Sri RadheKrishna Gopal Ji

Sri RadheKrishna Gopal Ji श्री राधेकृष्ण कहते है कि अगर मैँ तेरे दिल मे नहीं तो कहीं भी नहीं?

29/08/2026

भाद्रपद मास प्रारम्भ
============

हिन्दू पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में "भाद्रपद मास की शुरुआत 29 अगस्त 2026, शनिवार" से हो रही है "जो 26 सितंबर 2026 (भाद्रपद पूर्णिमा) तक रहेगा।"

-: भाद्रपद मास का महत्व और नियम :-👉🏻
🚩
• धार्मिक महत्व: यह चतुर्मास का दूसरा महीना है। इस दौरान भगवान श्रीकृष्ण, गणेश जी और शिव जी की पूजा विशेष फलदायी होती है।

• प्रमुख त्योहार: इस माह में कजरी तीज, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, हल षष्ठी, गणेश चतुर्थी और हरतालिका तीज जैसे बड़े व्रत-त्योहार मनाए जाते हैं।

• मांगलिक कार्य: चातुर्मास का हिस्सा होने के कारण इस महीने में विवाह, मुंडन, जनेऊ और नए गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं। हालांकि दैनिक पूजा, नए व्यापार की शुरुआत और वाहन या संपत्ति की खरीदारी की जा सकती है।
🔱

-: भादों में क्यों बदल जाते हैं खान-पान और जीवनशैली के नियम? :-👇🏻

भाद्रपद माह में बारिश का मौसम अपने अंतिम चरण में होता है, जिससे वातावरण में नमी और बैक्टीरिया का प्रभाव अधिक रहता है. आयुर्वेद और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस माह में पाचन तंत्र धीमा हो जाता है, इसलिए कई कड़े नियम बनाए गए हैं:-
🚩
• दही और छाछ का त्याग: भादों के महीने में दही, छाछ या इनसे बनी चीजों का सेवन पूरी तरह वर्जित माना गया है.

• तामसिक भोजन से दूरी: लहसुन, प्याज, मांस और मदिरा का सेवन इस दौरान पाचन और स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह माना जाता है.

• गुड़ और हरी पत्तेदार सब्जियां: इस महीने में गुड़ का अधिक सेवन और कच्ची हरी सब्जियां खाने से भी परहेज करने की सलाह दी जाती है.

-: भाद्रपद कृष्ण पक्ष के प्रमुख व्रत और त्योहार :-👇🏻

भादों का शुरुआती पखवाड़ा बड़े धार्मिक पर्वों से भरा होता है, जो इसे आध्यात्मिक रूप से बेहद शुभ बनाते हैं:-

• कजरी तीज: सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए यह निर्जला व्रत रखती हैं.

• श्री कृष्ण जन्माष्टमी: भाद्रपद श्री कृष्ण अष्टमी को भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्री कृष्ण का जन्मोत्सव पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है.

• गोगा नवमी: जन्माष्टमी के अगले दिन लोकदेवता गोगा जी की पूजा की जाती है.

• अजा एकादशी: पापों के नाश और आर्थिक संकटों से मुक्ति के लिए इस दिन व्रत रखा जाता है.

भाद्रपद माह मांगलिक कार्यों के उत्सव से ज्यादा आंतरिक शुद्धि, संयम और ईश्वर भक्ति का समय है. नियमों का पालन करते हुए खान-पान में सादगी रखें और भगवान श्री कृष्ण की आराधना करें l
🌹जय श्री राधेकृष्णा 🙏

प्रेम से बोलें श्री राधे राधे...🚩
Rahul Kumar, Ratibhan Singh, Pankaj Yadav, Raju Kumar Mahato, Raja Babu, Rajesh Bahl, R.K. Singh Rathore, Ranjeet Singh, Ramswaroop Meghvanshi, Ritu Agarwal, Gb Baldaniya Ahir, TriSha Pal, Akash Chaurasiya, Aarti Sharma, Prem M. Suthar, Niketa Sen, Navin Kumar

