Lokanath Publication

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09/04/2019

हमारी चेतना के अंदर सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण- तीनों प्रकार के गन व्याप्त हैं। प्रकृति के साथ इसी चेतना

14/06/2018

🌅भारतीय वाङ्मय में लोक-कल्याण🌅
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(गतांक से आगे)
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🎵 जैन विचार धारा के अनुसार मिथ्या ज्ञान किसी असत् या अनस्तिवान् तत्त्व का ज्ञान नहीं है, क्योंकि जो असत् है, मिथ्या है, उसका ज्ञान कैसे होगा? जैन दर्शन के अनुसार सारा ज्ञान सत्य है, शर्त यही है कि उसमें एकान्तवादिता या आग्रह न हो।

🎵 एकान्त सत्य के अनन्त पहलुओं को आवृत कर अंश को ही पूर्ण के रूप में प्रकट करता है और इस प्रकार अंश को पूर्ण बताकर व्यक्ति के ज्ञान को मिथ्या बना देता है। साथ ही आग्रह अपने में निहित छद्म राग से सत्य को रंगीन बना देता है।

🎵 इस प्रकार एकान्त या आग्रह आत्म साक्षात्कार में बाधक है। जैन दर्शन के अनुसार आत्मा पक्षातिक्रान्त है, अत: पक्ष या आग्रह के माध्यम से उसे नहीं पाया जा सकता।

🎵 वह तो परमसत्य है, आग्रह बुद्धि उसे नहीं देख सकती। विचार जब तक पक्ष मत या वादों से अनावरित नहीं होती, सत्य भी उसके लिए अनावृत नहीं होता। जब तक आँखों पर राग द्वेष, आसक्ति या आग्रह का रंगीन चश्मा है, अनावृत सत्य का साक्षात्कार सम्भव नहीं। दूसरे, आग्रह स्वयम् एक बन्धन है।

🎵 वह वैचारिक आसक्ति है। विचारों का परिग्रह है। आसक्ति या परिग्रह चाहे पदार्थ का हो या विचारों का, वह निश्चित ही बन्धन है। आग्रह विचारों का बन्धन है और अनाग्रह वैचारिक मुक्ति। विचार में जब तक आग्रह है, तब तक पक्ष रहेगा। यदि पक्ष रहेगा, तो उसका प्रतिपक्ष भी होगा।

🎵 पक्ष प्रतिपक्ष यही विचारों का संसार है, इसमें ही वैचारिक संघर्ष, साम्प्रदायिकता और वैचारिक मनोमालिन्य पनपते हैं। जैनाचार्यों ने कहा है कि वचन के जितने विकल्प हैं, उतने ही दृष्टिकोण (नयवाद) हैं और जितने दृष्टिकोण के ढंग हैं उतने ही मत मतान्तर हैं। व्यक्ति जब तक मत मतान्तरों में होता है तब तक पक्षातिक्रान्त विशुद्ध आत्मतत्त्व की प्राप्ति नहीं होती है।

🎵 तात्पर्य यह है कि बिना आग्रह का परित्याग किये मुक्ति नहीं होती। मुक्ति पक्ष का आश्रय लेने में नहीं, वरन् पक्षातिक्रान्त अवस्था को प्राप्त करने में है। वस्तुत: जहाँ भी आग्रह बुद्धि होगी, विपक्ष में निहित सत्य का दर्शन सम्भव नहीं होगा और जो विपक्ष में निहित सत्य नहीं देखेगा, वह सम्पूर्ण सत्य का द्रष्ट नहीं होगा।

🎵 भगवान् महावीर ने बताया कि आग्रह ही सत्य का बाधक तत्त्व है। आग्रह राग है और जहाँ राग है वहाँ सम्पूर्ण सत्य का दर्शन सम्भव नहीं। सम्पूर्ण सत्य का ज्ञान या केवलज्ञान केवल अनाग्रही को ही हो सकता है।

🎵 भगवान् महावीर के प्रथम शिष्य एवम् अन्तेवासी गौतम के जीवन की घटना इसका प्रत्यक्ष साक्ष्य है। गौतम को महावीर के जीवनकाल में कैवल्य की उपलब्धि नहीं हो सकी। गौतम के केवलज्ञान में आखिर कौन सा तथ्य बाधक बन रहा था ?

🎵 महावीर ने स्वयम् इसका समाधान दिया था। उन्होंने गौतम से कहा था—‘‘गौतम! तेरा मेरे प्रति जो ममत्व है,रागात्मकता है,वही तेरे केवलज्ञान (पूर्ण ज्ञान) का बाधक है। ’’महावीर की स्पष्ट घोषणा थी कि, सत्य का सम्पूर्ण दर्शन आग्रह के घेरे में खड़े होकर नहीं किया जा सकता।

🎵 सत्य तो सर्वत्र उपस्थित है, केवल हमारी आग्रहयुक्त या मतान्ध दृष्टि उसे देख नहीं पाती है और यदि देखती है तो उसे अपने दृष्टिराग से दूषित करके ही। आग्रह या दृष्टिराग से वही सत्य असत्य बन जाता है। अनाग्रह या समदृष्टित्व से वही सत्य के रूप में प्रकट हो जाता है।

🎵 अत: महावीर ने कहा, यदि सत्य को पाना है तो अनाग्रहों या मतवादों के घेरे से ऊपर उठो, दोष दर्शन की दृष्टि को छोड़कर सत्यान्वेषी बनो। सत्य कभी मेरा या पराया नहीं होता है।

🎵 सत्य तो स्वयं भगवान् है (सच्चं खलु भगवं)। वह तो सर्वत्र है। दूसरों के सत्यों को झुठलाकर हम सत्य को नहीं पा सकते हैं। सत्य विवाद से नहीं, समन्वय से प्रकट होता है। सत्य का दर्शन केवल अनाग्रही को ही हो सकता है।

🎵 जैन धर्म के अनुसार सत्य का प्रकटन आग्रह में नहीं, अनाग्रह में होता है। सत्य का साधक वीतराग और अनाग्रही होता है। जैन धर्म अपने अनेकान्त के सिद्धान्त के द्वारा एक अनाग्रही एवं समन्वयात्मक दृष्टि प्रस्तुत करता है, ताकि वैचारिक असहिष्णुता को समाप्त किया जा सके।

🛑क्रमशः🔜
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🔖सन्दर्भ ग्रन्थ
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👉अथर्ववेद: संस्कृति संस्थान, बरेली, 1962.
👉अभिधान राजेन्द्र कोश (सात खण्ड) : श्रीविजय राजेन्द्र सूरिजी, रतलाम
👉ऋग्वेद : वैदिक संशोधन मण्डल,पूना,1933.
👉कर्मग्रन्थ (कर्मविपाक) : देवेन्द्रसूरी, श्री आत्मानन्द जैन पुस्तक प्रचारक मण्डल, 2444
👉कौटिलीय अर्थशास्त्र : सम्पादक आर.शामशास्त्री,मैसूर,1909.
👉धम्मपद : संस्कृत अनुवाद हिन्दी अर्थसहित,इन्द्र देहली
👉श्रीमद्भागवत महापुराण : गीताप्रेस, गोरखपुर, सं.2006.
👉Medieval Mysticism of India, Luzac, : 19

