08/01/2026
घर के अंदर रसोई से अदरक और इलायची वाली चाय की खुशबू आ रही थी, पर रमेश शुक्ला के चेहरे पर वो गर्माहट नहीं उतर रही थी। वह बिस्तर से ठीक 6:10 पर उठ बैठे, जैसे अब भी उनकी ड्यूटी लगी हो। 35 साल रेलवे में हेड क्लर्क रहकर भी, रिटायरमेंट के छह महीने बाद भी, उनकी देह की घड़ी स्टेशन की सीटी पर चलती थी।
अलमारी का दरवाज़ा खुला। रमेश ने कमीज़ निकाली, पैंट निकाली, बेल्ट निकाली। फिर रुक गए। हाथ उसी तरह आगे बढ़ा जैसे किसी फाइल के कवर को टटोल रहा हो—पर फाइल तो थी ही नहीं। बस कुछ पुराने कागज़, एक डायरी, और नीचे वाली दराज़ में वह ब्राउन बैग, जो रिटायरमेंट के बाद “कभी” के लिए रख दिया गया था।
बगल के कमरे से सुमन की आवाज़ आई, “चाय रख दूँ?”
रमेश ने बिना मुड़े कहा, “हाँ… और टिफिन भी तैयार रखना। आज लेट हो रहा हूँ।”
सुमन के हाथ में कप काँप गया। वह पल भर को चुप रहीं, फिर बहुत संभली हुई आवाज़ में बोलीं, “किसके लिए टिफिन, जी?”
“अरे… स्टेशन के लिए। मीटिंग है।” रमेश ने बात ऐसे कही जैसे दुनिया की सबसे सामान्य बात हो।
सुमन धीरे-धीरे रसोई से बाहर आईं। आँखों के नीचे काले घेरे, माथे पर चिंता की स्थायी लकीर। “रमेश जी… आप रिटायर हो गए हैं। रोज़ यही बोलते हैं आप…।”
रमेश पलटे। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, चोट थी। “मुझे पागल समझ रखा है? मैं हेड क्लर्क रहा हूँ। मैं काम छोड़ दूँ? स्टेशन बिना मेरे कैसे चलेगा?”
“स्टेशन चल रहा है, जी।” सुमन की आवाज़ टूट गई। “आपके बिना भी।”
रमेश के चेहरे पर जैसे किसी ने थप्पड़ मार दिया हो। वह एक सेकंड को ऐसे देख रहे थे जैसे सुमन कोई और हों—पर अगले ही पल उनका चेहरा सख्त हो गया। “बहस मत करो। चाय दे दो। देर हो रही है।”
सुमन चुप हो गईं। घर में जब रमेश की आवाज़ सख्त होती थी, तो दीवारें भी चुप हो जाती थीं। वह चाय रखकर वापस मुड़ गईं, और अपनी पीठ छिपाते हुए आँसू पोंछने लगीं। क्योंकि रमेश शुक्ला को रोता देखना आसान नहीं था, और उससे भी कठिन था—रमेश शुक्ला के सामने खुद का रोना।
नाश्ते की प्लेट सामने थी। रमेश ने दो कौर लिए। फिर अचानक बोले, “मेरी घड़ी कहाँ है?”
“आपके हाथ में है।” सुमन ने धीरे से कहा।
रमेश ने अपनी कलाई देखी, जैसे पहली बार देख रहे हों। “अरे… हाँ।”
वह उठे, जूते पहनने लगे। जूते का फीता बांधते-बांधते हाथ काँप गए। रमेश ने उसे ठंड समझकर झटका दिया, पर सुमन जानती थीं—यह ठंड नहीं, यह वही डर था जो किसी आदमी के भीतर धीरे-धीरे फैलता है। वह डर, जिसे नाम देना भी डरावना लगता है।
दरवाज़ा खुला, रमेश बाहर निकलने लगे।
सुमन ने धीमे से कहा, “अकेले मत जाइए…”
रमेश ने कड़क स्वर में कहा, “मैं अकेला ही जाता आया हूँ। तुम बस घर संभालो।”
और वह चले गए।
सुमन वहीं खड़ी रहीं। एक तरफ रसोई में उबलता दूध था, दूसरी तरफ उनका दिल उबल रहा था। उन्होंने दूध बंद किया, और जैसे-तैसे खुद को संभाला। क्योंकि घर संभालना अब सिर्फ़ राशन और रसोई का काम नहीं था—घर संभालना अब रमेश को संभालना था।
घर के दूसरे कमरे में नितिन का फोन बजा। नितिन, रमेश का बेटा, गाज़ियाबाद की ही एक कंपनी में नौकरी करता था। उसकी पत्नी पूजा स्कूल में पढ़ाती थी। और आठवीं में पढ़ने वाली नंदिनी—उनकी पोती—घर की सबसे चुप लेकिन सबसे तेज़ समझ रखने वाली बच्ची थी।
नितिन ने फोन उठाया। “हाँ माँ?”
