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रिधिमा  की शादी उसी लड़के से कर दी जिसके साथ में तय की गई थी ।रिद्धिमा के पिता ने न जाने कैसे इंतजाम किया लेकिन उन्होंने...
08/01/2026

रिधिमा की शादी उसी लड़के से कर दी जिसके साथ में तय की गई थी ।

रिद्धिमा के पिता ने न जाने कैसे इंतजाम किया लेकिन उन्होंने लड़के वालों की सारी डिमांड पूरी कर दी।

रिधिमा शादी कर ससुराल तो आ गई थी लेकिन उसके मन में उथल पुथल मची हुई थी ।
बार-बार उसके मन में यही सवाल गूंज रहा था कि आखिर पापा ने इतने पैसों का इंतजाम कैसे किया और अगर उन्होंने सारे पैसे उसकी शादी पर खर्च कर दिए हैं तो वह उसकी बहन की शादी कैसे करेंगे ।

इन्हीं ख्यालों में खोई हुई रिधिमा अपने कमरे में सजी सुहाग की सेज पर बैठी हुई थी ।

तभी किसी ने दरवाजा खोला ,, यह रिधिमा की सासू मां कमला देवी थी ।

वह मुस्कुराते हुए कमरे के अंदर आई और बोली ,,, बहु चलो तुम्हें देखने मोहल्ले की कुछ औरतें आई है।

कमला देवी की बात सुन रिधिमा सोच में पड़ गई उसने घड़ी पर नजर डाली रात के 11:00 बज रहे थे ।
उसे समझ नहीं आया कि यह भला कौन सा वक्त है दुल्हन देखने का ।

उसने कमला देवी की तरफ देखा और बोली ,, मां जी रात के 11:00 बज गए हैं इस वक्त भला कौन दुल्हन देखने आता है।

अरे वह लोग दिन में नौकरी पर जाती है अभी रात को घर आती है तो इसी समय पर देखने आएंगे ना ।
सुबह 7:00 बजे उनको निकल जाना है उस टाइम तो भला हुआ कैसे तुमसे मिलने आ सकती हैं ।
चलो अभी टाइम बर्बाद मत करो जल्दी से आ जाओ।

रिधिमा ने गहरी सांस ली और बिस्तर से उतर कमला देवी के साथ कमरे से बाहर चली गई।

बाहर दो औरतें बैठी थी जिनकी उम्र लगभग कमला देवी के जितनी ही थी ।

रिद्धिमा के बाहर आते ही खड़े होकर उन्होंने रिद्धिमा का स्वागत किया और हाथ पकड़ अपने बगल में बैठा दिया।

रिधिमा ने घूंघट लिया हुआ था जिससे उसका चेहरा ढका था ।
बगल में बैठी औरत ने बड़े ही सलीके से घूंघट उठा कर उसके सर पर रखा और बोली ,, अरे वाह कमला ,, बहू तो बिल्कुल चांद का टुकड़ा लाई हो ।
सच कहती हूं छुपा कर रखना कहीं लोगों की नजर ना लग जाए।

दूसरी औरत ने भी रिधिमा को देखा और मुस्कुराते हुए बोली ,, हां भाभी सही कह रही हो ,, बिल्कुल हीरोइन जैसी दिखती है हमारी बहु तो ।

दोनों औरतों के मुंह से अपनी बहू की तारीफ सुन कमला देवी फूले नहीं समा रही थी ।
लेकिन फिर भी उन्होंने अपनी खुशी को दबाते हुए कहा क्या फायदा रूप का जरूरी तो गुण होते हैं ।

संस्कार अच्छे होने चाहिए घर संभालना आना चाहिए बाकी सुंदरता का हमें क्या ही करना है ।
हमें थोड़ी ना कोई बहू से मॉडलिंग करवानी है कि चांद का टुकड़ा होना जरूरी है।

तुम लोगों ने देखा है सावित्री की बहू को ,, दिखने में तो हीरोइन जैसी लगती है लेकिन मजाल है घर का एक भी काम करती हो ।
और संस्कार नाम की तो चीज ही नहीं सिखाई है मां बाप ने ।
कैसे चपड़ चपड़ करके लड़ती है अपने सास से ऐसी सुंदरता जाए मेरी जूती पे।

बहु भले ही रूपवती ना हो लेकिन संस्कारी और गुणवान होनी चाहिए।

सही कह रही हो भाभी रूप का क्या ही करना है गुण महत्व रखते हैं ।
अगर लड़की में संस्कार और सभ्यता ना हो तो सुंदरता किसी काम की नहीं होती।

पूरा दिन की रस्मों से थकी हुई रिधिमा आराम करना चाहती थी लेकिन कमला देवी ने उसे लाकर यहां बैठा दिया था ।
अंदर ही अंदर वह गुस्से से उबल रही थी लेकिन चाह कर भी कुछ बोल नहीं सकती थी।

आगे की कहानी अगले भाग में ,,,

भोजन को कभी भी बिना सम्मान के अनदेखा करके नहीं जाना चाहिए 🥺🙏🥰
08/01/2026

भोजन को कभी भी बिना सम्मान के अनदेखा करके नहीं जाना चाहिए 🥺🙏🥰

घर के अंदर रसोई से अदरक और इलायची वाली चाय की खुशबू आ रही थी, पर रमेश शुक्ला के चेहरे पर वो गर्माहट नहीं उतर रही थी। वह ...
08/01/2026

घर के अंदर रसोई से अदरक और इलायची वाली चाय की खुशबू आ रही थी, पर रमेश शुक्ला के चेहरे पर वो गर्माहट नहीं उतर रही थी। वह बिस्तर से ठीक 6:10 पर उठ बैठे, जैसे अब भी उनकी ड्यूटी लगी हो। 35 साल रेलवे में हेड क्लर्क रहकर भी, रिटायरमेंट के छह महीने बाद भी, उनकी देह की घड़ी स्टेशन की सीटी पर चलती थी।

अलमारी का दरवाज़ा खुला। रमेश ने कमीज़ निकाली, पैंट निकाली, बेल्ट निकाली। फिर रुक गए। हाथ उसी तरह आगे बढ़ा जैसे किसी फाइल के कवर को टटोल रहा हो—पर फाइल तो थी ही नहीं। बस कुछ पुराने कागज़, एक डायरी, और नीचे वाली दराज़ में वह ब्राउन बैग, जो रिटायरमेंट के बाद “कभी” के लिए रख दिया गया था।

बगल के कमरे से सुमन की आवाज़ आई, “चाय रख दूँ?”

रमेश ने बिना मुड़े कहा, “हाँ… और टिफिन भी तैयार रखना। आज लेट हो रहा हूँ।”

सुमन के हाथ में कप काँप गया। वह पल भर को चुप रहीं, फिर बहुत संभली हुई आवाज़ में बोलीं, “किसके लिए टिफिन, जी?”

“अरे… स्टेशन के लिए। मीटिंग है।” रमेश ने बात ऐसे कही जैसे दुनिया की सबसे सामान्य बात हो।

सुमन धीरे-धीरे रसोई से बाहर आईं। आँखों के नीचे काले घेरे, माथे पर चिंता की स्थायी लकीर। “रमेश जी… आप रिटायर हो गए हैं। रोज़ यही बोलते हैं आप…।”

रमेश पलटे। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, चोट थी। “मुझे पागल समझ रखा है? मैं हेड क्लर्क रहा हूँ। मैं काम छोड़ दूँ? स्टेशन बिना मेरे कैसे चलेगा?”

