06/01/2026
**ब्राह्मण कौन है?**
वह, जिसके विरुद्ध बिना प्रारंभिक जाँच के भी कठोर क़ानूनों के अंतर्गत कार्यवाही संभव है।
वह, जिसे जातिसूचक शब्दों से अपमानित करना सामाजिक रूप से स्वीकार्य बना दिया गया है।
वह, जो मतदान तो करता है, परंतु सैकड़ों आरक्षित लोकसभा और विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं रखता।
वह ब्राह्मण है—
जिसके हित में आज तक कोई राष्ट्रीय आयोग गठित नहीं हुआ,
जिसके लिए कोई विशेष सरकारी योजना नहीं बनी,
जिसे दंडित करने के लिए विशेष आयोग और विशेष न्यायालय बनाए गए,
पर जिसकी सुरक्षा और न्याय के लिए कोई पृथक व्यवस्था नहीं।
जो शिक्षा में सबसे अधिक शुल्क देता है,
पर रोजगार, पदोन्नति और आवास में सबसे पीछे खड़ा कर दिया जाता है।
जिसके बच्चे 90–95 प्रतिशत अंक लाकर भी अवसर खो देते हैं,
और कम अंक पाने वाले आरक्षण के बल पर आगे निकल जाते हैं।
जो सबसे अधिक कर देता है,
सबसे अधिक मत देता है,
फिर भी स्वयं को ठगा हुआ अनुभव करता है।
वह ब्राह्मण है—
जो सत्ता को फर्श बिछाकर सौंपता है,
देशहित में तन–मन–धन अर्पित करता है,
और इतने अन्याय के बाद भी यही प्रार्थना करता है—
**“धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो,
प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो।”**
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ब्राह्मण की पीड़ा अथाह है।
वह समाज की वह नींव है जिसने सदियों तक ज्ञान, संस्कृति और धर्म को जीवित रखा।
वेदों की रक्षा की, शिक्षा का दीप जलाया,
पर आज वही समाज के हाशिये पर खड़ा है।
शिक्षा, रोजगार और न्याय—
हर क्षेत्र में उसकी योग्यता को अनदेखा किया जाता है।
वह मेधावी है, पर अवसरहीन।
वह करदाता है, पर उपेक्षित।
वह शिकायत नहीं करता,
पर भीतर से टूटता है।
वह रोता नहीं,
पर उसकी चुप्पी बहुत कुछ कहती है।
क्या यही समानता है?
क्या यही संवैधानिक न्याय है?
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देश और धर्म के लिए ब्राह्मणों का बलिदान अमिट है।
मंगल पांडे ने स्वतंत्रता संग्राम की पहली चिंगारी जलाई।
चंद्रशेखर आज़ाद ने गुलामी स्वीकार करने से पहले मृत्यु को चुना।
रानी लक्ष्मीबाई ने रणभूमि में वीरगति पाई।
बाजीराव पेशवा ने राष्ट्र की रक्षा में शौर्य और बुद्धि का परिचय दिया।
कारगिल में कैप्टन मनोज पांडे और मेजर मोहित शर्मा ने प्राण न्योछावर कर दिए।
इन सभी ने यह सिद्ध किया कि ब्राह्मण केवल ग्रंथों का रक्षक नहीं,
बल्कि आवश्यकता पड़ने पर रणभूमि का योद्धा भी है।
आज वही समाज भेदभाव, उपेक्षा और असमानता से जूझ रहा है।
पूर्वजों के बलिदान भुला दिए गए हैं,
और उनकी संतानों को न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
ब्राह्मण आज भी राष्ट्रहित में समर्पित है—
पर सम्मान, समानता और न्याय की प्रतीक्षा में।