सुमन की आवाज़ में घबराहट थी। “तुम्हारे पापा फिर स्टेशन निकल गए।”
नितिन की साँस भारी हो गई। “माँ, आप चिंता मत करो। मैं… मैं देखता हूँ।”
“बेटा, आज सुबह उन्होंने टिफिन भी माँगा,” सुमन की आवाज़ काँप गई। “वो… वो भूल रहे हैं। सच में भूल रहे हैं।”
नितिन ने पल भर आंखें बंद कर लीं। उसे याद आया—पिछले हफ्ते पापा ने चाबी फ्रिज में रख दी थी। उससे पहले गैस जलती छोड़ दी थी। और उससे भी पहले—अपने ही घर के दरवाज़े पर बाहर से घंटी बजाई थी, जैसे यह उनका घर नहीं, कोई दफ्तर हो। तब सबने हँसकर टाल दिया था। “अरे, पापा अब फ्री हो गए हैं, दिमाग खाली है।” लेकिन अब… अब खालीपन भरा नहीं जा रहा था, खालीपन फैल रहा था।
पूजा ने नितिन का चेहरा देखा। “फिर?”
नितिन ने धीमे से कहा, “पापा स्टेशन चले गए। मैं अभी जाता हूँ।”
नंदिनी पास ही होमवर्क कर रही थी। उसने सिर उठाकर देखा। “दादू फिर…?”
पूजा ने उसकी पीठ थपथपाई। “तू पढ़ाई कर। हम आते हैं।”
लेकिन नंदिनी की आँखें डर से भर गईं। उसे समझ आने लगा था कि “भूल” कोई मज़ाक नहीं है। भूल के साथ घर की हवा बदल जाती है। भूल के साथ आवाज़ें बदल जाती हैं। भूल के साथ, सबसे मजबूत आदमी भी धीरे-धीरे बच्चे जैसा होने लगता है।
नितिन ने बाइक उठाई और स्टेशन की तरफ भागा। गाज़ियाबाद स्टेशन के बाहर पहुँचा तो वही रोज़ का शोर था—ऑटो, भीड़, चायवाले की पुकार, और प्लेटफॉर्म की तरफ दौड़ते लोग। लेकिन नितिन को उस शोर के बीच बस एक ही चेहरा ढूँढना था—अपने पापा का।
थोड़ी देर बाद रमेश दिख गए। वही ब्राउन बैग कंधे पर, चाल में वही पुरानी सख्ती, पर आँखों में एक बेचैन-सी खोज। वह टिकट खिड़की के सामने खड़े थे और किसी कर्मचारी पर बरस रहे थे।
“देखो भाई, ये सीनियर सिटीजन पास का फॉर्म ऐसे नहीं भरते! किसने ट्रेनिंग दी तुम्हें?”
कर्मचारी घबरा गया। “साहब, आप…?”
रमेश ने आँखें तरेरीं। “साहब क्या? मैं हेड क्लर्क हूँ यहाँ!”
नितिन तेजी से आगे बढ़ा। “पापा!”