“स्टेशन चल रहा है, जी।” सुमन की आवाज़ टूट गई। “आपके बिना भी।”

रमेश के चेहरे पर जैसे किसी ने थप्पड़ मार दिया हो। वह एक सेकंड को ऐसे देख रहे थे जैसे सुमन कोई और हों—पर अगले ही पल उनका चेहरा सख्त हो गया। “बहस मत करो। चाय दे दो। देर हो रही है।”

सुमन चुप हो गईं। घर में जब रमेश की आवाज़ सख्त होती थी, तो दीवारें भी चुप हो जाती थीं। वह चाय रखकर वापस मुड़ गईं, और अपनी पीठ छिपाते हुए आँसू पोंछने लगीं। क्योंकि रमेश शुक्ला को रोता देखना आसान नहीं था, और उससे भी कठिन था—रमेश शुक्ला के सामने खुद का रोना।

नाश्ते की प्लेट सामने थी। रमेश ने दो कौर लिए। फिर अचानक बोले, “मेरी घड़ी कहाँ है?”

“आपके हाथ में है।” सुमन ने धीरे से कहा।

रमेश ने अपनी कलाई देखी, जैसे पहली बार देख रहे हों। “अरे… हाँ।”

वह उठे, जूते पहनने लगे। जूते का फीता बांधते-बांधते हाथ काँप गए। रमेश ने उसे ठंड समझकर झटका दिया, पर सुमन जानती थीं—यह ठंड नहीं, यह वही डर था जो किसी आदमी के भीतर धीरे-धीरे फैलता है। वह डर, जिसे नाम देना भी डरावना लगता है।

दरवाज़ा खुला, रमेश बाहर निकलने लगे।

सुमन ने धीमे से कहा, “अकेले मत जाइए…”

रमेश ने कड़क स्वर में कहा, “मैं अकेला ही जाता आया हूँ। तुम बस घर संभालो।”

और वह चले गए।

सुमन वहीं खड़ी रहीं। एक तरफ रसोई में उबलता दूध था, दूसरी तरफ उनका दिल उबल रहा था। उन्होंने दूध बंद किया, और जैसे-तैसे खुद को संभाला। क्योंकि घर संभालना अब सिर्फ़ राशन और रसोई का काम नहीं था—घर संभालना अब रमेश को संभालना था।

घर के दूसरे कमरे में नितिन का फोन बजा। नितिन, रमेश का बेटा, गाज़ियाबाद की ही एक कंपनी में नौकरी करता था। उसकी पत्नी पूजा स्कूल में पढ़ाती थी। और आठवीं में पढ़ने वाली नंदिनी—उनकी पोती—घर की सबसे चुप लेकिन सबसे तेज़ समझ रखने वाली बच्ची थी।

नितिन ने फोन उठाया। “हाँ माँ?”

सुमन की आवाज़ में घबराहट थी। “तुम्हारे पापा फिर स्टेशन निकल गए।”

नितिन की साँस भारी हो गई। “माँ, आप चिंता मत करो। मैं… मैं देखता हूँ।”

“बेटा, आज सुबह उन्होंने टिफिन भी माँगा,” सुमन की आवाज़ काँप गई। “वो… वो भूल रहे हैं। सच में भूल रहे हैं।”

नितिन ने पल भर आंखें बंद कर लीं। उसे याद आया—पिछले हफ्ते पापा ने चाबी फ्रिज में रख दी थी। उससे पहले गैस जलती छोड़ दी थी। और उससे भी पहले—अपने ही घर के दरवाज़े पर बाहर से घंटी बजाई थी, जैसे यह उनका घर नहीं, कोई दफ्तर हो। तब सबने हँसकर टाल दिया था। “अरे, पापा अब फ्री हो गए हैं, दिमाग खाली है।” लेकिन अब… अब खालीपन भरा नहीं जा रहा था, खालीपन फैल रहा था।

पूजा ने नितिन का चेहरा देखा। “फिर?”

नितिन ने धीमे से कहा, “पापा स्टेशन चले गए। मैं अभी जाता हूँ।”

नंदिनी पास ही होमवर्क कर रही थी। उसने सिर उठाकर देखा। “दादू फिर…?”

पूजा ने उसकी पीठ थपथपाई। “तू पढ़ाई कर। हम आते हैं।”

लेकिन नंदिनी की आँखें डर से भर गईं। उसे समझ आने लगा था कि “भूल” कोई मज़ाक नहीं है। भूल के साथ घर की हवा बदल जाती है। भूल के साथ आवाज़ें बदल जाती हैं। भूल के साथ, सबसे मजबूत आदमी भी धीरे-धीरे बच्चे जैसा होने लगता है।

नितिन ने बाइक उठाई और स्टेशन की तरफ भागा। गाज़ियाबाद स्टेशन के बाहर पहुँचा तो वही रोज़ का शोर था—ऑटो, भीड़, चायवाले की पुकार, और प्लेटफॉर्म की तरफ दौड़ते लोग। लेकिन नितिन को उस शोर के बीच बस एक ही चेहरा ढूँढना था—अपने पापा का।

थोड़ी देर बाद रमेश दिख गए। वही ब्राउन बैग कंधे पर, चाल में वही पुरानी सख्ती, पर आँखों में एक बेचैन-सी खोज। वह टिकट खिड़की के सामने खड़े थे और किसी कर्मचारी पर बरस रहे थे।

“देखो भाई, ये सीनियर सिटीजन पास का फॉर्म ऐसे नहीं भरते! किसने ट्रेनिंग दी तुम्हें?”

कर्मचारी घबरा गया। “साहब, आप…?”

रमेश ने आँखें तरेरीं। “साहब क्या? मैं हेड क्लर्क हूँ यहाँ!”

नितिन तेजी से आगे बढ़ा। “पापा!”

रमेश पलटे। चेहरे पर राहत उभरी, जैसे किसी ने सही फाइल सही जगह रख दी हो। “अरे नितिन! तुम यहाँ? अच्छा हुआ आ गए। ये लोग काम ठीक नहीं कर रहे।”

नितिन ने कंधे पर हाथ रखा। “पापा, चलिए। घर चलते हैं। यहाँ सब ठीक है।”

रमेश झुंझलाए। “घर? अभी मीटिंग है।”

नितिन ने बहुत संभलकर कहा, “पापा, मीटिंग… कल कर लेंगे। आज थोड़ा आराम कर लेते हैं। चलिए ना।”

रमेश ने बैग कसकर पकड़ा। “मैं बेकार नहीं बैठ सकता, नितिन। नौकरी छोड़ दी तो आदमी… आदमी नहीं रहता।”

नितिन की आँखें नम हो गईं। पर उसने खुद को संभाला। “आप बेकार नहीं हैं, पापा। चलिए, आपके लिए एक ज़रूरी काम है।”

“क्या?”

नितिन ने झूठ में सच मिला दिया। “माँ ने कहा है—आज आपके हाथ की चाय पीनी है। आप ही बनाओगे।”

रमेश रुके। जैसे किसी ने उन्हें सम्मान दे दिया हो। “अच्छा? चलो।”

नितिन ने राहत की साँस ली। उसे पता था—पापा को “काम” चाहिए, वरना उनका दिमाग खुद को खा जाएगा। रिटायरमेंट ने उनके हाथ से पहचान छीन ली थी, और बीमारी उनके दिमाग से यादें छीन रही थी। दोहरी मार।

घर पहुँचे। सुमन ने दरवाज़ा खोला। रमेश अंदर आए तो वही पुराना घर—पर रमेश के चेहरे पर एक सेकंड की उलझन थी, जैसे वह घर को पहचान रहे हों पर नाम नहीं मिल रहा हो।

सुमन ने जल्दी से मुस्कान पहन ली। “आ गए, जी?”

