15/10/2026
क्या दीपेंद्र हुड्डा की छवि को नुकसान वायरल वीडियो ने नहीं, उनके तथाकथित शुभचिंतकों ने कर दिया?
कल सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो को लेकर खूब चर्चा हुई, जिसमें कथित तौर पर राहुल गांधी द्वारा दीपेंद्र हुड्डा को ट्रक से नीचे उतारे जाने का दृश्य दिखाया गया। इसके बाद खुद दीपेंद्र हुड्डा को सामने आकर सफाई देनी पड़ी कि उन्हें बैरिकेडिंग और स्थिति को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
लेकिन असली कहानी इसके बाद शुरू हुई!
दीपेंद्र हुड्डा को राजनीतिक नुकसान पहुंचाने के लिए वायरल वीडियो जितना असरदार साबित नहीं हुआ, उससे कहीं ज्यादा नुकसान उनके नाम पर मैदान में उतरे कुछ तथाकथित समर्थकों ने कर दिया। खुद को दीपेंद्र हुड्डा का सबसे बड़ा शुभचिंतक साबित करने की होड़ में इन लोगों ने पत्रकारों और दूसरे लोगों के लिए जिस तरह की अभद्र भाषा और गाली-गलौच का इस्तेमाल किया, उसने पूरी बहस का रुख ही बदल दिया।
विडंबना देखिए! बचाव करने निकले थे दीपेंद्र हुड्डा का, लेकिन सवालों के कटघरे में उन्हीं की छवि को खड़ा कर आए।
एक समय था, जब दीपेंद्र हुड्डा को हरियाणा की राजनीति में एक शालीन, सभ्य और मर्यादित नेता के रूप में देखा जाता था। उनके समर्थकों से भी इसी राजनीतिक संस्कार और संयम की अपेक्षा की जाती थी। लेकिन सोशल मीडिया पर खुद को उनका सबसे बड़ा समर्थक साबित करने की होड़ में लगे कुछ लोगों ने अपनी भाषा और व्यवहार से उनकी छवि को ऐसा नुकसान पहुंचाया, जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी।
और दीपेंद्र हुड्डा के लिए यह कोई नई राजनीतिक सीख नहीं, बल्कि हरियाणा की राजनीति के इतिहास से मिलने वाली एक चेतावनी भी है!
याद कीजिए दुष्यंत चौटाला का राजनीतिक दौर। एक समय उनके समर्थन में भी सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े दावे करने वाले, विरोधियों को ललकारने वाले और अपने नेता को हर हाल में सही साबित करने वाले समर्थकों की कमी नहीं थी। उनके नाम पर राजनीतिक माहौल बनाने वालों की आवाजें भी खूब सुनाई देती थीं। लेकिन आज उनमें से कितने लोग उनके साथ दिखाई देते हैं, यह अपने आप में एक सवाल है।
दुष्यंत चौटाला और उनकी पार्टी जननायक जनता पार्टी की मौजूदा राजनीतिक स्थिति किसी से छिपी नहीं है। कभी हरियाणा की सत्ता में निर्णायक भूमिका निभाने वाली पार्टी आज राजनीतिक रूप से बेहद कमजोर स्थिति में पहुंच चुकी है।
बेशक, किसी भी नेता के राजनीतिक उतार-चढ़ाव के पीछे कई कारण होते हैं। केवल समर्थकों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी सच है कि सोशल मीडिया पर शोर मचाने वाले समर्थक चुनावी जमीन पर जनसमर्थन की गारंटी नहीं होते।
नेता के नाम पर गाली-गलौच करने वाले, हर आलोचक को दुश्मन समझने वाले और हर गलती को सही साबित करने पर तुले लोग तत्काल तालियां तो बटोर सकते हैं, लेकिन लंबे समय में वे अपने ही नेता को जनता से दूर करने का काम कर सकते हैं।
दुष्यंत चौटाला के राजनीतिक सफर से यह सबक लिया जा सकता है कि सोशल मीडिया की लोकप्रियता, समर्थकों की आक्रामकता और वास्तविक जनविश्वास-तीनों अलग-अलग चीजें हैं।
आज दीपेंद्र हुड्डा के नाम पर जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे उनके विरोधियों को मेहनत करने की जरूरत ही नहीं पड़ रही। उनके कुछ तथाकथित शुभचिंतक ही उनके लिए मुश्किलें खड़ी करते नजर आ रहे हैं।
भीड़ में धक्कामुक्की होना, रैलियों में अव्यवस्था पैदा होना कोई नई बात नहीं है। ऐसी घटनाएं पहले भी होती रही हैं और आगे भी हो सकती हैं। किसी एक वीडियो को देखकर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं। लेकिन किसी घटना पर अपना पक्ष रखने का रास्ता तथ्य, तर्क और संयम है-गाली-गलौच नहीं।
किसी नेता की असली ताकत उसके समर्थकों की संख्या से नहीं, बल्कि जनता के बीच उसकी विश्वसनीयता से तय होती है। और विश्वसनीयता बनाने में वर्षों लगते हैं, जबकि कुछ लोगों की गैर-जिम्मेदाराना हरकतें पल भर में उस पर सवाल खड़े कर सकती हैं।
दीपेंद्र हुड्डा के विरोधियों को जो नुकसान वायरल वीडियो से शायद नहीं पहुंचा, वह नुकसान उनके कुछ तथाकथित समर्थकों ने अपनी जुबान और व्यवहार से पहुंचाने का काम कर दिया।
राजनीति में विरोधी से सावधान रहना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है उन लोगों को पहचानना, जो समर्थन के नाम पर नेता की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हों।
क्योंकि इतिहास गवाह है-नेता को कमजोर करने के लिए हमेशा विरोधियों की जरूरत नहीं पड़ती, कभी-कभी अंधसमर्थन करने वाले ही सबसे बड़ा नुकसान कर जाते हैं।
समर्थन कीजिए, लेकिन विवेक के साथ। विरोध का जवाब दीजिए, लेकिन मर्यादा के साथ। क्योंकि नेता की लड़ाई लड़ने के चक्कर में कहीं ऐसा न हो कि समर्थक ही उसकी राजनीतिक लुटिया डुबो दें!