Shri Shri 1008 Dera Baba Rudranand Ji Maharaj Nari

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"बाप का पसीना"😥अंकुर की आज शहर के सबसे बड़े कॉलेज में दाखिले की आखिरी तारीख थी। उसकी फीस 25,000 रुपये थी। अंकुर के पिता,...
24/08/2026

"बाप का पसीना"😥

अंकुर की आज शहर के सबसे बड़े कॉलेज में दाखिले की आखिरी तारीख थी। उसकी फीस 25,000 रुपये थी। अंकुर के पिता, रामनाथ जी, गाँव में एक छोटी सी किराने की दुकान चलाते थे, जिससे बमुश्किल घर का राशन पानी चल पाता था।

पिछले एक महीने से रामनाथ जी ने दिन-रात एक कर दिया था। कभी किसी रिश्तेदार के आगे हाथ फैलाए, तो कभी महाजन के चक्कर काटे।

दाखिले की सुबह, रामनाथ जी ने कांपते हाथों से अंकुर की हथेली पर 25,000 रुपये रखे। पैसों को देखकर अंकुर की आँखों में चमक आ गई, पर उसने ध्यान नहीं दिया कि उसके पिता की उंगलियां सूजी हुई थीं और उनके कुर्ते की जेब अंदर से फटी हुई थी।

अंकुर भागते हुए शहर पहुँचा और बैंक की लाइन में लग गया। जब उसकी बारी आई और कैशियर ने नोट गिने, तो उसने एक 500 का नोट वापस फेंक दिया।

"यह नोट बीच में से फटा हुआ है और इस पर टेप लगा है। यह नहीं चलेगा, दूसरा नोट दो," कैशियर ने रूखे स्वर में कहा।

अंकुर ने जेब टटोली, पर उसके पास एक रुपया भी फालतू नहीं था। बैंक बंद होने में सिर्फ 10 मिनट बाकी थे। अंकुर का दिल बैठने लगा। उसकी पूरी साल की मेहनत, उसके सपने, सब खत्म होते दिख रहे थे।

उसने कांपते हाथों से अपने पिता को फोन मिलाया और रोते हुए कहा, "पापा! आपने मुझे जो पैसे दिए थे, उसमें 500 का एक नोट फटा हुआ है। कैशियर जमा नहीं कर रहा। 10 मिनट में काउंटर बंद हो जाएगा... मेरी साल खराब हो जाएगी पापा!"

फोन के दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया। फिर रामनाथ जी की हाँफती हुई आवाज़ आई, "बेटा, तू वहीं रुक... भागना मत। मैं आ रहा हूँ।"

गाँव से शहर की दूरी 12 किलोमीटर थी। न बस का समय था, न रामनाथ जी के पास ऑटो के पैसे।

अंकुर बैंक के बाहर ज़मीन पर बैठकर रोने लगा। 8 मिनट बीते... 9 मिनट बीते... तभी दूर से एक बूढ़ा आदमी बदहवास भागता हुआ आता दिखा।

रामनाथ जी के नंगे पाँव थे। दोपहर की तपती सड़क पर भागने से उनके पैरों के छाले फूट चुके थे और खून बह रहा था। उनका पुराना कुर्ता पसीने से पूरी तरह भीगा हुआ था, और वे इतनी तेज़ हाँफ रहे थे कि लग रहा था उनका दम निकल जाएगा।

वे अंकुर के पास पहुँचे, हाँफते हुए घुटनों पर हाथ रखकर झुके और अपनी फटी हुई जेब से कड़कता हुआ 500 का एक नया नोट निकाला।

"ले... ले बेटा... जमा कर दे," रामनाथ जी ने कांपती आवाज़ में कहा।

अंकुर ने चौंककर पूछा, "पापा! आपके पास यह नोट कहाँ से आया?"

रामनाथ जी ने पसीना पोछते हुए मुस्कुराने की कोशिश की, पर उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े।

दरअसल, सुबह जब वे पैसे इकट्ठा कर रहे थे, तो 500 रुपये कम पड़ रहे थे। उन्होंने अपनी वह अंगूठी बेच दी थी जो उनकी दिवंगत पत्नी की आखिरी निशानी थी। दुकान वाले ने गलती से एक फटा नोट दे दिया था। जब अंकुर का फोन आया, तो रामनाथ जी ने गाँव के एक कबाड़ी वाले से अपनी पुरानी साइकिल 500 रुपये में बेची और 12 किलोमीटर नंगे पाँव भागते हुए शहर आए।