रमेश ने चुपचाप जूते उतारे, फिर बोले, “हाँ… आया।”

सुमन ने नितिन को आँखों से धन्यवाद दिया। फिर रमेश की ओर देखकर बोलीं, “चाय बना देंगे?”

रमेश ने जैसे गर्व से कहा, “हाँ। मैं बनाऊँगा।”

रसोई में रमेश चाय बनाने लगे। दूध रखा, चायपत्ती डाली, अदरक कूटी। सुमन एकदम पास खड़ी रहीं, जैसे किसी नए ड्राइवर के साथ पहली बार सफर करने वाली पत्नी। डर यह नहीं था कि चाय खराब हो जाएगी; डर यह था कि गैस जलती रह जाएगी।

रमेश ने चाय बनाकर कप में डाली। फिर अचानक पूछा, “सुमन, चीनी कहाँ रखी है?”

सुमन ने धीरे से कहा, “आपके सामने वाली डिब्बी।”

रमेश ने देखा, हँसने की कोशिश की। “अरे हाँ… आँखों का नंबर बढ़ गया है।”

सुमन जानती थीं—यह आँखों का नंबर नहीं, यादों का नंबर है जो घट रहा है।

चाय पीते हुए पूजा ने धीरे से कहा, “पापा जी, आज स्कूल में ‘ग्रैंडपैरेंट्स डे’ का नोटिस आया है। अगले हफ्ते है।”

रमेश ने कप नीचे रखा। “ग्रैंड… क्या?”

नंदिनी ने झट से कहा, “दादू, दादी-दादू वाला दिन। सब बच्चे स्टेज पर बोलते हैं।”

रमेश के चेहरे पर चमक आई। “अच्छा! तो मैं भी जाऊँगा।”

पूजा ने खुशी से कहा, “हाँ, बिल्कुल। नंदिनी भी आप पर बोलना चाहती है।”

रमेश ने नंदिनी का सिर थपथपाया। “बोल देना… कि दादू ने रेलवे में… सब संभाला।”

नंदिनी ने धीरे से कहा, “दादू, मैं ये भी बोलूँगी कि आप मुझे सबसे प्यारी कहानियाँ सुनाते हो।”

रमेश मुस्कुराए। “हाँ। वो भी।”

सुमन ने उस मुस्कान को ऐसे देखा जैसे कोई डूबता आदमी एक पल को सतह पर सांस ले ले। उस पल उसे लगा—सब खत्म नहीं हुआ है।

लेकिन बीमारी धूप-छाँव जैसी थी। कभी उजाला, कभी अचानक अंधेरा।

उस रात सुमन ने अलमारी से रमेश का पुराना रेलवे पहचान-पत्र निकाला। बहुत समय से रख दिया था, पर आज वह उसे देखना चाहती थीं। शायद इसलिए कि उसे याद दिला सके—आप कौन हैं। पर जब उन्होंने उसे रमेश के सामने रखा, रमेश देर तक उसे देखते रहे। आँखें सिकुड़ीं। फिर उन्होंने पहचान-पत्र हाथ में लिया, फोटो पर उंगली फेरी, और अचानक उनकी आँखें भर आईं।

“ये… ये मैं?” रमेश की आवाज़ बहुत धीमी थी।

सुमन ने कहा, “हाँ जी। आप। हेड क्लर्क।”

रमेश ने गहरी साँस ली। “इतनी जल्दी… इतना सब… कैसे निकल गया, सुमन? कल तक मैं… मैं प्लेटफॉर्म पर खड़ा था।”

सुमन ने नरमी से कहा, “कल ही तो था, जी। बस… अब थोड़ा घर में हैं।”

रमेश ने पहचान-पत्र को छाती से लगा लिया। और पहली बार, उस मजबूत आदमी का गला काँप गया। “मुझे डर लगता है।”

“किस बात का?”

“कि मैं… मैं एक दिन इस फोटो को भी न पहचानूँ।” उनकी आँखों से आँसू निकल आए। “और अगर फोटो नहीं पहचानी… तो मैं खुद को कैसे पहचानूँगा?”

सुमन ने उनका हाथ पकड़ लिया। “आपको खुद को पहचानने की जरूरत नहीं, जी। हम पहचानेंगे। मैं पहचानूँगी। नितिन पहचानेंगे। नंदिनी पहचानेंगी।”

रमेश ने बच्चों की तरह पूछा, “सच?”

सुमन ने सिर हिलाया। “सच।”

रमेश देर तक रोते रहे। फिर एकदम धीमे से बोले, “सुमन… अगर मैं गुस्सा करूँ… तो बुरा मत मानना। मैं… मैं नहीं होता तब।”

सुमन की आँखें भीग गईं। “नहीं मानूँगी। बस आप मेरा हाथ मत छोड़ना।”

अगले दिन नितिन ने घर में एक बड़ा सा बोर्ड लगा दिया—“आज के काम।” जैसे स्टेशन पर ड्यूटी रोस्टर होता है, वैसे ही घर में “रमेश जी की ड्यूटी” लिख दी गई। सुबह पौधों को पानी। 10 बजे अखबार के हेडलाइन जोर से पढ़ना। शाम 5 बजे नंदिनी का होमवर्क देखना। रात 8 बजे दवा। और सबसे खास—हर दूसरे दिन “स्टेशन वॉक” नितिन के साथ।

रमेश ने बोर्ड देखा और चेहरे पर गर्व आ गया। “ठीक है। अब घर भी स्टेशन है।”

सुमन ने मन ही मन कहा—“बस… यही सोच उन्हें बचा ले।”

ग्रैंडपैरेंट्स डे आया। नंदिनी ने रमेश को खुद तैयार किया। उनका स्वेटर ठीक किया, बालों में कंघी की, और आईने में देखकर बोली, “दादू, आप एकदम स्मार्ट लग रहे हो।”

रमेश मुस्कुराए। “मैं तो हमेशा स्मार्ट था।”

नंदिनी हँसी। “हाँ, हेड क्लर्क साहब।”

स्कूल के हॉल में बच्चे, टीचर, माता-पिता—सब मौजूद। नंदिनी का नंबर आया। वह स्टेज पर गई और माइक पकड़ा। उसकी आवाज़ हल्की थी पर साफ।

“नमस्ते… मेरा नाम नंदिनी है। मेरे दादू का नाम रमेश शुक्ला है। वो गाज़ियाबाद रेलवे स्टेशन पर हेड क्लर्क थे।”

रमेश दर्शकों में बैठे थे। उनकी आँखों में चमक थी। जैसे कोई कर्मचारी अपनी तारीफ सुनकर सीना चौड़ा कर ले।

नंदिनी बोलती गई, “मेरे दादू बहुत सख्त थे, लेकिन दिल के बहुत अच्छे हैं। उन्होंने बहुत लोगों की मदद की है। और वो मुझे पहाड़े सुनाते हैं…”

वो पल भर रुकी, फिर बोली, “और जब वो भूल जाते हैं… तो मैं उन्हें याद दिलाती हूँ। क्योंकि दादू ने मुझे सिखाया—घर का कोई भी सदस्य कभी अकेला नहीं होता।”

हॉल में चुप्पी छा गई। कई माताओं की आँखें भर आईं।

नंदिनी ने स्टेज से नीचे देखकर दादू की तरफ हाथ हिलाया। “दादू!”