24/08/2026

🔱॥ ऊँ नम: शिवाय ॥🔱
~~~~~~~~~~~~~~
॥ श्री शिव कथा ॥
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ऋग्‍वेद में जहॉ सूर्य, वरूण,वायु, अग्नि, इंद्र आदि प्रा‍कृतिक शक्तियों की उपासना है वहीं श्री ‘रूद्र’ का भी उल्‍लेख है। पर विनाशकारी शक्तियों के प्रतीक श्री ‘रूद्र’ गौण देवता थे। सागर- मंथन के बाद शायद श्री ‘रूद्र’ नए रूप में श्री ‘शिव’ बने। श्री ‘शिव’ तथा श्री ‘शंकर’ दोनों का अर्थ कल्‍याणकारी होता है। अंतिम विश्‍लेषण में विध्‍वंसक शक्ति कल्‍याणकारी भी होती है – यदि वह न हो तो जिंदगी भार बन जाय और दुनिया बसने के योग्‍य न रहे। आखिर कालकूट पीनेवाले भोलेनाथ ने समाज का महान् कल्‍याण किये ।
🚩
शिव का रूप विचित्र अमंगल है। नंग – धड़ंग, शरीर पर राख मले, जटाजूटधारी, सर्प लपेटे, गले में हडिडयों एवं नरमूंडों की माला और जिसके भूत – प्रेत, पिशाच आदि गण हैं। ये औघड़दानी सभी के लिए सुगम्‍य थे। देव तथ असुर सभी को बिना सोचे – समझे वरदान दे बैठते। एक बार भस्‍मासुर ने वरदान प्राप्‍त कर लिया कि वह जिसके ऊपर हाथ रखे वह भस्‍म हो जाय। तब यह सोचकर कि श्री शिव कहीं दूसरे को ऐसा वरदान न दें, वह उन्‍हीं पर हाथ रखने दौड़ा । श्री शिव सारे संसार में भागते फिरे। अंत में भगवान् सुंदरी ‘तिलोत्‍तमा’ का रूप धरकर नृत्‍य करने लगे। भस्‍मासुर मोहित होकर साथ में उसी प्रकार नाचने लगा। तिलोत्‍तमा ने नृत्‍य की मुद्रा में अपने सिर पर हाथ रखा, दूसरा हाथ कटि पर रखना नृत्‍य की साधारण प्रारंभिक मुद्रा है। भस्‍मासुर ने नकल करते हुए जैसे ही हाथ अपने सिर पर रख, वह स्‍वयं वरदान के अनुसार भस्‍म हो गया। शायद किसी असुर ने अग्नि के ऊपर यांत्रिक सिद्धि प्राप्‍त की और उससे संहारक शक्ति को नष्‍ट करने की सोची।
🔱
परन्तु संहारक शक्ति को इस प्रकार नष्‍ट नहीं किया जा सकता और वह स्‍वयं नष्‍ट हो गया। श्री शिव का उक्‍त रूप उस समय के सभी अंधविश्‍वासों से युक्‍त सामान्‍य लोगों का प्रतीक है।

असुर भी श्री शिव के उपासक थे। संभ्‍वतया समाज – मंथन के समय साधारण लोगों को तुष्‍ट करने के लिए उनके रूप में ढले ‘रूद्र’ को ‘महादेव’ तथा ‘महेश’ कहकर पुकारने लगे। इस प्रकार ‘महा’ उपसर्ग लगाकर संतुष्‍ट करने का एक एंग है। कुछ पुरातत्‍वज्ञ यह मानते हैं कि शंकर दक्षिण के देवता हैं , इसीलिए घोषित किया गया कि वह कैलास पर रम रहे हैं। माँ पार्वती उत्‍तर हिमालय की कन्‍या हैं। माँ उमा ने श्री शिव की प्राप्ति के लिए कन्‍याकुमारी जाकर तपस्‍या की। आज भी कुमारी अंतरीप में, जहॉ सागर की ओर मुंह करके खड़े होने की स्‍वाभाविक प्रवृत्ति होती है, उनकी मूर्ति उत्‍तर की ओर , अपने आराध्‍य देव कैलास आसीन श्री शिव की ओर मुंह करके खड़ी है। यह भरत की एकता का प्रतीक है। मानो शिव – पार्वती की विवाह से दक्षिण – उत्‍तर भारत एक हो गया।
🚩
श्री शिव का चिन्‍ह मानकर शिवलिंग की पूजा बुद्ध के कालखंड के पूर्व आई । वनवासी से लेकर सभी साधारण व्‍यक्ति जिस चिन्‍ह की पूजा कर सकें,उस पत्‍थर के ढेले, बटिया को शिव का चिन्‍ह माना। विक्रम संवत् के कुछ सहस्राब्‍दी पूर्व उक्‍कापात का अधिक प्रकोप हुआ। आदि मानव को यह रूद्र का आविर्भाव दिखा।