14/06/2018
14/06/2018

📮क़ुरआन और विज्ञान📮
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तमाम संस्कृतियों में मानवीय शक्ति वचन और रचनात्मक क्षमताओं की अभिव्यक्ति के प्रमुख साधनों में साहित्य और शायरी (काव्य रचना) सर्वोरि है। विश्व इतिहास में ऐसा भी ज़माना गु़ज़रा है जब समाज में साहित्य और काव्य को वही स्थान प्राप्त था जो आज विज्ञान और तकनीक को प्राप्त है।

गै़र-मुस्लिम भाषा-वैज्ञानिकों की सहमति है कि अरबी साहित्य का श्रेष्ठ सर्वोत्तम नमूना पवित्र क़ुरआन है यानी इस ज़मीन पर अरबी सहित्य का सर्वोत्कृष्ठ उदाहरण क़ुरआन -ए पाक ही है। मानव जाति को पवित्र क़ुरआन की चुनौति है कि इन क़ुरआनी आयतों (वाक्यों ) के समान कुछ बनाकर दिखाए उसकी चुनौती है :

‘‘और अगर तुम्हें इस मामले में संदेह हो कि यह किताब जो हम ने अपने बंदों पर उतारी है, यह हमारी है या नहीं तो इसकी तरह एक ही सूरत (क़ुरआनी आयत) बना लाओ, अपने सारे साथियों को बुला लो एक अल्लाह को छोड़ कर शेष जिस – जिस की चाहो सहायता ले लो, अगर तुम सच्चे हो तो यह काम कर दिखाओ, लेकिन अगर तुमने ऐसा नहीं किया और यकी़नन कभी नहीं कर सकते, तो डरो उस आग से जिसका ईधन बनेंगे इंसान और पत्थर। जो तैयार की गई है मुनकरीन हक़ (सत्य को नकारने वालों)के लिये" ( अल – क़ुरआन: सूर 2, आयत 23 से 24 )

क़ुरआन स्पष्ट शब्दों में सम्पूर्ण मानवजाति को चुनौती दे रहा है कि वह ऐसी ही एक सूरः बना कर तो दिखाए जैसी कि क़ुरआन में कई स्थानों पर दर्ज है । सिर्फ एक ही ऐसी सुरः बनाने की चुनौति जो अपने भाषा सौन्दर्य मृदुभषिता, अर्थ की व्यापकता औ चिंतन की गहराई में पवित्र क़ुरआन की बराबरी कर सके, आज तक पूरी नहीं की जा सकी ।

यद्यपि आधुनिक युग का तटस्थ व्यक्ति भी ऐसे किसी धार्मिक ग्रंथ को स्वीकार नहीं करेगा जो अच्छी साहित्यिक व काव्यात्मक भाषा का उपयोग करने के बावजूद यह कहता हो कि धरती चप्टी है। यह इस लिये है कि हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहां इंसान के बौद्धिक तर्क और विज्ञान को आधारभूत हैसियत हासिल है। बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह द्वारा क़ुरआन के अस्तित्व की प्रामाणिकता में उसकी असाधारण और सर्वोत्तम साहित्यिक भाषा को पर्याप्त प्रमाण नहीं मानेंगे। कोई भी ऐसा ग्रंथ जो आसमानी होने और अल्लाह द्वारा प्रदत्त होने का दावेदार हो, उसे अपने प्रासंगिक तर्कों की दृढ़ता के आधार पर ही स्वीकृति के योग्य होना चाहिये।

प्रसिद्ध भौतिकवादी दर्शनशास्त्री और नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टाइन के अनुसार ‘‘धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है और धर्म के बिना विज्ञान अंधा है ‘‘इसलिये अब हम पवित्र क़ुरआन का अध्ययन करते हुए यह जानने का प्रयत्न करते हैं कि आधुनिक विज्ञान और पवित्र क़ुरआन में परस्पर अनुकूलता है या प्रतिकूलता ?

यहां याद रखना ज़रूरी है कि क़ुरआन कोई वैज्ञानिक किताब नहीं है बल्कि यह ‘‘निशानियों‘‘ (signs) की, यानि आयात की किताब है। क़ुरआन में छह हज़ार से अधिक ‘‘निशानियां‘‘ (आयतें / वाक्य) हैं, जिनमें एक हज़ार से अधिक वाक्य विशिष्ट रूप से विज्ञान एवं वैज्ञानिक विषयों पर बहस करती हैं । हम जानते हैं कि कई अवसरों पर विज्ञान‘‘ यू टर्न ‘‘लेता है यानि विगत – विचार के प्रतिकूल बात कहने लगता है । अत: यहाँ केवल सर्वमान्य वैज्ञानिक वास्तविकताओं को ही चुना गया है जबकि ऐसे विचारों व दृष्टिकोण पर बात नहीं की है जो महज़ कल्पना हो और पुष्टि के लिये वैज्ञानिक प्रमाण न हो।

अंतरिक्ष – विज्ञान
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सृष्टि की संरचना: ‘‘बिग बैंग"अंतरिक्ष विज्ञान के विशेषज्ञों ने सृष्टि की व्याख्या एक ऐसे सूचक (phenomenon) के माध्यम से करते हैं और जिसे व्यापक रूप से बिग बैंग (big bang) के रूप में स्वीकार किया जाता है। बिग बैंग के प्रमाण में पिछले कई दशकों की अवधि में शोध एवं प्रयोगों के माध्यम से अंतरिक्ष विशेषज्ञों की इकटठा की हुई जानकारियां मौजूद है ‘बिग बैंग‘ दृष्टिकोण के अनुसार प्रारम्भ में यह सम्पूर्ण सृष्ठि प्राथमिक रसायन (primary nebula) के रूप में थी फिर एक महान विस्फ़ोट यानि बिग बैंग (secondry separation) हुआ जिस का नतीजा आकाशगंगा के रूप में उभरा, फिर वह आकाश गंगा विभाजित हुआ और उसके टुकड़े सितारों, ग्र्रहों, सूर्य, चंद्रमा आदि के अस्तित्व में परिवर्तित हो गए कायनात, प्रारम्भ में इतनी पृथक और अछूती थी कि संयोग (chance) के आधार पर उसके अस्तित्व में आने की ‘‘सम्भावना: (probability) शून्य थी ।

क़ुरआन सृष्टि की संरचना के संदर्भ से निम्नलिखित आयतों में बताता है:

‘‘क्या वह लोग जिन्होंने ( नबी स.अ.व. की पुष्टि ) से इन्कार कर दिया है ध्यान नहीं करते कि यह सब आकाश और धरती परस्पर मिले हुए थे फिर हम ने उन्हें अलग किया‘‘(अल – क़ुरआन: सुर: 21, आयत 30 )

इस क़ुरआनी वचन और ‘‘बिग बैंग‘‘ के बीच आश्चर्यजनक समानता से इनकार सम्भव ही नहीं! यह कैसे सम्भव है कि एक किताब जो आज से 1400 वर्ष पहले अरब के रेगिस्तानों में व्यक्त हुई अपने अन्दर ऐसे असाधारण वैज्ञानिक यथार्थ समाए हुए है?

