Indrajeet

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-::  स्त्री   की   अभिलाषा :: - चाह   नहीं   मैं   सुरबाला   बन ,किसी   का   पथ   भटकाऊ   ।           चाह   नहीं   प्रेम...
17/08/2026

-:: स्त्री की अभिलाषा :: -

चाह नहीं मैं सुरबाला बन ,
किसी का पथ भटकाऊ ।
चाह नहीं प्रेमिका बन ,
' मीरा बाई ' कहलाऊ ।
चाह नहीं मृत पति के साथ,
जल कर 'सती ' कहलाऊ ।
चाह नहीं देवदासी बन,
किसी की रखैल कहलाऊ ।
मुझे ब्याह कर ले जाना,
ए मानव के राज हंस ।
जिसे ' वीर ' बना सकू ,
वो हो मेरा ' अंश ' ।
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22/06/2026
---   :::   प्रथम  श्लोक  :::   ---प्रातः काल की बेला , तमसा नदी का तीर ,वाल्मिकी करें स्नान , बहता अविरल नीर ।क्रौंच पक...
17/06/2026

--- ::: प्रथम श्लोक ::: ---

प्रातः काल की बेला , तमसा नदी का तीर ,
वाल्मिकी करें स्नान , बहता अविरल नीर ।

क्रौंच पक्षी का युग्म , करे प्रेम रस पान ,
प्रणय क्रीड़ा मे मग्न ,दूर अनिष्ट से अंजान ।

प्रेम मे डूबा नर , मारा निषाद ने बाण ,
विलाप रही मादा , छोड़ गई अपने प्राण ।

देख पूरा प्रसंग , वाल्मिकी करें शोक ,
श्राप दे गए ऋषि , कहत अन्वय श्लोक ।

शुद्ध लय मे काव्य , श्राप बन गया श्लोक ,
सहसा बना वाक्य , ब्रह्मा आए इहलोक ।

महाकाव्य की रचना , वाल्मिकी का चुनाव ,
ब्रह्मा जी ने दिया , रामायण का सुझाव ।

' सीता राम ' चरित्र , महाकाव्य ' रामायण ' ,
धर्म की रक्षा हेतु , अवतरित हुए ' नारायण '।

सप्त काण्ड सुमिरन , अयोध्या पावन धाम ,
प्रेम , वचन , मर्यादा , पुरुषोत्तम " श्री राम "।

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25/05/2026

--- ::: नकाब और घूंघट ::: ---

नकाब छोड़ , घूंघट हटा ,
तालीम को सुदृढ बना ,
पुरुष प्रधान को हटाकर ,
मानवता प्रधान बना ।

मुख देता है परिचय ,
योग्यता देती पहचान ,
यौवना घूंघट हटाकर ,
स्वयं को दे रही सम्मान ।

वीरांगनाए छा रही ,
जल , थल और गगन पर ,
तब क्यो मुख छिपाए ,
अपने देश की अस्मिता पर ।

नादानियां है धर्मो की ,
कुरीतियों मे बंधा समाज ,
फरफरा रही चिड़िया पिंजरे मे ,
अब किस सदी की आस ।

' रजिया ' बनी सुल्ताना ,
' मनु ' बनी झांसी की रानी ,
समय कह रहा ' हे नारी ' ,
अब तुम्हारी है बारी ।।।।

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25/05/2026

--- ::: एक चाय की कीमत ::: ---

एक घर , उसमे बनवाया रसोई घर ,
एक चूल्हा ,उसमे लगवाया गैस सिलेंडर ,

घर , रसोई और रसोई का सामान ,
लगाओ ? चाय की कीमत का अनुमान ,

चूल्हे को सुलगाकर , उसपर चाय चढ़ाई ,
कुछ कप ,प्लेट और छन्नी भी ले आई ,

दूध , पानी , चाय , चीनी और अदरक ,
बिस्कुट , नमकीन , पकौड़ी , और रस्क ,

गरमागरम चाय , समा गई केतली मे ,
सबके मन को भाय , चाय हर मौसम मे ,

एक चाय की कीमत , तुम क्या जानो साहब ,
तन मन की थकान को करती है गायब ।।

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25/05/2026

--- ::: माँ का आंचल ::: ---

मुख चमकता था ,
जब आंचल से पोंछ देती ,
पेट भरता था ,
जब आंचल मे छिपा लेती ,
शिशु की " माँ " ,
आंचल ही कहलाती .....

आंसुओ की माला ,
जब आंचल से सुखाती ,
लुका छिपी का खेल ,
जब आंचल से ढक लेती ,
बालक की " माँ " ,
आंचल ही कहलाती .....

धूप नही सताती ,
जब आंचल की छांव मिलती ,
ठंडी हवा के झोके ,
जब आंचल से सहलाती ,
हर बचपन की " माँ " ,
आंचल ही कहलाती .....

आंचल ले लो " माँ " ,
ईश्वर भी बालक बन जायेगे ,
माँ का आंचल ,
ऐसा स्वर्ग कहाँ से पायेगे ,
त्रिदेव भी धरा पर ,
माँ अनुसुइया के लाल कहलायेगे ।

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25/05/2026

-- :: हिंसा और अहिंसा :: --

हिंसा और अहिंसा का मतभेद बहुत पुराना है
धर्म और अधर्म से नाता उसका पुराना है ।

'अहिंसा' नही है कायर , क्यों मौन रहें ,
वाद विवाद की चुनौती मे भी सक्रिय रहे ।

नही बनती जब बात , बात करने से ,
बन जाती है बात , विवाद करने से ।

तर्क वितर्क की कसौटी पर टिका है न्याय ,
सत्य से हमेशा मुख छिपाता है अन्याय ।

अन्याय जब उठा ले अपने हाथों में हथियार ,
तो हिंसा का प्रतोउत्तर , हिंसा ही देती हरबार ।

असत्य पर सत्य की जीत निश्चय है ,
हिंसा से या अहिंसा से , धर्म की विजय है ।

धर्म है मानव के विकारो को छांटते रहना ,
न शोषित होना , न किसी का शोषण करना ।

अहिंसा पाप और पापी को पृथक करता है ,
हिंसा पाप और पापी को संग मार देता है ।

बुद्धि और युक्ति , हिंसा को प्रताड़ित करती है
निस्वार्थ भावना हिंसा को , अहिंसा की शरण में
लाती है ।

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25/05/2026

--- ::: लोकतंत्र का महासंग्राम ::: ---

लोकतंत्र का महासंग्राम ,
संग्राम बनकर रह गया ,
कोई वाक्पटुता में आगे निकला,
कोई अवाक् बनकर रह गया ।

किसी को मिला सेवा का हक ,
कोई सेवा से निवृत्त रह गया ,
प्रतिशत के संग्राम में ,
जन गण कही खो गया ।

जाती - धर्म का प्रतिनिधि ,
राजनीतिक दल में बदल गया ,
जन - जाति की समस्या ,
घोषणा पत्र में बदल गया ।

लोकतंत्र की पृष्ठ भूमि में ,
संविधान शास्त्र बनकर रह गया ,
न्याय का पलड़ा डगमग है ,
चुनाव आयोग दोषी बनकर रह गया ।

लोकतंत्र का महासंग्राम ,
संग्राम बनकर रह गया ............।

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