पुराणों में उल्लेख है कि श्री शिव का पहला विवाह दक्ष प्रजापति की कन्या सती से हुआ। प्रजापतियों के यज्ञ में दक्ष ने घमंड में शाप दिया,
'अब इंद्रादि देवताओं के साथ श्री शिव को यज्ञ का भाग न मिले।'
और क्रोध में चले गये। तब नंदी (शिव के वाहन) ने दक्ष को शाप देने के साथ-साथ यज्ञकर्ता ब्राम्हणों को, जो दक्ष की बातें सुनकर हँसे रहें थे, शाप दिया,

'जो कर्मकांडी ब्राम्हण दक्ष के पीछे चलने वाले हैं वे केवल पेट पालने के लिए विद्या, तप, व्रतादि का आश्रय लें तथा धन, शरीर और इंद्रिय-सुख को ही सुख मानकर इन्हीं के गुलाम बनकर दुनिया में भीख मांगते भटकें।'

इस पर भृगु ने शाप दिया, जो शौचाचारविहीन, मंदबुद्वि तथा जटा, राख और हड्डियों को धारण करने वाले हों वे ही शैव संप्रदाय में दीक्षित हों, जिनमें सुरा और आसव देवता समान आदरणीय हों। तुम पाखंड मार्ग में जाओ, जिनमें भूतों के सरदार तुम्हारे इष्टदेव निवास करते हैं।'
जैसे कर्मकांडी ब्राम्हण या जैसी तांत्रिक क्रियाएँ शैव संप्रदाय में बाद में आई, ये शाप उनका संकेत करते है।

अधिक समय बीतने पर दक्ष ने महायज्ञ किया। उसमें सभी को बुवाया, पर अपनी प्रिय पुत्री सती एवं शिव को नहीं। सती का स्त्री-सुलभ मन न माना और मना करने पर भी अपने पिता दक्ष के यहाँ गई। पर पिता द्वारा श्री शिव की अवहेलना से दु:खित होकर माँ सती ने अपने प्राण त्याग दिए। जब श्री शिव ने यह सुना तो एक जटा से अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हजारों भुजाओं वाले श्री रूद्र के अंश- श्री वीरभद्र –को जन्म दिया। श्री वीरभद्र दक्ष का महायक्ष विध्वंस कर डाले । श्री शिव ने अपनी प्रिया सती के शव को लेकर भयंकर संहारक तांडव किये । जब संसार जलने लगा और किसी का कुछ कहने का साहस न हुआ तब भगवान श्री हरि ने सुदर्शन चक्र से शव का एक-एक अंश काट दिये । शव विहीन होकर शिव शांत हुए। जहाँ भिन्न-भिन्न अंक कटकर गिरे वहाँ शक्तिपीठ बने। ये १०८ शक्तिपीठ, जो गांधार (आधुनिक कंधार और बलूचिस्तान) से लेकर ब्रम्हदेश (आधुनिक म्याँमार) तक फैले हैं, देवी माँ की उपासना के प्रमुख केंद्र हैं।
❤️
माँ सती के शरीर के टुकड़े मानो इस मिटटी से एकाकार हो गए-सती मातृरूपा भारतभूमि है। यही माँ सती अगले जन्म में हिमालय की पुत्री माँ पार्वती हुई (हिमालय की गोद में बसी यह भारतभूमि मानो उनकी पुत्री है)। श्री शिव के उपासक शैव, श्री विष्णु के उपासक वैष्णव तथा माँ शक्ति (देवी) के उपासक शाक्त कहलाए। श्री शिव और सती को लोग पुसत्व एवं मातृशक्ति के प्रतीक के रूप में भी देख्ते हैं। इस प्रकार का अलंकार प्राय: सभी प्राचीन सभ्यताओं में आता है। यह शिव-सती की कहानी शैव एवं शाक्त मतों का समन्वय भी करती है। शैव एवं वैष्णव मतों के भेद भारत के ऎतिहासिक काल में उठे हैं। इसकी झलक रामचरितमानस में मिलती है। भगवान श्री शिव ने माँ पार्वती को भगवान श्री राम का परिचय 'श्री भगवान' कहकर दिये , श्री राम के द्वारा रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना हई। दोनों ने कहा कि उनका भक्त दूसरे का द्रोही नहीं हो सकता। यह शैव एवं वैष्णव संप्रदायों के मतभेद (यदि रहे हों) की समाप्ति की घोषणा है।

