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लोकतंत्र में संघर्ष का तरीका सबसे ज्यादा मायने रखता है!जनता जब किसी को विधायक चुनती है तो उसके पीछे बहुत बड़ी उम्मीद होत...
19/05/2026

लोकतंत्र में संघर्ष का तरीका सबसे ज्यादा मायने रखता है!

जनता जब किसी को विधायक चुनती है तो उसके पीछे बहुत बड़ी उम्मीद होती है। उम्मीद होती है कि हमारा प्रतिनिधि हमारी बात को मजबूती से सरकार और सदन तक पहुंचाएगा। विरोध करना, संघर्ष करना, आवाज उठाना लोकतंत्र की खूबसूरती है और हर जनप्रतिनिधि का अधिकार भी है।

लेकिन हाल ही में शिव विधानसभा से निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी का प्रदर्शन के दौरान उठाया गया कदम कई सवाल छोड़ गया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी समस्या का समाधान बातचीत, सदन में बहस, ज्ञापन, शांतिपूर्ण धरने और संवैधानिक तरीकों से निकाला जाता है। संविधान ने ही जनप्रतिनिधियों को सबसे ज्यादा ताकत दी है ताकि वे जनता की आवाज बन सकें।

सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षा नियमों का पालन करना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। प्रदर्शन स्थल पर किसी भी तरह का जोखिम भरा कदम न सिर्फ खुद के लिए बल्कि वहां मौजूद आम लोगों, पुलिस और मीडिया के लिए भी खतरनाक हो सकता है।

विधायक समाज के लिए एक आदर्श होते हैं। गांव-ढाणी का युवा उन्हें देखकर सीखता है। ऐसे में यह सोचना जरूरी है कि हम आने वाली पीढ़ी को कैसा संदेश देना चाहते हैं। क्या हम उन्हें बताना चाहते हैं कि हक पाने के लिए अपनी सुरक्षा दांव पर लगाना पड़ता है, या ये कि लोकतंत्र में कलम और कानून सबसे बड़े हथियार हैं?

हम समझ सकते हैं कि क्षेत्र की समस्याओं को लेकर एक जनप्रतिनिधि पर कितना दबाव रहता है। जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना आसान नहीं होता। मगर समाधान हमेशा वही स्थायी होता है जो कानून और मर्यादा के दायरे में रहकर निकाला जाए।

उम्मीद है कि सभी जनप्रतिनिधि गांधी जी के बताए शांतिपूर्ण और संवैधानिक रास्तों से ही जनता की लड़ाई लड़ेंगे। क्योंकि वही रास्ता सबसे मजबूत है और वही लोकतंत्र को जिंदा रखता है।

इस मुद्दे पर आप क्या सोचते हैं? अपनी राय मर्यादित भाषा में कमेंट करें।

 #शिव विधायक  #भाटी ने खुद पर छिड़का  #पेट्रोल,   👇🏻👇🏻पेट्रोल डालने से आंदोलन सफल नहीं होते बल्कि असफल हो जाते हैं।
19/05/2026

#शिव विधायक #भाटी ने खुद पर छिड़का #पेट्रोल, 👇🏻👇🏻
पेट्रोल डालने से आंदोलन सफल नहीं होते बल्कि असफल हो जाते हैं।

लाइन में लगाने की आदत लग गई है... इनको
19/05/2026

लाइन में लगाने की आदत लग गई है... इनको

किरोड़ी बाबा सरकार में रहते हुए काम भी नहीं करवा पा रहे हैं ...साथ में वो यह भी कह रहे है कि न तो चलती ट्रेन रोक सकते न ...
19/05/2026

किरोड़ी बाबा सरकार में रहते हुए काम भी नहीं करवा पा रहे हैं ...
साथ में वो यह भी कह रहे है कि न तो चलती ट्रेन रोक सकते न ही सीएम हाउस का घेराव कर सकते।
😎✍️

राजस्थान की राजनीति में Satish Poonia का योगदान किसी परिचय का मोहताज नहीं है।एक साधारण कार्यकर्ता से लेकर प्रदेश अध्यक्ष...
18/05/2026

राजस्थान की राजनीति में Satish Poonia का योगदान किसी परिचय का मोहताज नहीं है।
एक साधारण कार्यकर्ता से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक का उनका सफर संघर्ष, संगठन और समर्पण की मिसाल रहा है। जब राजस्थान भाजपा कठिन दौर से गुजर रही थी, तब सतीश पुनिया ने संगठन को गांव-ढाणी तक मजबूत करने का काम किया। कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने, पार्टी को मजबूती देने और विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने में उनकी भूमिका हमेशा अग्रणी रही है।

आज समय की मांग है कि भाजपा उनके अनुभव और संगठन क्षमता का सम्मान करे। सतीश पुनिया को राज्यसभा भेजकर केन्द्र की राजनीति में बड़ी जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। उनका अनुभव केवल राजस्थान ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी के लिए लाभदायक साबित हो सकता है।