आकाशगंगा की उत्पत्ति से पूर्व प्रारम्भिक वायुगत रसायन
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वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि सृष्टि में आकाशगंगाओं के निर्माण से पहले भी सृष्टि का सारा द्रव्य एक प्रारम्भिक वायुगत रसायन (gas) की अवस्था में था, संक्षिप्त यह कि आकाशगंगा निर्माण से पहले वायुगत रसायन अथवा व्यापक बादलों के रूप में मौजूद था जिसे आकाशगंगा के रूप में नीचे आना था. सृष्टि के इस प्रारम्भिक द्रव्य के विश्लेषण में गैस से अधिक उपयुक्त शब्द ‘‘धुंआ‘‘ है।

निम्नांकित आयतें क़ुरआन में सृष्टि की इस अवस्था को धुंआ शब्द से रेखांकित किया है।
‘‘फिर वे आसमान की ओर ध्यान आकर्षित हुए जो उस समय सिर्फ़ धुआं था उस (अल्लाह) ने आसमान और ज़मीन से कहा:

अस्तित्व में आ जाओ चाहे तुम चाहो या न चाहो‘‘ दोनों ने कहा: हम आ गये फ़र्मांबरदारों (आज्ञाकारी लोगों) की तरह‘‘(अल ..कु़रआन: सूर: 41 ,,आयत 11)

एक बार फिर, यह यथार्थ भी ‘‘बिग बैंग‘‘ के अनुकूल है जिसके बारे में हज़रत मुहम्मद मुस्तफा़ (स.अ.व. )की पैग़मबरी से पहले किसी को कुछ ज्ञान नहीं था (बिग बैंग दृष्टिकोण बीसवीं सदी यानी पैग़मबर काल के 1300 वर्ष बाद की पैदावार है ) अगर इस युग में कोई भी इसका जानकार नहीं था तो फिर इस ज्ञान का स्रोत क्या हो सकता है?

धरती की अवस्था: गोल या चपटी
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प्राराम्भिक ज़मानों में लोग विश्वस्त थे कि ज़मीन चपटी है, यही कारण था कि सदियों तक मनुष्य केवल इसलिए सुदूर यात्रा करने से भयाक्रांति करता रहा कि कहीं वह ज़मीन के किनारों से किसी नीची खाई में न गिर पडे़! सर फ्रांस डेरिक वह पहला व्यक्ति था जिसने 1597 ई0 में धरती के गिर्द ( समुद्र मार्ग से ) चक्कर लगाया और व्यवहारिक रूप से यह सिद्ध किया कि ज़मीन गोल (वृत्ताकार ) है। यह बिंदु दिमाग़ में रखते हुए ज़रा निम्नलिखित क़ुरआनी आयत पर विचार करें जो दिन और रात के अवागमन से सम्बंधित है:

‘‘ क्या तुम देखते नहीं हो कि अल्लाह रात को दिन में पिरोता हुआ ले आता है और दिन को रात में ‘‘
(अल-.क़ुरआन: सूर: 31 आयत 29 )

यहां स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है कि अल्लाह ने क्रमवार रात के दिन में ढलने और दिन के रात में ढलने (परिवर्तित होने )की चर्चा की है ,यह केवल तभी सम्भव हो सकता है जब धरती की संरचना गोल (वृत्ताकार ) हो। अगर धरती चपटी होती तो दिन का रात में या रात का दिन में बदलना बिल्कुल अचानक होता।

निम्न में एक और आयत देखिये जिसमें धरती के गोल बनावट की ओर इशारा किया गया है:

उसने आसमानों और ज़मीन को बरहक़ (यथार्थ रूप से )उत्पन्न किया है ,, वही दिन पर रात और रात पर दिन को लपेटता है।,,(अल.-क़ुरआन: सूर:39 आयत 5)

यहां प्रयोग किये गये अरबी शब्द ‘‘कव्वर‘‘ का अर्थ है किसी एक वस्तु को दूसरे पर लपेटना या overlap करना या (एक वस्तु को दूसरी वस्तु पर) चक्कर देकर ( तार की तरह ) बांधना। दिन और रात को एक दूसरे पर लपेटना या एक दूसरे पर चक्कर देना तभी सम्भव है जब ज़मीन की बनावट गोल हो ।

ज़मीन किसी गेंद की भांति बिलकुल ही गोल नहीं बल्कि नारंगी की तरह (geo-spherical) है यानि ध्रुव (poles) पर से थोडी सी चपटी है। निम्न आयत में ज़मीन के बनावट की व्याख्या यूं की गई हैः

‘‘और फिर ज़मीन को उसने बिछाया ‘‘(अल क़ुरआन: सूर 79 आयत 30)

यहां अरबी शब्द ‘‘दहाहा‘‘ प्रयुक्त है, जिसका आशय ‘‘शुतुरमुर्ग़‘‘ के अंडे के रूप, में धरती की वृत्ताकार बनावट की उपमा ही हो सकता है। इस प्रकार यह प्रमाणित हुआ कि क़ुरआन में ज़मीन के बनावट की सटीक परिभाषा बता दी गई है, यद्यपि कुरआन के अवतरण काल में आम विचार यही था कि ज़मीन चपटी है।

चांद का प्रकाश प्रतिबिंबित प्रकाश है
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प्राचीन संस्कृतियों में यह माना जाता था कि चांद अपना प्रकाश स्वयं व्यक्त करता है। विज्ञान ने हमें बताया कि चांद का प्रकाश प्रतिबिंबित प्रकाश है फिर भी यह वास्तविकता आज से चौदह सौ वर्ष पहले क़ुरआन की निम्नलिखित आयत में बता दी गई है।

"बड़ा पवित्र है वह जिसने आसमान में बुर्ज ( दुर्ग ) बनाए और उसमें एक चिराग़
और चमकता हुआ चांद आलोकित किया" ।( अल. क़ुरआन ,सूर: 25 आयत 61)

क़ुरआन में सूरज के लिये अरबी शब्द ‘‘शम्स‘‘ प्रयुक्त हुआ है। अलबत्ता सूरज को ‘सिराज‘ भी कहा जाता है जिसका अर्थ है मशाल (torch) जबकि अन्य अवसरों पर उसे ‘वहाज‘ अर्थात् जलता हुआ चिराग या प्रज्वलित दीपक कहा गया है। इसका अर्थ "प्रदीप्त तेज और महानता‘‘ है। सूरज के लिये उपरोक्त तीनों स्पष्टीकरण उपयुक्त हैं क्योंकि उसके अंदर प्रज्वलन combustion का ज़बरदस्त कर्म निरंतर जारी रहने के कारण तीव्र ऊष्मा और रौशनी निकलती रहती है।

चांद के लिये क़ुरआन में अरबी शब्द क़मर प्रयुक्त किया गया है और इसे बतौर‘ मुनीर प्रकाशमान बताया गया है ऐसा शरीर जो ‘नूर‘ (ज्योति) प्रदान करता हो। अर्थात, प्रतिबिंबित रौशनी देता हो। एक बार पुन: क़ुरआन द्वारा चांद के बारे में बताए गये तथ्य पर नज़र डालते हैं, क्योंकि निसंदेह चंद्रमा का अपना कोई प्रकाश नहीं है बल्कि वह सूरज के प्रकाश से प्रतिबिंबित होता है और हमें जलता हुआ दिखाई देता है। क़ुरआन में एक बार भी चांद के लिये‘, सिराज वहाज, या दीपक जैसें शब्दों का उपयोग नहीं हुआ है और न ही सूरज को , नूर या मुनीर‘,, कहा गया है।