रमेश ने मुस्कुराकर हाथ उठाया… फिर अचानक उनकी आँखें खाली हो गईं। जैसे धुंध उनके भीतर भी आ गई हो। वह कुर्सी पर सीधे बैठे थे, पर चेहरे पर उलझन। वह नंदिनी की तरफ देख रहे थे, जैसे समझ नहीं पा रहे हों कि यह बच्ची उन्हें क्यों बुला रही है।

नंदिनी का दिल धक से रह गया। वह स्टेज से उतरकर सीधे रमेश के पास आई। सबके सामने, उसने अपना छोटा हाथ दादू के हाथ पर रख दिया और धीरे से बोली, “दादू… मैं नंदिनी। आपकी नंदिनी।”

रमेश ने उसकी आँखों में देखा। सेकंड भर को कुछ टूटा, फिर कुछ जुड़ा। वह धीरे से बोले, “हाँ… नंदिनी…” और फिर उनकी आवाज़ में राहत आ गई, “मेरी बच्ची।”

नंदिनी ने उसके गले लगकर कहा, “आप ठीक हो। चलिए, फोटो खिंचवाते हैं।”

हॉल तालियों से भर गया। लेकिन नितिन और सुमन जानते थे—ये तालियाँ खुशियों की नहीं, हिम्मत की थीं।

उस दिन के बाद रमेश कुछ दिनों तक ठीक रहे। फिर एक शाम वह घर के बाहर निकल गए। सुमन को लगा, वह बालकनी में होंगे। पर दरवाज़ा खुला मिला। नितिन को फोन गया। नितिन और पूजा दौड़े। नंदिनी ने दरवाज़े के पास खड़े होकर पूछा, “दादू चले गए?”

सुमन की आवाज़ काँप रही थी। “हाँ… बेटा।”

नितिन ने एक ही बात कही, “स्टेशन।”

वे स्टेशन पहुँचे। प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर रमेश वही बेंच पर बैठे थे। ब्राउन बैग गोद में। सामने आती-जाती ट्रेनें। लोग भाग रहे थे। और रमेश… जैसे समय के बीच में अटक गए थे।

नितिन धीरे से पास गया। “पापा…”

रमेश ने सिर उठाया। उनकी आँखों में डर था, पर साथ ही एक राहत भी—जैसे सही आदमी मिल गया हो।

“तुम… तुम आ गए?” रमेश की आवाज़ फिसल रही थी।

“हाँ पापा। चलिए घर चलते हैं।”

रमेश ने हाथ कसकर बैग पर रखा। “मैं घर… घर कहाँ है?”

नितिन की आँखें छलक पड़ीं, पर उसने खुद को संभाला। “पापा, घर वही है जहाँ माँ है। चलिए।”

रमेश ने धीरे से पूछा, “माँ… कौन?”

नितिन का दिल टूट गया। उसने धीरे से कहा, “सुमन। आपकी सुमन।”

रमेश ने दो बार पलक झपकाई। फिर अचानक जैसे उनके भीतर कुछ जागा। “सुमन…” और उनका चेहरा सिकुड़ गया। “मैं… मैं उसका नाम भूल रहा हूँ, बेटा।”

नितिन ने उनके हाथ पकड़ लिए। “आप नहीं भूल रहे, पापा। बस… दिमाग थक जाता है।”

रमेश की आवाज़ बहुत छोटी हो गई। “मैं हेड क्लर्क था। मैं… मैं पूरे स्टेशन का हिसाब रखता था। अब मैं… अपने घर का पता नहीं रख पा रहा।”

नितिन ने उन्हें गले लगा लिया। “पापा, आप हमारे हो। बस इतना काफी है।”

रमेश ने कांपते होंठों से पूछा, “मैं तुम्हारा पापा हूँ न?”

नितिन की आँखों से आँसू बह निकले। “हाँ पापा। आप मेरे पापा हैं। और रहेंगे।”

रमेश रो पड़े। प्लेटफॉर्म की सीटी बजी। अनाउंसमेंट हुआ। लोगों ने देखा, पर किसी ने कुछ नहीं कहा। क्योंकि कुछ दर्द सार्वजनिक होते हुए भी निजी होते हैं।

घर लौटे तो रमेश दरवाज़े पर रुक गए। उन्होंने घर को देखा, जैसे नई जगह हो। सुमन दरवाज़े पर ही खड़ी थीं, आँखें सूजी हुईं, पर चेहरे पर वही कोशिश की हुई मुस्कान।

रमेश ने धीमे से पूछा, “ये… ये घर… हमारा?”

सुमन ने सिर हिलाया। “हाँ जी। आपका।”

रमेश की आँखें सुमन के चेहरे पर ठहरीं। “और… तुम?”

सुमन के अंदर कुछ टूट गया, पर उन्होंने आवाज़ गिरने नहीं दी। “मैं सुमन। आपकी सुमन।”

रमेश ने जैसे शब्द पकड़कर दोहराया। “सुमन…”

फिर अचानक रसोई से नारियल और घी की खुशबू आई। सुमन ने बर्फी बनाई थी—वो बर्फी जो रमेश को हमेशा पसंद थी। खुशबू ने जैसे किसी गहरी फाइल का पन्ना खोल दिया। रमेश की आँखों में चमक आई। वह धीमे से बोले, “तू… नारियल की बर्फी बनाती है न?”

सुमन की हँसी और रोना एक साथ निकल पड़ा। “हाँ जी… बनाती हूँ।”

रमेश ने राहत की साँस ली। “तो… सब नहीं गया।”

उस रात नितिन ने एक नई चीज शुरू की। उसने एक मोटी कॉपी निकाली—कवर पर लिख दिया: “पापा की मेमोरी बुक।” पहले पन्ने पर रमेश की फोटो चिपकाई। नीचे लिखा: “रमेश शुक्ला—रेलवे हेड क्लर्क (रिटायर्ड)—गाज़ियाबाद।” फिर सुमन की फोटो, नितिन-पूजा की फोटो, नंदिनी की फोटो। हर फोटो के नीचे दो लाइनें—“ये कौन है, और पापा इसे क्यों प्यार करते हैं।”

नितिन ने पापा को कॉपी दिखाकर कहा, “पापा, ये आपकी नई फाइल है। सबसे जरूरी फाइल।”

रमेश ने कॉपी हाथ में ली। उंगलियाँ काँपीं, पर पकड़ मजबूत थी। “फाइल… ठीक है।”

नंदिनी पास आई। “दादू, इसमें मेरा भी नाम लिखो।”

पूजा ने हँसकर कहा, “लिखा है बेटा।”

रमेश ने बुक का पन्ना पलटा। पढ़ने लगे, धीरे-धीरे। और पहली बार, उनके चेहरे पर ऐसा सुकून आया जैसे उन्हें फिर से कोई “काम” मिल गया हो—काम अपने लोगों को याद रखने का।

अगले कुछ दिनों में एक छोटा-सा चमत्कार नहीं, एक छोटा-सा बदलाव हुआ—पर वही बदलाव घर को जिंदा रखने के लिए काफी था। रमेश अब घर में “ड्यूटी” मानकर रहते। सुबह उठकर बोर्ड देखते। पौधों को पानी देते। नंदिनी का होमवर्क पूछते। कभी-कभी भूल जाते—तो नंदिनी हँसकर कहती, “दादू, आपका दिमाग लोडिंग ले रहा है।” रमेश भी हँस देते, “तो तुम वाई-फाई हो।”

सुमन ने भी एक नियम बना लिया—रमेश से बहस नहीं। बहस उनकी यादों को नहीं लौटाती, बस उनकी बेइज्जती बढ़ाती है। अब अगर रमेश कहते “टिफिन,” तो सुमन कहतीं, “हाँ जी, बना देती हूँ।” फिर धीरे से जोड़ देतीं, “आज घर वाली ड्यूटी है, याद है?” और रमेश अक्सर मान जाते। कभी-कभी नहीं मानते, तो नितिन उन्हें स्टेशन वॉक पर ले जाता—बस बाहर की हवा, स्टेशन की सीटी, और वापस घर। यह एक समझौता था—रमेश के पुराने जीवन और नए जीवन के बीच।

एक रविवार की शाम, जब धुंध हल्की थी, रमेश बालकनी में बैठे थे। नितिन पास बैठा। सुमन चाय लेकर आईं। नंदिनी ड्राइंग बना रही थी। पूजा सबको देखकर मुस्कुरा रही थी।

रमेश ने अचानक कहा, “नितिन…”

“हाँ पापा?”

