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जगन-मोहिनी योगिनी साधना -यह एक ऐसी योगिनी साधना है जिससे साधक एक से अधिक कई व्यक्ति-समूह को मोह लेती है। अतः किसी सामाजि...
07/04/2026

जगन-मोहिनी योगिनी साधना -
यह एक ऐसी योगिनी साधना है जिससे साधक एक से अधिक कई व्यक्ति-समूह को मोह लेती है। अतः किसी सामाजिक या राजनैतिक चुनाव में विजेता बनने के लिए इसकी साधना करनी चाहिए। व्यक्तिगत मोहन करने के लिए भी यह साधना उत्तम है। इस साधना द्वारा मोहन, सम्मोहन और आकर्षण होना संभव है और व्यक्ति से या समूह से मन-लायक काम लिया जा सकता है।
यह 37 दिन की साधना है और 42 वे दिन दशांश हवन कर या 37 कुंआरी लड़कियों को भोजन करा कर साधना संपन्न कर लिया जाता है। प्रतिदिन 15 माला जप करना होता है।
नए या पुराने साधक इस साधना को कर सकते हैं। जिन्हें दशांश हवन करने में कठिनाई हो वे 37 कुंआरी कन्याओं को भोजन करा सकते हैं। सभी कन्याएं भोजन से संतुष्ट हो जाएं -इस बात का ध्यान अवश्य रखें। साधना करने से पहले इस साधना की शिक्षा-दीक्षा अवश्य ले लें। साधक अपनी जन्मतिथि के अनुसार शुभ-मुहूर्त का चुनाव कर साधना आरम्भ कर सकते हैं।
इस साधना के सम्बन्ध में कोई भी बात साधना शुरू करने से पहले ही जो भी कुछ पूछना हो वह पूछ लें। साधना शुरू कर देने के बाद कोई भी बात अपने गुरु से भी न पूछें। साधना की पूर्णता के 15 दिन तक न पूछें। अधिकतर लोग इन बातों को ध्यान में नहीं रखते और चूक कर बैठते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि साधना ख़राब जाती है या परिणाम आने में बहुत देर हो जाती है। अतः बिना कोई त्रुटि हुए साधना संपन्न करें।
साधना -विधि
आवश्यक सामग्री - लाल चन्दन , लाल हकीक की संस्कारित माला या श्वेतार्क की माला। इनमे कोई एक।
भैरव तंत्र - सुरक्षा के लिए भैरव तंत्र अवश्य धारण कर साधना आरम्भ करना चाहिए।
साधना का समय - रात 10 बजे के बाद।
आसन और वस्त्र - लाल
साधना की दिशा - दक्षिण छोड़कर कोई भी दिशा। साधक को अपनी जन्मतिथि के अनुसार साधना की दिशा तय कराना चाहिए।
साधना स्थल पर अरंडी के तेल की दीपक जलाकर साधना आरम्भ करना है। दीपक बुझे नहीं , इसके लिए पूरी सुरक्षित उपाय कर लेना चाहिए।
मंत्र-जप करने से पहले कुछ देर नदी-शोधन प्राणायाम कर लेना चाहिए।
जप शुरू करने से पहले उच्छिष्ट गणपति जी को प्रणाम करना चाहिए।
मूल मंत्र है - HREEM HOOM STREEM JAGANMOHINI HOOM TAH HREEM FATT .
ह्रीं हूम स्त्रीं जगन्मोहिनी हूम ट: ह्रीं फट
उक्त मंत्र की साधना करने के बाद साधक किसी भी व्यक्ति- समूह को अपने भाषणों के द्वारा सम्मोहित कर लेता है। सभी लोगों का आकर्षण का केंद्र हो जाता है साधक।

इस मंत्र की साधना करके इसे जागृत करने के पश्चात कई प्रकार के प्रयोग किए जा सकते है।

मंत्र दीक्षा एवं आवश्यक सामग्री प्राप्त करके गंभीरता पूर्वक साधना करने के पश्चात प्रयोग इत्यादि बताए जाएँगे एवं अन्य कुछ गुप्त प्रक्रिया ।

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प्रस्तुत हैरागिनी योगिनी साधनायह सर्वोत्तम भोग, सौख्य, समृद्धि ऐश्वर्य दिलाने वाली साधना है। यदि साधना के बाद ध्यान भी क...
31/03/2026

प्रस्तुत है
रागिनी योगिनी साधना

यह सर्वोत्तम भोग, सौख्य, समृद्धि ऐश्वर्य दिलाने वाली साधना है। यदि साधना के बाद ध्यान भी किया जाए तो प्रत्यक्ष दर्शन देने वाली साधना है। जो लोग पहले से ही ध्यान कर रहे हैं और ध्यान के दूसरे चरण तक जा पहुंचे हैं उन्हें साधना के दशांश-हवनकर्म के बाद सिर्फ एक आह्वान करने पर ही अपनी उपस्थिति दर्शा देती है। यदि ध्यान न किया जाए तो अपनी उपस्थिति अदृश्य रूपों में दर्शाएगी। यह 23 दिनों की साधना है और 24 वे दिन दशांश हवन करना पड़ता है और प्रथम आह्वान शुभ मुहूर्त में करना पड़ता है।
यह साधना कंकलिका योगिनी की तरह ही है जो तांत्रिक साधनाओं में भरपूर मदद करती है। वैसे तो यह अप्रत्यक्ष रूप से जब प्रकट होती है तो तंत्र-योगी साधक की साधना में मदद देने के लिए किसी योग्य महिला शरीर में प्रवेश कर साधक की सहायता करती है और यदि यह प्रत्यक्ष स्वरुप में प्रकट होती है तो अन्य किसी महिला शरीर की आवश्यकता नहीं पड़ती।
अन्य सामान्य प्रकार के साधकों को अपने स्वभाव के अनुरूप उन्हें दर्शन देकर उनके मनोरथ को पूर्ण करती है।
साधना विधि -
साधक के जन्म राशि के अनुसार शुभ मुहूर्त से साधना शुरू की जाती है।
साधना करने का समय रात दस से ग्यारह बजे के अंदर ठीक रहता है और आधी रात से पहले संपन्न कर लेना चाहिए। आधी रात कहने का अर्थ है - रात या सुबह 01 : 00 am तक।
जप माला - श्वेतार्क की माला, संस्कारित सफ़ेद हकीक की माला या स्फटिक की माला। - इन प्रकार की माला नहीं उपलब्ध होने पर लाल चन्दन की संस्कारित माला से भी साधना की जा सकती है। माला का संस्कार विधिवत ढंग से संकरित होना चाहिए जोकि शराब के द्वारा होता है और इस प्रक्रिया में 7 दिन लगते हैं।
आसन और वस्त्र लाल हो या गुलाबी भी हो सकता है।
साधना-जप-काल में घी या तेल की दीपक जलाना है। घी गाय या भैंस का हो सकता है और तेल सरसों का या तिल या फिर अरंडी का हो सकता है। दीपक मिटटी या अन्य किसी धातु का हो सकता है।
जप आरम्भ करने से पहले गुरु और गणेश जी को प्रणाम कर साधना करें।
जप विधान के नियमों के पालन करते हुए निम्न मंत्र जप करें -