इस से स्पष्ट होता है कि क़ुरआन में सूरज और चांद की रोशनी के बीच बहुत स्पष्ट अंतर रखा गया है, जो क़ुरआन की आयत के अध्ययन से साफ़ समझ में आता है।

निम्नलिखित आयात में सूरज और चांद की रोशनी के बीच अंतर इस तरह स्पष्ट किया गया है:

वही है जिस ने सूरज को उजालेदार बनाया और चांद को चमक दी ।( अल-क़ुरआन: सूरः 10,, आयत 5 )

क्या देखते नहीं हो कि अल्लाह ने किस प्रकार सात आसमान एक के ऊपर एक बनाए और उनमें चांद को नूर ( ज्योति ) और सूरज को चिराग़ (दीपक) बनाया ।( अल- क़ुरआन: सूर:71 आयत 15 से 16 )

इन आयतों के अध्य्यन से प्रमाणित होता है कि क़ुरआन और आधुनिक विज्ञान में धूप और चाँदनी की वास्तविकता के बारे में सम्पूर्ण सहमति है।

🛑क्रमशः🔜
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✍️अगले अंक में "सूर्य"

14/06/2018

📯अज्ञान दुखों का मूल है, त्यागे📯
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सन्त फ्रांसिस का कथन है—‘‘दुःखी रहना शैतान का काम है।’’ इस कथन का तात्पर्य इसके सिवाय और क्या हो सकता है कि दुःखी रहना मानवीय प्रवृत्ति नहीं है। यह एक निकृष्ट प्रवृत्ति है जो मनुष्य को शोभा नहीं देती। तथापि, अधिकतर लोग दुःखी ही दिखाई पड़ते हैं।

अब प्रश्न उठता है कि जब दुःख रहना मानवीय प्रवृत्ति नहीं है, तब आखिर मनुष्य दुःखी क्यों रहते हैं? क्या कोई ऐसी अदृश्य शक्ति है जो मनुष्य को उसकी प्रवृत्ति के विरुद्ध दुःखी रहने को विवश करती है?

इस विषय में एक नहीं अनेक ऐसे प्रश्न और शंकायें उठ सकती हैं, किन्तु वास्तविकता यह है कि कोई वाह्य कारण अथवा अदृश्य शक्ति मनुष्य को दुःख नहीं रखती है, मनुष्य अपने स्वयं के अज्ञान और दुर्बलता के कारण, अकारण ही दुःखी रहता है। वैसे न सुख का और न दुःख का, अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व है। ये मनुष्य की अपनी निर्बल अनुभूतियां ही हैं जो सुख दुःख के रूप में आभासित होती हैं।

अदृश्य शक्ति को इस प्रसंग के बीच से निकाल ही दिया जाये, यही ठीक होगा। क्योंकि अदृश्य शक्ति तटस्थ और निरपेक्ष शक्ति होती है। वह चेतना प्रदान करने के सिवाय मनुष्य के जीवन में अधिक हस्तक्षेप नहीं करती। उसको इस प्रसंग में खींच लाने पर मानवीय धरातल पर सुख-दुःख और उसके कारणों का विवेचन कर सकना कठिन हो जायेगा।

दुःख का एक स्थूल-सा करना है वांछा का विरोध। जो हम चाहते हैं उसको न पा सकने पर जो क्षोभ अथवा निराशा होती है वही दुःख रूप में अनुभव होती है। मनुष्य को समझना चाहिए कि सभी वांछायें कभी पूरी नहीं होतीं, वांछाएं वे ही पूरी होती हैं जो उचित और उपयुक्त होती हैं। किन्तु अज्ञानी व्यक्ति इसका विचार न कर अपनी वांछायें बढ़ाते चले जाते हैं कि वे सब बिना विरोध के पूरी होती रहें।

ऐसे आदमी यह नहीं सोच पाते कि इस संसार में और दूसरे लोग भी हैं। उनकी भी अपनी कुछ वांछायें होती हैं, जिनकी पूर्ति का अधिकार उन्हें भी है। यदि किसी एक की ही सारी वांछायें पूरी होती रहें तो क्या दूसरे लोग अपनी वांछा पूर्ति के अधिकार से वंचित रह जायेंगे? किसी एक की सारी वांछायें पूरी होती रहें यह सम्भव नहीं।

किन्तु स्वार्थी मनुष्य जिनको केवल अपनेपन का ही ध्यान रहता है इस न्याय पर ध्यान नहीं दे पाते। उन्हें अपना स्वार्थ, अपना हित और अपना लाभ ही दीखता रहता है। दूसरों के हित अहित, हानि-लाभ से जैसे कोई मतलब ही नहीं रखते। ऐसे संकीर्णमना व्यक्तियों का दुःखी रहना स्वाभाविक ही है। वे स्वार्थ पूर्ण वांछायें करते ही रहेंगे वे असफल और अपूर्ण होती रहेंगी, उनके मन में क्षोभ और निराशा उत्पन्न होगी और जिसके फलस्वरूप वे दुःख अनुभव ही करते रहेंगे। इस क्रम में न बाधा आ सकती है और न व्यवधान।

ऐसे संकीर्णता, स्वार्थी, लिप्सु और हीन-भावना वाले किसी भी व्यक्ति से मिल कर, फिर चाहे वह अमीर हो या गरीब, सम्पन्न हो अथवा अभावग्रस्त, पढ़ा हो अथवा अनपढ़, स्त्री हो या पुरुष मालूम किया जा सकता है कि क्या वह अपने में जरा भी सुखी है? निश्चय ही वह दुःखी ही निकलेगा। विश्वासपूर्वक पूछने पर वह बतलायेगा कि वह बहुत दुःखी है, सारा संसार उसे क्लेशों से परिपूर्ण विदित होता है।

निश्चय ही ऐसे लोगों के दुःख का कारण उनकी हीन और स्वार्थपूर्ण भावनायें ही होती हैं। दुःख दुर्भावनाओं के कारण होता है। दुर्भावना रखने वाला शैतान ही तो माना गया है, इसलिए महात्मा फ्रांसिस ने कहा है—‘‘दुखी रहना शैतान का काम है।’’

दुःख के कुछ मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं। उनमें से एक संवेदनशीलता भी है। यों तो सामान्य रूप में सम्वेदनशीलता एक गुण है। किन्तु जब यह औचित्य की सीमा से परे निकल जाती है तब दुर्गुणा बन जाती है जिसका परिणाम दुःख ही होता है। अति संवेदनशील व्यक्ति का हृदय भावुकता के कारण बड़ा निर्बल हो जाता है। वह यथार्थ दुःख तो दूर काल्पनिक दुःखों से भी व्यग्र एवं व्याकुल होता रहता है इस क्षण-क्षण बदलते रहने वाले संसार का एक साधारण-सा थपेड़ा ही उन्हें व्याकुल कर देने के लिये बहुत होता है।

क्षण-क्षण परिवर्तित और बनने बिगड़ने वाले पदार्थ, परिस्थितियों और संयोगों के प्रभाव से सुरक्षित रह सकना उनके वश की बात नहीं होती। उन्हें संसार की एक नगण्य सी परिस्थिति झकझोर कर रख देती है और वे क्षुब्ध होकर दुःख अनुभव करने लगते हैं।

इस प्रकार के संवेदनशील व्यक्ति भावुकता के कारण अपनी ही एक काल्पनिक दुनिया बनाए और उनमें ही विचरण करते रहते हैं। विशेषता यह होती है कि उनकी वह काल्पनिक दुनिया इस यथार्थ संसार से सर्वथा भिन्न होती है! होना भी चाहिए यदि उनका संसार इस संसार से भिन्न न हो तो उसके बनाने का प्रयोजन ही क्या रह जाता है?