रमेश पलटे। चेहरे पर राहत उभरी, जैसे किसी ने सही फाइल सही जगह रख दी हो। “अरे नितिन! तुम यहाँ? अच्छा हुआ आ गए। ये लोग काम ठीक नहीं कर रहे।”
नितिन ने कंधे पर हाथ रखा। “पापा, चलिए। घर चलते हैं। यहाँ सब ठीक है।”
रमेश झुंझलाए। “घर? अभी मीटिंग है।”
नितिन ने बहुत संभलकर कहा, “पापा, मीटिंग… कल कर लेंगे। आज थोड़ा आराम कर लेते हैं। चलिए ना।”
रमेश ने बैग कसकर पकड़ा। “मैं बेकार नहीं बैठ सकता, नितिन। नौकरी छोड़ दी तो आदमी… आदमी नहीं रहता।”
नितिन की आँखें नम हो गईं। पर उसने खुद को संभाला। “आप बेकार नहीं हैं, पापा। चलिए, आपके लिए एक ज़रूरी काम है।”
“क्या?”
नितिन ने झूठ में सच मिला दिया। “माँ ने कहा है—आज आपके हाथ की चाय पीनी है। आप ही बनाओगे।”
रमेश रुके। जैसे किसी ने उन्हें सम्मान दे दिया हो। “अच्छा? चलो।”
नितिन ने राहत की साँस ली। उसे पता था—पापा को “काम” चाहिए, वरना उनका दिमाग खुद को खा जाएगा। रिटायरमेंट ने उनके हाथ से पहचान छीन ली थी, और बीमारी उनके दिमाग से यादें छीन रही थी। दोहरी मार।
घर पहुँचे। सुमन ने दरवाज़ा खोला। रमेश अंदर आए तो वही पुराना घर—पर रमेश के चेहरे पर एक सेकंड की उलझन थी, जैसे वह घर को पहचान रहे हों पर नाम नहीं मिल रहा हो।
सुमन ने जल्दी से मुस्कान पहन ली। “आ गए, जी?”
रमेश ने चुपचाप जूते उतारे, फिर बोले, “हाँ… आया।”
सुमन ने नितिन को आँखों से धन्यवाद दिया। फिर रमेश की ओर देखकर बोलीं, “चाय बना देंगे?”
रमेश ने जैसे गर्व से कहा, “हाँ। मैं बनाऊँगा।”
रसोई में रमेश चाय बनाने लगे। दूध रखा, चायपत्ती डाली, अदरक कूटी। सुमन एकदम पास खड़ी रहीं, जैसे किसी नए ड्राइवर के साथ पहली बार सफर करने वाली पत्नी। डर यह नहीं था कि चाय खराब हो जाएगी; डर यह था कि गैस जलती रह जाएगी।
रमेश ने चाय बनाकर कप में डाली। फिर अचानक पूछा, “सुमन, चीनी कहाँ रखी है?”
सुमन ने धीरे से कहा, “आपके सामने वाली डिब्बी।”
रमेश ने देखा, हँसने की कोशिश की। “अरे हाँ… आँखों का नंबर बढ़ गया है।”
सुमन जानती थीं—यह आँखों का नंबर नहीं, यादों का नंबर है जो घट रहा है।
चाय पीते हुए पूजा ने धीरे से कहा, “पापा जी, आज स्कूल में ‘ग्रैंडपैरेंट्स डे’ का नोटिस आया है। अगले हफ्ते है।”
रमेश ने कप नीचे रखा। “ग्रैंड… क्या?”