ह्रींग श्रीग पारब्रह्म स्वरूपिणी रास रंग विनोदिनी रागिनी हूम हूम हूम ॐ क्लिंग स्वाहा ।

उक्त मन्त्र की आठ माला जप करनी है और 23 दिनों तक करना है।
उक्त साधना राजसिक है। 24 दिन दशांश हवाना कर्म करना है। हवन कर्म आदि की सभी बातें यक्षिणी साधना की तरह ही है।

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रति-वल्लभ यक्षिणी साधनामोहन, सम्मोहन और वशीकरण के लिए इसकी साधना बहुत ही विख्यात है। द्वापर युग में इस मंत्र की साधना कर...
21/03/2026

रति-वल्लभ यक्षिणी साधना
मोहन, सम्मोहन और वशीकरण के लिए इसकी साधना बहुत ही विख्यात है। द्वापर युग में इस मंत्र की साधना करने का प्रचलन बहुत जोरों में था। पर, बाद के आने वाले समय के साथ यह लुप्त होता गया। इसके लुप्त होने का कारण यह भी था कि इस साधना को संपन्न करने के लिए सबसे पहले 33 दिनों तक ध्यान करना पड़ता है, उसके बाद 15 दिनों तक उच्छिष्ट गणपति की साधना करनी पड़ती है -साथ ही साथ ध्यान भी करना पड़ता है -उसके बाद 37 दिन की रतिवल्लभ यक्षिणी की साधना करनी पड़ती है और साथ ही साथ ध्यान भी करना पड़ता है। - इतना हो जाने पर साधक के जो भी मनोरथ होते हैं - जायज हो या नाजायज -इस साधना से पूर्ण हो जाते हैं ठीक भोलेनाथ के वरदान की तरह। - पर, बाद में लोग अपना धैर्य खोते रहे क्योंकि की शीघ्र फल प्रदान करने वाली साधनाओं में उनका आकर्षण बढ़ता गया और रतिवल्लभ को लोग भूलते गए और यह लुप्त-प्रायः हो गया। मैं यह कहना चाहता हूँ कि यह साधना इतनी शक्तिशाली है कि इसके प्रभाव से बहुत-प्रेत, पिशाचिनी-डाकिनी, चुड़ैल, यक्षिणी, योगिनी, बेताल आदि तक वश में हो जाता है। सिर्फ देव-देवी आदि के लिए इस साधना का प्रयोग नहीं किया जाता।
इस साधना का उपयोग सांसारिक कर्मों को सफल बनाने से सम्बंधित कार्यों में किया जाना चाहिए। चूँकि इस साधना से साधक चुम्बकीय शक्तियों से युक्त हो जाता है अतः उसके प्रति सभी सभी जन-मानस आकर्षित और वशीभूत होते हैं जिनके भी संपर्क में ये आते हैं। अतः जीवन में साधक सभी मामलों में सफलता अर्जित करता है और कोई भी इनका विरोधी नहीं होता, जो भी चाहता है -उसे आसानी से पूर्ण कर लेता है।
एक सफल जीवन जीने के लिए यह यक्षिणी वर्ग की साधना सर्वोत्तम है जिसे सभी को एक बार अपने जीवन में कर ही लेना चाहिए।
इस साधना में सफलता उन्हें बहुत शीघ्र मिल सकती है जो नियमित योगाभ्यास , यौगिक-क्रिया , प्राणायाम और ध्यान करते हैं। ऐसे साधकों को रतिवल्लभ यक्षिणी के प्रत्यक्ष दर्शन होने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। ध्यान रहे कि ये भोग नहीं करती बल्कि भोग्य वस्तुओं ( सजीव और निर्जीव ) को उपलब्ध करा देती है।
आप नए साधक हों या पुराने, इस साधना की सफलता के लिए नियमबद्ध रूप से ही साधना करनी होगी।
अब इस साधना को संपन्न करने के लिए पूरी विधि क्रमवार रूप से बताया जा रहा है ताकि सौ-प्रतिशत सफलता मिल सके।
पहला तो यह है कि सबसे पहले ध्यान करना सीखें। इसे गुरु निर्देशन में ही सीखें - ध्यान की दीक्षा ले कर अभ्यास करें। जब ध्यान 15 मिनट तक सहजता से होने लगे तब आपको 33 दिन का ध्यान-प्रयोग करना है। 33 दिन की प्रयोग की शुरुआत शुभ मुहूर्त से करना है -
रात्रि भोजन 75 प्रतिशत ही करें - अर्थात- यदि आप चार रोटियां खाते हैं तो तीन रोटी ही खाएं। भर-पेट न खाएं। खाना सात बजे से नौ बजे के अंदर कर लें। रात 10 बजे से मध्य रात्रि 12 बजे के अंदर निम्न भांति ध्यान करें।
ध्यान करने की दिशा मुहूर्त वाले दिनवार के अनुसार रखें , यदि वह दिन शनिवार या सोमवार पड़ा हो तो दिशा पश्चिम रहेगी, रविवार , गुरुवार , शुक्रवार या मंगलवार पड़ा हो तो पूरब रखें और यदि बुधवार पड़ा हो तो उत्तर दिशा होना चाहिए।
ध्यान में बैठने का आसन आपके शुभ-ग्रहों के अनुसार होना चाहिए जिसकी जानकारी दीक्षा के बाद दी जाएगी।
ध्यान करने से पहले एक ताम्बे या चांदी के बर्तन में शुद्ध पानी रखें। यह अपने आसन से कुछ आगे रखें। यह पानी भरा पात्र को किसी लकड़ी के तख्ते पर रखें -सीधा भूमि पर न रखें। उसके बाद ध्यान लगभग 15 मिनट करें। जब ध्यान हो जाए तो उस पानी को पी लें और आँख बंद किये कुछ क्षण आँख बंद किये हुए ही रहें। उसके बाद आप स्वतंत्र हैं अन्य कोई कार्य के लिए या सोने के लिए। -इस प्रकार का ध्यान 33 दिनों तक करना है।
इसके बाद शुभ-मुहूर्त से उच्छिष्ट गणपति जी की साधना 15 दिनों तक करनी है।
मंत्र है - ॐ श्रीम उच्छिष्ट गणपतियै नमः
OM SHREEM UCHHISHT GANPATIYAI NAMAH
इस मंत्र की साधना एक से नौ माला तक के अंतर्गत करनी हैं 15 दिनों तक। किसे कितनी माला करनी है -वह साधक की जन्मतिथि और साधना की तिथि आदि पर विचार करने के बाद बताया जाएगा।
उक्त उच्छिष्ट गणपति साधना के संपन्न हो जाने के बाद 15 घी के बने लड्डू गणेश जी के मंदिर में चढ़ा आएं या बच्चों में बाँट दें।
ध्यान की क्रिया जारी ही रहना चाहिए -सिर्फ पानी पीने वाली क्रिया नहीं करनी है। जब आप उच्छिष्ट गणपति जी की साधना करेंगे तो मंत्र-जप करने के बाद ध्यान करना है।
उपरोक्त प्रक्रिया पूरी करने के बाद अब पुनः शुभ मुहूर्त का चुनाव करें और उस दिन से रति-वल्लभ की साधना आरम्भ करें -

