Indrajeet

Indrajeet Its a page or a collection of poetry based on day today decisions. Must ready all the poetry for foc

25/05/2026

--- ::: नकाब और घूंघट ::: ---

नकाब छोड़ , घूंघट हटा ,
तालीम को सुदृढ बना ,
पुरुष प्रधान को हटाकर ,
मानवता प्रधान बना ।

मुख देता है परिचय ,
योग्यता देती पहचान ,
यौवना घूंघट हटाकर ,
स्वयं को दे रही सम्मान ।

वीरांगनाए छा रही ,
जल , थल और गगन पर ,
तब क्यो मुख छिपाए ,
अपने देश की अस्मिता पर ।

नादानियां है धर्मो की ,
कुरीतियों मे बंधा समाज ,
फरफरा रही चिड़िया पिंजरे मे ,
अब किस सदी की आस ।

' रजिया ' बनी सुल्ताना ,
' मनु ' बनी झांसी की रानी ,
समय कह रहा ' हे नारी ' ,
अब तुम्हारी है बारी ।।।।

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25/05/2026

--- ::: एक चाय की कीमत ::: ---

एक घर , उसमे बनवाया रसोई घर ,
एक चूल्हा ,उसमे लगवाया गैस सिलेंडर ,

घर , रसोई और रसोई का सामान ,
लगाओ ? चाय की कीमत का अनुमान ,

चूल्हे को सुलगाकर , उसपर चाय चढ़ाई ,
कुछ कप ,प्लेट और छन्नी भी ले आई ,

दूध , पानी , चाय , चीनी और अदरक ,
बिस्कुट , नमकीन , पकौड़ी , और रस्क ,

गरमागरम चाय , समा गई केतली मे ,
सबके मन को भाय , चाय हर मौसम मे ,

एक चाय की कीमत , तुम क्या जानो साहब ,
तन मन की थकान को करती है गायब ।।

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25/05/2026

--- ::: माँ का आंचल ::: ---

मुख चमकता था ,
जब आंचल से पोंछ देती ,
पेट भरता था ,
जब आंचल मे छिपा लेती ,
शिशु की " माँ " ,
आंचल ही कहलाती .....

आंसुओ की माला ,
जब आंचल से सुखाती ,
लुका छिपी का खेल ,
जब आंचल से ढक लेती ,
बालक की " माँ " ,
आंचल ही कहलाती .....

धूप नही सताती ,
जब आंचल की छांव मिलती ,
ठंडी हवा के झोके ,
जब आंचल से सहलाती ,
हर बचपन की " माँ " ,
आंचल ही कहलाती .....

आंचल ले लो " माँ " ,
ईश्वर भी बालक बन जायेगे ,
माँ का आंचल ,
ऐसा स्वर्ग कहाँ से पायेगे ,
त्रिदेव भी धरा पर ,
माँ अनुसुइया के लाल कहलायेगे ।

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25/05/2026

-- :: हिंसा और अहिंसा :: --

हिंसा और अहिंसा का मतभेद बहुत पुराना है
धर्म और अधर्म से नाता उसका पुराना है ।

'अहिंसा' नही है कायर , क्यों मौन रहें ,
वाद विवाद की चुनौती मे भी सक्रिय रहे ।

नही बनती जब बात , बात करने से ,
बन जाती है बात , विवाद करने से ।

तर्क वितर्क की कसौटी पर टिका है न्याय ,
सत्य से हमेशा मुख छिपाता है अन्याय ।

अन्याय जब उठा ले अपने हाथों में हथियार ,
तो हिंसा का प्रतोउत्तर , हिंसा ही देती हरबार ।

असत्य पर सत्य की जीत निश्चय है ,
हिंसा से या अहिंसा से , धर्म की विजय है ।

धर्म है मानव के विकारो को छांटते रहना ,
न शोषित होना , न किसी का शोषण करना ।

अहिंसा पाप और पापी को पृथक करता है ,
हिंसा पाप और पापी को संग मार देता है ।

बुद्धि और युक्ति , हिंसा को प्रताड़ित करती है
निस्वार्थ भावना हिंसा को , अहिंसा की शरण में
लाती है ।

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25/05/2026
25/05/2026

--- ::: लोकतंत्र का महासंग्राम ::: ---

लोकतंत्र का महासंग्राम ,
संग्राम बनकर रह गया ,
कोई वाक्पटुता में आगे निकला,
कोई अवाक् बनकर रह गया ।

किसी को मिला सेवा का हक ,
कोई सेवा से निवृत्त रह गया ,
प्रतिशत के संग्राम में ,
जन गण कही खो गया ।

जाती - धर्म का प्रतिनिधि ,
राजनीतिक दल में बदल गया ,
जन - जाति की समस्या ,
घोषणा पत्र में बदल गया ।

लोकतंत्र की पृष्ठ भूमि में ,
संविधान शास्त्र बनकर रह गया ,
न्याय का पलड़ा डगमग है ,
चुनाव आयोग दोषी बनकर रह गया ।

लोकतंत्र का महासंग्राम ,
संग्राम बनकर रह गया ............।

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25/05/2026

-:: दर्शन :: -

दर्शन की चाह थी ,
सुबह मंदिर का रूख लिया ।
घर से निकला तो ,
भंगी तन बचाकर निकल गया ।

