14/06/2018
📯अज्ञान दुखों का मूल है, त्यागे📯
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सन्त फ्रांसिस का कथन है—‘‘दुःखी रहना शैतान का काम है।’’ इस कथन का तात्पर्य इसके सिवाय और क्या हो सकता है कि दुःखी रहना मानवीय प्रवृत्ति नहीं है। यह एक निकृष्ट प्रवृत्ति है जो मनुष्य को शोभा नहीं देती। तथापि, अधिकतर लोग दुःखी ही दिखाई पड़ते हैं।
अब प्रश्न उठता है कि जब दुःख रहना मानवीय प्रवृत्ति नहीं है, तब आखिर मनुष्य दुःखी क्यों रहते हैं? क्या कोई ऐसी अदृश्य शक्ति है जो मनुष्य को उसकी प्रवृत्ति के विरुद्ध दुःखी रहने को विवश करती है?
इस विषय में एक नहीं अनेक ऐसे प्रश्न और शंकायें उठ सकती हैं, किन्तु वास्तविकता यह है कि कोई वाह्य कारण अथवा अदृश्य शक्ति मनुष्य को दुःख नहीं रखती है, मनुष्य अपने स्वयं के अज्ञान और दुर्बलता के कारण, अकारण ही दुःखी रहता है। वैसे न सुख का और न दुःख का, अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व है। ये मनुष्य की अपनी निर्बल अनुभूतियां ही हैं जो सुख दुःख के रूप में आभासित होती हैं।
अदृश्य शक्ति को इस प्रसंग के बीच से निकाल ही दिया जाये, यही ठीक होगा। क्योंकि अदृश्य शक्ति तटस्थ और निरपेक्ष शक्ति होती है। वह चेतना प्रदान करने के सिवाय मनुष्य के जीवन में अधिक हस्तक्षेप नहीं करती। उसको इस प्रसंग में खींच लाने पर मानवीय धरातल पर सुख-दुःख और उसके कारणों का विवेचन कर सकना कठिन हो जायेगा।
दुःख का एक स्थूल-सा करना है वांछा का विरोध। जो हम चाहते हैं उसको न पा सकने पर जो क्षोभ अथवा निराशा होती है वही दुःख रूप में अनुभव होती है। मनुष्य को समझना चाहिए कि सभी वांछायें कभी पूरी नहीं होतीं, वांछाएं वे ही पूरी होती हैं जो उचित और उपयुक्त होती हैं। किन्तु अज्ञानी व्यक्ति इसका विचार न कर अपनी वांछायें बढ़ाते चले जाते हैं कि वे सब बिना विरोध के पूरी होती रहें।
ऐसे आदमी यह नहीं सोच पाते कि इस संसार में और दूसरे लोग भी हैं। उनकी भी अपनी कुछ वांछायें होती हैं, जिनकी पूर्ति का अधिकार उन्हें भी है। यदि किसी एक की ही सारी वांछायें पूरी होती रहें तो क्या दूसरे लोग अपनी वांछा पूर्ति के अधिकार से वंचित रह जायेंगे? किसी एक की सारी वांछायें पूरी होती रहें यह सम्भव नहीं।
किन्तु स्वार्थी मनुष्य जिनको केवल अपनेपन का ही ध्यान रहता है इस न्याय पर ध्यान नहीं दे पाते। उन्हें अपना स्वार्थ, अपना हित और अपना लाभ ही दीखता रहता है। दूसरों के हित अहित, हानि-लाभ से जैसे कोई मतलब ही नहीं रखते। ऐसे संकीर्णमना व्यक्तियों का दुःखी रहना स्वाभाविक ही है। वे स्वार्थ पूर्ण वांछायें करते ही रहेंगे वे असफल और अपूर्ण होती रहेंगी, उनके मन में क्षोभ और निराशा उत्पन्न होगी और जिसके फलस्वरूप वे दुःख अनुभव ही करते रहेंगे। इस क्रम में न बाधा आ सकती है और न व्यवधान।
