15/09/2026
🕉🙏ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏🕉
श्रीमद् भगवद्गीता 🕉 🕉दशमोऽध्याय: 🕉
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ 15॥🙏🙏🕉️
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतय: ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ 16॥🙏🙏🕉️
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ 17॥🙏🙏🕉️
अन्वय: :-
स्वयम् एव आत्मना आत्मानम् वेत्थ त्वम् पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ 15॥🙏🙏🕉️
वक्तुम् अर्हसि अशेषेण दिव्या: हि आत्म विभूतय: ।
याभि: विभूतिभि: लोकान् इमान् त्वम् व्याप्य तिष्ठसि ॥ 16॥🙏🙏🕉️
कथम् विद्याम् अहम् योगिन् त्वाम् सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्य: असि भगवन् मया ॥ 17॥🙏🙏🕉️
अर्थ: -
हे भूतों अर्थात् प्राणियों को उत्पन्न करने वाले! हे प्राणियों के ईश्वर! हे देवों के देव! हे जगत के स्वामी! हे पुरूषोत्तम! आप स्वयम् अपने से अपने को जानते हैं।। 15।।🙏🙏🕉️
इसलिए हे परम प्रभु! आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियों को सम्पूर्णता से कहने में समर्थ हैं, जिन विभूतियों के द्वारा आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं।। 16।। 🙏🙏🕉️
हे योगेश्वर ! मैं किस प्रकार निरन्तर, अनवरत, सर्वदा चिन्तन मनन करता हुआ आप को जानूँ पहचानूँ और हे भगवन्! आप किन - किन भावों में मेरे द्वारा चिन्तन मनन करने योग्य हैं?।। 17।।🙏🙏🕉️
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आध्यात्मिक प्रवक्ता श्री शैलेश कृष्ण जी महाराज