष यह महत्वपूर्ण प्रश्न है कि एसपी और डीजीपी के जवाब में वाहन को गैर-संलग्न बताने का आधार क्या था और सरकारी रिकॉर्ड के विपरीत तथ्य आयोग के समक्ष क्यों रखे गए? आयोग द्वारा संबंधित मूल अभिलेख तलब कर वस्तुस्थिति स्पष्ट किए जाने की मांग उठ रही है।

*राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष आज पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी की पेशी* शिमला। हिमाचल प्रदेश के पुलिस महानिदेशक अ...
20/08/2026

*राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष आज पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी की पेशी*

शिमला। हिमाचल प्रदेश के पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी को आज राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना है। आयोग ने पुलिस महानिदेशक द्वारा व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट देने तथा वीडियो सम्मेलन के माध्यम से कार्यवाही में शामिल होने के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया है। ऐसे में आज की सुनवाई को अनुसूचित जाति वर्ग से संबंधित पुलिस अधिकारी के सेवा-संबंधी मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग संविधान के अनुच्छेद 338 के अंतर्गत अनुसूचित जातियों के अधिकारों और उनके संवैधानिक संरक्षण से संबंधित मामलों की जांच करता है। रोजगार और सेवा से जुड़े मामलों में यदि किसी अनुसूचित जाति अधिकारी के साथ कथित उत्पीड़न, भेदभाव अथवा प्रताड़ना का आरोप हो, तो आयोग की कार्यवाही का महत्व और भी बढ़ जाता है।

यह मामला पुलिस उपाधीक्षक विजय रघुवंशी से संबंधित है। आरोप है कि श्री विजय रघुवंशी ने अपनी गंभीर शारीरिक परेशानी और निर्धारित दायित्वों का निर्वहन करने में असमर्थता के संबंध में जिलाधिकारी, शिमला को पत्र लिखा था। लेकिन कथित रूप से इसी पत्र को उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई और निलंबन की संस्तुति का आधार बना दिया गया।

यह स्थिति अपने आप में अत्यंत विचित्र और हास्यास्पद प्रतीत होती है। किसी अधिकारी द्वारा अपनी स्वास्थ्य संबंधी कठिनाई के बारे में जिलाधिकारी को पत्र लिखना आखिर किस प्रकार अनुशासनहीनता हो सकता है? कोई अधिकारी यदि अपनी शारीरिक स्थिति, पीड़ा अथवा कार्य करने में असमर्थता के बारे में सक्षम प्रशासनिक अधिकारी को सूचित करता है, तो यह सूचना देना है, न कि अनुशासनहीनता।

यदि ऐसे पत्र को ही अनुशासनहीनता का आधार माना गया, तो स्वाभाविक प्रश्न है—किस सेवा नियम के अंतर्गत स्वास्थ्य संबंधी अपनी वास्तविक स्थिति से अवगत कराना ‘गंभीर कदाचार’ अथवा अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है?