क्रमशः

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प्राणाकर्षण ध्यान -कंही एकांत स्थान में जाओ । समतल भूमि में नरम बिछोना बिछाकर पीठ के बल लेट जाओ । मुँह ऊपर को रहे । पैर ...
20/03/2026

प्राणाकर्षण ध्यान -

कंही एकांत स्थान में जाओ । समतल भूमि में नरम बिछोना बिछाकर पीठ के बल लेट जाओ । मुँह ऊपर को रहे । पैर , कमर, छाती, सिर सब एक सीध में रहें । दोनों हाथ सूर्यचक्र पर ( आमाशय का वह स्थान जहाँ पसलियाँ और पेट मिलता है) रख लो । मुँह बंद रखो । शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दो मानो वह कोई निर्जीव वस्तु है और उससे तुम्हारा कुछ भी संबंध नहीं है । कुछ देर शिथिलता की भावना करने पर शरीर बिल्कुल ढीला पड़ जाएगा । अब धीरे- धीरे नाक द्वारा साँस खिंचना आरंभ करो और दृढ़ शक्ति के साथ भावना करो कि विश्वव्यापी महान प्राण भंडार में से मैं स्वच्छ प्राण , साँस के साथ खींच रहा हूँ और वह प्राण मेरे रक्त प्रवाह तथा समस्त नाड़ी - तंतुओं में प्रवहित होता हुआ सूर्य चक्र में इकठ्ठा हो रहा है। इस भावना को कल्पना- लोक में इतनी दृढता के साथ उतारो कि प्राणशक्ति की बिजली जैसी किरणें नसिका द्वारा देह में घुसती हुई चित्रवत दिखने लगें और अपने रक्त का दौरा एवं नाड़ी समूह तसवीर की तरह दिखें तथा उसमें प्राण- प्रवाह बहता हुआ नजर आए। भावना की जितनी अधिकता होगी , उतनी ही अधिक मात्रा में तुम प्राण खींच सकोगे। फेफडों को वायु से अच्छी तरह भर लो और पाँच से दस सेकंड तक उसे भीतर हि रोके रहो। आरंभ में पाँच सेकंड काफी है, पश्चात अभ्यास बढ़ने पर दस सेकंड तक रोक सकते हैं। साँस रोके रहने के समय अपने अंदर प्रचुर परिमाण में प्राण भरा हुआ अनुभव रहना चाहिए। अब वायु को मुह के द्वारा बाहर निकालो। निकलते समय ऐसा अनुभव करो कि शरीर के सारे दोष , रोग और विष इसके द्वारा निकाले जा रहे हैं। दस सेकंड तक बिना हवा के रहो और फिर पुर्ववत प्राणाकर्षण प्रणयाम करना आरंभ कर दो। स्मरण रखो कि प्राण आकर्षण का मूल तत्व साँस खिंचने-छोड़ने में नहीं, वरण आकर्षण की उस भावना में है, जिसके अनुसार अपने शरीर में प्राण का प्रवेश होता हुआ चित्रवत दिखाई देने लगता है।
इस प्रकार की स्वास-प्रश्वास क्रियाएँ दस मिनट से लेकर धीरे-धीरे आधा घंटे तक बढ़ा लेनी चाहिए। श्वास द्वारा खींचा हुआ प्राण सूर्य चक्र में जमा होता जा रहा है, इसकी विशेष रूप से भावना करो। यदि मुँह द्वारा श्वास छोड़ते समय आकर्षित प्राण को भी छोड़ने की भी कल्पना करने लगे तो यह सारी क्रिया व्यर्थ हो जायेगी और कुछ भी लाभ न मिलेगा। ठीक तरह से प्राणाकर्षण करने पर सूर्यचक्र जाग्रत होने लगता है। ऐसा प्रतीत होता है कि पसलियों के जोड़ का आमाशय के स्थान पर जो गड्ढा है, वँहा सूर्य के समान एक छोटा - सा प्रकाश बिंदु मानस नैत्रों से दिखने लगा है। यह गोला आरंभ में छोटा, थोड़े प्रकाश का धुँधला मालूम देता है, किन्तु जैसे-जैसे अभ्यास बढ़ने लगता है, वैसे-वैसे वह साफ, स्वच्छ, बड़ा और प्रकाशवान होता जाता है। जिनका अभ्यास बढ़ा-चढ़ा है, उन्हें आँखें बंद करते ही अपना सूर्यचक्र साक्षात सूर्य की तरह तेजपूर्ण दिखाई देने लगता है। यह प्रकाशित तत्व सचमुच प्राणशक्ति है। इसकी शक्ति से कठिन कर्यों में अदभुत सफलता प्राप्त होती है।
अभ्यास पूरा करके उठ बैठो। तुम्हें मालूम पड़ेगा कि रक्त का दौरा तेजी से हो रहा है और सारे शरीर में एक बिजली-सी दौड़ रही है। अभ्यास के उपरांत कुछ देर शांतिमय स्थान में बैठना चाहिए और हो सके तो किसी सात्विक वस्तु का जलपान कर लेना चाहिए। अभ्यास से उठाकर एकदम किसी कठिन काम में जुट जाना , स्नान,भोजन या मैथुन करना निषिद्ध है। अभ्यास के लिए प्रातः-काल का समय सर्वोतम है।

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पाताल भैरवी की राजसिक साधनातंत्र-जगत के अनुसार यह एक तांत्रिक साधना है जिसके नियम आदि अलग हटकर हैं तामसिक साधनाओं की तरह...
18/03/2026