ऐसे संकीर्णता, स्वार्थी, लिप्सु और हीन-भावना वाले किसी भी व्यक्ति से मिल कर, फिर चाहे वह अमीर हो या गरीब, सम्पन्न हो अथवा अभावग्रस्त, पढ़ा हो अथवा अनपढ़, स्त्री हो या पुरुष मालूम किया जा सकता है कि क्या वह अपने में जरा भी सुखी है? निश्चय ही वह दुःखी ही निकलेगा। विश्वासपूर्वक पूछने पर वह बतलायेगा कि वह बहुत दुःखी है, सारा संसार उसे क्लेशों से परिपूर्ण विदित होता है।
निश्चय ही ऐसे लोगों के दुःख का कारण उनकी हीन और स्वार्थपूर्ण भावनायें ही होती हैं। दुःख दुर्भावनाओं के कारण होता है। दुर्भावना रखने वाला शैतान ही तो माना गया है, इसलिए महात्मा फ्रांसिस ने कहा है—‘‘दुखी रहना शैतान का काम है।’’
दुःख के कुछ मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं। उनमें से एक संवेदनशीलता भी है। यों तो सामान्य रूप में सम्वेदनशीलता एक गुण है। किन्तु जब यह औचित्य की सीमा से परे निकल जाती है तब दुर्गुणा बन जाती है जिसका परिणाम दुःख ही होता है। अति संवेदनशील व्यक्ति का हृदय भावुकता के कारण बड़ा निर्बल हो जाता है। वह यथार्थ दुःख तो दूर काल्पनिक दुःखों से भी व्यग्र एवं व्याकुल होता रहता है इस क्षण-क्षण बदलते रहने वाले संसार का एक साधारण-सा थपेड़ा ही उन्हें व्याकुल कर देने के लिये बहुत होता है।
क्षण-क्षण परिवर्तित और बनने बिगड़ने वाले पदार्थ, परिस्थितियों और संयोगों के प्रभाव से सुरक्षित रह सकना उनके वश की बात नहीं होती। उन्हें संसार की एक नगण्य सी परिस्थिति झकझोर कर रख देती है और वे क्षुब्ध होकर दुःख अनुभव करने लगते हैं।
इस प्रकार के संवेदनशील व्यक्ति भावुकता के कारण अपनी ही एक काल्पनिक दुनिया बनाए और उनमें ही विचरण करते रहते हैं। विशेषता यह होती है कि उनकी वह काल्पनिक दुनिया इस यथार्थ संसार से सर्वथा भिन्न होती है! होना भी चाहिए यदि उनका संसार इस संसार से भिन्न न हो तो उसके बनाने का प्रयोजन ही क्या रह जाता है?
इस भिन्नता के कारण इस यथार्थ संसार और उनकी काल्पनिक दुनिया में टकराव पैदा होता रहता है। कमजोर एवं निराधार होने से उसकी दुनिया टूटती है, जिसके शोक में वे दुःखी और व्यग्र होते रहते हैं। यदि मनुष्य भावुकता का परित्याग कर, यथार्थ के कठोर धरातल पर ही रहे उसी के अनुसार व्यवहार करे, हर तरह की आने वाली परिस्थिति को संसार का स्वाभाविक क्रम समझकर खुशी-खुशी स्वागत करने को तत्पर रहे तो वह बहुत कुछ दुःख के आक्रमण से अपनी रक्षा कर सकता है।
अज्ञान को तो सारे दुःखों का मूल ही माना गया है। मनुष्य को अधिकांश दुःख तो उसके अज्ञान के कारण ही होते हैं। सुख-दुखों के विषय में यदि मनुष्य का अज्ञान दूर हो जाये तो वह एक बड़ी सीमा तक दुःखों से छुटकारा पा सकता है। सुख-दुःख का अपना कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। उनका अनुभव भ्रम अथवा अज्ञान के कारण ही होता है। यदि मनुष्य एक बार यह समझ सके और विश्वास कर सके कि सुख-दुःखों का सम्बन्ध किन्हीं बाह्य परिस्थितियों से नहीं है, यह मनुष्य की अपनी अनुभूति विशेष के ही परिणाम होते हैं तो शायद वह उनसे उतना प्रभावित न हो जितना कि होता रहता है।
