Chandrakanta bhutia

Chandrakanta bhutia ଗୋପପୁରିଆ ଗୋପାଳ ରାଜା 👑 TALCHER

13/08/2023

#पहला_हवाई_जहाज..... भारतीय वैज्ञानिक शिवकर बापूजी तलपदे ने बनाया था 🚩🚩

जब 20 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में अमेरिका वासी राइट बंधुओं ने पहले ग्लाइडर के प्रयोग किये और हवा से भारी 12 हार्स पावर की मोटर वाला पहला स्वतः अग्रगामी वायुयान ''राइट फ्लायर -1' बनाया जिसे 17 दिसम्बर 1903 को ओरविले राइट ने उसमें बैठकर उड़ाकर दिखाया।

वायुयान का इतिहास बताने वाले विज्ञान के आधुनिक ग्रंथों में राइट बंधुओं की इस उपलब्धि की चर्चा तो खूब जोर-शोर से की जाती है, पर भारत के उस 'वैज्ञानिक' की कोई चर्चा नहीं की जाती जिसने राइट बंधुओं के 'राइट फ्लायर ' से आठ साल पहले सन् 1895 में विमान बनाया, विशाल जन समूह की उपस्थिति में मुम्बई के चौपाटी समुद्र तट पर 17 मिनट तक उसे उड़ाया और उसे 1500 फुट तक की ऊँचाई पर ले गया।

जिस भारतीय वैज्ञानिक ने यह करामात की उनका नाम था “शिवकर बापूजी तलपदे” वे मराठी व्यक्ति थे ।

मुम्बई के चीरा बाजार इलाके में एक सामान्य परिवार में जन्में श्री तलपदे संस्कृत के विद्वान थे और कला की प्रसिद्ध संस्था
‘जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स, मुम्बई' में चित्रकला के शिक्षक
थे।

तलपदे जी 1885 में मुम्बई में स्थापित 'शामरावं कृष्ण
आणि मंडली' नामक संस्था के सक्रिय सदस्य थे जो स्वामी
दयानंद सरस्वती (1824-1883) के विचारों से प्रभावित
लोगों ने स्वामी जी के ग्रंथों का मराठी में अनुवाद करने के
लिए बनायी थी ।

स्वामी दयानंद सरस्वती (1824-1883) ने अपने ग्रंथ ऋग्वेदादिवभाष्य भूमिक (1877) में अन्य विषयों के साथ विमान बनाने से संबंधित कतिपय वेदमंत्रों की व्याख्या की ।

उनके ग्रंथ से प्रेरणा पाकर आपकी विमान शास्त्र में रूचि पैदा
हो गयी और हमारे देश में विमान शास्त्र के जो सबसे बड़े वैज्ञानिक माने जाते हैं वो 'महर्षि भारद्वाज' ।

महर्षि भारद्वाज ने विमान शास्त्र की सबसे पहली पुस्तक लिखी, उस पुस्तक के आधार पर फिर सैकड़ों पुस्तकें लिखी गयी।

भारत में जो पुस्तक उपलब्ध है उसमें सबसे पुरानी पुस्तक 1500 साल पुरानी है और महर्षि भारद्वाज तो उससे भी बहुत साल पहले हुए।

शिवकर बापू जी तलपदे जी के हाथ में महर्षि भारद्वाज के विमान शास्त्र पुस्तक लग गई और इस पुस्तक को उन्होनें पढ़ा ।

इस पुस्तक के बारे में तलपदे जी ने कुछ रोचक बातें कहीं जैसे-

इस पुस्तक के आठ वे अध्याय में विमान बनाने की तकनीकी का ही वर्णन है।

आठ वे अध्याय में 100 खंड है जिसमें विमान बनाने की
टेक्नालॉजी का वर्णन है।

महर्षि भारद्वाज ने अपनी पूरी पुस्तक में विमान बनाने के 500 सिद्धांत लिखे हैं।

एक सिद्धांत होता है जिसमें इंजन बन जाता है और पूरा विमान
बन जाता है, ऐसे 500 सिद्धांत लिखे हैं महर्षि भारद्वाज ने यानि 500 तरह के विमान बनाये जा सकते हैं हर एक सिद्धांत पर ।

इस पुस्तक के बारे में तलपदे जी और लिखते हैं कि- इन 500 सिद्धांतो के 3000 श्लोक हैं विमान शास्त्र में।

