08/08/2026
शक्ति उपासना एवं आचार
शाक्त साधना तीन प्रकार के आचारों से की जाती है १. दक्षिणाचार, २. वामाचार एवं ३. कुलाचार। दक्षिणाचार में समस्त वैष्णवाचार सम्मिलित है। इसमें प्रात: स्नान, दिन में पूजन, हविष्यान का भोजन, पूजन में ऊन का आसन, रुद्राक्ष माला तथा तुलसीमाला का प्रयोग, श्रौत-स्मार्त नियमों का पालन करते हुए साधना करना, पत्थर या मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करना, ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना, अपनी ही स्त्री से सम्भोग करना तथा मद्य से पूजन न करना।
बामाचार में स्नान-शौचादि का कोई बन्धन नहीं है। साधक सदा सभी समय में जप-ध्यानादि कर सकता है। रात्रिपूजन विशेष रूप से किया जाता है। वर्णाश्रम धर्म के पालन की कोई आवश्यकता नहीं है। नृदन्त की माला तथा नरमुण्ड के पात्र प्रशस्त हैं। धर्मादि (मृगचर्मादि) के आसन, स्त्रीकेश के कंकण तथा मदा का सेवन विहित है। मद्य-मांसादि से ही देवता का पूजन किया जाता है। साधनाकाल में अपनी स्त्री या दूसरे की ही में यह भेद नहीं किया जाता।
कुलाचार को राजयोग भी कहा जाता है। इसके पश्च मकार अन्तर्याग से सम्बन्धित हैं। इनका क्रमपूर्वक विवेचन यथास्थान किया जायेगा।
उपरोक्त तीनों आचारों को भावत्रय भी कहते हैं। दक्षिणाचार पशुभाव से सम्बन्धित है, वामाचार वीरभाव से तथा कुलाचार दिव्यभाव से सम्बन्धित है।
कालीविलासतन्त्र का कहना है
शृणु भावनयं देवि ! दिव्यवीरपशुक्रमात् ।
दिव्यश्च देववत् प्रायो वीरचोद्धतमानसः ।।
पशुभावः सदा देवि। शुद्धश्च शुचिवत् सदा ।
अर्थात् हे देवि । भावत्रय का श्रवण करो। दिव्य, बीर एवं पशु यह क्रमपूर्वक है। दिव्यभाव देववत् है, वीरभाव औद्धत्य है और पशुभाव सदा शुद्ध तथा पवित्रवत् है।
'कालीविलासतन्त्र' पशुभाव को सर्वश्रेष्ठ तथा बीरभाव को सबसे निकृष्ट मानता है; जबकि अन्य तन्त्र पशुभाव को ही निकृष्ट मानते हैं; जैसा कि 'भावचूड़ामणि' में कहा भी गया है-
भावस्तु त्रिविधो देव। दिव्यबीरपशुक्रमात् । आद्यभावो महादेव । श्रेयान् सर्वसमृद्धिदः ।।
द्वितीयो मध्यमशैव तृतीयस्सर्वनिन्दितः ।।
श्रीदेवी ने कहा- हे देव। भाव तीन प्रकार के होते हैं १. दिव्य, २. वीर तथा ३. पशु। हे महादेव! दिव्यभाव सभी प्रकार की समृद्धि प्रदान करने वाला है, वीरभाव मध्यम है तथा पशुभाव सभी प्रकार से निन्दित है।
यहाँ पर यह भी उल्लेखनीय है कि जिस तन्त्रग्रन्ध ने जिस भाव को प्रधानता दी है उसे ही श्रेष्ठ कहा है, किन्तु अधिकांश ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि पशुभाव ही सबसे निन्दित है।
अब इन सभी भावों का क्रमपूर्वक पृथक् पृथक् विवेचन किया जायेगा।