नंदिनी ने झट से कहा, “दादू, दादी-दादू वाला दिन। सब बच्चे स्टेज पर बोलते हैं।”
रमेश के चेहरे पर चमक आई। “अच्छा! तो मैं भी जाऊँगा।”
पूजा ने खुशी से कहा, “हाँ, बिल्कुल। नंदिनी भी आप पर बोलना चाहती है।”
रमेश ने नंदिनी का सिर थपथपाया। “बोल देना… कि दादू ने रेलवे में… सब संभाला।”
नंदिनी ने धीरे से कहा, “दादू, मैं ये भी बोलूँगी कि आप मुझे सबसे प्यारी कहानियाँ सुनाते हो।”
रमेश मुस्कुराए। “हाँ। वो भी।”
सुमन ने उस मुस्कान को ऐसे देखा जैसे कोई डूबता आदमी एक पल को सतह पर सांस ले ले। उस पल उसे लगा—सब खत्म नहीं हुआ है।
लेकिन बीमारी धूप-छाँव जैसी थी। कभी उजाला, कभी अचानक अंधेरा।
उस रात सुमन ने अलमारी से रमेश का पुराना रेलवे पहचान-पत्र निकाला। बहुत समय से रख दिया था, पर आज वह उसे देखना चाहती थीं। शायद इसलिए कि उसे याद दिला सके—आप कौन हैं। पर जब उन्होंने उसे रमेश के सामने रखा, रमेश देर तक उसे देखते रहे। आँखें सिकुड़ीं। फिर उन्होंने पहचान-पत्र हाथ में लिया, फोटो पर उंगली फेरी, और अचानक उनकी आँखें भर आईं।
“ये… ये मैं?” रमेश की आवाज़ बहुत धीमी थी।
सुमन ने कहा, “हाँ जी। आप। हेड क्लर्क।”
रमेश ने गहरी साँस ली। “इतनी जल्दी… इतना सब… कैसे निकल गया, सुमन? कल तक मैं… मैं प्लेटफॉर्म पर खड़ा था।”
सुमन ने नरमी से कहा, “कल ही तो था, जी। बस… अब थोड़ा घर में हैं।”
रमेश ने पहचान-पत्र को छाती से लगा लिया। और पहली बार, उस मजबूत आदमी का गला काँप गया। “मुझे डर लगता है।”
“किस बात का?”
“कि मैं… मैं एक दिन इस फोटो को भी न पहचानूँ।” उनकी आँखों से आँसू निकल आए। “और अगर फोटो नहीं पहचानी… तो मैं खुद को कैसे पहचानूँगा?”
सुमन ने उनका हाथ पकड़ लिया। “आपको खुद को पहचानने की जरूरत नहीं, जी। हम पहचानेंगे। मैं पहचानूँगी। नितिन पहचानेंगे। नंदिनी पहचानेंगी।”
रमेश ने बच्चों की तरह पूछा, “सच?”
सुमन ने सिर हिलाया। “सच।”
रमेश देर तक रोते रहे। फिर एकदम धीमे से बोले, “सुमन… अगर मैं गुस्सा करूँ… तो बुरा मत मानना। मैं… मैं नहीं होता तब।”
सुमन की आँखें भीग गईं। “नहीं मानूँगी। बस आप मेरा हाथ मत छोड़ना।”
अगले दिन नितिन ने घर में एक बड़ा सा बोर्ड लगा दिया—“आज के काम।” जैसे स्टेशन पर ड्यूटी रोस्टर होता है, वैसे ही घर में “रमेश जी की ड्यूटी” लिख दी गई। सुबह पौधों को पानी। 10 बजे अखबार के हेडलाइन जोर से पढ़ना। शाम 5 बजे नंदिनी का होमवर्क देखना। रात 8 बजे दवा। और सबसे खास—हर दूसरे दिन “स्टेशन वॉक” नितिन के साथ।
रमेश ने बोर्ड देखा और चेहरे पर गर्व आ गया। “ठीक है। अब घर भी स्टेशन है।”
सुमन ने मन ही मन कहा—“बस… यही सोच उन्हें बचा ले।”
ग्रैंडपैरेंट्स डे आया। नंदिनी ने रमेश को खुद तैयार किया। उनका स्वेटर ठीक किया, बालों में कंघी की, और आईने में देखकर बोली, “दादू, आप एकदम स्मार्ट लग रहे हो।”
रमेश मुस्कुराए। “मैं तो हमेशा स्मार्ट था।”
नंदिनी हँसी। “हाँ, हेड क्लर्क साहब।”
स्कूल के हॉल में बच्चे, टीचर, माता-पिता—सब मौजूद। नंदिनी का नंबर आया। वह स्टेज पर गई और माइक पकड़ा। उसकी आवाज़ हल्की थी पर साफ।
“नमस्ते… मेरा नाम नंदिनी है। मेरे दादू का नाम रमेश शुक्ला है। वो गाज़ियाबाद रेलवे स्टेशन पर हेड क्लर्क थे।”
रमेश दर्शकों में बैठे थे। उनकी आँखों में चमक थी। जैसे कोई कर्मचारी अपनी तारीफ सुनकर सीना चौड़ा कर ले।
नंदिनी बोलती गई, “मेरे दादू बहुत सख्त थे, लेकिन दिल के बहुत अच्छे हैं। उन्होंने बहुत लोगों की मदद की है। और वो मुझे पहाड़े सुनाते हैं…”
वो पल भर रुकी, फिर बोली, “और जब वो भूल जाते हैं… तो मैं उन्हें याद दिलाती हूँ। क्योंकि दादू ने मुझे सिखाया—घर का कोई भी सदस्य कभी अकेला नहीं होता।”
हॉल में चुप्पी छा गई। कई माताओं की आँखें भर आईं।
नंदिनी ने स्टेज से नीचे देखकर दादू की तरफ हाथ हिलाया। “दादू!”