शिव को तंत्र का अधिष्‍ठाता कहा गया है। इसी से शैव एवं शाक्‍त संप्रदायों में तांत्रिक क्रियाऍं आईं। तंत्र का शाब्दिक अर्थ ‘तन को त्राण देने वाला’ है, जिसके द्वारा शरीर को राहत मिले। वैसे तो योगासन भी मन और शरीर दोनों को शांति पहुँचाने की क्रिया है। तंत्र का उद्देश्‍य भय, घृणा, लज्‍जा आदि शरीर के सभी प्रारंभिक भावों पर विजय प्राप्‍त करना है। मृत्‍यु का भय सबसे बड़ा है। इसी से श्‍मशान में अथवा शव के ऊपर बैठकर साधना करना, भूत-प्रेत सिद्ध करना, अघोरपंथीपन, जटाजूट, राख मला हुआ नंग-धड़ंग, नरमुंड तथा हडिड्ओं का हार आदि कल्‍पनाऍं आईं। तांत्रिक यह समझते थे कि वे इससे चमत्‍कार करने की सिद्धि प्राप्‍त कर सकते हैं। देखें – बंकिमचंद्र का उपन्‍यास ‘कपाल-कुंडला’। यह विकृति ‘वामपंथ’ में प्रकट हुई जिसमें मांस-मदिरा, व्‍यसन और भोग को ही संपूर्ण सुख माना। ययाति की कहानी भूल गए कि भोग से तृष्‍णा बढ़ती है, कभी शांत नहीं होती। जब कभी ऐसा जीवन उत्‍पन्‍न हुआ तो सभ्‍यता मर गई। शिव का रूप विरोधी विचारों के दो छोर लिये है।

🔱॥ हर हर महादेव ॥🔱

प्रेम से बोलें श्री राधे राधे...🚩

Send a message to learn more

18/08/2026

माता श्री सीता की कथा

भगवान श्रीराम राजसभा में विराज रहे थे उसी समय विभीषण वहां पहुंचे। वे बहुत भयभीत और हड़बड़ी में लग रहे थे। सभा में प्रवेश करते ही वे कहने लगे- हे राम! मुझे बचाइए, कुंभकर्ण का बेटा मूलकासुर आफत ढा रहा है। अब लगता है, न लंका बचेगी और न मेरा राजपाट।

भगवान श्रीराम द्वारा ढांढस बंधाए जाने और पूरी बात बताए जाने पर विभीषण ने बताया कि कुंभकर्ण का एक बेटा मूल नक्षत्र में पैदा हुआ था इसलिए उस का नाम मूलकासुर रखा गया। इसे अशुभ जान कुंभकर्ण ने जंगल में फिंकवा दिया था। जंगल में मधुमक्खियों ने मूलकासुर को पाल लिया।
🚩
मूलकासुर जब बड़ा हुआ तो उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया। अब उनके दिए वर और बल के घमंड में भयानक उत्पात मचा रखा है। जब जंगल में उसे पता चला कि आपने उसके खानदान का सफाया कर लंका जीत ली और राजपाट मुझे सौंप दिया है, तो वह भन्नाया हुआ है।

भगवन्, आपने जिस दिन मुझे राजपाट सौंपा उसके कुछ दिन बाद ही उसने पातालवासियों के साथ लंका पहुंचकर मुझ पर धावा बोल दिया। मैंने 6 महीने तक मुकाबला किया, पर ब्रह्माजी के वरदान ने उसे इतना ताकतवर बना दिया है कि मुझे भागना पड़ा तथा अपने बेटे, मंत्रियों तथा स्त्री के साथ किसी प्रकार सुरंग के जरिए भागकर यहां पहुंचा हूं।

उसने कहा कि 'पहले धोखेबाज भेदिया विभीषण को मारूंगा फिर पिता की हत्या करने वाले राम को भी मार डालूंगा। वह आपके पास भी आता ही होगा। समय कम है, लंका और अयोध्या दोनों खतरे में हैं। जो उचित समझते हों तुरंत कीजिए।'

भक्त की पुकार सुन श्रीरामजी हनुमान तथा लक्ष्मण सहित सेना को तैयार कर पुष्पक यान पर चढ़ झट लंका की ओर चल पड़े।

मूलकासुर को श्रीरामचन्द्र के आने की बात मालूम हुई, वह भी सेना लेकर लड़ने के लिए लंका के बाहर आ डटा। भयानक युद्ध छिड़ गया। 7 दिनों तक घोर युद्ध होता रहा। मूलकासुर भगवान श्रीराम की सेना पर अकेले ही भारी पड़ रहा था।

अयोध्या से सुमंत्र आदि सभी मंत्री भी आ पहुंचे। हनुमानजी संजीवनी लाकर वानरों, भालुओं तथा मानुषी सेना को जिलाते जा रहे थे। पर सब कुछ होते हुए भी युद्ध का नतीजा उनके पक्ष में जाता नहीं दिख रहा था। भगवान भी चिंता में थे।