ऐसे समर्पित नेता को केन्द्रीय मंत्रीमंडल में स्थान मिलना लाखों कार्यकर्ताओं के सम्मान जैसा होगा, जिन्होंने वर्षों तक पार्टी के लिए मेहनत की है।
संघर्ष करने वालों को सम्मान मिलना ही चाहिए।

🌙 चांद को देखकर बारिश का अंदाजा? बुजुर्गों की बात, किसान साथी का अनुभव 🌧️गांव के बुजुर्ग कहते हैं - "चांद देखकर बता देंग...
18/05/2026

🌙 चांद को देखकर बारिश का अंदाजा? बुजुर्गों की बात, किसान साथी का अनुभव 🌧️

गांव के बुजुर्ग कहते हैं - "चांद देखकर बता देंगे कल पानी आएगा या नहीं।" मोबाइल-ऐप से पहले यही हमारा मौसम विभाग था।

बुजुर्गों के बताए चांद के संकेत:
1. चांद के चारों तरफ घेरा - अगर चांद के आसपास गोल छल्ला दिखे तो 2-3 दिन में बारिश पक्की। जितना बड़ा घेरा, उतनी तेज बारिश।
2. लाल चांद - चांद लाल दिखे तो हवा चलेगी, आंधी-तूफान के साथ बारिश का चांस।
3. चांद झुका हुआ - चांद का निचला हिस्सा भारी लगे, कटोरी जैसी शक्ल हो तो कहते हैं "कटोरी भरकर पानी गिरेगा"।
4. बादलों में छुपा चांद - अमावस्या से तीज तक चांद बादलों में लुका-छिपी करे तो सावन अच्छा जाएगा।
5. चांद साफ-चमकीला - एकदम साफ चमकता चांद सूखे का संकेत माना जाता है।

आज भले सैटेलाइट से पता चल जाए, पर दादाजी-नानाजी के ये अनुभव आज भी खेत में काम आते हैं।

किसान साथियों, आप बताओ 👇
आपके इलाके में चांद को लेकर क्या कहावत है? आपके बुजुर्ग क्या संकेत बताते थे? क्या आपके साथ ऐसा हुआ है कि चांद देखकर बारिश का सही अंदाजा लगा हो?

कमेंट में अपना अनुभव जरूर लिखें। नई पीढ़ी को भी पुराना ज्ञान मिल जाएगा।

राजस्थान जैसे विशाल और भौगोलिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण राज्य में पानी केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा आधार है। ख...
18/05/2026

राजस्थान जैसे विशाल और भौगोलिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण राज्य में पानी केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा आधार है। खासकर Rajasthan के चूरू, झुंझुनू और सीकर जैसे जिलों में हर वर्ष गर्मियों के दौरान पेयजल संकट आम जनता की सबसे बड़ी परेशानी बन जाता है। इंदिरा गाँधी नहर, आपणी योजना और चौधरी कुंभाराम लिफ्ट परियोजना पर निर्भर लाखों लोगों के सामने हर साल वही पुराना सवाल खड़ा हो जाता है—“क्या इस बार पानी समय पर मिलेगा?”

हर वर्ष नहरों की मरम्मत और रख-रखाव के नाम पर 30-40 दिन की नहरबंदी की जाती है। सरकार और जलदाय विभाग पहले से दावा करते हैं कि स्टोरेज डैम भर लिए गए हैं, 48 घंटे में जलापूर्ति होगी, टैंकरों से संकटग्रस्त गाँवों तक पानी पहुँचाया जाएगा और किसी को परेशानी नहीं होने दी जाएगी। कागज़ों और बैठकों में व्यवस्था बहुत मजबूत दिखाई देती है, लेकिन धरातल पर तस्वीर अक्सर अलग नजर आती है।

गाँवों में लोग घंटों पानी का इंतजार करते हैं। कहीं टैंकर समय पर नहीं पहुँचते, कहीं पाइपलाइन सूखी रहती है, तो कहीं एक-एक बूंद के लिए विवाद की स्थिति बन जाती है। जनप्रतिनिधि जनसुनवाई करते हैं, अधिकारियों को फटकार भी लगाते हैं, लेकिन आम नागरिक के घर तक पानी फिर भी नियमित रूप से नहीं पहुँच पाता। जनता कुछ देर के लिए भाषणों और आश्वासनों से संतुष्ट हो जाती है, परंतु उनकी असली समस्या जस की तस बनी रहती है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह संकट कोई नई समस्या नहीं है। वर्षों से हर गर्मी में यही हालात बनते हैं। यदि समस्या हर साल निश्चित रूप से आने वाली है, तो उसका स्थायी समाधान भी वर्षों पहले तैयार हो जाना चाहिए था। आखिर क्यों आज भी इतनी बड़ी आबादी को गर्मियों में पानी के लिए संघर्ष करना पड़ता है? क्यों अभी तक ऐसी मजबूत वैकल्पिक व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई, जिससे नहरबंदी का असर आम जनता पर कम से कम पड़े?