इस भिन्नता के कारण इस यथार्थ संसार और उनकी काल्पनिक दुनिया में टकराव पैदा होता रहता है। कमजोर एवं निराधार होने से उसकी दुनिया टूटती है, जिसके शोक में वे दुःखी और व्यग्र होते रहते हैं। यदि मनुष्य भावुकता का परित्याग कर, यथार्थ के कठोर धरातल पर ही रहे उसी के अनुसार व्यवहार करे, हर तरह की आने वाली परिस्थिति को संसार का स्वाभाविक क्रम समझकर खुशी-खुशी स्वागत करने को तत्पर रहे तो वह बहुत कुछ दुःख के आक्रमण से अपनी रक्षा कर सकता है।

अज्ञान को तो सारे दुःखों का मूल ही माना गया है। मनुष्य को अधिकांश दुःख तो उसके अज्ञान के कारण ही होते हैं। सुख-दुखों के विषय में यदि मनुष्य का अज्ञान दूर हो जाये तो वह एक बड़ी सीमा तक दुःखों से छुटकारा पा सकता है। सुख-दुःख का अपना कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। उनका अनुभव भ्रम अथवा अज्ञान के कारण ही होता है। यदि मनुष्य एक बार यह समझ सके और विश्वास कर सके कि सुख-दुःखों का सम्बन्ध किन्हीं बाह्य परिस्थितियों से नहीं है, यह मनुष्य की अपनी अनुभूति विशेष के ही परिणाम होते हैं तो शायद वह उनसे उतना प्रभावित न हो जितना कि होता रहता है।

मनुष्य की मान्यता, कल्पना, अनुभूति विशेष और उसकी अपनी मानसिक अवस्था से सुख-दुःख का जन्म होता है। यदि इन अवस्थाओं में अनुकूल परिवर्तन लाया जा सके तो दुःख से छूटने की सम्भावना कोई काल्पनिक बात नहीं है। यदि मनुष्य के दुःखों का सम्बंध परिस्थितियों से होता तो उनका प्रभाव सब पर एक समान ही पड़ना चाहिए। किंतु ऐसा होता नहीं है। जिन एक तरह की परिस्थितियों में कोई एक दुःख और शोक का अनुभव करता है, उन्हीं परिस्थितियों में दूसरा हर्षित और प्रसन्न होता है।

दुःख का आधार अपनी अनुभूति विशेष को न मानकर किन्हीं वाह्य परिस्थितियों को मानना अज्ञान है। इस अज्ञान को दूर किये बिना यदि कोई चाहे कि दुःख से छुटकारा हो जाये तो यह सम्भव न होगा। अनुकूल परिस्थितियों में हर्षातिरेक के वशीभूत हो जाना और प्रतिकूलताओं में रोने-झींकने का स्वभाव स्वयं एक अज्ञान है।

इससे मनुष्य का मस्तिष्क असन्तुलित सा हो जाता है। वह यथार्थ से हटकर अधिकतर भ्रम में ही भटकता और ठोकरें खाता रहता है। उसके ठीक समझने और मूल्यांकन करने की क्षमता नष्ट हो जाती है। वह किसी बात में ठीक-ठीक यह नहीं समझ पाता कि जिन बातों में मैं दुःख मना रहा हूं वह दुःख के असंतुलित स्थिति में मनुष्य गलत-सलत सोचता और वैसा ही व्यवहार करता है, जिससे दुःख का उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है।

दुःख के कारणों में आशक्ति भी एक बड़ा कारण है। यहां पर आसक्ति का एक मोटा-सा अर्थ यह लिया जा सकता है—अत्यधिक अपनेपन का लगाव। जिन बातों में अत्यधिक लगाव होता है, उनको सर्वथा अपने अनुकूल रखने की कामना रहती है। किंतु किसी भी वस्तु अथवा व्यक्ति को हर स्थिति में सर्वथा अपने अनुकूल रख सकना सम्भव नहीं होता। वे अपनी गति में कभी किसी समय भी विपरीत दिशा में घूम सकती है।

ऐसी दशा में उनके प्रति अत्यधिक अपनत्व के कारण दुःख की अनुभूति से बचा नहीं जा सकता। यदि वस्तुओं और व्यक्तियों का स्वतन्त्र अस्तित्व स्वीकार किया जा सके और उन्हें सर्वथा अपने अनुकूल देखने की इच्छा का त्याग किया जा सके तो कोई कारण नहीं कि व्यर्थ में अनुभव होने वाले बहुत से दुःखों का सामना करना पड़े।

ऐसे लोग जो संसार नाटक के पट परिवर्तन से जल्दी प्रभावित नहीं होते दुःखों के आक्रमण से बचे रहते हैं। कामनाओं की पूर्ति के समय उल्लसित हो उठने और आपूर्ति के समय मलीन मन हो जाने का यदि अपना स्वभाव बदला जा सके तो दुःखों के बहुत से कारण आप से आप ही नष्ट हो जायें।

यदि संसार में उदार गम्भीर ओर यथार्थ जीवन लेकर चला जा सके और आसक्ति के साथ अत्यधिक संवेदना को संक्षेप किया जा सके तो हमारी मनोभूमि निश्चय ही इतनी दृढ़ और परिपक्व हो सकती है कि उस पर सुख दुःख की कोई प्रतिक्रिया ही न हो।

‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वेसन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु या कश्रिद् दुखभाग्भवेत्’’—का ऋषि सिद्धान्त लेकर चलने वालों को संसार में किसी प्रकार का दुःख शेष नहीं रह जाता। इस सार्वभौमिक भाव से मनुष्य की स्वार्थपूर्ण संकीर्णता विस्तृत एवं व्यापक हो जाती है। वह अपने को पीछे रख कर दूसरों के लिए सोचता है, दूसरों के लाभ के लिए काम करता है और दूसरों के कल्याण के लिए जीता है।

हृदय में जब अपनत्व का स्थान सर्वस्व ले लेता है तो मनुष्य की अनुभूतियां भी उसकी नहीं रह जातीं। वह दूसरे के दुःख से दुःखी और दूसरे के सुख से सुखी होने लगता है। ऐसी दशा में पर दुःख से कातर मनुष्य को उस कष्ट उस क्लेश में भी एक आध्यात्मिक सुख सन्तोष मिला करता है। अपने को समष्टि में मिला देने पर तो दुःख का सर्वथा अभाव ही हो जाता है।