रमेश ने गहरी साँस ली। “मैं… कभी-कभी डर जाता हूँ। पर अब… इतना डर नहीं लगता।”

“क्यों?”

रमेश ने सुमन की तरफ देखा। उनके चेहरे पर वही पुरानी पत्नी वाली नरमी थी। फिर नंदिनी की तरफ देखा—उसकी आँखों में वही बच्ची वाली सच्चाई थी। रमेश बोले, “क्योंकि… तुम लोग… मुझे पकड़ लेते हो।”

सुमन ने धीरे से पूछा, “आपको याद है मैं कौन हूँ?”

रमेश ने बिना रुके कहा, “सुमन।”

सुमन की आँखें भर आईं। “और नितिन?”

रमेश ने नितिन की तरफ देखा, हल्का सा मुस्कुराए। “मेरा बेटा।”

नितिन का गला रुंध गया। “और नंदिनी?”

रमेश ने नंदिनी को बुलाया, “ए… इधर आ।” नंदिनी दौड़कर आई। रमेश ने उसके सिर पर हाथ रखा। “मेरी पोती। मेरी… मेरी चतुर बच्ची।”

नंदिनी ने फुसफुसाकर कहा, “दादू, आज आप नहीं भूले।”

रमेश ने धीमे से कहा, “आज… नहीं भूला।”

सुमन ने चाय का कप उनके हाथ में दिया। “तो आज खुश रहिए।”

रमेश ने कप उठाया और पहली बार बहुत सामान्य, बहुत घरेलू, बहुत आदमी वाली आवाज़ में कहा—“सुमन… कल भी अगर भूल जाऊँ… तो भी तुम लोग याद दिला देना। गुस्सा आ जाए तो… माफ कर देना। मैं कोशिश करूँगा।”

नितिन ने कहा, “आप कोशिश मत कीजिए, पापा। बस हमारे साथ रहिए।”

रमेश ने सिर हिलाया। “ठीक है। मैं साथ रहूँगा।”

और उसी पल, गाज़ियाबाद की हवा में दूर से ट्रेन की सीटी आई—लंबी, साफ, स्थिर। रमेश की आँखें उस आवाज़ पर टिक गईं। उन्होंने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “सीटी सही है… ट्रेन समय पर है।”

सुमन ने नितिन की ओर देखा, फिर पूजा की ओर। दोनों की आँखें भीगी थीं, पर चेहरे पर उम्मीद थी। क्योंकि उन्हें समझ आ गया था—बीमारी जीतने-हारने का खेल नहीं है। बीमारी के साथ जीना एक नया तरीका है। और इस घर ने वह तरीका सीख लिया था—प्यार से, धैर्य से, और रोज़ के छोटे-छोटे “काम” से।

उस शाम सुमन ने नारियल की बर्फी फिर बनाई। रमेश ने पहला टुकड़ा उठाया, नितिन को दिया। दूसरा पूजा को। तीसरा नंदिनी को। और चौथा खुद खाकर बोले, “ठीक है… आज ड्यूटी पूरी।”

नंदिनी ने हँसकर कहा, “दादू, कल फिर ड्यूटी।

नानीजी बच्चों को डांट-डपटकर चुप करा देतीं. चिल्ल-पों सन्नाटे में बदल जाती. नानाजी हाथ-मुंह धोते, नानीजी तौलिया लेकर खड़ी ...
08/01/2026

नानीजी बच्चों को डांट-डपटकर चुप करा देतीं. चिल्ल-पों सन्नाटे में बदल जाती. नानाजी हाथ-मुंह धोते, नानीजी तौलिया लेकर खड़ी होतीं… नानाजी रसोई में घुसते, नानीजी झट से चूल्हे की लकड़ी आगे कर उसे और भड़का देतीं… नानाजी पीढ़े पर बैठते और नानीजी झट से थाली आगे लगा देतीं… नानाजी भोजन करना शुरू करते, तो नानीजी हाथ से पंखा करती रहतीं. दोनों के बीच एक सन्नाटा पसरा रहता. नानाजी के चप-चप खाने की आवाज़ और जबड़े की हिलती हड्डियां ही वातावरण में स्पंदन पैदा करती थीं. हमें नानीजी अपने आस-पास भी फटकने नहीं देती थीं.

बीच-बीच में नानीजी के ‘एक फुलका और ले लो… सब्ज़ी दूं… तरी तो लो…’ जैसे जुमलों के अलावा और कोई भी जुमला उस वातावरण की दहलीज़ लांघने के लिए निषिद्ध था. मैं यानी यामिनी उस समय औरत नहीं, बच्ची थी. न स्त्री, न पुुुरुष… सिर्फ़ बच्ची. इसलिए ये सब बातें वातावरण का हिस्सा लगती थीं. फिर नानाजी के सोने की तैयारी. तकिया, चादर, सब साफ़-सुथरे. कहीं कोई सिलवट नहीं. नानाजी अधलेटे से रेडियो सीलोन पर बीबीसी न्यूज़ सुनते और सुनते-सुनते निद्रा के आगोश में चले जाते. और नानीजी चौका-बर्तन समेटकर अगले दिन की तैयारी में कभी दही जमातीं, तो कभी छोले-राजमा भिगोती नज़र आतीं. हम बच्चे खुसर-फुसरकर अपनी कहानी पूरी करते, क्योंकि नानाजी सो जो गए होते.

