31/05/2026
सम्मान समारोह एवं जयकारों के साथ हुई संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा की पूर्णाहुति
महाआरती में उमड़ा आस्था का सैलाब
उदयपुर। शहर के अशोक नगर में पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर पूज्य पुष्कर दास महाराज के सान्निध्य में आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन पूर्णाहुति में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। कथा के अंतिम दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण से गूंज उठा। कथा के समापन अवसर पर जय श्री कृष्ण और हरि नाम के जयकारों से पूरा पंडाल गूंजायमान हो गया।
कथा वाचक पुष्कर दास महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन संघर्षों से भरा रहा। जन्म से लेकर जीवन के अंतिम क्षण तक उन्होंने अनेक कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन हर परिस्थिति में धर्म और प्रेम का मार्ग नहीं छोड़ा।
महाराज ने कहा कि संघर्ष ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारता है। जिन लोगों को बिना परिश्रम के सुख-सुविधाएं और सम्पन्नता प्राप्त हो जाती है, उनमें अहंकार जल्दी आ जाता है, जबकि संघर्षशील व्यक्ति जीवन के वास्तविक मूल्यों को समझता है। उन्होंने कहा कि संसार में सबसे बड़ा यदि कुछ है तो वह प्रभु श्रीराम का नाम है। तुलसी के पौधे में भगवान का वास माना गया है, पर्वतों में ईश्वर की शक्ति विद्यमान है और नदियां सदैव परोपकार के लिए बहती हैं। महाराज ने सृष्टि की रचना और ईश्वर की व्यापकता का सुंदर वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को भक्ति और सेवा का संदेश दिया।
कथा के दौरान श्रीकृष्ण और सुदामा की अमर मित्रता का मार्मिक प्रसंग सुनाते हुए महाराज ने कहा कि सच्चे प्रेम और आत्मीयता के कारण ही द्वारकाधीश श्रीकृष्ण अपने मित्र सुदामा से मिलने के लिए स्वयं दौड़े चले आए। उन्होंने कहा कि हम भगवान के “दर्शन” करने जाते हैं, जबकि सुदामा भगवान से “मिलने” गए थे। दर्शन में दूरी होती है, लेकिन मिलने में अपनापन और निकटता होती है।
महाराज ने बताया कि अत्यंत गरीबी में जीवन बिताने के बावजूद सुदामा ने कभी अपनी परिस्थितियों को अपने आत्मसम्मान पर हावी नहीं होने दिया। उनकी पत्नी सुशीला अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सरल और सद्गुणी थीं। सुदामा जब चावल की पोटली लेकर द्वारका पहुंचे तो भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बालसखा का अत्यंत प्रेम और सम्मान के साथ स्वागत किया। भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी ने स्वयं सुदामा के चरण प्रक्षालन किए। यह प्रसंग सुनकर कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
महाराज ने कहा कि भगवान अपने भक्त के प्रेम के भूखे होते हैं। सुदामा ने भगवान से कुछ नहीं मांगा, लेकिन भगवान ने बिना मांगे ही उनके जीवन की सारी दरिद्रता दूर कर दी। कथा के अंतिम क्षणों में पूरा पंडाल श्रद्धा और भक्ति में डूबा नजर आया।
कथा पूर्णाहुति अवसर पर मुख्य यजमान अजय राज आचार्य ने सपरिवार व्यासपीठ पर महाराज का सम्मान किया और सभी भक्तो का आभार व्यक्त किया l इसके पश्चात सभी श्रद्धालुओं ने सामूहिक महाआरती में भाग लिया। आरती के दौरान पूरा मंदिर परिसर “जय श्रीकृष्ण” और “हरि बोल” के जयकारों से गूंज उठा। अंतिम दिन कथा स्थल श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहा और सभी भक्तों ने भक्ति रस का भरपूर आनंद प्राप्त किया।