राज्य सरकारें बदलती रहीं, घोषणाएँ होती रहीं, योजनाओं के नाम बदले, बजट घोषित हुए, लेकिन गाँवों की प्यास पूरी तरह नहीं बुझ पाई। विकास के दावों के बीच यदि लोगों को भीषण गर्मी में पीने के पानी के लिए परेशान होना पड़े, तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आधुनिक तकनीक, बेहतर जल संरक्षण, अतिरिक्त स्टोरेज क्षमता, वर्षा जल संचयन और स्थानीय जल स्रोतों के विकास पर यदि समय रहते गंभीरता से काम किया जाए, तो इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

पानी पर राजनीति करने से ज्यादा जरूरी है पानी की स्थायी व्यवस्था करना। क्योंकि प्यासे व्यक्ति को भाषण नहीं, पानी चाहिए। जनता अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ऐसा समाधान चाहती है जिससे हर वर्ष गर्मियों में पानी के लिए संघर्ष उसकी नियति न बने।

प्रदेशाध्यक्ष के लिए अनिल चौपड़ा......
18/05/2026

प्रदेशाध्यक्ष के लिए अनिल चौपड़ा......

खींवसर विधायक रेवंत राम जी डांगा: सादगी, संस्कृति और कार्यशैली का संगम ईमानदारी 😒रेवंत राम जी डांगा साहब को देखकर लगता ह...
17/05/2026

खींवसर विधायक रेवंत राम जी डांगा: सादगी, संस्कृति और कार्यशैली का संगम ईमानदारी 😒

रेवंत राम जी डांगा साहब को देखकर लगता है कि नेता कैसा होना चाहिए।

डांस के मामले में तो इनसे आगे कोई नहीं, लेकिन सबसे बड़ी बात है इनकी सादगी। हमेशा धोती-कुर्ता और सिर पर राजस्थानी साफा। विधानसभा हो या खेत का मेड़, पोशाक नहीं बदलती। ये दिखावा नहीं, राजस्थानी संस्कृति को जीने का तरीका है।

और आपने ये बात भी नोट की होगी कि इनकी कार्यशैली भी ठीक है। जनता के बीच रहना, सुख-दुख में शामिल होना, और अफसरों से सीधा सवाल करना - यही असली जनप्रतिनिधि की पहचान है।

किसान पुत्र हैं तो किसान का दर्द समझते हैं। रात-बिरात फोन उठाते हैं, मौके पर पहुंचते हैं। कुर्सी पर बैठकर आदेश देने वाले नेता बहुत देखे, पर धरती पर बैठकर जनता की बात सुनने वाले कम हैं। डांगा साहब उन्हीं में से हैं।

आज की राजनीति में जहां नेता कोट-पैंट में जनता से दूर होते जा रहे हैं, वहां रेवंत राम जी धोती में जनता के पास बैठते हैं। डांस करते हैं तो जनता के साथ, रोते हैं तो किसान के साथ।

खींवसर की जनता खुशनसीब है जिसे ऐसा विधायक मिला। सादगी में ताकत है और डांगा साहब इसकी मिसाल हैं।

काम बोलता है, पोशाक नहीं। और इनका काम भी बोल रहा है, कार्यशैली भी बोल रही है।

हनुमान जी बेनीवाल ने याद दिलाई मंजू जी को उनकी ताकत13 मई 2026 को नागौर जिला परिषद सभागार में हुई DISHA की बैठक में सांसद...
17/05/2026

हनुमान जी बेनीवाल ने याद दिलाई मंजू जी को उनकी ताकत

13 मई 2026 को नागौर जिला परिषद सभागार में हुई DISHA की बैठक में सांसद हनुमान बेनीवाल ने साफ कहा - जनप्रतिनिधि के पास जनता की ताकत होती है, उसका इस्तेमाल करना चाहिए।

मंजू जी को संबोधित करते हुए हनुमान जी बोले: "आपके पास बहुत बड़ी ताकत है, उपयोग लो। 2.5 साल निकल गए, फिर कब लोगी?"

बात सही है। जनता चुनती है तो उम्मीद करती है कि उसका विधायक, उसका सांसद अफसरों से जवाब तलब करे। फाइल अटकाए बैठे अधिकारी को सबक सिखाना जरूरी है, ताकि आम आदमी का काम समय पर हो।

जनप्रतिनिधि की कुर्सी शोभा के लिए नहीं है। वो ताकत जनता ने दी है। अगर अधिकारी सुनते नहीं, काम टालते हैं, तो जनप्रतिनिधि को सख्त होना पड़ेगा। एक-दो पर कार्रवाई होगी तभी सिस्टम सुधरेगा।

2.5 साल का कार्यकाल बीत जाना मतलब जनता के 2.5 साल बर्बाद होना। अब देर मत करो। जनता सब देख रही है। जो अधिकारी काम नहीं करेगा, उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।

हनुमान जी बेनीवाल की बात हर विधायक-सांसद के लिए है - ताकत का उपयोग जनहित में करो। कुर्सी की गर्मी दिखाओ, ताकि अफसरशाही की ठंड खत्म हो।

जनता ने चुना है तो जनता के लिए लड़ो। यही लोकतंत्र है।

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