यह तो (Technology) तकनीकी होती है इसका एक
के (Process) प्रक्रिया होती है, और हर एक तकनीकी के एक विशेष प्रक्रिया होती है तो महर्षि भारद्वाज ने 32 प्रक्रियाओं
का वर्णन किया है। मतलब 32 तरह से 500 किस्म के विमान बनाए जा सकते हैं मतलब 32 तरीके हैं 500 तरह के विमान बनाने के अर्थात् एक विमान बनाने के 32 तरीके, 2 विमान बनाने के 32 तरीके, 500 विमान बनाने के 32 तरीके उस पुस्तक विमल शास्त्र में है।

3000 श्लोक है 100 खण्ड है और 8 अध्याय है।

आप सोचिये यह कितना बड़ा ग्रन्थ है ।

तलपदे जी ने अपना अनुसंधान वेद एवं विमान विद्या से सम्बंधित संस्कृत ग्रंथों के आधार पर किया । संस्कृत में ऐसे
अनेक ग्रंथ हैं जिनमें विमान बनाने की विधि बतायी गयी है।

आचार्य वैद्यनाथ जी शास्त्री ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'शिक्षण
तरंगिणी' में विमान से सम्बंधित संस्कृत के 17 ग्रंथों का
उल्लेख किया है जो विभिन्न समयों पर लिखे गये, पर आज
इनमें से कुछ ही ग्रंथ उपलब्ध हैं।

राजा भोज (11 वीं शताब्दी) द्वारा निर्मित 'समरांगण सूत्रधर' में विमान बनाने का संक्षेप में वर्णन मिलता है। पर अब यह ग्रंथ पूरा उपलब्ध नहीं है, इसका एक भाग 'वैमानिक प्रकरण' बड़ौदा के राजकीय पुस्तकालय में रखा है जिसमें एक स्थान से दूसरे स्थान के लिए, एक देश से दूसरे देश के लिए तथा एक ग्रह से दूसरे ग्रह जाने के लिए पृथक-पृथक प्रकार के विमानों का भी वर्णन किया गया है।

इस ग्रन्थ को शिवकर बापूजी तलपदे जी ने पढ़ा अपने विद्यार्थी जीवन में और पढ़कर परीक्षण किये और परीक्षण करते-करते 1895 में वो सफल हो गए और उन्होंने पहला विमान बना लिया और उसको उड़ा कर भी दिखाया।

इस परीक्षण को देखने के लिए भारत के बड़े-बड़े लोग गए।

हमारे देश के उस समय के एक बड़े व्यक्ति हुआ करते थे महादेव गोविन्द रानाडे जो अंग्रेजी न्याय व्यवस्था में जज की
हैसियत से काम किया करते थे।

मुम्बई हाई कोर्ट में रानाडे जी गए उसको देखने के लिए।

बड़ोदरा के एक बड़े राजा हुआ करते थे गायकवाड़ नाम के वो गए उसको देखने के लिए। ऐसे बहुत से लोगों के सामने और हजारों साधारण लोगों की उपस्थिति में शिवकर बापूजी तलपदे ने अपना विमान उड़ाया और हैरानी की बात यह थी उस विमान को उन्होंने उड़ाया, उसमें खुद नहीं बैठे, बिना चालक के उड़ा
दिया उसको।

याने उस विमान को उड़ाया होगा पर कण्ट्रोल सिस्टम तलपदे जी के हाथ में है और विमान हवा में उड़ रहा है और यह घटना जून 1895 में हुई और उस विमान को उड़ाते-उड़ाते 1500 फिट तक वो लेके गए फिर उसके बाद उन्होंने उसको उतारा और बहुत सकुशल उतारकर विमान को जमीन पर खड़ा कर दिया।

याने विमान टुटा नहीं उसमें आग लगी नहीं उसके साथ को दुर्घटना हुई नहीं, वो उड़ा 1500 फिट तक गया फिर नीचे कुशलता से उतरा और सारी भीड़ ने तलपदे जी को कंधे पर उठा लिया।

महाराजा गायकवाड़ जी ने उनके लिए इनाम की घोषणा की। एक जागीर उनके लिए घोषणा कर दी और गोविन्द रानाडे जी जो थे वहाँ पर उन्होंने घोषणा की बड़े-बड़े लोगों ने घोषणायें की।