पाताल भैरवी की राजसिक साधना
तंत्र-जगत के अनुसार यह एक तांत्रिक साधना है जिसके नियम आदि अलग हटकर हैं तामसिक साधनाओं की तरह और कुछ कठिन भी है। अतः राजसिक विधान के अनुसार इसकी साधना विधि बताई जा रही है जोकि इस विधि से भी की गयी साधना श्रेष्ठ फल प्रदान करने वाली है।
परिचय - प्रत्येक देवी-देवता के दो स्वरुप होते हैं - ऋणात्मक और धनात्मक,- दूसरे शब्दों में सकारात्मक ऊर्जा और नकारात्मक ऊर्जा। निगेटिव और पोजेटिव। महा-भैरवी धनात्मक ऊर्जा का केंद्र है। जितनी धनात्मक ऊर्जा है उतनी ही शक्तिशाली नकारात्मक ऊर्जा भी है। ये दोनों प्रकार की ऊर्जा प्रत्येक व्यक्ति में है। इसी प्रकार देवी या देवताओं में भी दोनों प्रकार की ऊर्जा होती है। मैं बता चूका हूँ कि माता पार्वती का ही नाम तंत्र जगत में महा-भैरवी है। यह सकारात्मक ऊर्जा अर्थात धनात्मक ऊर्जा से युक्त है। महा-भैरवी के ही नकारात्मक अर्थात ऋणात्मक एक और स्वरुप है - तामसिक महा-भैरवी जिन्हें सहज भाषा में तामसिक देवी कही जाती है। अर्थात माता पार्वती या महा-भैरवी का ही दूसरा तामसिक स्वरुप। -इसे इस प्रकार समझें - किसी के मन में असीम प्रेम उमड़ सकता है तो नफरत और गुस्सा भी समय आने पर उमड़ सकता है। इसमें आप प्रेम वाले भाव को सकारात्मक ऊर्जा समझें और क्रोध-नफरत को नकारात्मक ऊर्जा समझें। इस प्रकार एक ही देवी या देवता के दो स्वरुप हो जाते हैं। बिलकुल ठीक इसी प्रकार महा-भैरवी के दो स्वरुप हो जाते हैं। सकारात्मक ऊर्जा आकाश की ओर निर्देशित होती हैं और नकारात्मक ऊर्जा पाताल की ओर। नकारात्मक ऊर्जा वाली महा-भैरवी अंधकार में रहती हैं। ये ही हैं तामसिक माता जिसकी कृपा के बिना कोई भी तामसिक साधना सफल नहीं होती। अब तामसिक माता का भी एक स्वरुप है -पाताल भैरवी। - हमारा ख्याल है कि आपसब समझ गए हैं।
इस साधना को करने की आवश्यकता-
जिन लोगों को राजसिक, सात्विक या तामसिक साधनाओं में सफलता नहीं मिलती या जो लोग साधनाओं के अच्छे परिणाम नहीं मिल पाते - निराश हो चुके हैं तो यह समझना चाहिए कि उन्हें नकारात्मक ऊर्जा वाली साधना करनी चाहिए। एक प्रकृति प्रदप्त नियम है - जहर ही जहर को काटता है-लोहा लोहे को काटता है। आयुर्वेद में भी यही नियम लागु होती है और होमियोपैथी में भी। जब साधक में नकारात्मक ऊर्जा ज्यादा होती है तो वह किसी साधना को सफल नहीं बना सकता। इसी प्रकार के साधक जब तामसिक माता की कृपा से नकारात्मक ऊर्जा वाली साधना करता है तो साधक की नकारात्मकता नष्ट होती है और सकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव का जन्म हो जाता है। पाताल भैरवी की साधना से साधक की नकारात्मकता मिटटी है और वह अपने जीवन को सफल कर ले जाता है।
पाताल भैरवी की कृपा से वह सबकुछ प्राप्त होता है जो साधक इच्छा रखता है। पाताल लोक में रहने वाले सभी देव-दानव आदि साधक के अनुकूल हो जाते हैं।
साधना के प्रभाव को उल्लेखित करना सूर्य को अर्थात दैविक शक्तियों को दीपक दिखाने जैसी बात होगी। अतः साधक बिना कोई लाभ-हानि की चिंता किये वगैर अगर पाताल भैरवी की उपासना करता है तो उसके जीवन में चमत्कार पूर्ण अनुकूल परिणाम पाता है। इस युग की यह एक अत्यंत प्रभावी साधना है और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली है। दरिद्रता मिटती है और धन-सुख और सौभाग्य प्राप्त होता है। पाताल भैरवी स्वयं अपने साधक को अनेकों प्रकार का गूढ़-रहस्य्मय ज्ञान प्रदान करती है जिससे साधक उसका भरपूर उपयोग करता है।
साधना विधि -
आवश्यक सामग्री - शंख की या कौड़ियों की संस्कारित माला या सफ़ेद हकीक की संस्कारित माला।
भैरव तंत्र - सुरक्षा के लिए भैरव-तंत्र धारण करना अनिवार्य है। बिना दीक्षा लिए इसकी साधना न करें।
आसन और वस्त्रों के रंग - सफ़ेद , लाल या काला।
साधना की दिशा - साधना शुरू करने वाले वार के अनुसार।
साधना करने का समय - रात 10 बजे के बाद। देर-रात 2 बजे के अंदर साधना समाप्त कर लेना चाहिए।
साधना शुरू करने का मुहूर्त - जन्मतिथि, राशि और लग्न के अनुसार चयनित मुहूर्त से साधना शुरू करनी है।
दीपक - साधना स्थल पर दीपक जलाकर साधना करनी है। दीपक तिल -तेल या अरंडी के तेल की हो।
साधना शुरू करने से पहले उच्छिष्ट गणपति जी को प्रणाम करें और साधना की सफलता के लिए कामना करें।
अब तामसिक माता को इस मंत्र के साथ प्रणाम करें -
मंत्र है - ऐंग भूगर्भा तमो देवीयै हूम फट
AING BHUGARBHA TAMO DEVIYAI HOOM FATT
उक्त मंत्र को 6 बार पढ़ें और 6 बार प्रणाम करें।
अब पाताल भैरवी के मूल-मंत्र का जप करें।
मूल मंत्र है -ऐंग पाताल भैरवी तंग हंग शा
AING PATAL BHAIRAVI TANG HANG SHA
यह साधना-मंत्र की 9 माला जप से 17 माला जप नित्य किया जाता है। साधक की जन्मतिथि आदि जानने के बाद और साधना शुरू करने की तारीख के ऊपर निर्भर करता है कि उसे कितनी माला जप नित्य करना है। इसकी जानकारी के लिए संपर्क कर सकते हैं जोकि दीक्षा के बाद बताई जाएगी।
यह साधना 42 दिन की है। अतः 42 दिन नित्य साधना करनी हैं। जब साधना पूर्ण हो जाए तो 3300 आहुतियों से हवन-कर्म करना है।
हवनकुंड - तीन , आठ या नौ कोण वाली हो।
हवन की लकड़ी - बरगद की हो या गंभार की हो।
हवन-आहुति - गूलर के सूखे फल या बरगद के फल।
अंतिम आहुति खड़े सूखे नारियल की।
तर्पण -मार्जन - सिर्फ गंगाजल या सामान्य जल।
नोट- एक वर्ष में तीन बार साधना पूर्ण करने से साधक की सभी कामनाएं पूर्ण हो जाती है। यदि पाताल -भैरवी के प्रत्यक्षीकरण की भी इच्छा हो तो तीन वर्षों तक साधना पूर्ण करें अर्थात तीन वर्षों में कुल नौ पुरश्चरण साधना करनी हैं। इतना कर लेने पर साधक में इतना आत्मबल हो जाता है कि उसके इच्छा मात्र से भीषण भूकंप भी शांत हो जाता है -होने वाले विनाश को रोक सकता है। भविष्य में आने वाली आपदाओं को रोकने में यह साधना की अहम् भूमिका हो सकती।
बिना मंत्र दीक्षा एवं मार्गदर्शन के साधना ना करें गुरु आज्ञा लेकर ही करें ।

