17/12/2025
अजय गोदारा अरजनसर
पढ़ाई का सपना लेकर रूस गए थे।
28 नवंबर 2024 को
स्टडी वीज़ा,के तहत
बेहतर भविष्य की उम्मीदें और घर वालों की दुआएँ उनके साथ थीं।
लेकिन परिस्थितियाँ इतनी विकृत हो गईं कि एक छात्र को बिना इच्छा, बिना प्रशिक्षण
युद्ध जैसे हालात में धकेल दिया गया।
और अंततः एक ऐसे संघर्ष में उसकी जान चली गई,
जिससे उसका कोई लेना-देना ही नहीं था।
अजय अकेले नहीं था उसके साथ भारत के काफी युवा थे लेकिन
उन्होंने सितंबर 2025 में वीडियो के ज़रिये गुहार लगाई थी कि रूस में
20–25 भारतीय नागरिक फँसे हुए हैं।
कुछ युवा युद्ध के दौरान शहीद हो चुके थे
वह संदेश सिर्फ़ अपील नहीं था,
वह आने वाले खतरे की आख़िरी चेतावनी थी। अजय ने अपने परिवार जनों को कहा भी था कि आपसे कुछ होता है तो करिए नहीं तो मेरा यही आखरी संदेश होगा
दुर्भाग्य यह रहा कि उस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया गया।
और परिवारजनों ने मंत्रियों के आगे चक्कर काटे लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई
आज अजय का शव शाम 4 बजे अरजनसर पहुंचा जिसमें रूस का राष्ट्रीय ध्वज व वर्दी थी
लेकिन यही दृश्य एक सवाल को और गहरा कर देता है—
जब एक मृत शरीर को लाया जा सकता है,
तो एक ज़िंदा इंसान को समय रहते क्यों नहीं बचाया जा सका?
यह बात किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति पर आरोप नहीं है।
यह सवाल उस व्यवस्था से है
जिसमें आम नागरिक की ज़िंदगी अक्सर फ़ाइलों के नीचे दब जाती है।
अजय के परिवार के लिए यह केवल एक मृत्यु नहीं,
बल्कि बेटे के सपनों का अंत है अजय इकलौता बेटा था एक ऐसा नुकसान, जिसे कोई मुआवज़ा पूरा नहीं कर सकता।
आज केवल श्रद्धांजलि काफी नहीं है।
ज़रूरत है जवाबदेही की,
संवेदनशीलता की
और ऐसी त्वरित प्रणाली की
जो संकट में फँसे हर नागरिक तक समय पर पहुँचे।
अजय गोदारा को नमन।
आपकी कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं,
बल्कि पूरे सिस्टम की खामियों को उजागर करती है।
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