तलपदे जी का यह कहना था कि मैं ऐसे कई विमान बना सकता हूँ, मुझे पैसे की कुछ जरुरत हैं, आर्थिक रूप से मेरी
अच्छी स्थिति नहीं है। तो लोगों ने इतना पैसा इकट्ठा करने
की घोषणाये की के आगे उनको कोई जरुरत नहीं थी।

लेकिन तभी उनके साथ एक धोखा हुआ। अंग्रेजों की एक कंपनी थी उसका नाम था Ralli Brothers वो आयी तलपदे
जी के पास और तलपदे जी को कहा यह जो विमान आपने
बनाया है इसका ड्राइंग हमें दे दीजिये।

तलपदे जी ने कहा की उसका कारण बताइए तो उन्होंने कहा की हम आपकी मदद करना चाहते हैं, आपने यह जो आविष्कार किया है इसको सारी दुनिया के सामने लाना चाहते है आपके पास पैसे की बहुत कमी है, हमारी कंपनी काफी पैसा इस काम में लगा सकती है लिहाजा हमारे साथ आप समझौता कर लीजिये, और इस विमान की डिजाईन दे दीजिए।

तलपदे जी भोले- भाले सीधे-साधे आदमी थे तो वो मान गए और कंपनी के साथ उन्होंने एक समझौता कर लिया। उस समझौते में Ralli Brothers जो कंपनी थी उसने विमान का जो मॉडल था उनसे ले लिया, ड्राइंग ले ली और डिजाईन ले ली, और उसको लेकर यह कंपनी लन्दन चली गयी और लन्दन जाने के बाद उस समझौते को वो कंपनी भूल गयी। और वही
ड्राइंग और वो डिजाईन फिर अमेरिका पहुँच गयी। फिर अमेरिका में Write Brothers के हाथ में आ गयी फिर Write Brothers ने वो विमान बना के अपने नाम से सारी दुनिया में रजिस्टर करा लिया। तलपदे जी के पास ज्ञान तो बहुत था लेकिन उनको चालाकी और मक्कारी नहीं आती थी।

शिवकर बापूजी तलपदे जी के द्वारा 1895 में बना हुआ विमान सारी दुनिया के सामने अब यह घोषित करता है कि विमान सबसे पहले अमेरिकी Write Brothers ने बनाया और 1903 में 17 दिसम्बर को उड़ाया पर इससे 8 साल पहले भारत में विमान बन चुका था और देश के सामने वो दिखाया जा चुका था।

हमारी उदासीनता और विदेशियों के षड्यंत्र का परिणाम यह हुआ कि तलपदे जी ने इस अनुसंधान को कैसे सम्पन्न किया अब इसका विस्तृत विवरण उपलब्ध ही नहीं।

इसी कारण भारतीय वायु सेना ने जब सेंटिनल्स ऑफ द स्काड: ग्लिम्सेस ऑफ द इण्डियन एयरफोर्स पुस्तक
(लेखक : आर. के. पाल एवं ए. पी. मोठे : वर्ष 1999) प्रकाशित की तो उसमें तलपदे जी के इस प्रयोग की गर्व सहित चर्चा करते हुए यह तो लिखा कि शिवकर बापूजी तलपदे ने 1895 में एक चालक रहित विमान उड़ाकर दिखाया था, पर इस बात पर दुख भी व्यक्त किया कि अब उसके आविष्कारी प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

उनके अनुसंधान के सम्बंध में अब केवल इतनी ही जानकारी मिल सकी है कि विमान शास्त्र सम्बंधी प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में ऊर्जा के लिए जो अग्नि और पारे की चर्चा की गयी है, तलपदे जी ने उसी के आधार पर अपने प्रयोग में सूर्य किरण और पारे का प्रयोग किया।

कुछ समय पहले मुम्बई के विलेपार्ले में वैमानिकी से सम्बंधित एक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था जिसमें तलपदे जी के 'मरुत्सखा' का मॉडल भी रखा गया था।

तलपदे जी के प्रयोग से सम्बंधित जो भी दस्तावेज अब उपलब्ध हो सके, हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड ने उन्हेंहै खोजकर अपने पास सुरक्षित रख लिया है।

कुछ मानसिक कुंठित जानकारी को गलत बता रहे उनकी जानकारी के लिए बता दूं, यह जानकारी माध्यमिक शिक्षा मंडल मध्यप्रदेश भोपाल के वेबसाइट में जारी सुझावात्मक प्रोजेक्ट वर्क पर आधारित है, यह प्रयोजना पुस्तक हिंदी कक्षा 12 नवबोध प्रकाशन में छापी गई है 🙏
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13/08/2023