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तंत्र साधना मार्ग एवं अनुभूत विचार भाग -१एक व्यक्ति जीवन में अनेकों प्रकार से हर स्तर पर स्वयं को परखते हुए अनुभव लेता ह...
09/03/2026

तंत्र साधना मार्ग एवं अनुभूत विचार
भाग -१

एक व्यक्ति जीवन में अनेकों प्रकार से हर स्तर पर स्वयं को परखते हुए अनुभव लेता है ।सामाजिक व्यवस्था हो अथवा गृहस्थी की जिम्मेदारी,अपने सभी कर्त्तव्यों को निभाते हुए व्यक्ति अपने जीवनी शक्ति के साथ आगे बढ़ता है।इस यात्रा के मूल में छिपा अध्यात्म बीच बीच में व्यक्ति को प्रेरणा देता है कि वो स्वयं को इस मकैनिकल यात्रा को अब आत्मानुभूति की तरफ़ मोड़ दे।लेकिन इस भ्रमित और मूढ़ बुद्धि का रूपांतरण तभी होता है जब किसी प्रकार का कष्ट जीवन में आए आप चाहे पुराने साधक संस्कार ले कर पैदा हुए हो अथवा आपकी यात्रा में साधना अध्यात्म का उदय इस जन्म में होना शुरू हुआ को किसी ने किसी बहाने से ईश्वर की सत्ता की तरफ़ एवं उनके अलग अलग स्वरूपों के तरफ़ व्यक्ति का रुझान बढ़ता है। साधनात्मक संस्कार पुराने हो तो तड़प बढ़ती है संस्कार निर्माण हो रहे हो तो पहले अपने आवश्यकता एवं चेतना के स्तर के अनुसार साधना मार्ग का चयन करके आगे बढ़ते है जिसमे भौतिक शक्तियों से जुड़ी तंत्र साधना हो अथवा अपने मन के अंदर दबे पुराने संकल्पों को पूरा करने के लिए हम साधना मार्ग में प्रेरित होते है।हालांकि पुराने अथवा नए दोनों प्रकार के जो साधना संस्कार है उसके बस ये फर्क होता है की नए आध्यात्मिक संस्कार निर्माण में व्यक्ति का पूरा जीवन सिद्धि ,चमत्कारिक शक्ति ,नाम ,यश इत्यादि प्राप्त करके अपने मन को संतुष्ट करने की दिशा में ही निकलता है लेकिन वही यदि पुराने संस्कार आपके व्याप्त हो तो इस जीवन में शुरुआती तौर पर वही सब करेंगे जो आपकी प्राकृतिक आवश्यकताएं है लेकिन धीरे धीरे मन शांत होते हुए आत्म साक्षात्कार की तरफ़ बढ़ने लगता है।

अब इसका तीसरा पहलू देखते है आपके आध्यात्मिक साधनात्मक संस्कार अत्यंत पुराने और प्रगाढ़ है तो ऐसे में यह स्थिति आपको पैदा होते से ही दिखने लगती है और बचपन से ही वैराग्य आ जाता है और साधक का मन सब छोड़ कर कहीं चले जाने का होता है और ऐसा कई ऋषि महर्षियों ने किया।

यहाँ मैंने जो भी बताया यह सब अवस्थाएँ है और अवस्थाएँ परंपरा नहीं बन सकती यह हर व्यक्ति की अपनी स्वयं की व्यक्तिगत यात्रा होती है।
लेकिन जब हम अवस्थाओं को परंपरा से जोड़ते है तो उनका निर्वाह करने हेतु वो सब जबरदस्ती करने लगते है जिस अवस्था में चेतना है ही नहीं और जब जब बिना अपनी संस्कार अवस्थाओ के कोई जबरदस्ती उसमे अपने आपको झोंकता है तो वो विकार बन कर उत्पन्न होता है।उदाहरण लीजिए जैसे हमारे पुराने साधना संस्कार इतने प्रगाढ़ नहीं हो कि हमारा बन बचपन से ही ईश्वरीय सत्य के प्रेम में तड़प उठे और सब छोड़ कर तप करने की इक्षा हो जो बहुत ही विरले होते है लेकिन इसी अवस्था को किसी परंपरा से जुड़ कर जबरदस्ती अपने अंदर लाने की कोशिश की जाए तो यह विकार बनते है और सारे विकार आगे चल कर भयानक रूप से प्रदर्शित होते है समाज के अंदर।जो साधक अपने भौतिक जीवन में वो सब कर चुके है जो प्राकृतिक रूप से उनकी आवश्यकताएं हो धन ,यश ,ऐशो आराम और पुनः कोई ऐसी घटना घटी की मन आध्यात्म साधना की तरफ़ दौड़ पड़ा तो इस अवस्था में व्यक्ति बहुत मेहनत से तप करते हुए पाए गए है लेकिन सब छोड़ कर नहीं अपितु सबके साथ रह कर ध्यान रहे यहाँ भी अवस्थाओ की बात है अवस्था और दिखावा दोनों भिन्न चीजे है।

यह कम शब्दों में आपको जीवन में साधना के असल अनुभूतियों को बता रहा हूँ जो की किसी किताब में नहीं मिलेगी और ना ही इस दिखावे वाले समाज में ऐसी गहरी चर्चा पढ़ने को कही मिलेगी लेकिन ईश्वरीय प्रेरणा से यह लिखना शुरू किया है और आगे बहुत कुछ इसपर लिखूँगा।एक एक भ्रम की परत हटा दूँगा और आप सब को समझ आ जाएगा की साधना कैसे करनी है कैसे आगे बढ़ना है और किस प्रकार ईश्वर आपसे कल्याणकारी कार्य करा लेते है।यह कई भाग में लिख कर डालूँगा और यह लेख के मर्म को वही समझ सकेंगे जो वर्षों से भटके है साधना मार्ग में।