अंकुर का कलेजा मुँह को आ गया। उसने नोट नहीं लिया, बल्कि अपने पिता के धूल और खून से सने पैरों को पकड़कर वहीं ज़मीन पर बैठ गया। पूरी सड़क पर खड़े लोग उस बाप-बेटे को देख रहे थे।

कैशियर, जो यह सब खिड़की से देख रहा था, बाहर निकलकर आया। उसने रामनाथ जी के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "अंकुर, तुम्हारे पिता के इस 500 के नोट की कीमत 25,000 से कहीं ज़्यादा है।"

कैशियर ने खुद अपनी जेब से 500 का नोट निकालकर जमा कर लिया और फटा हुआ नोट अपनी डायरी में संभालकर रख लिया।

🌟 अंतिम पंक्ति:🌟

"संतान के सपनों को सींचने के लिए एक बाप अपने जिस्म की छालों की परवाह भी नहीं करता—क्योंकि पिता की फटी जेब में अक्सर दुनिया का सबसे बड़ा खजाना छुपा होता है।"

🙏🙏जय जय गुरुदेव🙏🙏
#पापाकीपुरानीजेब #पिताकाप्यार

24/08/2026

"गुरु वो दीप स्तंभ हैं, जो भवसागर के तूफानों में भटकती जीवन-नौका को सही दिशा दिखाते हैं।"
🙏🙏जय जय गुरुदेव🙏🙏

24/08/2026

"गुरु के प्रति विश्वास ही जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है।"

🙏🙏जय जय गुरुदेव🙏🙏

24/08/2026

"गुरु का आशीर्वाद ही मेरी सबसे बड़ी सफलता है।"

🙏🙏जय जय गुरुदेव🙏🙏

मन को बनाएं दोष-रहित और पाएँ सच्चा ऐश्वर्य! 🌟✨ ईश्वरीय मार्गदर्शन का महामंत्र ✨सामवेद महामंत्र (अष्टचत्वारिंशत् विकल्प)ॐ...
23/08/2026

मन को बनाएं दोष-रहित और पाएँ सच्चा ऐश्वर्य! 🌟✨ ईश्वरीय मार्गदर्शन का महामंत्र ✨

सामवेद महामंत्र (अष्टचत्वारिंशत् विकल्प)

ॐ यस्मै त्वं सुद्रविणो ददाशो अनागास्त्वमग्ने स्वस्तये।

महो विश्वायुः कस्यचित् सुप्रणीते॥

(सामवेद — पूर्वार्चिक, प्रपाठक १, दशति ३, मंत्र ५)

सरल शब्दार्थ (विस्तृत पद-च्छेद एवं भावार्थ):

यस्मै (यस्मै): जिस निष्ठावान साधक या भक्त के लिए।

त्वं (त्वम्): आप (हे परमेश्वर!)।

सुद्रविणो (सुद्रविणः): श्रेष्ठ, पवित्र और अक्षय धन-ऐश्वर्य (ज्ञान, शांति और धर्म) को प्रदान करने वाले।

ददाशः (ददाशः): कृपापूर्वक प्रदान करते हैं।

अनागास्त्वम् (अनागास्त्वम्): पाप-रहित अवस्था, निष्पाप मन और परम पवित्रता को ('आगस्' का अर्थ पाप/दोष होता है, 'अनागस्' का अर्थ निष्पाप)।

अग्ने (अग्ने): हे ज्ञानस्वरूप, प्रकाशमान परमात्मा!

स्वस्तये (स्वस्तये): कल्याण, मंगल और आत्मिक सुरक्षा के लिए।

महो (महः): महान्, अत्यंत विस्तृत और प्रभावशाली।

विश्वायुः (विश्वायुः): संपूर्ण जीवन-अवधि, पूर्ण आयु तथा अनंत जीवन-शक्ति।

कस्यचित् (कस्यचित्): किसी भी उस साधक के लिए जो आपकी शरण में आता है।

सुप्रणीते (सुप्रणीते): हे उत्तम मार्ग दिखाने वाले, परम मार्गदर्शक प्रभु!