कुछ आगे बढ़ा तो दुर्घटना,
देख मेरा पैर फिसल गया ।
उसकी टूटी साईकिल घायल तन,
मुझे सहारा देने लगा ।

बस में खड़ा देख ,
एक बूढ़ा व्यक्ति उठ गया ।
मुझे जगह दे कर ,
खुद खड़ा रह गया ।

धन्यवाद भी कह न सका,
वह बस से उतर गया ।
भंडारा का भोज था ,
पल भर को रुक गया ।

सोच न पाया था तभी ,
एक कन्या ने प्रसाद दे दिया ।
पेट मे भूख थी इसलिए,
मस्तक लगाकर ग्रहण किया ।

दर्शन को अभिलाषित ,
मंदिर की सिढी चढ़ गया ।
भीड़ को हटते देख ,
मैं सबकुछ समझ गया ।

विलम्ब हुआ है मुझको ,
दर्शन का समय खत्म हो गया ।
चार रूपों में देखा तुझको ,
भंगी, सहायक , बूढ़ा और कन्या ।
तृप्त हुआ मैं दर्शन पाकर ,
हर रूप में तूने दर्शन दिया ।

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25/05/2026

---::: राम राज में अच्छे दिन ::: ---

राम राज में 'श्री राम ' को सुख नाही ,
और माँ सीता को वियोग का दुख ,
राम राज में देवों को सुख नाही ,
और दानव को मिट जाने का दुख ।

राम राज में दानव कैसे करें काम,
देवों के पास आवश्यकता से अधिक काम,
मानव करें देव दानव का मिलाप ,
कैसे होंगे भगवान राम के अधूरे काम ।

प्रयास रत हैं नर के नारायण ,
कैसे दूर करें मनुष्य की परतंत्रता ,
सीता पर लगाए अनावश्यक लांछन ,
यही है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ?

मनुष्य की प्रवृत्ति मनुष्य ही जाने ,
जिस डाल पर बैठे, उसे ही काटें ,
स्वार्थ की पाती, हर शास्त्र पर भारी,
धर्म की गणना मनुष्य जाति को बांटे

नही चाहिए अब किसी को रामराज ,
राम की श्रद्धा को कुण्डी लगाकर रखना ,
तन का सुख मन पर हावी ,
मन को परतन्त्र बनाकर रखना ।

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25/05/2026

--- ::: चौराहा और बुत ::: ---

यूं तो इस धरती पर बहुत से ,
महान लोगों ने जन्म लिया ,
कुछ इतिहास में अंकित है ,
कुछ इतिहास ने भूला दिया ।

श्रद्धा बांधी थी जिनके साथ ,
उनका बुत चौराहे पर लगा दिया ,
जन्म तिथि पर माला पहनाकर ,
उनसे किनारा कर लिया ।

दिशा से न भटके कोई ,
उन्हें मील का पत्थर बना दिया ,
उनके आदर्श और शिक्षा को ,
पुस्तकों में दफना दिया ।

जिन्दगी ने कुछ न दिया ,
मरणोपरांत पुरस्कार का बिल्ला लटका दिया ,
जो बुत के खिलाफ थे ,
उनका भी बुत बना दिया ।

बुत ने मानव को वर्ग में बांट दिया ,
आदर्शवादी को निम्नवादी बना दिया ,
मानवता को बनाने की कोशिश में ,
मानवता को ही विभाजित कर दिया ।

चौराहे और बुत का पुराना नाता है ,
जिसे कला का नमूना बना दिया ,
उस कलाकार को नमन है ,
जिसने बुत को दीर्घ आयु बना दिया ।

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25/05/2026

---- :::: कुरुक्षेत्र :::: ----

छल ने छल से छल को छल लिया,
छला न एक भी छल ,
छला छली के इस दौड़ में,
कुरुक्षेत्र कहे मुझसे आकर मिल ।

आदरणीय शब्द बहुत बड़ा है ,
अधर्म का कवच पहन खड़ा है,
दुर्बुद्धि का बवंडर आगे बढ़ा है,
वचनों का गिर ढाल बनकर खड़ा है ।

मर्यादा की सीमा पार हुई है ,
शब्द के बाण हृदय को चीर गए ,
कृतज्ञता, धृष्टता, और मलिनता ,
विरता की परिभाषा भूल गए हैं ।

श्वेत चादर सिंदूर पर भारी है ,
आखेट नही युद्ध की तैयारी है,
रक्त का अभिषेक कर रही सेना ,
अपनों का शव उठाने की बारी है ।

पीले पत्तों की छांव में ,
हरे पत्ते भी झर रहे है ,
पिता के शव से पहले ,
पुत्र के शव मिल रहे है ।

छिन्न-भिन्न वस्त्रों को छोड़कर ,
चलीं आत्मा नव गर्भ की खोज में,
मिट्टी और राख का मिलन ,
कुरुक्षेत्र देख रहा अश्रु की ओट में ।

मिथ्या नही है जीवन मरण ,
समय की अधूरी गाथा है ,
अतीत की पाती पढ़कर समझे ,
वर्तमान भविष्य का अटूट नाता है ।

गीता दे रही दस्तक हर युग में ,
दुर्बुद्धि अडिग बनकर खड़ा है ,
माताएं विजय का आशीर्वाद कैसे दे,
आंचल का आंचल पर कर्ज बड़ा है ।

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Gola Dinanath
Varanasi
221001

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