फिर मम्मी का ज़माना देखा. पापा आते दफ़्तर से. मम्मी पानी का ग्लास लेकर हाज़िर होती. मम्मी-पापा काफ़ी देर तक बतियाते. पापा कुछ दफ़्तर की सुनाते, कुछ मम्मी मोहल्ले की सूचना देती, फिर पापा खड़े-खड़े हाथ-मुंह धोते. तौलिया वॉश बेसिन पर ही टंगा होता. मम्मी किचन में पापा के लिए चाय बनाती. हम मम्मी-पापा के दो बच्चे उनके इर्द-गिर्द घूमते तो कभी पापा को गलबहियां डालते, कभी उनके गीले, धुले चेहरे को छूते. मम्मी हमारी हरकतों पर हंसती. फिर हम सब डायनिंग टेबल पर बैठकर चाय-पकौड़े खाते. कभी हम दोनों बहन-भाई लड़ते. मम्मी-पापा की बातचीत में खलल होता. पापा थोड़ा ग़ुस्से से देखते. हम चुप हो जाते. उसके बाद मम्मी-पापा शाम को घूमने निकल जाते या किसी मित्र-परिचित के घर मिलने-जुलने. लौटकर मम्मी किचन में खाना तैयार करती और पापा हमें पढ़ाने बैठ जाते. हम सब मिलकर आपस में बातचीत करते हुए भोजन करते. मम्मी, पापा की थाली पर बराबर नज़र रखती और एक-एक फुलका देती जाती, साथ ही हम बच्चों को भी. रात को पापा सबका बिस्तर लगाते और हम सब सो जाते.
मैं तब भी औरत नहीं थी, बच्ची ही थी. मम्मी और नानीजी का समय एक ही था, पर जीवन का अंदाज़ कुछ अलग. धीरे-धीरे मैं युवती बनी. मम्मी को भी देखती रही. मजाल है कि मम्मी बिना पापा को पूछे दो रुपए भी ख़र्च कर ले या बाज़ार तो क्या पड़ोस में भी बिना पूछे चली जाए. मम्मी ने पढ़ाई की प्रबल इच्छा को न जाने कितने बरसों तक दबाए रखा, पापा की सहमति के इंतज़ार तक. पढ़ाई की, पर मज़ाल है कि पापा के कमरे की लाइट रात को जल जाए. बुनाई का शौक था, पर पापा के सामने एक फंदा भी बुनने की हिम्मत न जुटा सकी कभी. सब कुछ पापा की अनुपस्थिति में शाम पांच बजे तक ही होता. पापा के आने की आहट के साथ ही सब ताम-झाम सिमटने लगता.

हम बच्चे बड़े हुए तो मम्मी ने पापा से नौकरी की इच्छा जताई. कड़ा विरोध उभरा, तो दुबारा कह नहीं पाई पापा को. पर विरोध वक़्त के साथ सहमति में बदल गया. मम्मी ने प्राइवेट स्कूल में नौकरी कर ली. मम्मी थोड़ी आत्मविश्‍वासी बनी, पर घर की सार-संभाल में कभी कोई कमी नहीं आई. घर का कामकाज पहले जैसा ही रहा.

मैं बच्ची से युवती बनी. कुछ पंख उगते रहे. हर दिन पंखों में इज़ाफ़ा हुआ. समय सतत् चलता रहा. मेरे हाथ पीले करने की तैयारी हुई, तो मेरा बेबाक़ विरोध मम्मी-पापा के सामने था. पढ़ाई मेरी प्राथमिकता रहेगी. उसमें कोई खलल बर्दाश्त नहीं होगा. चाहे आप हों या मेरा नया घर- ससुराल. मम्मी-पापा का आश्‍वासन था, “ऐसा ही होगा तुम्हारा ससुराल, वहां तुम्हें पढ़ने से कोई नहीं रोकेगा.”
सचमुच राजकुमार आया था मेरे जीवन में. अब मैं पत्नी थी, गृहिणी थी. वो मेरा राजकुमार, ऑफिस से आता था. मैं पढ़ती रहती थी. उसे पानी देती. कभी उसकी मां पकड़ा देती. नई बहू थी, इसलिए मां किचन में हमारे लिए चाय बनातीं. हम दोनों पीते. मैं चहकती… बातें करती दिनभर की… सास-ससुर और हम सब मिलकर डायनिंग टेबल पर खाना खाते. सब अपनी सब्ज़ी ख़ुद ही लेते. रोटी, सलाद, दही सब अपने आप ही परोसते. आधुनिक बुफे सिस्टम जो था.. ससुरजी भी बतियाते. रात ढले मैं अपने राजकुमार के सिरहाने बैठकर पढ़ती. वो मेरे बालों से खेलता. कभी पेन पकड़े हाथों को छूता, तो कभी अपनी उंगलियों से मेरी आंखों की पलकों को गिराकर कहता, “सो जाओ अब. थक जाओगी, कल पेपर देने भी जाना है.”
फिर बच्चे हुए. पढ़ाई, नौकरी सब कुछ गृहस्थ जीवन जैसा बनता चला गया. मैं किचन में बर्तन साफ़ करती, वो शेल्फ पर लगा देता. मैं पलंग की चादरें बदलती, वो डस्टिंग करता. मैं बच्चों के नैपी बदलती, तो वो दूसरा नैपी मेरे सामने लिए खड़ा होता. मैं नाश्ते के लिए परांठे सेंकती, वो चाय बनाता. मैं रोटी बनाती, तो वो हम दोनों के लिए टिफिन पैक करता. फिर मुझे मोटरसाइकिल के पीछे बैठाकर ऑफिस तक छोड़ता.

मम्मी के घर जाना होता. मम्मी पूछती हमारा हालचाल. गाहे-बगाहे बातचीत में दिनचर्या झलक ही जाती. मां सुलग उठती. वो चाहे उनकी नारी सुलभ ईर्ष्या ही होती.
“अच्छे आदमी हैं आजकल के.”
“आजकल पति नहीं होते मम्मी, दोस्त होते हैं… दोस्त!” मैं गर्व से कह उठती. मैं मम्मी की पुरानी बातें टटोलती. एक सतही संबंध दिखाई देता मुझे. मम्मी से पूछती, “मम्मी, तुम्हारा दम नहीं घुटता? ऐसे ऊपरी रिश्ते निभाती हो, दिनभर तीमारदारी करती हो पति की और उनसे कोई अपेक्षा
नहीं रखती.”
मम्मी कहती, “पति तो पति होता है. कोई दोस्त-वोस्त नहीं. आजकल की लड़कियां तो दोस्त-दोस्त कहकर ख़्याल ही नहीं रखतीं.” मुझे तो वो कई बार कहतीं, “अच्छा पति है तेरा. तुझे रात को भी लाइट जलाकर पढ़ने देता है और बुनाई भी करने देता है. तेरे पापा तो, मजाल है कि जो रात को दूसरे कमरे से आती रोशनी की एक किरण भी बर्दाश्त कर लें.”
मैं गर्व से इतरा उठती, “तुम्हारा तो पति था, हमारा तो दोस्त है और दोस्ती में सब कुछ बर्दाश्त है.”
जीवन के कुछ और अनुभवों से गुज़रती हूं, तो पीछे मुड़कर नानीजी-नानाजी के संबंधों कोे याद करती हूं. स्त्री-पुरुष संबंधों की गहराई में जाती हूं, तो सोचती हूं कि वे कैसी औरतें होंगी, जो अपने पति के नीचे बिस्तर की तरह बिछ जाती होंगी. गोया एक वस्तु हों, जिसे पति के सामने प्रस्तुत करना ज़रूरी है. नहीं… नहीं… मैं ऐसा नहीं कर सकती. देह प्रस्तुत करने से पहले आत्मा का मिलन ज़रूरी है और आत्मा के मिलन से पहले दोस्ती का होना बेहद ज़रूरी है. भई, ये पुरानी औरतों में कहां?
मैंने नानीजी को नानाजी के कमरे में कभी सोते नहीं देखा. एक दिन मैं 40 वर्षीया औरत अपनी 85 साल की नानीजी से मज़ाक कर बैठी, “नानीजी, फिर बच्चे कैसे पैदा हुए?” नानीजी बोलीं, “आसमान से स्वाति नक्षत्र से बूंद गिरी थी, वो
ले ली.”
“वॉव! नानीजी आप भी बड़ी रोमांटिक हैं.” मैं हैरान थी नानीजी की कल्पना पर. मम्मी तो कई बार दर्द को सहेजते हुए कह चुकी है, “औरत-आदमी का संबंध तो स्वार्थ का होता है. तेरी नानीजी भी यही कहा करती थीं, पर मैं ऐसा नहीं समझती थी. आज तू पूछ रही है तो बता रही हूं कि औरत की तो देह भी अपनी नहीं होती. दिनभर पति लड़ता है और उसी पति के सामने रात को बिछना पड़ता है. छी:! कैसी ज़िंदगी थी औरत की उस समय!”
मैं मम्मी से कहती, “हम सुखी हैं कि हमारा पति दोस्त है… दोस्त!”