वाहन सुविधा से वंचित करने का आरोप
इस प्रकरण में एक और गंभीर और मानवीय पहलू सामने आया है। आरोप है कि पुलिस उपाधीक्षक स्तर के अधिकारी विजय रघुवंशी से सरकारी वाहन की सुविधा वापस ले ली गई और उन्हें लगभग 7 किलोमीटर पैदल चलने के लिए मजबूर होना पड़ा।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब उसी कार्यालय में अन्य अधिकारियों को सरकारी वाहन उपलब्ध कराए जा रहे थे, तो विजय रघुवंशी को ही वाहन सुविधा से क्यों वंचित किया गया? यदि वाहन उपलब्ध थे और अन्य अधिकारी उनका उपयोग कर रहे थे, तो एक पुलिस उपाधीक्षक को लगभग 7 किलोमीटर पैदल चलने की स्थिति में डालने के निर्णय का औचित्य क्या था?
मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि आरोप है कि इसी अवधि में पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी द्वारा प्रशिक्षण पर आए भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों के लिए विशेष रूप से नए स्कॉर्पियो-एन वाहन उपलब्ध कराए गए। एक ओर प्रशिक्षणरत अधिकारियों के लिए नए वाहन उपलब्ध कराए जाने का दावा है, वहीं दूसरी ओर पुलिस उपाधीक्षक स्तर के अधिकारी विजय रघुवंशी को वाहन से वंचित कर लगभग 7 किलोमीटर पैदल चलने की स्थिति में छोड़ दिया गया।
यदि ये तथ्य रिकॉर्ड से प्रमाणित होते हैं, तो यह केवल वाहन आवंटन का प्रशासनिक प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि समानता, गरिमा और प्रशासनिक निष्पक्षता का गंभीर प्रश्न बन जाता है।
एक तरफ नए वाहन और दूसरी तरफ पैदल चलने को विवश अधिकारी—यह विरोधाभास आज राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष विशेष ध्यान आकर्षित कर सकता है।
स्वास्थ्य की जानकारी को ही अनुशासनहीनता बना दिया गया?
आरोपों के अनुसार, स्थिति तब और गंभीर हो गई जब 19 मई को विजय रघुवंशी चिकित्सकीय परीक्षण के लिए गए। आरोप है कि उनकी अनुपस्थिति दर्ज की गई और उनकी स्वास्थ्य संबंधी परिस्थिति को समझने अथवा उनके स्वास्थ्य की जानकारी लेने के बजाय मामले को विभागीय अनुशासनहीनता के रूप में प्रस्तुत किया गया।
यह प्रश्न भी उठता है कि जिस अधिकारी के बारे में यह बताया जा रहा था कि वह गंभीर शारीरिक पीड़ा में था, उसके स्वास्थ्य और कुशलक्षेम की जानकारी लेने के लिए क्या पुलिस प्रशासन द्वारा कोई संवेदनशील प्रयास किया गया?
किसी अधिकारी की बीमारी को समझने के बजाय उसकी बीमारी से संबंधित पत्र को ही उसके विरुद्ध इस्तेमाल करना प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
मामले में शिमला के पुलिस अधीक्षक गौरव सिंह की भूमिका को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि विजय रघुवंशी की स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों को ही उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई और निलंबन की संस्तुति का आधार बनाया गया।
मामले को इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी द्वारा भी विजय रघुवंशी के विरुद्ध ऐसी एकपक्षीय और परोक्ष कार्यवाही की गई, जिसका प्रतिकूल प्रभाव उनके सेवा जीवन और पेशेवर प्रतिष्ठा पर पड़ सकता था।
यदि किसी अधिकारी की स्वास्थ्य संबंधी सूचना को ही उसके विरुद्ध हथियार बना दिया जाए और साथ ही उसे बुनियादी वाहन सुविधा से वंचित कर दिया जाए, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था के मानवीय पक्ष पर गंभीर प्रश्न है।
पुलिस जैसे अनुशासित बल में अनुशासन आवश्यक है, लेकिन अनुशासन का अर्थ यह नहीं हो सकता कि कोई अधिकारी अपनी बीमारी या शारीरिक पीड़ा के बारे में सक्षम प्राधिकारी को सूचित करने से भी भयभीत हो।

*सरकार की चुप्पी पर भी सवाल*
हिमाचल प्रदेश सरकार की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि एक अनुसूचित जाति अधिकारी द्वारा कथित उत्पीड़न और प्रशासनिक दबाव की शिकायत किए जाने के बावजूद सरकार ने अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाई और पूरे घटनाक्रम को मूकदर्शक की तरह देखा।
सोलन जिले के एक दलित नेता ने कहा है कि यदि कमजोर वर्ग से आने वाले अधिकारियों के साथ कथित भेदभाव और दुर्व्यवहार की शिकायतों पर संस्थागत स्तर पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती है, तो इस मुद्दे को सड़क तक ले जाया जाएगा। उनका कहना है कि प्रभावशाली अधिकारियों को संरक्षण और कमजोर वर्ग के अधिकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार की धारणा प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।अब सभी की निगाहें आज होने वाली राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की व्यक्तिगत सुनवाई पर हैं। आयोग के समक्ष केवल यह प्रश्न नहीं होगा कि विजय रघुवंशी के विरुद्ध की गई कार्रवाई उचित थी या नहीं, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होगा कि एक पुलिस उपाधीक्षक को वाहन सुविधा से वंचित कर लगभग 7 किलोमीटर पैदल चलने की स्थिति क्यों उत्पन्न हुई, जबकि अन्य अधिकारियों को वाहन उपलब्ध थे। और उससे भी बड़ा सवाल
यदि प्रशिक्षणरत भारतीय पुलिस सेवा अधिकारियों के लिए नए स्कॉर्पियो-एन वाहन उपलब्ध कराए जा सकते हैं, तो एक कार्यरत पुलिस उपाधीक्षक को सरकारी वाहन से वंचित कर पैदल चलने के लिए क्यों छोड़ दिया गया?
आज की सुनवाई यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण हो सकती है कि सरकारी सेवा में अनुशासन के नाम पर प्रशासनिक कार्रवाई की सीमा क्या है और क्या किसी अनुसूचित जाति अधिकारी के साथ स्वास्थ्य, वाहन सुविधा तथा सेवा-संबंधी निर्णयों में समानता और गरिमा के संवैधानिक सिद्धांतों का पालन किया गया।

Address

Solan
173212

Telephone

+919816199020

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when News Now India posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to News Now India:

Shortcuts

Share