27/11/2025
मूल पिछड़ों जागो
हक और अधिकारों के लिए संगठित हों।
आज पिछड़ा वर्ग आयोग बीकानेर में करेगा जनसुनवाई
भारत की आजादी के बाद 1953 में मंडल आयोग ने पिछड़ा वर्ग को शासन प्रशासन में भागीदारी देने की सिफारिश की थी परंतु 1990 तक हमें हमारे हक और अधिकारों से वंचित रखा।
1990 में वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग को आंशिक रिपोर्ट लागू किया जिसे 1992 में सुप्रीम कोर्ट की अधिसूचना से लागू किया गया।
अफसोस 19 अक्टूबर 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेई ने गैर संवैधानिक रूप से जाट बिश्नोई जैसी जातियों को पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल कर दिया और 1999 में राजस्थान सरकार ने जाट समुदाय को (भरतपुर और धौलपुर जिलों को छोड़कर) राज्य की अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) सूची में शामिल करने का निर्णय लिया, जो राज्य का पहला ऐसा कदम था जो मूल पिछड़ा वर्ग के हक और अधिकारों पर कुठाराघात था।
पिछड़ा वर्ग में जाट बिश्नोई जैसी सक्षम जातियों के शामिल करने के बाद मूल OBC समुदायों (जैसे गुर्जर, माली, अहीर आदि) की स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
जाट समुदाय आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत मजबूत होने के कारण OBC कोटे में प्रमुखता से हावी हो गया, जिससे अन्य गरीब OBC जातियों को आरक्षण के लाभ प्राप्त करने में कठिनाई हुई।
एक सरकारी अधिकारी के अनुसार, "1999 के बाद OBC समूहों जैसे गुर्जर, माली और अहीर को आर्थिक रूप से समृद्ध जाट उम्मीदवारों से प्रतिस्पर्धा करना असंभव हो गया।" इससे मूल OBC समुदायों में असंतोष बढ़ा, और 2007 में गुर्जर आंदोलन की शुरुआत हुई, जिसमें उन्होंने अनुसूचित जनजाति (ST) दर्जा मांगा ताकि उनका अलग कोटा सुनिश्चित हो।
पिछड़ा वर्ग में जाट बिश्नोई जैसी सक्षम जातियों को शामिल करने का अटल बिहारी वाजपेई का यह निर्णय राजनीतिक वोट बैंक के लिए लिया गया निर्णय माना गया, जिसने OBC आरक्षण प्रणाली को और जटिल बना दिया।
बाद में 2015 में राजस्थान हाईकोर्ट ने धौलपुर और भरतपुर में जाटों के OBC कोटे को रद्द कर दिया, लेकिन राज्य स्तर पर प्रभाव जारी रहा। कुल मिलाकर, मूल OBC समुदायों के लिए यह एक 'दौड़ पीछे की ओर' जैसी स्थिति बनी, जहां स्रोतों का बंटवारा असमान हो गया।
हे मूल पिछड़ा वर्ग के लोगों
अपने बच्चों के भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए राजनैतिक रूप से सक्षम बनो।
श्याम वर्मा श्री करणपुर।
#पिछड़ावर्गआयोग