रमेश ने मुस्कुराकर हाथ उठाया… फिर अचानक उनकी आँखें खाली हो गईं। जैसे धुंध उनके भीतर भी आ गई हो। वह कुर्सी पर सीधे बैठे थे, पर चेहरे पर उलझन। वह नंदिनी की तरफ देख रहे थे, जैसे समझ नहीं पा रहे हों कि यह बच्ची उन्हें क्यों बुला रही है।
नंदिनी का दिल धक से रह गया। वह स्टेज से उतरकर सीधे रमेश के पास आई। सबके सामने, उसने अपना छोटा हाथ दादू के हाथ पर रख दिया और धीरे से बोली, “दादू… मैं नंदिनी। आपकी नंदिनी।”
रमेश ने उसकी आँखों में देखा। सेकंड भर को कुछ टूटा, फिर कुछ जुड़ा। वह धीरे से बोले, “हाँ… नंदिनी…” और फिर उनकी आवाज़ में राहत आ गई, “मेरी बच्ची।”
नंदिनी ने उसके गले लगकर कहा, “आप ठीक हो। चलिए, फोटो खिंचवाते हैं।”
हॉल तालियों से भर गया। लेकिन नितिन और सुमन जानते थे—ये तालियाँ खुशियों की नहीं, हिम्मत की थीं।
उस दिन के बाद रमेश कुछ दिनों तक ठीक रहे। फिर एक शाम वह घर के बाहर निकल गए। सुमन को लगा, वह बालकनी में होंगे। पर दरवाज़ा खुला मिला। नितिन को फोन गया। नितिन और पूजा दौड़े। नंदिनी ने दरवाज़े के पास खड़े होकर पूछा, “दादू चले गए?”
सुमन की आवाज़ काँप रही थी। “हाँ… बेटा।”
नितिन ने एक ही बात कही, “स्टेशन।”
वे स्टेशन पहुँचे। प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर रमेश वही बेंच पर बैठे थे। ब्राउन बैग गोद में। सामने आती-जाती ट्रेनें। लोग भाग रहे थे। और रमेश… जैसे समय के बीच में अटक गए थे।
नितिन धीरे से पास गया। “पापा…”
रमेश ने सिर उठाया। उनकी आँखों में डर था, पर साथ ही एक राहत भी—जैसे सही आदमी मिल गया हो।
“तुम… तुम आ गए?” रमेश की आवाज़ फिसल रही थी।
“हाँ पापा। चलिए घर चलते हैं।”
रमेश ने हाथ कसकर बैग पर रखा। “मैं घर… घर कहाँ है?”
नितिन की आँखें छलक पड़ीं, पर उसने खुद को संभाला। “पापा, घर वही है जहाँ माँ है। चलिए।”
रमेश ने धीरे से पूछा, “माँ… कौन?”
नितिन का दिल टूट गया। उसने धीरे से कहा, “सुमन। आपकी सुमन।”
रमेश ने दो बार पलक झपकाई। फिर अचानक जैसे उनके भीतर कुछ जागा। “सुमन…” और उनका चेहरा सिकुड़ गया। “मैं… मैं उसका नाम भूल रहा हूँ, बेटा।”
नितिन ने उनके हाथ पकड़ लिए। “आप नहीं भूल रहे, पापा। बस… दिमाग थक जाता है।”
रमेश की आवाज़ बहुत छोटी हो गई। “मैं हेड क्लर्क था। मैं… मैं पूरे स्टेशन का हिसाब रखता था। अब मैं… अपने घर का पता नहीं रख पा रहा।”
नितिन ने उन्हें गले लगा लिया। “पापा, आप हमारे हो। बस इतना काफी है।”
रमेश ने कांपते होंठों से पूछा, “मैं तुम्हारा पापा हूँ न?”