अगला भाग जल्द ही

जय माँ

होलिका दहन एवं चंद्र ग्रहण में साधना संबंधित चर्चा आज २ तारीख की रात्रि ११.३० बजे के बाद  से साधना हेतु शक्तिशाली मुहूर्...
02/03/2026

होलिका दहन एवं चंद्र ग्रहण में साधना संबंधित चर्चा

आज २ तारीख की रात्रि ११.३० बजे के बाद से साधना हेतु शक्तिशाली मुहूर्त है
एवं ३ तारीख की संध्या 3.50-6.50 तक अच्छा शक्तिशाली मुहूर्त है।
हमे कई लोगो के मेसेज आए की क्या कर सकते हैं तो इस संदर्भ में बात करते हैं।

यह जो प्रमुख समय होते है उनके सबसे उपयुक्त ये माना गया है की आपने जिस मंत्र अथवा स्तोत्र के अपने जीवन में ज़्यादा से ज़्यादा अनुष्ठान किए हो अथवा परम्परा से गुरु मंत्र प्राप्त हो इनके ही इन प्रमुख समय में ज़्यादा से ज़्यादा जप पाठ करके निश्चित रूप से एक हवन कर देना चाहिए।आपका मंत्र अथवा स्तोत्र जागृत हो जाता है और आप उसके प्रयोग भी कर सकेंगे अथवा उसकी शक्ति को आप अपने अंदर संचित कर सकेंगे।

इसके साथ ही साथ किसी विशेष स्थिति मनोकामना इत्यादि के लिए शाबर मंत्रों का जाप हवन श्रेष्ठ माना गया ह।इन दिनों में कई ऐसे शावर मंत्रों को जागृत करके रख लिया जाता है जिसका आगे किसी कल्याणकारी भावना अथवा अपने स्वयं की रक्षा एवं लाभ के लिए प्रयोग किया जा सके।
जो योग मार्ग के अनुयायी है उनके लिए मंत्र योग के माध्यम से अपने मंत्रों का जप करते हुए इन्हें जागृत करना चाहिए।
आशा करता ही इस लेख को पढ़कर आपको निर्णय लेने में आसानी होगी एवं जिन्हें शावर मंत्र ही करना हो या आज से ही कुछ शुरू करना चाहते हो वे मांत्रिक दीक्षा अथवा शाबरी दीक्षा प्राप्त करें

जय माँ

विपरीत रति और भैरवी चक्र माँ छिन्नमस्ता का स्वरूप कामदेव एवं रति की विपरीत रति मुद्रा पर स्थापित हैं।तो हम यहाँ विपरीत र...
31/01/2026

विपरीत रति और भैरवी चक्र

माँ छिन्नमस्ता का स्वरूप कामदेव एवं रति की विपरीत रति मुद्रा पर स्थापित हैं।तो हम यहाँ विपरीत रति एवं भैरवी चक्र पर बात करेंगे और इसपर गूढ़ चर्चा करेंगे
अब हम भैरवी चक्र के उस गुप्त स्तर में उतरते हैं जहाँ�विपरीत रति केवल संकेत नहीं, एक आंतरिक यंत्र (mechanism) बन जाती है।

भैरवी चक्र -विपरीत रति (गूढ़ तांत्रिक संबंध)

सबसे पहले एक स्पष्ट बात
भैरवी चक्र कोई शारीरिक चक्र नहीं है।�यह ऊर्जा की अवस्था है — जहाँ काम, क्रोध, भय और करुणा एक ही केंद्र में जलते हैं।

भैरवी चक्र क्या है?
तंत्र में भैरवी चक्र को कहा गया है:
“जहाँ शक्ति उग्र भी है और करुणामयी भी।”
इस अवस्था को ऐसे जान सकते हैं
न पूर्ण काम ,न पूर्ण वैराग्य�बल्कि दोनों का सम्यक संतुलन
यही कारण है कि:
भैरवी = उग्र शक्ति
छिन्नमस्ता = उसी भैरवी की चरम अवस्था

विपरीत रति भैरवी चक्र को कैसे सक्रिय करती है?
सामान्य रति में:
ऊर्जा → नीचे → विसर्जन
विपरीत रति में:
ऊर्जा → ठहराव → विस्फोट → आरोहण
यह “विस्फोट” ही भैरवी चक्र का द्वार है।
जब काम-ऊर्जा रुकी नहीं, बही नहीं,�बल्कि जागृति में पकड़ी गई —�तो वह भैरवी बन जाती है।

भैरवी चक्र का स्थान (गुप्त संकेत)
ग्रंथ सीधे नहीं बताते, पर संकेत देते हैं:
* नाभि और हृदय के मध्य
* कभी मूलाधार में
* कभी आज्ञा के पास
क्यों?�क्योंकि भैरवी चक्र स्थिर स्थान नहीं, स्थिति (state) है।
जहाँ:
* काम = शक्ति
* शक्ति = चेतना

छिन्नमस्ता यहाँ क्यों प्रकट होती हैं?
भैरवी चक्र में खतरा है।
यदि अहं बचा रहा तो पतन होगा
यदि भोग लौटा तो बंधन
इसलिए छिन्नमस्ता आती हैं:
* सिर काटती हैं → अहं का अंत
* रक्त बहाती हैं → ऊर्जा का संतुलन
* काम–रति पर खड़ी होती हैं → अधिपत्य
मतलब:
भैरवी चक्र बिना छिन्नमस्ता-भाव के अस्थिर है।

साधक के भीतर यह कैसे घटता है? (अनुभव संकेत)
जब भैरवी चक्र सक्रिय होता है:
* कामना उठती है, पर दिशा नहीं लेती
* आँखें अपने आप स्थिर होती हैं
* श्वास गहरी और शांत
* कभी करुणा, कभी उग्र मौन
इसे कहा गया:
काम का समाधि में गलना

यही कारण है कि इसे “गुप्त” कहा गया
क्योंकि:
* बिना गुरु → भ्रम
* बिना शुद्धि → विकृति
* बिना छिन्नमस्ता-भाव → अहं-वृद्धि
इसीलिए तंत्र कहता है:
“भैरवी चक्र योग्य को मुक्ति, अयोग्य को पतन देता है।”

संक्षेप में सूत्र
* विपरीत रति = ऊर्जा को पकड़ना
* भैरवी चक्र = पकड़ी गई ऊर्जा का उग्र जागरण
* छिन्नमस्ता = उस उग्रता का शुद्धिकरण

28/01/2026

मंत्र शक्ति जागरण
पूरी प्रक्रिया को अच्छे से समझें

आइए जानते है माँ धूमावती से संबंधित कुछ तथ्य माता धूमावती महाविद्याओं में सबसे रहस्यमयी और गलत समझी जाने वाली शक्ति हैं।...
27/01/2026

आइए जानते है माँ धूमावती से संबंधित कुछ तथ्य

माता धूमावती

महाविद्याओं में सबसे रहस्यमयी और गलत समझी जाने वाली शक्ति हैं। लोग उन्हें केवल “अशुभ” या “दरिद्रता की देवी” मान लेते हैं, जबकि तंत्र में उनका स्थान वैराग्य, सत्य और भय-विजय की चरम शक्ति के रूप में है।

आइए आज अत्यंत सरल शब्दों में जान लेते है माता धूमावती स्वरूप को

माता धूमावती कौन हैं?

