07/12/2025
ध्यान रखना हिंदुओ—समय हाथ से फिसल रहा है। हमारे पास मात्र दस वर्ष बचे हैं। जो करना है, अभी करना होगा। जिसे बोलकर योगदान देना आता है, वह बेझिझक बोले। जिसे लिखना आता है, वह निर्भीक होकर सनातन के लिए लिखे। क्योंकि यह आख़िरी दस वर्ष हैं—और उसके बाद सनातनियों के पास कोई अवसर नहीं बचेगा। आज जो सच कहा जा रहा है, आने वाले समय में वही सच बोलना अपराध बना दिया जाएगा। ये अंतिम मौका है… सोचो, समझो, जागो।
1930 में, जहाँ आज पाकिस्तान का पंजाब, मुल्तान, सिंध और बलूचिस्तान है—वहाँ कुछ राष्ट्रवादी लोग जाकर हिंदुओं से कहते थे: “तुम्हारे पास दस–पन्द्रह साल हैं, संभल जाओ, एकजुट हो जाओ।” लेकिन उस समय के हिंदुओं ने उनकी बात पर हँसी उड़ाई—उन्हें पागल कहा, अतिशयोक्ति कहा। और 1947 में वही घटा जिसकी चेतावनी उन्हें पहले ही दे दी गई थी। क्योंकि वे न संगठित हुए, न एकजुट हुए, न एक ध्वज के नीचे आए। इसलिए 1947 में सबसे ज़्यादा वही लोग काटे गए जो जीवन भर “हम सब भाई-भाई हैं, हिंदू–मुस्लिम–सिख–ईसाई” का झूठा राग अलापते रहे।
कश्मीर में भी यही इतिहास दोहराया गया। 1980 में बहुत से लोग चेताते थे—“इस झूठे भाईचारे के जाल में मत फँसो। जिन्हें तुम भाई समझते हो, वही तुम्हें चारा बनाकर निगल जाएंगे।” लेकिन कश्मीरी हिंदुओं ने भी यह सच नहीं माना। महाराजा रणवीर सिंह हिंदुओं की घर-वापसी कराना चाहते थे, उन दलित हिंदुओं को वापस सनातन में लाना चाहते थे जिन्हें जबरन मुसलमान बनाया गया था। लेकिन कुछ ब्राह्मणों ने विरोध करते हुए कहा—“अगर उन्हें वापस लाया, तो हम झेलम नदी में कूदकर जान दे देंगे।” और विडम्बना देखिए—मरने की धमकी देने वाले नहीं मरे, लेकिन बाद में उन्हीं को काट-काटकर भगा दिया गया।
1980 में चेतावनी दी गई, लेकिन किसी ने सुना नहीं। चेताने वालों पर हँसी उड़ाई गई। और 19 जनवरी 1990 की रात, सात लाख कश्मीरी हिंदुओं को काटकर, डराकर, बलपूर्वक भगा दिया गया। इतिहास में वही दोहराया गया—सच बोलने वालों को मूर्ख कहा गया, और न मानने वालों ने अपनी जमीन, अपने घर, अपनी पीढ़ियाँ खो दीं।
आज स्थितियाँ फिर वहीं पहुँच रही हैं,जो लोग तर्क, प्रमाण और युक्ति के साथ हिंदुओं को जगाने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें आज के सेक्युलर, वामपंथी, और बिके हुए बुद्धिजीवी “हेट स्पीच”, “भाईचारा”, समावेशिता का लेप लगाकर चुप कराने में जुटे है...
राधे - राधे 🙏🙏🙏🚩🚩🚩