मनुष्य की मान्यता, कल्पना, अनुभूति विशेष और उसकी अपनी मानसिक अवस्था से सुख-दुःख का जन्म होता है। यदि इन अवस्थाओं में अनुकूल परिवर्तन लाया जा सके तो दुःख से छूटने की सम्भावना कोई काल्पनिक बात नहीं है। यदि मनुष्य के दुःखों का सम्बंध परिस्थितियों से होता तो उनका प्रभाव सब पर एक समान ही पड़ना चाहिए। किंतु ऐसा होता नहीं है। जिन एक तरह की परिस्थितियों में कोई एक दुःख और शोक का अनुभव करता है, उन्हीं परिस्थितियों में दूसरा हर्षित और प्रसन्न होता है।
दुःख का आधार अपनी अनुभूति विशेष को न मानकर किन्हीं वाह्य परिस्थितियों को मानना अज्ञान है। इस अज्ञान को दूर किये बिना यदि कोई चाहे कि दुःख से छुटकारा हो जाये तो यह सम्भव न होगा। अनुकूल परिस्थितियों में हर्षातिरेक के वशीभूत हो जाना और प्रतिकूलताओं में रोने-झींकने का स्वभाव स्वयं एक अज्ञान है।
इससे मनुष्य का मस्तिष्क असन्तुलित सा हो जाता है। वह यथार्थ से हटकर अधिकतर भ्रम में ही भटकता और ठोकरें खाता रहता है। उसके ठीक समझने और मूल्यांकन करने की क्षमता नष्ट हो जाती है। वह किसी बात में ठीक-ठीक यह नहीं समझ पाता कि जिन बातों में मैं दुःख मना रहा हूं वह दुःख के असंतुलित स्थिति में मनुष्य गलत-सलत सोचता और वैसा ही व्यवहार करता है, जिससे दुःख का उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है।
दुःख के कारणों में आशक्ति भी एक बड़ा कारण है। यहां पर आसक्ति का एक मोटा-सा अर्थ यह लिया जा सकता है—अत्यधिक अपनेपन का लगाव। जिन बातों में अत्यधिक लगाव होता है, उनको सर्वथा अपने अनुकूल रखने की कामना रहती है। किंतु किसी भी वस्तु अथवा व्यक्ति को हर स्थिति में सर्वथा अपने अनुकूल रख सकना सम्भव नहीं होता। वे अपनी गति में कभी किसी समय भी विपरीत दिशा में घूम सकती है।
ऐसी दशा में उनके प्रति अत्यधिक अपनत्व के कारण दुःख की अनुभूति से बचा नहीं जा सकता। यदि वस्तुओं और व्यक्तियों का स्वतन्त्र अस्तित्व स्वीकार किया जा सके और उन्हें सर्वथा अपने अनुकूल देखने की इच्छा का त्याग किया जा सके तो कोई कारण नहीं कि व्यर्थ में अनुभव होने वाले बहुत से दुःखों का सामना करना पड़े।
ऐसे लोग जो संसार नाटक के पट परिवर्तन से जल्दी प्रभावित नहीं होते दुःखों के आक्रमण से बचे रहते हैं। कामनाओं की पूर्ति के समय उल्लसित हो उठने और आपूर्ति के समय मलीन मन हो जाने का यदि अपना स्वभाव बदला जा सके तो दुःखों के बहुत से कारण आप से आप ही नष्ट हो जायें।
यदि संसार में उदार गम्भीर ओर यथार्थ जीवन लेकर चला जा सके और आसक्ति के साथ अत्यधिक संवेदना को संक्षेप किया जा सके तो हमारी मनोभूमि निश्चय ही इतनी दृढ़ और परिपक्व हो सकती है कि उस पर सुख दुःख की कोई प्रतिक्रिया ही न हो।
‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वेसन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु या कश्रिद् दुखभाग्भवेत्’’—का ऋषि सिद्धान्त लेकर चलने वालों को संसार में किसी प्रकार का दुःख शेष नहीं रह जाता। इस सार्वभौमिक भाव से मनुष्य की स्वार्थपूर्ण संकीर्णता विस्तृत एवं व्यापक हो जाती है। वह अपने को पीछे रख कर दूसरों के लिए सोचता है, दूसरों के लाभ के लिए काम करता है और दूसरों के कल्याण के लिए जीता है।
हृदय में जब अपनत्व का स्थान सर्वस्व ले लेता है तो मनुष्य की अनुभूतियां भी उसकी नहीं रह जातीं। वह दूसरे के दुःख से दुःखी और दूसरे के सुख से सुखी होने लगता है। ऐसी दशा में पर दुःख से कातर मनुष्य को उस कष्ट उस क्लेश में भी एक आध्यात्मिक सुख सन्तोष मिला करता है। अपने को समष्टि में मिला देने पर तो दुःख का सर्वथा अभाव ही हो जाता है।
तथापि बहुत से लोगों को यह प्रक्रिया कठिन तथा दुरूह दिखलाई दे सकती है उनकी मनोभूमि इस योग्य न होना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। ऐसा हो सकता है। अस्तु मध्यम मनोभूमि वाले व्यक्तियों को मध्यम मार्ग, का अवलम्बन ले ही लेना चाहिए। वह मध्यम मार्ग इस प्रकार का हो सकता है। अपनी स्थिति, शक्ति और अधिकार सीमा में रहकर वांछायें की जायें। उन्हें पूरा करने का प्रयत्न किया जाये। फिर भी यदि उनमें से कोई अपूर्ण रह जाये तो इसे संसार की एक साधारण प्रक्रिया मानकर सन्तोष किया जाये।
अनुकूल एवं प्रतिकूल दोनों अवस्थाओं में तटस्थ रहकर अपना कर्तव्य किया जाये और किसी वस्तु अथवा व्यक्ति के प्रति आसक्ति रखकर कोई अपेक्षा न की जाये दुःख से बचने का यह मध्यम उपाय ऐसा नहीं है जो साधारण मनोभूमि वालों के लिए कठिन हो।
सामान्य मध्यम अथवा उच्च जो भी उपाय किया जा सके दुःख से बचने के लिये करना ही चाहिए—क्योंकि दुःखी रहना शैतान का काम है, मनुष्य का नहीं। हमारे लिए मानवोचित रीति-नीति अपना कर ही चलना बुद्धिमानी भी है और कल्याणकारी भी।
दुःख से छुटकारा कैसे मिले?
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देखने में आता है कि सुख-स्वास्थ्य, दूध पूत, धन-दौलत, यश-मान सभी कुछ होते हुए भी अधिकांश व्यक्ति दुःखी रहते हैं। कोई विरले व्यक्ति होंगे, जो परिवार के कीचड़ में फंस कर भी कमल की तरह उससे अलिप्त और अप्रभावित रहते हों। तब क्या नानकजी की यह वाणी सत्य है कि ‘नानक दुखिया सब संसार।’ किसी ज्ञानी ने सुख की परिभाषा इन शब्दों में की है—
‘‘इस सृष्टि में दुःख ही व्यापक है। दुःख के अभाव को ही सुख कहना उचित होगा।’’
तब तो यह मानकर ही चलना अधिक कल्याणकर होगा कि सुख तो दो दिन का साथी है असल में दुःख ही चिरसंगी है। इस चिरसंगी के साथ जो व्यक्ति समझौता करना जानता है, उसे दुःख गहराई तक प्रभावित नहीं कर पाता। मनुष्य जीवन की सार्थकता इस सांसारिक रगड़े झगड़े से ऊपर उठने में है, नहीं तो ये आप पर हावी हो जायेंगे। आपको पराजित कर आपकी आत्मिक शक्ति को मरोड़कर रख देंगे।