ज़िंदगी चल रही है. धीरे-धीरे सोशल दायरा बढ़ गया है. बच्चे बड़े हो गए हैं. नौकरी में पद कुछ ऊंचा हुआ है और कुछ साहित्य में उपलब्धियां बढ़ी हैं. समाज में कुछ नाम भी हुआ है. मैं ख़ुश हूं. दोस्त भी ख़ुश हुआ है, पर समाज को उसकी ख़ुशी बर्दाश्त नहीं हुई है. इतने बरसों तक की मेरी और उसकी दोस्ती में खलल डाला गया है. उसे पंचों ने बुलाया और समझाया, “तूने अपनी औरत को पढ़ाया-लिखाया, नौकरी पर भेजा, पर उसका उच्च पद ठीक नहीं. नौकरी तो पैसे के लिए होती है, पद के लिए नहीं. और फिर औरत का अख़बारों में छपना शोभा नहीं देता. साहित्य से तो घर बिगड़ता है. औरत का काम है- घर को देखना, बच्चों को संभालना… काहे दो-दो नौकरानियां रखे हो? जिसे ब्याह कर लाए हो, वो क्या करेगी? उसी से झाड़ू-पोंछा लगवाओ, बर्तन मंजवाओ, औरत का अफसर होना शोभा नहीं देता. अरे! आदमी तऱक़्क़ी करे, तो अच्छा लगता है.

तू बन अफसर, हमें कोई ग़म नहीं. औरत अफसरी के नाम पर ऑफिस से देरी से आए, ये क्या अच्छी बात है? अरे, आदमी घर आते हैं देरी से, ऑफिस से ना सही, किसी पान की दुकान से ही सही या चाय के स्टॉल से या यार-दोस्त के नुक्कड़ से ही सही. औरत को तो बांधकर रख…”
और भी न जाने ऐसे कितने जुमले हैं, जो समाज ने चीख-चिल्लाकर कहे हैं मेरे ख़िलाफ़. आख़िर पति मर्द ही है ना, सो भड़क गया है. सीख ले ली है उनकी. मेरी दोस्ती को समाज की इस आग ने धुएं की तरह उड़ा दिया है और मैं गर्म पड़ी हुई राख को देख रही हूं.
मम्मी से कहां छुप सकता था ये सब. मम्मी कहती है, “मैं न कहती थी कि पति-पत्नी में कोई दोस्ती नहीं होती. पति को पति ही समझना चाहिए. थाली परोसो, बिस्तर बिछाओ और ख़ुद बिछ जाओ बिस्तर की तरह. बड़ी बनती फिरती थी अपने पति की दोस्त.” मम्मी की झिड़कियां अब सटीक लगती हैं.

एक दिन तो मम्मी चिल्लाकर बोली, “उतार फेंक अब अपनी दोस्ती के तमगे. बन जा औरत केवल औरत.” आंसुओं की नदी के बीच सब कुछ बहा दिया है- दोस्ती, प्यार, इज़्ज़त व समाज, अब केवल बचा है सूखा रास्ता. बंजर एकदम बंजर.

अब मेरा दोस्त मर चुका है. अब मेरा पति आता है ऑफिस से. पानी देती हूं. रोटी बनाती हूं. परोस देती हूं एक सन्नाटे के बीच. बैठ जाती हूं उसके पास. पूछ लेती हूं, “और लोगे… तरी लो…” नानीजी के ज़माने की तरह, पर हाथ से पंखा नहीं कर पाती, वो बीज नहीं हैं अभी मुझमें. पति इस स्थिति को नकारता नहीं है. पूछता भी नहीं है कि तुमने खाया? सिर पर कपड़ा क्यों बांधा है? तबियत ठीक नहीं है क्या? इसका कयास मैं यही लगाती हूं कि वो दोस्ती वाला ज़माना नकली था. असली मर्द तो औरत से यही चाहता है. थाली परोसो, बिस्तर बिछाओ और ख़ुद बिछ जाओ. इससे ऊपर वो औरत को उठते देखना नहीं चाहता. औरत की उपलब्धियां उसे शूल की तरह चुभती प्रतीत होती हैं. मैं देखती हूं उसमें मौलिक पुरुष उग आया

भगवान ना करे तब आपकी भाभी आपके साथ ऐसा व्यवहार करें, जैसा आप मेरे साथ कर रही हो"मोहिनी रोते हुए अपनी भाभी ममता से बोली।ल...
08/01/2026

