24/08/2026
"बाप का पसीना"😥
अंकुर की आज शहर के सबसे बड़े कॉलेज में दाखिले की आखिरी तारीख थी। उसकी फीस 25,000 रुपये थी। अंकुर के पिता, रामनाथ जी, गाँव में एक छोटी सी किराने की दुकान चलाते थे, जिससे बमुश्किल घर का राशन पानी चल पाता था।
पिछले एक महीने से रामनाथ जी ने दिन-रात एक कर दिया था। कभी किसी रिश्तेदार के आगे हाथ फैलाए, तो कभी महाजन के चक्कर काटे।
दाखिले की सुबह, रामनाथ जी ने कांपते हाथों से अंकुर की हथेली पर 25,000 रुपये रखे। पैसों को देखकर अंकुर की आँखों में चमक आ गई, पर उसने ध्यान नहीं दिया कि उसके पिता की उंगलियां सूजी हुई थीं और उनके कुर्ते की जेब अंदर से फटी हुई थी।
अंकुर भागते हुए शहर पहुँचा और बैंक की लाइन में लग गया। जब उसकी बारी आई और कैशियर ने नोट गिने, तो उसने एक 500 का नोट वापस फेंक दिया।
"यह नोट बीच में से फटा हुआ है और इस पर टेप लगा है। यह नहीं चलेगा, दूसरा नोट दो," कैशियर ने रूखे स्वर में कहा।
अंकुर ने जेब टटोली, पर उसके पास एक रुपया भी फालतू नहीं था। बैंक बंद होने में सिर्फ 10 मिनट बाकी थे। अंकुर का दिल बैठने लगा। उसकी पूरी साल की मेहनत, उसके सपने, सब खत्म होते दिख रहे थे।
उसने कांपते हाथों से अपने पिता को फोन मिलाया और रोते हुए कहा, "पापा! आपने मुझे जो पैसे दिए थे, उसमें 500 का एक नोट फटा हुआ है। कैशियर जमा नहीं कर रहा। 10 मिनट में काउंटर बंद हो जाएगा... मेरी साल खराब हो जाएगी पापा!"
फोन के दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया। फिर रामनाथ जी की हाँफती हुई आवाज़ आई, "बेटा, तू वहीं रुक... भागना मत। मैं आ रहा हूँ।"
गाँव से शहर की दूरी 12 किलोमीटर थी। न बस का समय था, न रामनाथ जी के पास ऑटो के पैसे।
अंकुर बैंक के बाहर ज़मीन पर बैठकर रोने लगा। 8 मिनट बीते... 9 मिनट बीते... तभी दूर से एक बूढ़ा आदमी बदहवास भागता हुआ आता दिखा।
रामनाथ जी के नंगे पाँव थे। दोपहर की तपती सड़क पर भागने से उनके पैरों के छाले फूट चुके थे और खून बह रहा था। उनका पुराना कुर्ता पसीने से पूरी तरह भीगा हुआ था, और वे इतनी तेज़ हाँफ रहे थे कि लग रहा था उनका दम निकल जाएगा।
वे अंकुर के पास पहुँचे, हाँफते हुए घुटनों पर हाथ रखकर झुके और अपनी फटी हुई जेब से कड़कता हुआ 500 का एक नया नोट निकाला।
"ले... ले बेटा... जमा कर दे," रामनाथ जी ने कांपती आवाज़ में कहा।
अंकुर ने चौंककर पूछा, "पापा! आपके पास यह नोट कहाँ से आया?"
रामनाथ जी ने पसीना पोछते हुए मुस्कुराने की कोशिश की, पर उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े।
दरअसल, सुबह जब वे पैसे इकट्ठा कर रहे थे, तो 500 रुपये कम पड़ रहे थे। उन्होंने अपनी वह अंगूठी बेच दी थी जो उनकी दिवंगत पत्नी की आखिरी निशानी थी। दुकान वाले ने गलती से एक फटा नोट दे दिया था। जब अंकुर का फोन आया, तो रामनाथ जी ने गाँव के एक कबाड़ी वाले से अपनी पुरानी साइकिल 500 रुपये में बेची और 12 किलोमीटर नंगे पाँव भागते हुए शहर आए।
अंकुर का कलेजा मुँह को आ गया। उसने नोट नहीं लिया, बल्कि अपने पिता के धूल और खून से सने पैरों को पकड़कर वहीं ज़मीन पर बैठ गया। पूरी सड़क पर खड़े लोग उस बाप-बेटे को देख रहे थे।
कैशियर, जो यह सब खिड़की से देख रहा था, बाहर निकलकर आया। उसने रामनाथ जी के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "अंकुर, तुम्हारे पिता के इस 500 के नोट की कीमत 25,000 से कहीं ज़्यादा है।"
कैशियर ने खुद अपनी जेब से 500 का नोट निकालकर जमा कर लिया और फटा हुआ नोट अपनी डायरी में संभालकर रख लिया।
🌟 अंतिम पंक्ति:🌟
"संतान के सपनों को सींचने के लिए एक बाप अपने जिस्म की छालों की परवाह भी नहीं करता—क्योंकि पिता की फटी जेब में अक्सर दुनिया का सबसे बड़ा खजाना छुपा होता है।"
🙏🙏जय जय गुरुदेव🙏🙏
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