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25/08/2026

⚖️ सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण : मतदाता सूची से नाम हटने का अर्थ बुनियादी अधिकारों की समाप्ति नहीं!
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम मौखिक टिप्पणी की है, जो आम नागरिकों के अधिकारों की दिशा में एक बड़ा कदम है।
📌 मामले के मुख्य बिंदु :
・अन्य लाभ रहेंगे सुरक्षित: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 'बिहार SIR' मामले में दिए गए फैसले के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची (Voter List) से हटा दिया जाता है, तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि उसे अन्य नागरिकता लाभों से वंचित कर दिया जाएगा।
・राशन और प्रमाण पत्र पर नहीं पड़ेगा असर: पश्चिम बंगाल SIR मामले की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि मतदाता सूची से बाहर हुए लोगों को PDS (सार्वजनिक वितरण प्रणाली/राशन) और मूल निवास (Domicile) प्रमाण पत्र जैसी सुविधाओं से रोका जा रहा है।
・सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: वरिष्ठ अधिवक्ता की दलीलों पर सुनवाई करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से नाम हटने का ऐसा "दुष्प्रभाव" नागरिकों के अन्य बुनियादी अधिकारों पर नहीं पड़ना चाहिए।

यह टिप्पणी यह सुनिश्चित करती है कि कानूनी या प्रक्रियागत कारणों से मतदाता सूची से बाहर होने पर भी किसी भी व्यक्ति से उसके जीवन-यापन से जुड़ी आवश्यक सरकारी सुविधाएं नहीं छीनी जा सकतीं।
अपने कानूनी अधिकारों, सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम फैसलों और अहम कानूनी जानकारियों से अपडेट रहने के लिए पेज से जुड़े रहें।
Advocate Kunwar Singh Yadav

24/08/2026

🚨 यूपी के मकान मालिकों और किराएदारों के लिए बड़ी खबर! 🚨
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के नए किरायेदारी कानून (UP Tenancy Act, 2021) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है! ⚖️
हाईकोर्ट ने 2021 के नए कानून के कई प्रमुख नियमों को रद्द कर दिया है, जिससे यूपी में किरायेदारी की व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने जा रहा है।
📌 फैसले की मुख्य बातें:
・नियम रद्द: कोर्ट ने नए कानून के तहत किराया निर्धारण, किराया बढ़ाने और मकान खाली कराने से जुड़े अहम नियमों (धारा 8, 9, 10, 38 और 42) को खारिज कर दिया है।
・पुराना कानून फिर से लागू: इस फैसले के बाद, अब राज्य में जरूरत के हिसाब से पुराना 1972 का किरायेदारी कानून ही फिर से प्रभावी होगा।
・ऐसा क्यों हुआ? कोर्ट ने पाया कि राज्य का 2021 का नया कानून, केंद्र सरकार के 'ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट (TPA)' जैसे पुराने और स्थापित कानूनों से सीधे तौर पर टकरा रहा था।
🗣️ इस पर आपकी क्या राय है?
आप एक मकान मालिक हैं या किराएदार? हाईकोर्ट के इस पुराने कानून की तरफ लौटने वाले फैसले को आप किस नजरिए से देखते हैं? अपनी बेबाक राय हमें कमेंट्स (👇) में जरूर बताएं!
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23/08/2026

⚖️ क्या राजस्व रिकॉर्ड में नाम होने से आप संपत्ति के मालिक बन जाते हैं? सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला! 🏠
​सुप्रीम कोर्ट ने अचल संपत्ति और मालिकाना हक को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण बात दोहराई है, जिसे हर संपत्ति मालिक को जानना चाहिए।
​मुख्य बातें:
・​मालिकाना हक का सबूत नहीं: कोर्ट ने साफ किया है कि राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Records/Mutation) में किसी व्यक्ति का नाम दर्ज होने से न तो संपत्ति का नया मालिकाना हक (Ownership) पैदा होता है और न ही पुराने मालिक का हक खत्म होता है।
・​हिस्सेदारी सुरक्षित है: केवल राजस्व रिकॉर्ड में किसी अन्य व्यक्ति का नाम दर्ज हो जाने के आधार पर यह बिल्कुल नहीं माना जा सकता कि मूल सह-स्वामी (Co-owner) ने अपनी संपत्ति में अपनी हिस्सेदारी स्वेच्छा से छोड़ दी है।
・​इसका मतलब क्या है? राजस्व रिकॉर्ड मुख्य रूप से सरकार द्वारा लगान या टैक्स वसूलने के लिए होते हैं। संपत्ति का असली मालिकाना हक केवल सही कानूनी दस्तावेजों (Title Deeds) से ही तय होता है।