विभीषण ने बताया कि इस समय मूलकासुर तंत्र-साधना करने गुप्त गुफा में गया है। उसी समय ब्रह्माजी वहां आए और भगवान से कहने लगे- 'रघुनंदन! इसे तो मैंने स्त्री के हाथों मरने का वरदान दिया है। आपका प्रयास बेकार ही जाएगा।

श्रीराम, इससे संबंधित एक बात और है, उसे भी जान लेना फायदेमंद हो सकता है। जब इसके भाई-बिरादर लंका युद्ध में मारे जा चुके तो एक दिन इसने मुनियों के बीच दुखी होकर कहा, 'चंडी सीता के कारण मेरा समूचा कुल नष्ट हुआ'। इस पर एक मुनि ने नाराज होकर उसे शाप दे दिया- 'दुष्ट! तूने जिसे 'चंडी' कहा है, वही सीता तेरी जान लेगी।

' मुनि का इतना कहना था कि वह उन्हें खा गया बाकी मुनि उसके डर से चुपचाप खिसक गए। तो हे राम! अब कोई दूसरा उपाय नहीं है। अब तो केवल सीता ही इसका वध कर सकती हैं। आप उन्हें यहां बुलाकर इसका वध करवाइए, इतना कहकर ब्रह्माजी चले गए।

भगवान श्रीराम ने हनुमानजी और गरूड़ को तुरंत पुष्पक विमान से सीताजी को लाने भेजा।

इधर माँ सीता देवी-देवताओं की मनौती मनातीं, तुलसी, शिव-प्रतिमा, पीपल आदि के फेरे लगातीं, ब्राह्मणों से 'पाठ, रुद्रीय' का जप करातीं, दुर्गाजी की पूजा करतीं कि विजयी श्रीराम शीघ्र लौटें। तभी गरूड़ और हनुमानजी उनके पास पहुंचे।

पति के संदेश को सुनकर माँ सीताजी तुरंत चल दीं। भगवान श्रीराम ने उन्हें मूलकासुर के बारे में सारा कुछ बताया। फिर तो भगवती सीता को गुस्सा आ गया। उनके शरीर से एक दूसरी तामसी शक्ति निकल पड़ी, उसका स्वर बड़ा भयानक था। यह छाया सीता चंडी के वेश में लंका की ओर बढ़ चलीं।
🔱
इधर श्रीराम ने वानर सेना को इशारा किया कि मूलकासुर जो तांत्रिक क्रियाएं कर रहा है उसको उसकी गुप्त गुफा में जाकर तहस-नहस करें। वानर गुफा के भीतर पहुंचकर उत्पात मचाने लगे तो मूलकासुर दांत किटकिटाता हुआ सब छोड़-छाड़कर वानर सेना के पीछे दौड़ा। हड़बड़ी में उसका मुकुट गिर पड़ा। फिर भी भागता हुआ वह युद्ध के मैदान में आ गया।

युद्ध के मैदान में छाया सीता को देखकर मूलकासुर गरजा, तू कौन? अभी भाग जा। मैं औरतों पर मर्दानगी नहीं दिखाता।

छाया सीता ने भी भीषण आवाज करते हुए कहा, 'मैं तुम्हारी मौत चंडी हूं। तूने मेरा पक्ष लेने वाले मुनियों और ब्राह्मणों को खा डाला था, अब मैं तुम्हें मारकर उसका बदला चुकाऊंगी।' इतना कहकर छाया सीता ने मूलकासुर पर 5 बाण चलाए। मूलकासुर ने भी जवाब में बाण चलाए। कुछ देर तक घोर युद्ध हुआ, पर अंत में 'चंडिकास्त्र' चलाकर छाया सीता ने मूलकासुर का सिर उड़ा दिया और वह लंका के दरवाजे पर जा गिरा।

राक्षस हाहाकार करते हुए इधर-उधर भाग खड़े हुए। छाया सीता लौटकर सीता के शरीर में प्रवेश कर गई। मूलकासुर से दुखी लंका की जनता ने मां सीता की जय-जयकार की और विभीषण ने उन्हें धन्यवाद दिया। कुछ दिनों तक लंका में रहकर श्रीराम सीता सहित पुष्पक विमान से अयोध्या लौट आए।
जय श्री राम...🚩

प्रेम से बोलें श्री राधे राधे...🚩

Send a message to learn more

Address

Varanasi

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Sri RadheKrishna Gopal Ji posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to Sri RadheKrishna Gopal Ji:

Shortcuts

Share