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18/10/2026

एक पत्रकार द्वारा नशे के खिलाफ मुहिम चलाने पर उसकी पीठ थपथपाने की बजाए उसी पर पर्चा दर्ज करवा दिया - अभय सिंह चौटाला

भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को सीने में संक्रमण और उम्र संबंधी समस्याओं के चलते अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया ग...
17/10/2026

भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को सीने में संक्रमण और उम्र संबंधी समस्याओं के चलते अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया।

17/10/2026

🚨 दीपेंद्र के बाद अब भूपेंद्र हुड्डा का वीडियो वायरल!

राहुल गांधी के हरियाणा दौरे का वीडियो चर्चा में, संगठन सृजन अभियान की ट्रेनिंग के दौरान राहुल गांधी, भूपेंद्र सिंह हुड्डा को नजरअंदाज कर आगे बढ़ते दिखे। आखिर हरियाणा कांग्रेस में चल क्या रहा है? 🤔

हरियाणा विधानसभा के बाद अनेक मौकों पर राहुल गांधी जी द्वारा भूपेंद्र सिंह हुड्डा जी और दीपेंद्र सिंह हुड्डा जी की इस अनदेखी के क्या सियासी मायने ?

2029 की तैयारी या हुड्डा गुट की घेराबंदी? कांग्रेस में शुरू हुआ सियासी शतरंज का खेल!हुड्डा साहब जाए तो जाए लेकिन उससे पह...
16/10/2026

2029 की तैयारी या हुड्डा गुट की घेराबंदी? कांग्रेस में शुरू हुआ सियासी शतरंज का खेल!

हुड्डा साहब जाए तो जाए लेकिन उससे पहले खाली हाथ किया जाए!

हरियाणा विधानसभा चुनाव में अभी करीब तीन साल बाकी हैं, लेकिन कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में 2029 की बिसात बिछती दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अगर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने भविष्य में अलग राजनीतिक राह चुनी, तो क्या कांग्रेस हाईकमान उन्हें मजबूत संगठन और समर्थकों के साथ जाने देगा? या उससे पहले ही उनके राजनीतिक प्रभाव को सीमित करने की रणनीति पर काम हो रहा है?

2024 की हार से शुरू हुई कहानी!

2024 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बड़ी जीत के दावे धरे रह गए। तमाम सर्वे 65-70 सीटों तक का अनुमान लगा रहे थे, लेकिन पार्टी 37 सीटों पर सिमट गई और भाजपा ने सरकार बना ली। हार के बाद नेता प्रतिपक्ष के चयन में हुई देरी और पार्टी के भीतर गुटबाजी ने नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े किए। इसके बाद राहुल गांधी और कांग्रेस हाईकमान की हरियाणा में अलग-अलग नेताओं को आगे बढ़ाने की कवायद को इसी बदलते सियासी समीकरण से जोड़कर देखा जाने लगा।

हुड्डा गुट के बाहर नए चेहरे, पुराने समीकरणों में बदलाव!

बृजेंद्र सिंह की सद्भाव यात्रा के जरिए विनेश फोगाट जैसे नेताओं को गुट के प्रभाव से दूर कर कांग्रेस की मुख्य धारा मे लाना । ऐसे चेहरों को भी महत्व मिलता दिखाई दिया, जिनकी पहचान केवल हुड्डा खेमे तक सीमित नहीं है। राज्यसभा चुनाव में कर्मवीर बौद्ध को उम्मीदवार बनाने का फैसला भी चर्चा का विषय बना। चुनाव में क्रॉस वोटिंग और वोट रद्द होने के बाद कांग्रेस के भीतर संभावित सेंधमारी को लेकर सवाल उठे। अंततः इनेलो के दोनों विधायकों के मतदान से दूर रहने के बीच कर्मवीर बौद्ध महज 0.33 वोट के अंतर से जीत गए।

निशित कटारिया ,सचिन कुंडू को तवज्जो, हुड्डा खेमे को संदेश?

हालिया घटनाक्रम में सांसद दीपेंद्र हुड्डा से जुड़े नेताओं की कथित अनदेखी और निशित कटारिया को राहुल गांधी तथा प्रियंका गांधी द्वारा विशेष रूप से बुलाए जाने की चर्चा ने नए राजनीतिक सवाल खड़े किए हैं। निशित कटारिया को हुड्डा खेमे से जुड़ा माना जाता है, ऐसे में उन्हें सीधे शीर्ष नेतृत्व की ओर से महत्व मिलना क्या केवल एक सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम था या कांग्रेस के भीतर बदलते समीकरणों का संकेत?