तथापि बहुत से लोगों को यह प्रक्रिया कठिन तथा दुरूह दिखलाई दे सकती है उनकी मनोभूमि इस योग्य न होना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। ऐसा हो सकता है। अस्तु मध्यम मनोभूमि वाले व्यक्तियों को मध्यम मार्ग, का अवलम्बन ले ही लेना चाहिए। वह मध्यम मार्ग इस प्रकार का हो सकता है। अपनी स्थिति, शक्ति और अधिकार सीमा में रहकर वांछायें की जायें। उन्हें पूरा करने का प्रयत्न किया जाये। फिर भी यदि उनमें से कोई अपूर्ण रह जाये तो इसे संसार की एक साधारण प्रक्रिया मानकर सन्तोष किया जाये।

अनुकूल एवं प्रतिकूल दोनों अवस्थाओं में तटस्थ रहकर अपना कर्तव्य किया जाये और किसी वस्तु अथवा व्यक्ति के प्रति आसक्ति रखकर कोई अपेक्षा न की जाये दुःख से बचने का यह मध्यम उपाय ऐसा नहीं है जो साधारण मनोभूमि वालों के लिए कठिन हो।

सामान्य मध्यम अथवा उच्च जो भी उपाय किया जा सके दुःख से बचने के लिये करना ही चाहिए—क्योंकि दुःखी रहना शैतान का काम है, मनुष्य का नहीं। हमारे लिए मानवोचित रीति-नीति अपना कर ही चलना बुद्धिमानी भी है और कल्याणकारी भी।

दुःख से छुटकारा कैसे मिले?
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देखने में आता है कि सुख-स्वास्थ्य, दूध पूत, धन-दौलत, यश-मान सभी कुछ होते हुए भी अधिकांश व्यक्ति दुःखी रहते हैं। कोई विरले व्यक्ति होंगे, जो परिवार के कीचड़ में फंस कर भी कमल की तरह उससे अलिप्त और अप्रभावित रहते हों। तब क्या नानकजी की यह वाणी सत्य है कि ‘नानक दुखिया सब संसार।’ किसी ज्ञानी ने सुख की परिभाषा इन शब्दों में की है—

‘‘इस सृष्टि में दुःख ही व्यापक है। दुःख के अभाव को ही सुख कहना उचित होगा।’’

तब तो यह मानकर ही चलना अधिक कल्याणकर होगा कि सुख तो दो दिन का साथी है असल में दुःख ही चिरसंगी है। इस चिरसंगी के साथ जो व्यक्ति समझौता करना जानता है, उसे दुःख गहराई तक प्रभावित नहीं कर पाता। मनुष्य जीवन की सार्थकता इस सांसारिक रगड़े झगड़े से ऊपर उठने में है, नहीं तो ये आप पर हावी हो जायेंगे। आपको पराजित कर आपकी आत्मिक शक्ति को मरोड़कर रख देंगे।

दुःख के मूल कारण माने जाते हैं अभाव, प्रियजन की मृत्यु, बीमारी, कुरूपता, शारीरिक बल की कमी, प्रेम में असफलता, ईर्ष्या, घृणा और डर की बातें।

उपर्युक्त परिस्थितियों में प्रत्येक व्यक्ति की अनुभूति विभिन्न प्रकार से हो सकती है। किसी व्यक्ति के लिए अभाव का मतलब है जीवन की जरूरतों को पूरा करने के साधनों की कमी। सन्तोषी मनुष्य भगवान से केवल इतना ही मांगकर सन्तुष्ट है कि—

साईं इतना दीजिए, जामें कुटुम समय ।
मैं भी भूखा ना रहूं, अतिथि ना भूखा जाय ।।

जब कि ठीक इसके विपरीत ऐसे लोग भी हैं कि सब कुछ पाकर भी तृष्णा के शिकार बने रहते हैं। उनकी ‘हाय और, ‘हाय और, की पुकार कभी बन्द ही नहीं होती। दुर्बल हृदय व्यक्ति को यदि जरा-सा जुकाम भी हुआ या 99 डिग्री भी बुखार हुआ तो वह दिन में दस बार अपनी नब्ज़ देखेगा और इसी चिन्ता में परेशान रहेगा कि शायद अब उसे निमोनिया होने जा रहा है, जब कि दूसरों की चिन्ता में रत परोपकारी व्यक्ति अपना दुःख दर्द भूलकर बीमारी और अभावों में भी सेवा कार्य करते देखे गए हैं।

जीवन में असफलता दृढ़ निश्चयी को आगे बढ़ने की प्रेरणा देगी, जब कि एक निराशावादी को जीवन में मामूली-सी असफलता भी आत्मघात करने की हद तक पागल बना सकती है।

इससे यह प्रमाणित होता है कि प्रतिकूल परिस्थितियों को हम वास्तव में दुःख का कारण नहीं कह सकते। असल में यह प्रत्येक मनुष्य की अपनी अपनी समझ, परख और जीवन के प्रति दृष्टिकोण है, जो कि अभाव, असफलता ओर प्रतिकूल परिस्थितियों को दुःख की संज्ञा देता है। अब देखना यह है कि क्या धन-दौलत, स्वास्थ्य, सौन्दर्य, सन्तान, भोग विलास आदि मनुष्य के जीवन को सुख, शान्ति और सन्तोष से भर देने में समर्थ हैं? क्या इनके द्वारा दुःखों से छुटकारा मिल सकता है?

कर्मशील व्यक्ति के लिए तो धन हाथ का मैल है। उस को यदि कार्य में सफलता मिलती है तो यही उसका पुरस्कार है। हां, मेरा बैंक-बैलेंस दिन पर दिन बढ़ रहा है और मेरा परिश्रम धन के रूप में साकार हो रहा है यह जान कर चाहे उसे आत्म-सन्तुष्टि हो, पर क्या वह स्वअर्जित अपार धन राशि को भोगने में खुद समर्थ है? पुरुष पुरातन की वधू लक्ष्मी चंचला है। अगर धन बटता नहीं और उसे होनहार पुरुषार्थियों का संरक्षण प्राप्त नहीं होता तो वह जरूर नष्ट हो जाता है।

धन मनुष्य को निर्दय, अधिकार से अन्धा और दंभी बना देता है। अमीरों और धनियों की अपनी मुसीबतें हैं हरदम उन्हें अपने धन की रक्षा की चिन्ता बनी रहती है। आगे इसको संभालने वाला सुयोग्य वारिस होना चाहिए इसी चिन्ता में वे घुलते रहते हैं। निन्यानवे के फेर में पड़कर वे धन का सदुपयोग ही भूल जाते हैं। धन का बढ़ता हुआ ढेर ही उनके जीवन की चिन्ताओं का मूल कारण बन जाता है। धन साधन न होकर जीवन का ध्येय बनकर रह जाता है।

