23/12/2025
जनरल कोच की भीड़भाड़ में सफर करना शारीरिक रूप से तो थका देने वाला होता ही है, लेकिन आज जो मैंने देखा वह मानसिक रूप से भी परेशान करने वाला था। यह इंसानी फितरत का एक कड़वा सच था।
मैंने देखा कि एक लड़की ने बैठे हुए लोगों के एक समूह से खड़े होने के लिए बस थोड़ी सी जगह मांगी, लेकिन उन्होंने उसे बुरी तरह मना कर दिया और उससे झगड़ा करने लगे। मगर कुछ ही स्टेशनों के बाद, जब एक दूसरी महिला चढ़ी जो उन्हीं के 'समूह' या पहचान की लग रही थी, तो उसी बैठे हुए समूह ने तुरंत बिना किसी हिचकिचाहट के उसके लिए जगह बना दी।
यह भेदभाव और दोहरा रवैया (hypocrisy) साफ दिखाई दे रहा था। और सबसे ज्यादा गुस्सा तब आया जब वे लोग बाद में ऐसे अनजान और मासूम बन रहे थे जैसे उन्होंने पहले वाली लड़की के साथ कुछ गलत किया ही नहीं।
इस घटना ने आज मुझे दो बड़ी बातें सिखाईं:
* असली इंसानियत चुनिंदा नहीं होती: 'अपने' जैसे दिखने वाले या अपने 'समुदाय/ग्रुप' के लोगों की मदद करना बहुत आसान है। लेकिन आपके चरित्र की असली परीक्षा तब होती है जब आप किसी ऐसे अनजान व्यक्ति के प्रति भी वही शिष्टाचार दिखाएं जो आपकी तरह ही परेशान है। मदद और सहानुभूति (Empathy) किसी शर्त पर नहीं होनी चाहिए।
* अपनी शांति बनाए रखें (Protect your peace): कभी-कभी आप सार्वजनिक जगहों पर ऐसी नाइंसाफी देखते हैं जिससे खून खौल उठता है। लेकिन ऐसी खचाखच भरी और तनावपूर्ण स्थिति में दखल देने या उलझने से लोगों की मानसिकता नहीं बदली जा सकती। कभी-कभी सबसे अच्छा यही है कि आप बस देखें, शांत रहें, और यह सबक लें कि आपको भविष्य में खुद किसी के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना है।
आइए भेद-भाव छोड़कर पहले सामने वाले में 'इंसान' को देखें। आखिर हम सब अपनी-अपनी मंजिल पर पहुँचने के लिए ही संघर्ष कर रहे हैं।