इसी तरह, हुड्डा गुट के विधायकों को जिम्मेदारियों में प्राथमिकता मिलने के बजाय सचिन कुंडू को कांग्रेस के अभियान का जिला प्रभारी बनाए जाने को भी संगठन में नए चेहरों को आगे लाने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। यदि इन नियुक्तियों और मुलाकातों का यही व्यापक रुझान जारी रहता है, तो हरियाणा कांग्रेस में शक्ति संतुलन बदल सकता है।

ट्रक प्रकरण: महज एक वीडियो या बड़े सियासी टकराव की झलक?

राहुल गांधी के कार्यक्रम के दौरान ट्रक से जुड़े घटनाक्रम और वीडियो को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हुईं। हुड्डा खेमे के नेताओं की अनदेखी की अटकलों के बीच दूसरे चेहरों को मिलती तवज्जो ने इस सवाल को और हवा दी कि क्या कांग्रेस नेतृत्व हरियाणा में किसी एक गुट पर निर्भरता कम करना चाहता है?

सवाल बड़ा है-2029 से पहले कांग्रेस किसे मजबूत करेगी और किसका प्रभाव सीमित होगा?

राजनीतिक गलियारों में नई पार्टी की संभावनाओं से लेकर संगठनात्मक फेरबदल तक कई चर्चाएं हैं। अभी इन्हें कांग्रेस की घोषित रणनीति कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन घटनाक्रमों ने अटकलों को जरूर हवा दी है।

अगर भूपेंद्र और दीपेंद्र हुड्डा भविष्य में अलग रास्ता चुनते हैं, तो क्या उनके पास वही राजनीतिक ताकत और समर्थकों का आधार रहेगा? या कांग्रेस हाईकमान उससे पहले ही हरियाणा में नए नेतृत्व और नए समीकरणों की जमीन तैयार कर लेगा?

2029 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन हरियाणा कांग्रेस में नेतृत्व की लड़ाई के संकेत अभी से चर्चा में हैं।

16/10/2026

पानीपत के वार्ड-3 में देवी मंदिर के पास खुले नाले में गिरी 8 वर्षीय मासूम बच्ची को युवक ने जान जोखिम में डालकर बचाया। स्थानीय लोगों के मुताबिक, यहां पहले भी हादसे हो चुके हैं। खुले नालों की सुरक्षा को लेकर प्रशासन पर सवाल उठ रहे हैं।

16/10/2026

हालत ऐसे हो रहे हैं कि ज्ञानेश कुमार को तो जाना ही पड़ेगा,हो सकता है सरकार को भी जाना पड़े - प्रोफ़ेसर संपत सिंह

क्या दीपेंद्र हुड्डा की छवि को नुकसान वायरल वीडियो ने नहीं, उनके तथाकथित शुभचिंतकों ने कर दिया?कल सोशल मीडिया पर वायरल ह...
15/10/2026

क्या दीपेंद्र हुड्डा की छवि को नुकसान वायरल वीडियो ने नहीं, उनके तथाकथित शुभचिंतकों ने कर दिया?

कल सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो को लेकर खूब चर्चा हुई, जिसमें कथित तौर पर राहुल गांधी द्वारा दीपेंद्र हुड्डा को ट्रक से नीचे उतारे जाने का दृश्य दिखाया गया। इसके बाद खुद दीपेंद्र हुड्डा को सामने आकर सफाई देनी पड़ी कि उन्हें बैरिकेडिंग और स्थिति को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी दी गई थी।

लेकिन असली कहानी इसके बाद शुरू हुई!

दीपेंद्र हुड्डा को राजनीतिक नुकसान पहुंचाने के लिए वायरल वीडियो जितना असरदार साबित नहीं हुआ, उससे कहीं ज्यादा नुकसान उनके नाम पर मैदान में उतरे कुछ तथाकथित समर्थकों ने कर दिया। खुद को दीपेंद्र हुड्डा का सबसे बड़ा शुभचिंतक साबित करने की होड़ में इन लोगों ने पत्रकारों और दूसरे लोगों के लिए जिस तरह की अभद्र भाषा और गाली-गलौच का इस्तेमाल किया, उसने पूरी बहस का रुख ही बदल दिया।

विडंबना देखिए! बचाव करने निकले थे दीपेंद्र हुड्डा का, लेकिन सवालों के कटघरे में उन्हीं की छवि को खड़ा कर आए।

एक समय था, जब दीपेंद्र हुड्डा को हरियाणा की राजनीति में एक शालीन, सभ्य और मर्यादित नेता के रूप में देखा जाता था। उनके समर्थकों से भी इसी राजनीतिक संस्कार और संयम की अपेक्षा की जाती थी। लेकिन सोशल मीडिया पर खुद को उनका सबसे बड़ा समर्थक साबित करने की होड़ में लगे कुछ लोगों ने अपनी भाषा और व्यवहार से उनकी छवि को ऐसा नुकसान पहुंचाया, जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी।

और दीपेंद्र हुड्डा के लिए यह कोई नई राजनीतिक सीख नहीं, बल्कि हरियाणा की राजनीति के इतिहास से मिलने वाली एक चेतावनी भी है!