​अगर आपके या आपके परिवार में किसी संपत्ति को लेकर ऐसा कोई भ्रम है, तो यह कानूनी जानकारी आपके बहुत काम आ सकती है! इस पोस्ट को शेयर करें ताकि दूसरों को भी उनके कानूनी अधिकारों के बारे में सही जानकारी मिल सके।

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​- एडवोकेट कुँवर सिंह यादव | विधिक सलाहकार

22/08/2026

⚖️ इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा और ऐतिहासिक फैसला: असंवैधानिक नियमों के आधार पर बर्खास्तगी अमान्य!

​क्या किसी कर्मचारी को ऐसे नियमों के तहत नौकरी से निकाला जा सकता है जो खुद संविधान के खिलाफ हों? बिल्कुल नहीं! इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 40 दशक पुराने एक मामले में कर्मचारियों के हक में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
​📌 फैसले की मुख्य बातें :

・​नियम शुरुआत से ही शून्य : कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान लागू होने के बाद बनी ऐसी कोई भी सेवा नियमावली, जिसे अदालत असंवैधानिक घोषित कर चुकी है, उसे शुरुआत से ही शून्य (Void) माना जाएगा।
​ ​・​बर्खास्तगी गैरकानूनी: ऐसे असंवैधानिक नियमों के आधार पर की गई किसी भी कर्मचारी की बर्खास्तगी कानूनी रूप से कायम नहीं रह सकती।
・​ 40 साल बाद मिला न्याय: जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने इसी आधार पर गोरखपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के एक क्लर्क की वर्ष 1983 में हुई बर्खास्तगी को रद्द कर दिया।
​कर्मचारियों के अधिकारों और कानूनी सुरक्षा की दिशा में यह एक बड़ी नज़ीर है! न्याय में भले ही देरी हुई, लेकिन अंततः जीत संविधान की हुई। 🇮🇳

​आपका हाईकोर्ट के इस फैसले पर क्या विचार है?
कमेंट में अपनी राय जरूर बताएं! 👇

22/08/2026

सुप्रीम कोर्ट में BCI चेयरमैन के कार्यकाल को चुनौती..
NALSAR विवाद के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन श्री मनन कुमार मिश्रा की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। उनके लंबे कार्यकाल और BCI की कार्यप्रणाली को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अहम रिट याचिका दायर की गई है।

"कानूनी शिक्षा और व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग करते हुए BCI के नेतृत्व पर बड़े सवाल खड़े किए गए हैं।"

💢 याचिका की मुख्य बातें:
याचिकाकर्ता:
एडवोकेट योगमाया एमजी द्वारा यह रिट याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है।

💢 कार्यकाल पर सवाल: मिश्रा के चेयरमैन पद पर लगातार इतने लंबे समय तक बने रहने को सीधे तौर पर चुनौती दी गई है।
💢 ऑडिट की मांग: याचिका में BCI के फाइनेंस (वित्तीय मामलों) और देशभर के लॉ कॉलेजों के निष्पक्ष ऑडिट की भी कड़ी मांग की गई है।

✍️ आपकी क्या राय है? क्या कानूनी संस्थाओं के शीर्ष पदों पर एक तय समय सीमा (Term Limit) होनी चाहिए? कमेंट सेक्शन में अपने विचार जरूर साझा करें!

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