अब लीजिए स्वास्थ्य को। इसमें कोई सन्देह नहीं कि ‘तन्दुरुस्ती हजार न्यामत है’ और सुन्दर तथा सुडौल काया एक वरदान है, पर यह भी तो चिरस्थायी नहीं है। कई बूढ़े पंगु भी अपने में मस्त और सुखी पाये गये हैं जब कि बड़े-बड़े पहलवान, नौजवान और रूपगर्विता नारियां भी किसी रोग या दुर्घटना का शिकार होकर अपना महत्व खो बैठते हैं। सभी स्वस्थ पुरुष सुखी तो नहीं होते और न सभी आकर्षक सुन्दरियां पति की प्यारी ही होती हैं। जो वस्तु अपने को प्राप्य न हो उस ओर मनुष्य लपकता है। सुन्दरी युवती का पति भी दूसरी स्त्रियों के प्रति आकृष्ट होता देखा गया है।

युवावस्था में मित्रता, घनिष्ठता, विश्वास और भावुकता मिलकर प्रेम का रूप लेते हैं। मैं किसी का हो जाऊं किसी को अपना बना लूं, यह लालसा प्रेमी को दीवाना बना देती है। प्रेमिका के बिना उसे दुनिया सुनी लगती है। उसको पाकर वह निहाल हो जाता है। पर थोड़े दिनों में जब प्रेम का खुमार उतर जाता है, तब वे प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे के दोषों की कटु आलोचना करते नहीं थकते।

कभी-कभी यौवन का यह उन्माद प्रेम वासना की सुनहली गली को पार करके जब यथार्थता की भूमि पर से गुजरता है तो समझदार प्रेमी-प्रेमिकाएं अपना सन्तुलन नहीं खोते। एक दूसरे के गुणों की कद्र करते हैं। उनका प्रेम विश्वास और सहयोग का पुट पाकर गम्भीर और स्थायी हो जाता है। यह प्रेम की विजय न होकर उनकी समझदारी की जय होती है।

प्रेम में ईर्ष्या या अधिकार की भावना ही दुःख का कारण बनती है। सच्चा प्रेम किसी व्यवसाय में लगाई हुई पूंजी नहीं है कि जिसके बदले में प्राप्ति दिनों दिन बढ़ती जाए, न वह फिफ्टी- फिफ्टी का सौदा ही है। यहां तो देने में ही सुख है। लेने का जहां हिसाब लगाने बैठे कि प्रेम दुःख का कारण बन जाएगा।

लालसाओं का अन्त नहीं, एक के बाद एक बढ़ती ही जाती हैं। जिस बात की पूर्ति इन्सान अपने जीवन में नहीं कर पाता, उसकी पूर्ति वह अपनी संतान के जीवन में देखना चाहता है। निस्सन्तान व्यक्ति अपने वंश की बेल को समाप्त होते देख अत्यन्त दुःखी होता है। उसे इस बात से सन्तुष्टि नहीं होती कि मनुष्य का नाम उसकी सन्तान से नहीं सुकर्मों से अमर होता है। सन्तान जहां नाम चलाती है, वहां डुबोती भी है। गृहस्थियों की अनेक चिन्ताओं का कारण सन्तान ही होती है। बच्चे का पालन पोषण, उसकी तरक्की के लिए अनेक साधन जुटाने का काम क्या कम परेशानी का है?

सन्तान के पीछे मनुष्य कितने प्रलोभनों और दुर्बलताओं का शिकार बनता है। उद्देश्य और अनुशासन-हीन लड़के मां-बाप की जिन्दगी को दूभर करके रख देते हैं। इसलिए निस्सन्तान व्यक्ति को इस पहलू से विचार करते हुये आत्म-सन्तोष करना चाहिए। अपनी सन्तान नहीं तो दूसरों के बच्चों को प्यार दुलार कर वे अपने मन को प्रसन्न कर सकते हैं। किसी गरीब, पर योग्य बालक को अपना कर अपना जीवन सरस बना सकते हैं।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि कर्म करो पर फल की आशा मत करो। सुख पाने में नहीं त्यागने में है। सुख के पीछे बावले होकर दौड़ने में नहीं, अपितु कर्मशील होकर दुःख और मुसीबतों से जूझने में है। यदि आप दुःख को जीत लेते हैं, उसे अपने पर हावी नहीं होने देते तो आप सुखी हैं। आसक्ति से दूर रहकर दूसरों के लिए जिए। जो मनुष्य अपने परिवार को भूलकर दूसरों के लिए जीता है, उसी को जीने का सच्चा आनन्द मिलता है। मां-बाप इसी प्रेरणा के वशीभूत होकर अपने बच्चों के लिए जीते हैं। उसकी सफलता, सुख और आनन्द में उन्हें सन्तोष मिलता है।

इसी भावना को अधिक व्यापक बनाने का प्रयत्न करने से मनुष्य परिवार के दायरे से निकल कर समाजोपयोगी जीवन व्यतीत करने में समर्थ हो पाता है। माया मोह आर्थिक दृष्टिकोण, स्वार्थ, अर्थप्रधान नीति मनुष्य को जहां एक ओर स्वार्थी बनाती हैं, उसकी वृत्ति को संकुचित करती हैं, वहां दूसरी ओर दुःख की अनुभूति को तीव्र भी कर देती हैं। मनुष्य परिस्थितियों का दास बन जाता है और जीवन के वास्तविक सौन्दर्य से भी अनजान रह जाता है। उसकी दिलचस्पी, प्रेम, त्याग और सहयोग का दायरा संकुचित हो जाता है।

इन्सान दुर्बलताओं का पुतला है, वह परिस्थिति का दास बन जाता है इस तथ्य को स्वीकार करके मनुष्य को दूसरे को उदारता और सहानुभूति के साथ समझने की चेष्टा करनी चाहिए। आप जैसा व्यवहार अपने प्रति चाहते हैं, वैसा ही दूसरे के प्रति करें। अपने मन को टटोलें।

यदि आपकी आत्मा आपको चेतावनी देती है, तो उसे सुनें। अपराधी और अन्यायी चाहे समाज से बच जाए पर आत्मा की कचोट उसे चैन से नहीं रहने देगी। अपने को धोखा देना ही सबसे बड़ा धोखा है। पछतावे की अग्नि बड़ी दारुण होती है। उसमें तपे बिना आत्मा पवित्र नहीं हो सकती।

दूसरों से कुछ पाने में ही सुख नहीं है, देने में भी सुख है। किसी भूखे को खाना खिलाकर या किसी असहाय की मदद करके आपको जो आनन्द मिलता है, उसके आशीर्वाद से आपका जो आत्मिक बल बढ़ता है, वह कुछ कम नहीं है। ‘‘मैं भी दूसरों को सुखी बना सकता हूं, मेरे सहयोग की किसी को अपेक्षा है’’ यह भरोसा आत्म-विश्वास पैदा करता है।

जो इन्सान अपने को भूलकर दूसरों के लिए जीता है, उसको दुःख नहीं व्यापता। अधिकांश माताएं और पत्नियां अपने बच्चों व पतियों के लिए बड़े से बड़ा दुःख सहने को तैयार रहती हैं। उन्हें अपने खाने-पीने या आराम की परवाह नहीं रहती। इसीलिए माता का दर्जा पिता से अधिक ऊंचा माना गया है।

दुःख को जीतने के लिए हमें अपनी कमजोरियों को ही जीतना होगा। स्वार्थ, माया मोह, ईर्ष्या, क्रोध, द्वेष आदि से ऊपर उठकर ही मनुष्य दुःख के शिकंजे से छुटकारा पा सकता है।