भगवान ना
करे तब आपकी भाभी आपके साथ ऐसा व्यवहार करें, जैसा आप मेरे साथ कर रही हो"
मोहिनी रोते हुए अपनी भाभी ममता से बोली।
लेकिन ममता तो आज पूरे दंभ के साथ बोल रही थी। उसे कोई लेना देना नहीं था कि उसके कारण किसी की आंखों
में आंसू आ रहे हैं या किसी का दिल जोर जोर से रो रहा है। और सुने भी क्यों? ननद ने कौन सा उसके साथ कभी अच्छा किया था। बड़ी बेशर्मी के साथ उसने मोहिनी को जवाब दिया,
" मेरी किस्मत तुम्हारे जैसी नहीं है। जब तक मम्मी जी पापा जी थे हमने रिश्ता निभा दिया। यही तक बहुत है अब ज्यादा हमारे सिर पर चढ़कर तांडव करने की जरूरत नहीं है। अब जब माता-पिता ही नहीं रहे तो अपनी जिम्मेदारी खुद उठाओ। कम से कम इतनी अकल तो तुम में ही होनी चाहिए। आखिर कब तक हम तुम्हारी जिम्मेदारी निभाते रहेंगे"
" सही कहा भाभी। इतनी अकल तो मुझ में ही होनी चाहिए थी। पर पता नहीं क्यों भाई के लिए बेशर्म बनकर यहां रह रही हूं। भूल गई थी कि भाई तो तुम्हारा ही पति है। अब वह तुम्हारी सुनेगा। मुझसे उससे क्या लेना देना"
कहकर मोहिनी ने अपने आंसू पोंछे और चुपचाप अपना सामान लेने अपने कमरे में चली गई। सामान पैक करते हुए आंखों से निरंतर आंसू बहे जा रहे थे। रह रहकर पति
नमन का चेहरा आंखों के सामने घूम रहा था। नमन के घर में उसकी इज्जत तो थी उसने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार ली। दूसरों के कहने पर अपना घर तोड़ लिया।
और बात कुछ भी नहीं थी। सिर्फ एक सोने के गहनों के पीछे इतना बड़ा तमाशा कर दिया कि बीच में रिश्तेदारों को ही
बचाव करना पड़ गया। लेकिन उसके बाद ताव ही ताव में हमेशा हमेशा के लिए मायके आ गई। माता-पिता ने भी अपने
घर में उसे जगह दे दी। पर माता-पिता के बाद ये जगह रह जाएगी। ये उम्मीद बिल्कुल नहीं थी।
मोहिनी की शादी चार साल पहले ही नमन के साथ हुई थी। नमन के परिवार की आर्थिक स्थिति मोहिनी के परिवार की
आर्थिक स्थिति से कम ही थी। पर क्योंकि नमन की सरकारी नौकरी थी। वो एक पटवारी था, इसीलिए मोहिनी के माता-पिता ने उसकी शादी नमन से कर दी।
यह सोचकर कि अभी स्थिति कमतर है। लेकिन आने वाले वक्त में नमन अच्छा खासा कर ही लेगा। आखिर इसमें ऊपर का पैसा बहुत है।
पर पति नमन बहुत ही ईमानदार व्यक्ति थे। उसके परिवार में उसके माता-पिता और एक छोटी बहन थी। नमन के पिता एक परचूनी की दुकान चलाते थे। बहन नेहा अभी कॉलेज में पढ़ रही थी। और मां एक कुशल गृहणी थी। सब के सब जितना था, उसी में संतुष्ट थे।
हालांकि मोहिनी का अपने ससुराल में मन नहीं लगता था। उसे हर चीज में कमी ही कमी नजर आती थी। कई बार तो वो इस बारे में अपने पापा से शिकायत भी कर चुकी थी,
" आपने जानबूझकर मुझे ऐसे घर में पटक दिया। क्या मैं कभी इतनी कमियों में रही हूं"
लेकिन हर बार पापा उसे यही समझाते,
" नमन अभी कमजोर है। हमने तो सोचा था कि पटवारी है तो आने वाले वक्त में अच्छा खासा कर लेगा। लेकिन तेरा पति तो ईमानदार निकला। क्या करें? थोड़ा उसको समझा कि ईमानदारी छोड़कर ऊपर के पैसे भी ले लिया करें "
उसके बाद मोहिनी नमन से कहती तो नमन साफ इनकार कर देता।
" मोहिनी मैं कम में भी खुश हूं। क्योंकि मैं अपनी ईमानदारी के साथ रहता हूं। मुझे अपनी ईमानदारी से बहुत प्यार है"
" पर तुम्हारी ईमानदारी से मेरे शौक तो पूरे नहीं होते हैं ना। कब तक अपनी इच्छाओं को मारती रहूं। कभी अपनी पत्नी
के बारे में भी सोचा है। मेरी सारी सहेलियां हमेशा गहनों से लदी रहती है। किटी पार्टी करती है, घूमने फिरने जाती है। और यहां मुझे देखो। मेरे पास तो कमी के अलावा कुछ नहीं है"
मोहिनी भी शिकायत करते हुए बोलती।
लेकिन शादी के कुछ दिनों बाद मोहिनी के किसी रिश्तेदार को नमन से कुछ काम निकलवाना था। पर नमन ईमानदार
था इसलिए उसने साफ इनकार कर दिया। तो उस रिश्तेदार ने इसके लिए मोहिनी और उसके माता-पिता से मदद मांगी।
माता-पिता ने तो ज्यादा कुछ नहीं कहा। लेकिन उस रिश्तेदार ने मोहिनी को एक सोने का हार सेट दिखाते हुए लालच दिया कि अगर वो उसका काम करवा देगी तो वो उसे ये सोने का हार सेट गिफ्ट कर देगा।
उस हार को देखकर मोहिनी को लालच आ गया। उसने इस बारे में नमन से बात की तो नमन ने साफ इनकार कर दिया।
इस बात पर मोहिनी उससे लड़ पड़ी,
" मुझे नहीं पता। या तो आप मेरे उस रिश्तेदार का काम पूरा कर दो और बदले में तोहफे के तौर पर वो सोने का हार ले
लो। नहीं तो कहीं से भी मुझे हार लाकर दो। कब तक में यूं ही कोरी कोरी घूमती रहूंगी "
"आखिर तुम्हारे पास क्या कमी है। है तो सही इतने गहने। उन्हें पहन लो"
" वो गहने तो मेरे माता-पिता ने दिलवाए है। ससुराल वालों की इतनी भी औकात नहीं है कि कम से कम बहू को अपनी तरफ से कोई ढंग के गहने तो ला दे। क्या करूं तुम्हारी ईमानदारी का मैं। जिंदगी बर्बाद कर दी मेरी तो"
" मोहिनी बेवजह बात को बढ़ाओ मत। मैं तुम्हारे लिए अपनी ईमानदारी नहीं छोड़ सकता"
" तो ठीक है ना। फिर मुझे छोड़ दो। जा रही हूं मैं अपने मायके। जिस दिन अपना फैसला बदल लो उस दिन लेने आ जाना"
मोहिनी अपना सामान पैक कर मायके चली गई।
मोहिनी के माता-पिता ने भी उसी का साथ दिया। लेकिन उम्मीद के विपरीत नमन उसे लेने ही नहीं गया। आखिर अपनी जिद में मोहिनी दोबारा ससुराल ही नहीं गई। बल्कि उसने तो नमन और अपने ससुराल वालों को डराने के लिए तलाक के पेपर भेज दिए।
लेकिन वो उस समय शाॅक रह गई जब नमन ने भी उन तलाक के पेपर पर साइन करके भेज दिया। आखिर रिश्तेदारों के बीच बचाव करने से सहमति से तलाक भी हो गया। तब से वो अपने मायके ही रह रही थी।

यहीं पर उसने एक स्कूल जॉइन कर लिया। लेकिन माता-पिता के राज में जिंदगी ऐशो आराम से कट रही थी। भाभी पर हुक्म चलाना, मन किया तो काम करना नहीं तो भाभी तो थी ही सही। मां के साथ बैठकर भाभी के कामों में मीन मेख निकालना उसका प्रिया काम था। भाभी के साथ कभी बनाई ही नहीं तो भाभी भला क्यों साथ देगी।

अभी तीन महीने पहले माता-पिता की कार एक्सीडेंट में आकस्मिक मृत्यु हो गई। माता-पिता के जाने का दुख तो था ही, पर फिर भी ये दंभ था कि भाई भाभी अभी भी उसके सामने झुकेंगे। इसलिए अभी भी उन्हें अपने हिसाब से चलाने की कोशिश कर रही थी।
लेकिन उस समय वो हैरान रह गई, जब उसे पता चला कि भाई ने धोखे से मकान भी अपने नाम कर लिया है। और अब भाभी उसे अपना बंदोबस्त कही ओर करने के लिए कह रही थी। आखिर भाभी ने इतना सहा था तो अब अपना रोद्र रूप दिखा रही थी।
खैर अपना सामान पैक कर वो बाहर आई तो भाई सोफे पर ही बैठा हुआ था।
मोहिनी ने उसकी तरफ देखकर कहा,
" भाई ये तूने अच्छा नहीं किया। अपनी ही बहन के साथ बेईमानी कर दी "
" दीदी तो इसमें गलत क्या है। आखिर ईमानदार लोग तुम्हें पसंद कहां है"
आखिर भाई का जवाब सुनकर वो ज्यादा कुछ कह नहीं पाई। हालांकि उसने बाद में कोर्ट में मकान में हिस्से के लिए अपील जरूर की। और कोर्ट में अभी भी केस पेंडिंग चल रहा है।
फिलहाल तो मोहिनी गर्ल्स हॉस्टल में रहकर अपना गुजारा कर रही है। उसने नमन से मिलने की कोशिश भी की थी। लेकिन वहां जाकर पता चला कि नमन का दूसरा विवाह हो चुका है और एक बेटी भी है। वो अपनी दूसरी शादी से बहुत खुश है ये देखकर वो आगे कुछ कह नहीं पा

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