मंत्र की विस्तृत एवं गहन आध्यात्मिक व्याख्या

यह मंत्र मनुष्य के जीवन में निष्पाप आचरण और ईश्वरीय मार्गदर्शन के महत्व को उजागर करता है। इसके मर्म को हम इन चार मुख्य स्तंभों से समझ सकते हैं:

१. 'अनागास्त्वम्' — निष्पाप हृदय ही सच्चा धन है

वेदों के अनुसार, जीवन का सबसे बड़ा वरदान भौतिक धन नहीं, बल्कि 'अनागास्त्वम्' यानी मन का दोष-रहित होना है। जब व्यक्ति का मन कपट, ईर्ष्या और असत्य से मुक्त हो जाता है, तभी उसमें ईश्वर का सच्चा आनंद उतरता है। निष्पाप मन ही ईश्वर की कृपा पाने की सबसे पहली और अनिवार्य शर्त है।

२. 'सुद्रविणः' — सात्विक और अक्षय ऐश्वर्य

'सु-द्रविण' का अर्थ है वह धन जो धर्म और न्याय के रास्ते से आया हो और जो आत्मा को तृप्ति दे। गलत रास्ते से कमाया गया धन अशांति लाता है, जबकि सात्विक कर्मों से प्राप्त धन जीवन में सुख, आरोग्य और शांति लाता है। परमात्मा अपने भक्तों को ऐसा ही पवित्र और कल्याणकारी धन प्रदान करते हैं।

३. 'सुप्रणीते' — ईश्वर ही सर्वोत्तम मार्गदर्शक

'सुप्रणीत' का अर्थ है जो बिना भटके सही और कल्याणकारी रास्ते पर ले जाए। जीवन के हर मोड़ पर जब मनुष्य दुविधा में होता है, तो उसका अंतरात्मा ही ईश्वर की आवाज़ बनकर उसे सही दिशा दिखाता है। जो व्यक्ति ईश्वर को अपना पथ-प्रदर्शक मानता है, वह कभी असत्य के मार्ग पर नहीं भटकता।

४. 'विश्वायुः' — पूर्ण और अर्थपूर्ण जीवन का वरदान
'विश्वायुः' केवल वर्षों में गिनी जाने वाली उम्र नहीं है, बल्कि एक ऐसा जीवन है जो स्वस्थ, ओजस्वी, ज्ञान से भरपूर और समाज के लिए उपयोगी हो। जब मनुष्य ईश्वर के बताए मार्ग पर चलता है, तो उसकी शारीरिक और आत्मिक ऊर्जा बनी रहती है और वह जीवन का पूर्ण आनंद प्राप्त करता है।

मुख्य संदेश: -
"सामवेद का यह पावन मंत्र हमें सिखाता है कि जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति धन-दौलत नहीं, बल्कि एक निष्पाप और निर्मल मन ('अनागास्त्वम्') है। जब आप अपने विचारों को शुद्ध रखते हैं और ईश्वर को अपना मार्गदर्शक ('सुप्रणीत') बनाते हैं, तो परमात्मा आपको न केवल आत्मिक शांति देते हैं, बल्कि एक अर्थपूर्ण और पूर्ण जीवन का वरदान भी देते हैं। अपने विचारों को सात्विक रखें, ईश्वर का अनुग्रह सदा आपके साथ रहेगा।"

🙏🙏जय जय गुरुदेव🙏🙏
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23/08/2026

"जहाँ गुरु की वाणी का वास है, वहीं सच्ची शांति और प्रकाश है।"
🙏🙏जय जय गुरुदेव🙏🙏

अपनी वाणी में घोलें भक्ति की मिठास! 🌸✨ ईश्वरीय आह्वान और आनंद का महामंत्र ✨सामवेद महामंत्र (सप्तचत्वारिंशत् विकल्प)ॐ एह्...
22/08/2026

अपनी वाणी में घोलें भक्ति की मिठास! 🌸✨ ईश्वरीय आह्वान और आनंद का महामंत्र ✨

सामवेद महामंत्र (सप्तचत्वारिंशत् विकल्प)

ॐ एह्यू षु ब्रवाणि तेऽग्न इत्थेतरा गिरः।

एभिर्वर्धास इन्दुभिः॥

(सामवेद — पूर्वार्चिक, प्रपाठक १, दशति ३, मंत्र ४)

सरल शब्दार्थ (विस्तृत पद-च्छेद एवं भावार्थ):

आ इहि (एहि): हमारे हृदय के अत्यंत निकट आ जाइए / हमारे अंतःकरण में प्रकट हो जाइए।

उ (उ): निश्चित रूप से / अत्यंत आदरपूर्वक।

सु (षु): अत्यंत सुंदर, मधुर और कल्याणकारी रीति से।

ब्रवाणि (ब्रवाणि): हम आपकी महिमा और गुणों का गान करते हैं।

ते (ते): आपके लिए ही (हे परमेश्वर!)।

अग्ने (अग्ने): हे ज्ञान के संवाहक, प्रकाशमान परमात्मा!