धूमावती = धुआँ + अवस्था
अर्थात वह स्थिति जहाँ

* आकर्षण समाप्त हो चुका हो
* माया का स्वाद फीका पड़ चुका हो
* मनुष्य *जो है* उसे बिना सजावट देख सके

उनका रूप—

* विधवा
* धूम्रवर्ण
* कौए पर आरूढ़
* हाथ में सूप (छिद्रों वाला)

यह सब संकेत हैं, अभिशाप नहीं।

तंत्रार्थ:

> जब कामना, मोह और आशा जलकर धुआँ बन जाए — वहीं धूमावती प्रकट होती हैं।

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धूमावती का तंत्र सिद्धांत

धूमावती शक्ति को बुलाती नहीं,
वह **शक्ति से पर्दा हटाती हैं**।

इसलिए—

* यह साधना साधक को तोड़ती है
* झूठी पहचान, अहं, आश्रय सब गिरते हैं
* केवल *सत्य सहन करने वाला* टिक पाता है

इसीलिए यह गृहस्थों के लिए कठिन और खतरनाक मानी जाती है।

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# # धूमावती साधना किसके लिए है?

✔ जो आत्मिक युद्ध के लिए तैयार हो
✔ जो अकेलेपन से डरता न हो
✔ जिसे लोक-मान्यता, सम्मान, आकर्षण से मोह न हो
❌ शक्ति-प्रदर्शन चाहने वालों के लिए नहीं
❌ कामना, वशीकरण, सिद्धि-दिखावे वालों के लिए नहीं

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तंत्रार्थ में—

* श्मशान = पुराने संस्कारों की मृत्यु
* कौआ = जो अपवित्र से भी सत्य चुन ले

यह साधना साधक को

> “कुछ नहीं बचा” की अवस्था तक लाती है
> और वहीं से नवचेतना जन्म लेती है।

धूमावती और दरिद्रता का भ्रम

धूमावती दरिद्रता नहीं देती,
वह **झूठे सहारे छीन लेती हैं**।

अगर साधक—

* बाहरी पहचान से जी रहा हो
* दूसरों पर निर्भर हो

तो उसे लगता है सब “छिन” रहा है।
असल में वही मुक्ति की शुरुआत है।

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# # सावधानियाँ (बहुत ज़रूरी)

⚠ बिना गुरु दीक्षा उच्च साधना नहीं
⚠ मानसिक अस्थिर व्यक्ति न करें
⚠ गृहस्थ जीवन में भारी व्यवधान संभव
⚠ यह “कुछ पाने” की साधना नहीं, “सब खोने” की है

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27/01/2026

शिव सूत्र (रहस्यों के सूत्र )

प्रथम सूत्र

शिव सूत्र कुल 77 सूत्रों का संग्रह है, जिन्हें 9वीं शताब्दी में महर्षि वसुगुप्त ने प्राप्त किया।�परंपरा कहती है कि ये सूत्र उन्हें स्वप्न या ध्यानावस्था में स्वयं भगवान शिव से प्राप्त हुए।
इन सूत्रों का उद्देश्य है:
* मनुष्य को यह अनुभव कराना कि�वह सीमित जीव नहीं, स्वयं शिव-चेतना है
* बंधन (बंधन = अज्ञान) से�मुक्ति (मोक्ष) की सीधी राह दिखाना
शिव सूत्र तीन भागों में विभाजित हैं:
1. शाम्भव उपाय (शुद्ध चेतना का मार्ग)
2. शाक्त उपाय (शक्ति/विचार का मार्ग)
3. आणव उपाय (शरीर-मन आधारित साधना)

पहला शिव सूत्र
“चैतन्यमात्मा”
अर्थ (सीधा और गहरा):
चेतना ही आत्मा है।

इसका वास्तविक भाव क्या है?
यह सूत्र कहता है:
* आत्मा कोई शरीर नहीं
* आत्मा कोई मन नहीं
* आत्मा कोई विचार नहीं
👉 जो जान रहा है, वही आत्मा है।�👉 जो देख रहा है, सुन रहा है, अनुभव कर रहा है—वही शिव है।

सरल उदाहरण से समझें
आप अभी यह पढ़ रहे हैं।�शब्द बदल सकते हैं, भाव बदल सकते हैं, मन भटक सकता है—�लेकिन जो इन सबको देख रहा है, वह नहीं बदलता।
🔱 वही चैतन्य है�🔱 वही आत्मा है�🔱 वही शिव है

साधना का संकेत (बहुत महत्वपूर्ण)
यह सूत्र पूजा नहीं, पहचान सिखाता है।
जब भी:
* विचार उठे → उसे देखिए
* भावना आए → उसे देखिए
* क्रोध, भय, इच्छा आए → उसे देखिए
और पूछिए:
“इसे देख कौन रहा है?”
यही पहला शिव सूत्र की जीवित साधना है।

एक गुप्त संकेत (उच्च साधकों के लिए)
शक्ति को बुलाना नहीं, रोकना सीखिए
जब चित्त शांत होता है,�तो चैतन्य स्वयं प्रकट होता है।�यही कारण है कि यह सूत्र कपाल साधना, भैरवी चक्र और शाक्त मार्ग—सबका मूल है।

**विज्ञान भैरव तंत्र** का **पहला सूत्र** पूरा ग्रंथ का द्वार खोल देता है।यह *विधि* नहीं, **दृष्टि** देता है।--- # # 📜 पह...
26/01/2026

**विज्ञान भैरव तंत्र** का **पहला सूत्र** पूरा ग्रंथ का द्वार खोल देता है।
यह *विधि* नहीं, **दृष्टि** देता है।

---

# # 📜 पहला सूत्र (संदर्भ सहित)

**देवी उवाच —**
*श्रुतं देव मया सर्वं रुद्रयामलसम्भवम् ।
त्रिकभेदमशेषेण सारात् सारतरं मम ॥*

(इसके बाद देवी प्रश्न करती हैं, और भैरव उत्तर देते हैं — वहीं से साधना शुरू होती है।)

