30/12/2020
यादों के झरोखों से इलाहाबाद,
एक सुस्ताया सा शहर जहां हनुमान जी भी आकर सो जाते हैं।मेरे जैसे आलसी का दिसम्बर 1978 से 2006 फरवरी तक का लगभग पूरा समय वहीं सानन्द बीता। उस दौर के इलाहाबाद में जागने के बाद युवा यदि कर्नलगंज कटरा या ममफोर्डगंज के आस पास विश्वविद्यालय के छात्रावास या डेलीगेसी का वासी होता था तो जगने और मंजन करने के बाद जब दही-जलेबी का भक्षण करते अखबार पर सरसरी निगाह डालता था तो खबरों का निचोड़ चार यारों के मध्य जब तक बहस का हिस्सा न बन जाय तब तक उन सभी के दिल को शांति नहीं मिला करती थी। अस्सी और नब्बे के दशक की यही यादें तब के युवा और आज के सठिया रहे डा. यतेन्द्र की यादों का पीछा नहीं छोड़ रही है।स्थानान्तरण के कारण 2006 में लखनऊ वासी बन गया।अवकाश लेकर या सरकारी विजिट में जब भी इलाहाबाद गया तो फुरसत मिलने पर शाम के समय कटरा से आनंद भवन घूमने का बहाना ढूढ़ लिया करता था लेकिन वाह रे कोरोना तेरे कारण मार्च 2020 के पश्चात इलाहाबाद जाने का अवसर नहीं मिला।यही वजह है कि वहां की यादें जहन में ज्यादा आ रही हैं ! आज याद आ रहा है कि ममफोर्डगंज से शुरु हुई पद यात्रा (ब्यस्त रहने पर स्कूटर से) कटरा सब्जी मंडी होते हुये यूनिवरसिटीरोड पर चाय की दुकान तक पहुंचा करती थी।उतने से पेट नहीं भरा तो वापसी में नेतराम की कचौरियां का भक्षण कर लक्ष्मी टाकिज पर माया पत्रिका और अंग्रेजी अखबार खरीदने के बहाने बहस का हिस्सा बन जाया करते थे।रविवार के दिन साइकिल पर बैठकर थार्नहिल रोड चलकर हीराहलवाई की दही जलेबी की पार्टी उड़ाना अभी भी याद है ! कभी फुरसत के दिनों में शाम के समय आनंद भवन के साए में आलू टिक्की और फुलकी दबाना,
थोडा़ और आगे जाने पर सदियों का इतिहास समेटे कंपनी बाग़ जो शहर का दिल बन के धडकता है, वही गेट के बगल में खोखा राय का ठंडा दही-बडा़ का ठेला जो आज के पिज्जा युग में अपनी चमक खो बैठा है !
हमारे समय हाईकोर्ट के पास फुटपाथ के किनारे की लिट्टी-बाटी का स्वाद की याद आज के फाइव-स्टार के भोजन के स्वाद को टक्कर देती नज़र आती है !
वही से कुछ दूर पर सिविल लाइन्स झिलमिलता नज़र आता था।काफी पीने का मन हुआ तो समय कम होने पर अम्बर की काफी का सेवन ही तृप्त कर देता था।फुरसत के समय काफी हाउस की काफी और डोसा तो बहाना होता था चार दोस्तों के साथ गप्प करने का ठिकाना होता था़।जेब टाइट होने पर चुन्नीलाल के छोले भटूरे का भक्षण करना तथा कभी किसी शनिवार की शाम को अवसर मिलने पर हैस्टी टेस्टी में दोस्तो संग बीयर की चुस्कियां लेकर राष्ट्रीय सियासत पर बहस करना शनिवार को सार्थक बना देता था!
वहां से जॉनसेनगंज की भीड़भाड़ से होते हुए चौक की तंग गलियों तक का सफ़र, वही रस्ते में वो नीम का पेड़ आज भी मौजूद है, जिसकी कहानिया सुनहरे शब्दों में दर्ज है!
दशहरे के आस पास नखासकोना से गुजरते हुए सुलाकी की दूकान की तक की रसमलाई की मिठास की याद में आज भी खो जाता हूं ! कार्तिक के महीने स्नान के पीछे नौका विहार की कामना होती थी। गंगा की चंचलता और यमुना की गहराई के उस पर नाव खेता एक नाविक तथा नदी की लहरें जीवन का दर्शन बयान करती थी ! माहौल का सुकून स्नान का पुण्य लाभ करने आये धार्मिक ब्यक्तियों के श्लोक उच्चारण से भंग होता था !!
सूरज भी ढलते-ढलते अपना थोडा सा सुनहरा रंग गंगा-जमुना में छोड़ जाता था जो रात के साथ मिल के थोडा और गहरा हो जाता है ! वक़्त बस वही थम सा जाता था !!
कहाँ से मिलेगा ये सब एक दौड़ते-भागते महानगर में ?
आप इस शहर को भले छोड़ दे पर ये शहर आपको कभी नहीं छोड़ता, अन्दर धड़कता है एक अहसास बनकर हर पल, चाहे दुनिया के किसी भी कोने में बस जाए मन करता वापस लौट जाए, शहर छूटे चौदह साल हो गये पर नहीं छूटी नहीं टूटी वहां की यादें ............""
*अपना इलाहाबाद*.""