नितिन की आँखों से आँसू बह निकले। “हाँ पापा। आप मेरे पापा हैं। और रहेंगे।”
रमेश रो पड़े। प्लेटफॉर्म की सीटी बजी। अनाउंसमेंट हुआ। लोगों ने देखा, पर किसी ने कुछ नहीं कहा। क्योंकि कुछ दर्द सार्वजनिक होते हुए भी निजी होते हैं।
घर लौटे तो रमेश दरवाज़े पर रुक गए। उन्होंने घर को देखा, जैसे नई जगह हो। सुमन दरवाज़े पर ही खड़ी थीं, आँखें सूजी हुईं, पर चेहरे पर वही कोशिश की हुई मुस्कान।
रमेश ने धीमे से पूछा, “ये… ये घर… हमारा?”
सुमन ने सिर हिलाया। “हाँ जी। आपका।”
रमेश की आँखें सुमन के चेहरे पर ठहरीं। “और… तुम?”
सुमन के अंदर कुछ टूट गया, पर उन्होंने आवाज़ गिरने नहीं दी। “मैं सुमन। आपकी सुमन।”
रमेश ने जैसे शब्द पकड़कर दोहराया। “सुमन…”
फिर अचानक रसोई से नारियल और घी की खुशबू आई। सुमन ने बर्फी बनाई थी—वो बर्फी जो रमेश को हमेशा पसंद थी। खुशबू ने जैसे किसी गहरी फाइल का पन्ना खोल दिया। रमेश की आँखों में चमक आई। वह धीमे से बोले, “तू… नारियल की बर्फी बनाती है न?”
सुमन की हँसी और रोना एक साथ निकल पड़ा। “हाँ जी… बनाती हूँ।”
रमेश ने राहत की साँस ली। “तो… सब नहीं गया।”
उस रात नितिन ने एक नई चीज शुरू की। उसने एक मोटी कॉपी निकाली—कवर पर लिख दिया: “पापा की मेमोरी बुक।” पहले पन्ने पर रमेश की फोटो चिपकाई। नीचे लिखा: “रमेश शुक्ला—रेलवे हेड क्लर्क (रिटायर्ड)—गाज़ियाबाद।” फिर सुमन की फोटो, नितिन-पूजा की फोटो, नंदिनी की फोटो। हर फोटो के नीचे दो लाइनें—“ये कौन है, और पापा इसे क्यों प्यार करते हैं।”
नितिन ने पापा को कॉपी दिखाकर कहा, “पापा, ये आपकी नई फाइल है। सबसे जरूरी फाइल।”
रमेश ने कॉपी हाथ में ली। उंगलियाँ काँपीं, पर पकड़ मजबूत थी। “फाइल… ठीक है।”
नंदिनी पास आई। “दादू, इसमें मेरा भी नाम लिखो।”
पूजा ने हँसकर कहा, “लिखा है बेटा।”
रमेश ने बुक का पन्ना पलटा। पढ़ने लगे, धीरे-धीरे। और पहली बार, उनके चेहरे पर ऐसा सुकून आया जैसे उन्हें फिर से कोई “काम” मिल गया हो—काम अपने लोगों को याद रखने का।
अगले कुछ दिनों में एक छोटा-सा चमत्कार नहीं, एक छोटा-सा बदलाव हुआ—पर वही बदलाव घर को जिंदा रखने के लिए काफी था। रमेश अब घर में “ड्यूटी” मानकर रहते। सुबह उठकर बोर्ड देखते। पौधों को पानी देते। नंदिनी का होमवर्क पूछते। कभी-कभी भूल जाते—तो नंदिनी हँसकर कहती, “दादू, आपका दिमाग लोडिंग ले रहा है।” रमेश भी हँस देते, “तो तुम वाई-फाई हो।”
सुमन ने भी एक नियम बना लिया—रमेश से बहस नहीं। बहस उनकी यादों को नहीं लौटाती, बस उनकी बेइज्जती बढ़ाती है। अब अगर रमेश कहते “टिफिन,” तो सुमन कहतीं, “हाँ जी, बना देती हूँ।” फिर धीरे से जोड़ देतीं, “आज घर वाली ड्यूटी है, याद है?” और रमेश अक्सर मान जाते। कभी-कभी नहीं मानते, तो नितिन उन्हें स्टेशन वॉक पर ले जाता—बस बाहर की हवा, स्टेशन की सीटी, और वापस घर। यह एक समझौता था—रमेश के पुराने जीवन और नए जीवन के बीच।
एक रविवार की शाम, जब धुंध हल्की थी, रमेश बालकनी में बैठे थे। नितिन पास बैठा। सुमन चाय लेकर आईं। नंदिनी ड्राइंग बना रही थी। पूजा सबको देखकर मुस्कुरा रही थी।
रमेश ने अचानक कहा, “नितिन…”
“हाँ पापा?”
