04/12/2025
*कोडीन कफ सिरप कांड का काला सच*
हैवानियत की फैक्ट्री खुली और चाटुकारों ने आरती की थाली उठा ली
उत्तरप्रदेश।
कोडीन कफ सिरप कांड ने मानवता की लाश को बीच चौराहे पर रखकर पूरे सिस्टम से पूछा है कहाँ सोये थे तुम और किस कीमत पर?
नशे के कारोबार में लिप्त हैवानों ने ऐसी हैवानियत दिखाई कि समाज का चेहरा शर्म से ज़मीन में धँस गया। आश्चर्य तो यह है कि कांड की वीभत्सता देखकर भी कुछ “महान” नागरिक इन बाहुबलियों के चरणों में फूल-माला लेकर खड़े दिखाई देने लगे। जाहिर है जिसे शक्ति का नशा चढ़ जाए, उसे समाज का नशा-बर्बादी दिखाई कहाँ देता है।
इन समर्थकों की सोच देखकर लगता है जैसे इंसानियत मर चुकी है, और बचा है सिर्फ लाभ और डर का धंधा।
कांड घर में न हुआ, इसलिए दर्द भी नहीं हुआ।
कभी इनके घर लपटें पहुँचें, तब शायद इनको समझ आये कि अपनों को खोने का दुःख क्या होता है।
*लक्ज़री गाड़ियों का काफिला, मेहनत से कम, धंधों से ज़्यादा*
किसी की मेहनत की कमाई से इतनी लक्ज़री गाड़ियाँ नहीं आती।
लेकिन यहाँ तो काफिले ऐसे निकल रहे हैं जैसे ईमानदारी ने खुद resign देकर भगा दिया हो।
और जनता भी ताली बजाती है क्योंकि हम अभी भी “ये ठाकुर है”, “ये बाभन है”, “ये यादव है”, "ये मुस्लिम हैं" की चादर में लिपटे पड़े हैं, जबकि सच्चाई यह है कि
हैवानियत की कोई जाति नहीं होती। नशे के कारोबारियों की कोई बिरादरी नहीं होती। सब एक ही नाली के कीड़े होते हैं, बस फर्क इतना है कि किसी ने सोने की नाली बनवा ली है और किसी ने कच्ची।
*सरकार और सिस्टम चुप्पी की जिम्मेदारी कौन लेगा?*
यह कांड सिर्फ अपराधियों का नहीं, बल्कि उस सिस्टम का भी है जो
देखकर भी अनदेखा करता है, जानकर भी मौन रहता है और कार्रवाई के नाम पर सिर्फ सख्त बयान देकर पल्ला झाड़ लेता है।
सरकारें बदलती रहती हैं,
लेकिन अपराधियों को मिलने वाला संरक्षण कभी नहीं बदलता। अगर यही संरक्षण न मिलता तो
नशे की इतनी बड़ी फैक्ट्री कोई माँझी पुल के नीचे नहीं चला पाता।
आज का भारतीय समाज नशे के धंधे से उतना डरता नहीं, जितना बाहुबलियों की नाराज़गी से डरता है।
और सरकारें उतनी सक्रिय नहीं, जितना सोशल मीडिया पर एक्टिव होने का दिखावा करती हैं।
कोडीन कांड ने बता दिया
कीड़े सिर्फ नाली में नहीं होते, कुछ कुर्सियों और कुछ चौराहों पर भी पलते है। *नीरज तिवारी*