इत्था (इत्था): इस प्रकार / सत्य-निष्ठा के साथ।

इतराः गिरः (इतराः गिरः): साधारण सांसारिक बातों को छोड़कर, केवल आपकी दिव्य स्तुति रूपी वाणी (गिरः) को।

एभिः (एभिः): इन हमारे द्वारा अर्पित भावों और निष्ठा से।

वर्धासे (वर्धासे): आप हमारे हृदय में अधिकाधिक महिमावान और संवर्धित हों (हमारे भीतर आपका प्रकाश निरंतर बढ़े)।

इन्दुभिः (इन्दुभिः): भक्ति और प्रेमरस की बिंदु-बूंदों (आनंद-रस) के द्वारा।

मंत्र की विस्तृत एवं गहन आध्यात्मिक व्याख्या

यह मंत्र साधक को सांसारिक व्यर्थ की बातों से हटकर ईश्वर के ध्यान और भक्ति-रस में लीन होने की प्रेरणा देता है। इसके मर्म को हम इन चार मुख्य स्तंभों से समझ सकते हैं:

१. 'एहि' — हृदय में ईश्वर का स्नेहमय आह्वान

'एहि' का अर्थ है "आइए"। यह पुकार किसी डर या मजबूरी से नहीं, बल्कि एक भक्त के ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम से निकलती है। साधक अपने हृदय रूपी मंदिर में ईश्वर को पधारने का निमंत्रण देता है। जब भक्ति में यह आतुरता और तड़प आती है, तब परमात्मा का अनुभव दूर नहीं रहता।

२. 'इतराः गिरः' — सांसारिक कड़वाहट से मुक्ति

'गिरः' का अर्थ वाणी और 'इतराः' का अर्थ अन्य व्यर्थ की बातें (जैसे चुगली, निंदा, ईर्ष्या और असत्य) है। यह मंत्र सिखाता है कि अगर हम अपनी वाणी को ईश्वरीय गुणगान और सत्य बोलने में लगाएंगे, तो हमारे विचार स्वतः शुद्ध हो जाएंगे। व्यर्थ के प्रलाप को छोड़कर प्रभु का स्मरण करना ही मन को शांति प्रदान करता है।

३. 'इन्दुभिः' — भक्ति रस की शीतल बूँदें

'इन्दु' का वैदिक अर्थ सोम/आनंद-रस या भक्ति की बूँदें हैं। जैसे वर्षा की बूँदें सूखी धरती को तृप्त कर देती हैं, वैसे ही ईश्वर भक्ति का रस मनुष्य के सूखे और तनावग्रस्त जीवन में आनंद, शीतलता और सरसता भर देता है। भक्ति केवल नियम नहीं, बल्कि आत्मा का परम आनंद है।

४. 'वर्धासे' — अपने भीतर ईश्वरीय चेतना को बढ़ाना
भगवान कभी घटते या बढ़ते नहीं हैं, लेकिन हमारे हृदय में उनका अनुभव हमारे भावों के अनुसार घटता-बढ़ता है। 'वर्धासे' का अर्थ है कि जैसे-जैसे हम ध्यान, जप और सात्विक कर्म करते हैं, वैसे-वैसे हमारे भीतर ईश्वर की उपस्थिति और प्रकाश का अहसास गहरा होता चला जाता है।

मुख्य संदेश: -
"सामवेद का यह पावन मंत्र हमें सिखाता है कि जीवन की असली शांति व्यर्थ की सांसारिक चर्चाओं में नहीं, बल्कि परमात्मा के स्मरण और सात्विक विचारों में है। अपनी वाणी से दूसरों की निंदा करने के बजाय ईश्वर का गुणगान करें और सत्य का साथ दें। जब आपके हृदय में प्रेम और भक्ति रस ('इन्दु') बहने लगता है, तो ईश्वर का दिव्य प्रकाश आपके जीवन को आनंद से भर देता है।"

🙏🙏जय जय गुरुदेव🙏🙏
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22/08/2026
19/08/2026

"गुरु की भक्ति ही आत्मा का सच्चा श्रृंगार है।"

🙏🙏जय जय गुरुदेव🙏🙏

19/08/2026

हे गुरुदेव !
"मुझे भाग्य से कोई शिकायत नहीं बस इतनी कृपा रखना कि हर परिस्थिति में आपका स्मरण बना रहे"
🙏🙏जय जय गुरुदेव🙏🙏

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