रमेश ने गहरी साँस ली। “मैं… कभी-कभी डर जाता हूँ। पर अब… इतना डर नहीं लगता।”
“क्यों?”
रमेश ने सुमन की तरफ देखा। उनके चेहरे पर वही पुरानी पत्नी वाली नरमी थी। फिर नंदिनी की तरफ देखा—उसकी आँखों में वही बच्ची वाली सच्चाई थी। रमेश बोले, “क्योंकि… तुम लोग… मुझे पकड़ लेते हो।”
सुमन ने धीरे से पूछा, “आपको याद है मैं कौन हूँ?”
रमेश ने बिना रुके कहा, “सुमन।”
सुमन की आँखें भर आईं। “और नितिन?”
रमेश ने नितिन की तरफ देखा, हल्का सा मुस्कुराए। “मेरा बेटा।”
नितिन का गला रुंध गया। “और नंदिनी?”
रमेश ने नंदिनी को बुलाया, “ए… इधर आ।” नंदिनी दौड़कर आई। रमेश ने उसके सिर पर हाथ रखा। “मेरी पोती। मेरी… मेरी चतुर बच्ची।”
नंदिनी ने फुसफुसाकर कहा, “दादू, आज आप नहीं भूले।”
रमेश ने धीमे से कहा, “आज… नहीं भूला।”
सुमन ने चाय का कप उनके हाथ में दिया। “तो आज खुश रहिए।”
रमेश ने कप उठाया और पहली बार बहुत सामान्य, बहुत घरेलू, बहुत आदमी वाली आवाज़ में कहा—“सुमन… कल भी अगर भूल जाऊँ… तो भी तुम लोग याद दिला देना। गुस्सा आ जाए तो… माफ कर देना। मैं कोशिश करूँगा।”
नितिन ने कहा, “आप कोशिश मत कीजिए, पापा। बस हमारे साथ रहिए।”
रमेश ने सिर हिलाया। “ठीक है। मैं साथ रहूँगा।”
और उसी पल, गाज़ियाबाद की हवा में दूर से ट्रेन की सीटी आई—लंबी, साफ, स्थिर। रमेश की आँखें उस आवाज़ पर टिक गईं। उन्होंने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “सीटी सही है… ट्रेन समय पर है।”
सुमन ने नितिन की ओर देखा, फिर पूजा की ओर। दोनों की आँखें भीगी थीं, पर चेहरे पर उम्मीद थी। क्योंकि उन्हें समझ आ गया था—बीमारी जीतने-हारने का खेल नहीं है। बीमारी के साथ जीना एक नया तरीका है। और इस घर ने वह तरीका सीख लिया था—प्यार से, धैर्य से, और रोज़ के छोटे-छोटे “काम” से।
उस शाम सुमन ने नारियल की बर्फी फिर बनाई। रमेश ने पहला टुकड़ा उठाया, नितिन को दिया। दूसरा पूजा को। तीसरा नंदिनी को। और चौथा खुद खाकर बोले, “ठीक है… आज ड्यूटी पूरी।”
नंदिनी ने हँसकर कहा, “दादू, कल फिर ड्यूटी।