याद कीजिए दुष्यंत चौटाला का राजनीतिक दौर। एक समय उनके समर्थन में भी सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े दावे करने वाले, विरोधियों को ललकारने वाले और अपने नेता को हर हाल में सही साबित करने वाले समर्थकों की कमी नहीं थी। उनके नाम पर राजनीतिक माहौल बनाने वालों की आवाजें भी खूब सुनाई देती थीं। लेकिन आज उनमें से कितने लोग उनके साथ दिखाई देते हैं, यह अपने आप में एक सवाल है।

दुष्यंत चौटाला और उनकी पार्टी जननायक जनता पार्टी की मौजूदा राजनीतिक स्थिति किसी से छिपी नहीं है। कभी हरियाणा की सत्ता में निर्णायक भूमिका निभाने वाली पार्टी आज राजनीतिक रूप से बेहद कमजोर स्थिति में पहुंच चुकी है।

बेशक, किसी भी नेता के राजनीतिक उतार-चढ़ाव के पीछे कई कारण होते हैं। केवल समर्थकों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी सच है कि सोशल मीडिया पर शोर मचाने वाले समर्थक चुनावी जमीन पर जनसमर्थन की गारंटी नहीं होते।

नेता के नाम पर गाली-गलौच करने वाले, हर आलोचक को दुश्मन समझने वाले और हर गलती को सही साबित करने पर तुले लोग तत्काल तालियां तो बटोर सकते हैं, लेकिन लंबे समय में वे अपने ही नेता को जनता से दूर करने का काम कर सकते हैं।

दुष्यंत चौटाला के राजनीतिक सफर से यह सबक लिया जा सकता है कि सोशल मीडिया की लोकप्रियता, समर्थकों की आक्रामकता और वास्तविक जनविश्वास-तीनों अलग-अलग चीजें हैं।

आज दीपेंद्र हुड्डा के नाम पर जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे उनके विरोधियों को मेहनत करने की जरूरत ही नहीं पड़ रही। उनके कुछ तथाकथित शुभचिंतक ही उनके लिए मुश्किलें खड़ी करते नजर आ रहे हैं।

भीड़ में धक्कामुक्की होना, रैलियों में अव्यवस्था पैदा होना कोई नई बात नहीं है। ऐसी घटनाएं पहले भी होती रही हैं और आगे भी हो सकती हैं। किसी एक वीडियो को देखकर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं। लेकिन किसी घटना पर अपना पक्ष रखने का रास्ता तथ्य, तर्क और संयम है-गाली-गलौच नहीं।

किसी नेता की असली ताकत उसके समर्थकों की संख्या से नहीं, बल्कि जनता के बीच उसकी विश्वसनीयता से तय होती है। और विश्वसनीयता बनाने में वर्षों लगते हैं, जबकि कुछ लोगों की गैर-जिम्मेदाराना हरकतें पल भर में उस पर सवाल खड़े कर सकती हैं।

दीपेंद्र हुड्डा के विरोधियों को जो नुकसान वायरल वीडियो से शायद नहीं पहुंचा, वह नुकसान उनके कुछ तथाकथित समर्थकों ने अपनी जुबान और व्यवहार से पहुंचाने का काम कर दिया।

राजनीति में विरोधी से सावधान रहना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है उन लोगों को पहचानना, जो समर्थन के नाम पर नेता की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हों।

क्योंकि इतिहास गवाह है-नेता को कमजोर करने के लिए हमेशा विरोधियों की जरूरत नहीं पड़ती, कभी-कभी अंधसमर्थन करने वाले ही सबसे बड़ा नुकसान कर जाते हैं।

समर्थन कीजिए, लेकिन विवेक के साथ। विरोध का जवाब दीजिए, लेकिन मर्यादा के साथ। क्योंकि नेता की लड़ाई लड़ने के चक्कर में कहीं ऐसा न हो कि समर्थक ही उसकी राजनीतिक लुटिया डुबो दें!

15/10/2026

दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान रोहतक से सांसद दीपेंद्र हुड्डा की वायरल वीडियो पर भिवानी से बीजेपी सांसद धर्मबीर सिंह की प्रतिक्रिया....

कांग्रेसी सांसद अपने नेता को कहें कि वो भी चुने हुए सांसद हैं....

24 फसलें MSP पर खरीद के सरकारी दावे पर इनेलो ने उठाए सवाल..अभय चौटाला ने कहा - “बाजरे का MSP 2900 /क्विंटल लेकिन मंडियों...
15/10/2026

24 फसलें MSP पर खरीद के सरकारी दावे पर इनेलो ने उठाए सवाल..
अभय चौटाला ने कहा - “बाजरे का MSP 2900 /क्विंटल लेकिन मंडियों में 1800-1900/ क्विंटल बिक रहा है”

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