ज्ञानवापी मंदिर के बारे मे विस्तृत जानकारी

पुराणों के अनुसार, ज्ञानवापी की उत्पत्ति तब हुई थी जब धरती पर गंगा नहीं थी और इंसान पानी के लिए बूंद-बूंद तरसता था। तब भगवान शिव ने स्वयं अपने अभिषेक के लिए त्रिशूल चलाकर जल निकाला। यही पर भगवान शिव ने माता पार्वती को ज्ञान दिया। इसीलिए, इसका नाम ज्ञानवापी पड़ा और जहां से जल निकला उसे ज्ञानवापी कुंड कहा गया। ज्ञानवापी का उल्लेख हिंदू धर्म के पुराणों मे मिलता है तो फिर ये मस्जिद के साथ नाम कैसे जुड़ गया?

वापी का अर्थ होता है तालाब। ज्ञानवापी का सम्पूर्ण अर्थ है ज्ञान का तालाब। काशी की छः वापियों का उल्लेख पुराणों मे भी मिलता है।

पहली वापी: ज्येष्ठा वापी, जिसके बारे मे कहा जाता है की ये काशीपुरा मे थी, अब लुप्त हो गई है।

दूसरी वापी: ज्ञानवापी, जो काशी विश्वनाथ मंदिर के उत्तर मे है।

तीसरी वापी: कर्कोटक वापी, जो नागकुंआ के नाम से प्रसिद्ध है।

चौथी वापी: भद्रवापी, जो भद्रकूप मोहल्ले मे है।

पांचवीं वापी: शंखचूड़ा वापी, लुप्त हो गई।

छठी वापी: सिद्ध वापी, जो बाबू बाज़ार मे है और अब लुप्त हो गई।

अठारह (18) पुराणों मे से एक लिंग पुराण मे कहा गया है:

देवस्य दक्षिणी भागे वापी तिष्ठति शोभना।
तस्यात वोदकं पीत्वा पुनर्जन्म ना विद्यते।

इसका अर्थ है: प्राचीन विश्ववेश्वर मंदिर के दक्षिण भाग में जो वापी है, उसका पानी पीने से जन्म मरण से मुक्ति मिलती है।

स्कंद पुराण मे कहा गया है:

उपास्य संध्यां ज्ञानोदे यत्पापं काल लोपजं ।
क्षणेन तद्पाकृत्य ज्ञानवान जायते नरः ।

अर्थात इसके जल से संध्यावंदन करने का भी बड़ा फल है, इससे भी ज्ञान उत्पन्न होता है, पाप से मुक्ति मिलती है।

स्कंद पुराण:

योष्टमूर्तिर्महादेवः पुराणे परिपठ्यते ।।
तस्यैषांबुमयी मूर्तिर्ज्ञानदा ज्ञानवापिका।।

अर्थात ज्ञानवापी का जल भगवान शिव का ही स्वरूप है।

पुराण जो ना जाने कितनी सदियों पहले लिखे गए, उसमें भी ज्ञानवापी को भगवान शिव का स्वरूप बताया गया है। सारे पुराण, कह रहे है की ज्ञानवापी हिंदुओं से जुड़ा हुआ है लेकिन आज हम आप सुनते है की मस्जिद का नाम है ज्ञानवापी मस्जिद। मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमण से पहले काशी को अविमुक्त और भगवान शिव को अविमुक्तेश्वर कहा जाता था।

काशी मे अविमुक्तेश्वर के स्वयं प्रकट हुए शिवलिंग की पूजा होती थी जिसे आदिलिंग कहा जाता।

13/08/2023
 # # Jay maa adishakti 🙏🙏💐 # # Jay shiva sambhu 🙏🙏💐
03/05/2021

# # Jay maa adishakti 🙏🙏💐
# # Jay shiva sambhu 🙏🙏💐

Jaya sree krishna, har har mahadev 🙏🙏💐💐jay maa adishakti 🙏🙏💐💐
03/05/2021

Jaya sree krishna, har har mahadev 🙏🙏💐💐jay maa adishakti 🙏🙏💐💐

 # # # Har har mahadev, 🙏🙏🙏💐💐💐 # # # jaya sree krishna 🙏🙏🙏💐💐💐 # # # jaya ganapati baba 🙏🙏🙏💐💐💐
03/05/2021

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