14/06/2018

#युवा_जोश : #संवारें_कैरियर_1

📮पुरातत्व में संवारें कैरियर📮
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यह तो आप जानते ही हैं कि किसी देश की सभ्यता जानने के लिए इतिहास का अध्ययन करना बहुत जरुरी है और भारत का इतिहास हज़ारों पांडुलिपियों , रिकॉर्ड , अभिलेखों आदि से भरा पड़ा है। इनमे से अधिकतर चीज़ों को संरक्षित किया जा चुका है। इनका संरक्षण करना भी बेहद जरुरी है, क्योंकि इससे हमारे इतिहास का भी पता चलता रहता है। तो हम आपको इस क्षेत्र से सम्बंधित और भी जानकारी बताते हैं, जो आपके करियर को संवार सकता है।

इतिहास न सिर्फ कई राज़ दबाए रखा है बल्कि साथ के साथ कई शोधकर्ताओं और इतिहासकारों के लम्बे शोध का विषय भी है। इसमें शोध करने वाली टीमें इतिहास को लोगों के सामने लाती है। Students ने प्राचीन , मध्य और आधुनिक काल का इतिहास , शासन प्रणाली , साम्राज्य , धार्मिक व्यवस्था व लिपि आदि के बारे में अपनी कक्षा में पढ़ा ही होगा।

लेकिन यह सब इतिहास क्षेत्र का मान लीजिये सिर्फ basic ही था। इस क्षेत्र में Specialisation करने वाले लोग Archaelogy , museology का अध्ययन करते हैं। इसके अंतर्गत सामाजिक परिस्तिथियों का अध्ययन , शिल्प तथ्यों , स्मारक अवशेषों , भवन अवशेषों , प्राचीन मुद्राओं , जीवाश्मों , प्राचीन पुस्तकों , शिलालेखों , मंदिरों , मूर्तियों , गुफा चित्रों की पहचान आदि के बारे में जानकारी हासिल की जाती है।

👉कई नए अवसरों की रखता है नींव :

History एक ऐसा subject है, जिसकी पढ़ाई students school level से ही करना शुरू कर देते हैं। Graduate level (BA) में history का अध्ययन कई नए अवसरों की नींव रखता है। इसके बाद Master graduate (MA व MSC) में भी इतिहास की कई शाखाओं का अध्ययन किया जा सकता है। वैसे कई Institute भी Diploma , Specialisation और Short-term coursesभी कराते हैं।

👉अपने अंदर यह Talent Develop करने होंगे :

इस क्षेत्र में success होने के लिए अपने अंदर professionals के कई गुण अपने अंदर लाने होंगे। इसके साथ साथ अपने अंदर समस्या का हल ढूंढ़ना , Creativity , शोध करने का कौशल , Group-discussions , Communication Skills आदि गुण होने बेहद जरुरी है। इसके अलावा अपने अंदर किसी भी रहस्य को जानने की कला को develop करना होगा।

👉बारीकी से करना होगा अध्ययन :

यह एक ऐसा करियर है जिसमे आगे चलकर वही सफलता हासिल कर सकता है। जो इस क्षेत्र में बारीकी से अध्ययन करते हैं , क्योंकि जब इसमें आपकी नींव मज़बूत हो जाएगी तो सफलता के अवसर भी कई गुणा बढ़ जाते हैं।

👉पाठ्यक्रम जो जरुरी है :

1. BA in History/Ancient History/Medieval History/Modern History.
2. BA (Honours) in History.
3. MA in History/Ancient History/Medieval History/Modern History.
4. Msc in Global History/Economic History.
5. M.phil in History.
6. P.hd in Ancient History.
7. Short term Course in Air and Conservation of Books.
8. Diploma in Heritage Management.

👉रोज़गार की संभावनाएं :

इसमें सफलतापूर्वक कोर्स करने के बाद Govt. और private दोनों जगह जॉब की संभावनाएं हैं। Govt. job के अंतर्गत जहाँ professionals को Archaelogical Survey of India , Armed forces , सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय , बैंक , International Developement Organisation , Government Museum या Gallery में जॉब के अवसर मिलते हैं। इसके अलावा Accountancy firm , उच्च शिक्षण संस्थान , Law firm , Management Consultancy , Publishing Company , Retailing Company , Charitage and Heritage Organisation , National Park Services आदि कई ऐसे private Institutes हैं , जो Students को नौकरी देते हैं।

👉इस रूप में प्राप्त हो सकता है अवसर :

1. Heritage Manager.
2. Conservation Officer.
3. Museum Education Officer.
4. Museum/Gallery Curator.
5. Museum Exhibition Officer.
6. School Teacher/Librarian.
7. Archaelogist.
8. Broadcast Journalist.

👉Civil Services में भी इतिहास है मददग़ार :

इतिहास एक विषय भी है , जिसमे Civil Services की परीक्षाओं में भी छात्र चयनित होते हैं और आज यही कारण है कि अधिकतर छात्र इतिहास विषय की ओर रुख कर रहे हैं। प्रारंभिक परीक्षा में सामान्य अध्ययन के करीब 20 से 25 प्रश्न इतिहास से होते हैं और मुख्य परीक्षा में इस 150 अंक के प्रश्न पूछे जाते हैं। ये सभी प्रश्न Modern India , 1857 का विद्रोह , प्राचीन भारत में सिंधु घाटी की सभ्यता , सामाजिक-धार्मिक आंदोलन , National Movement, विश्व में घटी नई घटनाएं आदि से सम्बंधित होते हैं। इनका syllabus same ही रहता है।

👉वेतन :

इस क्षेत्र में Professionals का वेतन उनकी योग्यता के ऊपर निर्भर करती है। Govt. Institutes में शुरूआती दौर में Professionals को 25 से 30 हज़ार रूपये प्रतिमाह मिलते हैं। तीन-चार साल का अनुभव होने के बाद यह वेतन 35-40 हज़ार रूपये हो जाती है। इसमें प्रदर्शन के आधार पर प्रमोशन होता है। इसके अलावा College में Teaching के field से जुड़े Professionals को शुरुआत में 40-42 हज़ार आसानी से मिल जाते हैं।

👉शिक्षा हासिल करने हेतु प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान :

1. Delhi University , New Delhi (www.du.ac.in).

2. Allahabad University , Allahabad (www.allduniv.ac.in).

3.Banaras Hindu University , Varanasi (www.bhu.ac.in).

4. Chaudhary Charan Singh University , Meerut (www.ccsuniversity.ac.in).

5. Saint Xavier College , Mumbai (www.xaviers.edu).

6. Deendayal Upadhyay Gorakhpur University (www.ddugu.edu.in).

7. Madras Christian College , Chennai (www.mcc.edu.in).

8. Sophia College for Women , Maharashtra (www.sophiacollegemumbai.com).

#युवा_जोश कालम विशेषतः युवा वर्ग के कैरियर को दृष्टिगत रखते हुए आरंभ किया जा रहा है। आपको यह कालम कैसा लगा कृपया कमेंट बॉक्स मे अवश्य बतायें।

धन्यवाद!

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Lakhanpur, Bhullanpur PAC
Varanasi
221108

Telephone

9415274987

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