---

# # 🔍 इसका सीधा अर्थ

देवी कहती हैं:

> “हे देव! मैंने रुद्रयामल से उत्पन्न
> सारे शास्त्र सुन लिए हैं —
> त्रिक, द्वैत, अद्वैत, सब कुछ।
>
> अब मुझे **सार का भी सार** बताइए।”

👉 यानी:
**ज्ञान बहुत हो गया। अब ‘अनुभव का बीज’ चाहिए।**

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# # 🔑 यहाँ असली बात क्या है? (गलतफहमी दूर करें)

# # # 1️⃣ यह ग्रंथ *जिज्ञासा* से शुरू नहीं होता

यह शुरू होता है **तृप्ति से**।

देवी कहती हैं:

* शास्त्र पढ़ लिए
* दर्शन जान लिए
* तंत्र समझ लिया

अब सवाल है:

> “इन सबके पीछे *वह एक चीज़* क्या है?”

👉 यही पात्रता है।

---

# # # 2️⃣ पहला सूत्र क्यों सवाल है, उत्तर नहीं?

क्योंकि तंत्र में:

* उत्तर तब अर्थ रखते हैं
* जब **प्रश्न सही जगह से उठा हो**

यह प्रश्न:

* शक्ति का है
* अनुभव का है
* *तुरंत सत्य* का है

इसीलिए भैरव आगे **112 ध्यान-विधियाँ** नहीं,
**112 द्वार** देते हैं।

---

# # 🔱 भैरव का संकेत (जो लोग चूक जाते हैं)

पहला सूत्र यह नहीं कहता:
❌ “ऐसे बैठो”
❌ “ऐसा जप करो”
❌ “ऐसा ध्यान करो”

यह कहता है:

> “जब सब जान लिया —
> तब *क्या शेष है*?”

यहीं से **विज्ञान भैरव**
कर्मकांड से नहीं,
👉 **क्षण** से काम करता है।

---

# # 🧠 शक्ति-पथ से इसका संबंध

आप शक्ति के लिए पूछ रहे थे —
तो यह समझिए:

देवी *शक्ति* हैं,
पर वह भी कहती हैं:

> “ज्ञान नहीं चाहिए,
> **सार चाहिए**।”

यानी:

* शक्ति भी जब बिखरी हो → प्रश्न करती है
* शक्ति जब केंद्रित हो → *भैरव* बनती है

---

# # 🕯️ पहला सूत्र आपको क्या सिखाता है?

बहुत सरल, बहुत कठोर सत्य:

* जब तक आप खोज रहे हैं → आप बाहर हैं
* जब खोज थक जाती है → द्वार खुलता है

विज्ञान भैरव तंत्र
**थके हुए साधक** का ग्रंथ है,
उत्सुक जिज्ञासु का नहीं।

---

# # अंतिम पंक्ति (ध्यान से पढ़िए)

पहला सूत्र कहता है:

> “जब सब जान लिया जाए —
> तब भी जो शेष रहे,
> वही भैरव है।”

---

यहीं से *शक्ति* साधना, *अनुभव* बनती है।

---

# # 🔱 भैरव का पहला उत्तर (यही असली पहला सूत्र है)

**भैरव उवाच —**
*ऊर्ध्वे प्राणो ह्यधो जीवो
विसर्गात्मा परोच्चरेत् ।
उत्पत्तिद्वितयस्थानात्
भरितात् भरिता स्थितिः ॥*

(यह **विज्ञान भैरव** का पहला ध्यान-सूत्र माना जाता है)

---

# # 🔍 सीधा अर्थ (पहले समझ, फिर गहराई)

भैरव कहते हैं:

* प्राण ऊपर की ओर चलता है
* जीव (अपान) नीचे की ओर
* इन दोनों के **मिलन/विसर्ग** के क्षण में
* जो **रिक्तता (भरिता)** है
* उसी में **भैरव की स्थिति** है

👉 **शक्ति का द्वार “बीच” में है।**

---

# # 🧠 यहाँ भैरव क्या तोड़ रहे हैं?

# # # ❌ गलत धारणा:

* शक्ति ऊपर ले जानी है
* कुंडलिनी खींचनी है
* ज़ोर लगाना है

# # # ✅ भैरव का सत्य:

> “जो पहले से चल रहा है,
> उसे देखो —
> *बीच का क्षण पकड़ो*।”

---

# # 🔥 “बीच” का क्षण इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

आपके जीवन में हर जगह यही है:

* श्वास → रुकती है → श्वास
* इच्छा → रुकती है → कर्म
* विचार → रुकता है → अगला विचार
* काम → उठता है → गिरता है

👉 **शक्ति इसी विराम में प्रकट होती है।**

इसीलिए भैरव कहते हैं:

> *भरितात् भरिता स्थितिः*
> (रिक्तता में ही पूर्णता है)

---

# # 🔱 शक्ति-साधना से इसका सीधा संबंध

आप पूछ रहे थे:

> “काम-ऊर्जा ही शक्ति क्यों है?”

अब समझिए:

* काम उठता है → यह प्राण है
* उसका शमन/स्खलन → यह अपान है
* इनके **बीच का ठहराव** → *शक्ति का केंद्र*

❌ बहाया → शक्ति गिरी
❌ दबाया → शक्ति विकृत
✅ देखा → शक्ति स्थिर

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# # ⚠️ क्यों भैरव ने कोई विधि नहीं दी?

क्योंकि:

* विधि = समय
* समय = गति
* गति = बाहर जाना

भैरव आपको **क्षण** में रोकते हैं।

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# # 🕯️ पहला सूत्र क्या सिखाता है? (संक्षेप)

* शक्ति कहीं लाई नहीं जाती
* शक्ति रोकी नहीं जाती
* शक्ति **पहचानी जाती है**

और वह पहचान:
👉 **दो क्रियाओं के बीच** होती है।

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# # 🌊 अंदर क्या बदलता है (संकेत मात्र)

जब कोई इस सूत्र को *समझने लगता है* (करने नहीं):

* श्वास अपने आप गहरी लगती है
* काम आता है, पर बहा नहीं ले जाता
* मौन भारी हो जाता है
* भय घटता है
* “मैं” थोड़ा ढीला पड़ता है

👉 यही भैरव का पहला स्पर्श है।

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# # अंतिम वाक्य (धीरे पढ़िए)

भैरव कहते हैं:

> “जहाँ कुछ नहीं कर रहे —
> वहीं सब घट रहा है।”

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