01/09/2026
*हिमाचल पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी फिर तलब, कनिष्ठ पुलिस अधिकारी पर अत्याचार के आरोपों पर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग सख्त।*
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग अनुच्छेद 338 ,द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अन्तर्गत, हिमाचल प्रदेश पुलिस के उप पुलिस अधीक्षक विजय कुमार रघुवंशी की ओर से लगाए गए कथित जातिगत अत्याचारों और भेदभाव के आरोपों को लेकर एक बार फिर हिमाचल प्रदेश के पुलिस महानिदेशक तथा अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह एवं सतर्कता) को तलब किया है। आयोग के 1 सितंबर 2026 के पत्र के अनुसार, 20 अगस्त को हुई सुनवाई के कार्यवृत्त के आधार पर कार्रवाई रिपोर्ट तथा संबंधित अभिलेखों के साथ दोनों अधिकारियों को 10 सितंबर 2026 को सुबह 11:30 बजे नई दिल्ली स्थित आयोग के मुख्यालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने को कहा गया है। आयोग ने संबंधित केस फाइल, केस डायरी तथा अन्य प्रासंगिक अभिलेख भी प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
विवाद की शुरुआत हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा जारी स्थानांतरण आदेश के बाद हुई, जिसके पश्चात आरोप है कि पुलिस महानिदेशक अशोक तेवारी द्वारा उक्त स्थानांतरण आदेश के क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न की गई। इसके बाद विजय रघुवंशी के विरुद्ध निलंबन और विभागीय जांच की कार्रवाई किए जाने का आरोप है। मामले का सबसे गंभीर पहलू यह बताया जा रहा है कि समान परिस्थितियों में स्थानांतरित अन्य अधिकारियों ने भी उसी समय कार्यभार ग्रहण किया, लेकिन उनके विरुद्ध ऐसी कार्रवाई नहीं की गई और केवल विजय रघुवंशी को निशाना बनाया गया। इसी आधार पर मामले में कथित मनमानी, चयनात्मक कार्रवाई और भेदभाव को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
मामले में सरकारी वाहन को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि पुलिस महानिदेशक से संबद्ध वाहन भी विजय रघुवंशी से वापस ले लिया गया, जबकि समान कार्यालय में तैनात दो आईपीएस अधिकारियों को स्कॉर्पियो-एन जैसे वाहन उपलब्ध कराए गए। दूसरी ओर, पुलिस अधीक्षक शिमला की ओर से वाहन अथवा अन्य सुविधाओं के संबंध में दिए गए तर्कों पर भी सवाल उठाए गए हैं। विजय रघुवंशी द्वारा प्रस्तुत वेतन विवरण में कथित रूप से संलग्न वाहन के लिए प्रतिमाह लगभग 750 रुपये की कटौती दर्शाए जाने से वाहन संबंधी रिपोर्ट और वास्तविक वेतन अभिलेखों के बीच कथित विरोधाभास का मुद्दा भी सामने आया है। उप पुलिस अधीक्षक मुख्यालय का पद जिला पुलिस में महत्वपूर्ण पद माना जाता है, इसलिए इस पद से जुड़े अधिकारों और सुविधाओं से वंचित किए जाने के कारणों पर भी आयोग के समक्ष स्पष्टीकरण अपेक्षित है।
हिमाचल प्रदेश सरकार पर भी गंभीर आरोप हैं कि सरकार ने विजय रघुवंशी के विरुद्ध कथित अत्याचार करने वाले अधिकारियों को संरक्षण प्रदान किया। अन्यथा यह सवाल उठता है कि किसी सेवारत पुलिस अधिकारी का वाहन कथित रूप से छीनने तथा आयोग अथवा सक्षम प्राधिकारी के समक्ष भ्रामक संचार प्रस्तुत किए जाने के लिए जिम्मेदारी आखिर क्यों निर्धारित नहीं की गई। यदि संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई नियमों के अनुरूप थी, तो उसके समर्थन में स्पष्ट अभिलेख और उत्तरदायित्व निर्धारित करने में सरकार को कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। लेकिन यदि ऐसे मामलों में भी जिम्मेदारी तय नहीं होती, तो इससे कथित संरक्षण और चयनात्मक कार्रवाई के आरोपों को और बल मिलता है।
मामले का एक अन्य गंभीर पहलू वेतन से जुड़ा है। स्रोतों के अनुसार विजय रघुवंशी को अगस्त 2026 का वेतन भी जारी नहीं किया गया, जबकि वह चिकित्सकीय प्रतिबंधों के बीच उपचाराधीन बताए जा रहे हैं। ऐसे समय में वेतन तथा वैध सेवा सुविधाओं से कथित वंचित किए जाने का मामला और अधिक गंभीर हो जाता है। पूरे घटनाक्रम को लेकर कोली समाज की ओर से भी हिमाचल प्रदेश सरकार को प्रतिनिधित्व देकर कार्रवाई की मांग किए जाने की बात सामने आई है। राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जातियों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े संवैधानिक आयोग के समक्ष मामला पहुंचने के कारण अब राज्य सरकार और पुलिस मुख्यालय की कार्रवाई पर विशेष निगाहें टिकी हैं।
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग द्वारा पुनः सुनवाई निर्धारित किया जाना इस मामले में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। आयोग ने प्रथम दृष्टया आरोपों पर विचार करते हुए संबंधित अधिकारियों से व्यक्तिगत उपस्थिति, कार्रवाई रिपोर्ट और सभी प्रासंगिक दस्तावेज मांगे हैं। ऐसे में 10 सितंबर की सुनवाई में पुलिस महानिदेशक अशोक तेवारी तथा अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह एवं सतर्कता) के समक्ष यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा कि समान परिस्थितियों में कार्यभार ग्रहण करने वाले अन्य अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं हुई, जबकि विजय रघुवंशी के विरुद्ध निलंबन और विभागीय जांच जैसी कठोर कार्रवाई क्यों की गई। यदि आरोपों और अभिलेखों में वर्णित विरोधाभासों का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया जाता है, तो यह प्रकरण हिमाचल प्रदेश पुलिस में कथित चयनात्मक कार्रवाई, भेदभाव और अनुसूचित जाति के अधिकारी के साथ कथित अत्याचार के आरोपों को लेकर और गंभीर रूप ले सकता है।