दुःख के मूल कारण माने जाते हैं अभाव, प्रियजन की मृत्यु, बीमारी, कुरूपता, शारीरिक बल की कमी, प्रेम में असफलता, ईर्ष्या, घृणा और डर की बातें।
उपर्युक्त परिस्थितियों में प्रत्येक व्यक्ति की अनुभूति विभिन्न प्रकार से हो सकती है। किसी व्यक्ति के लिए अभाव का मतलब है जीवन की जरूरतों को पूरा करने के साधनों की कमी। सन्तोषी मनुष्य भगवान से केवल इतना ही मांगकर सन्तुष्ट है कि—
साईं इतना दीजिए, जामें कुटुम समय ।
मैं भी भूखा ना रहूं, अतिथि ना भूखा जाय ।।
जब कि ठीक इसके विपरीत ऐसे लोग भी हैं कि सब कुछ पाकर भी तृष्णा के शिकार बने रहते हैं। उनकी ‘हाय और, ‘हाय और, की पुकार कभी बन्द ही नहीं होती। दुर्बल हृदय व्यक्ति को यदि जरा-सा जुकाम भी हुआ या 99 डिग्री भी बुखार हुआ तो वह दिन में दस बार अपनी नब्ज़ देखेगा और इसी चिन्ता में परेशान रहेगा कि शायद अब उसे निमोनिया होने जा रहा है, जब कि दूसरों की चिन्ता में रत परोपकारी व्यक्ति अपना दुःख दर्द भूलकर बीमारी और अभावों में भी सेवा कार्य करते देखे गए हैं।
जीवन में असफलता दृढ़ निश्चयी को आगे बढ़ने की प्रेरणा देगी, जब कि एक निराशावादी को जीवन में मामूली-सी असफलता भी आत्मघात करने की हद तक पागल बना सकती है।
इससे यह प्रमाणित होता है कि प्रतिकूल परिस्थितियों को हम वास्तव में दुःख का कारण नहीं कह सकते। असल में यह प्रत्येक मनुष्य की अपनी अपनी समझ, परख और जीवन के प्रति दृष्टिकोण है, जो कि अभाव, असफलता ओर प्रतिकूल परिस्थितियों को दुःख की संज्ञा देता है। अब देखना यह है कि क्या धन-दौलत, स्वास्थ्य, सौन्दर्य, सन्तान, भोग विलास आदि मनुष्य के जीवन को सुख, शान्ति और सन्तोष से भर देने में समर्थ हैं? क्या इनके द्वारा दुःखों से छुटकारा मिल सकता है?
कर्मशील व्यक्ति के लिए तो धन हाथ का मैल है। उस को यदि कार्य में सफलता मिलती है तो यही उसका पुरस्कार है। हां, मेरा बैंक-बैलेंस दिन पर दिन बढ़ रहा है और मेरा परिश्रम धन के रूप में साकार हो रहा है यह जान कर चाहे उसे आत्म-सन्तुष्टि हो, पर क्या वह स्वअर्जित अपार धन राशि को भोगने में खुद समर्थ है? पुरुष पुरातन की वधू लक्ष्मी चंचला है। अगर धन बटता नहीं और उसे होनहार पुरुषार्थियों का संरक्षण प्राप्त नहीं होता तो वह जरूर नष्ट हो जाता है।
धन मनुष्य को निर्दय, अधिकार से अन्धा और दंभी बना देता है। अमीरों और धनियों की अपनी मुसीबतें हैं हरदम उन्हें अपने धन की रक्षा की चिन्ता बनी रहती है। आगे इसको संभालने वाला सुयोग्य वारिस होना चाहिए इसी चिन्ता में वे घुलते रहते हैं। निन्यानवे के फेर में पड़कर वे धन का सदुपयोग ही भूल जाते हैं। धन का बढ़ता हुआ ढेर ही उनके जीवन की चिन्ताओं का मूल कारण बन जाता है। धन साधन न होकर जीवन का ध्येय बनकर रह जाता है।
अब लीजिए स्वास्थ्य को। इसमें कोई सन्देह नहीं कि ‘तन्दुरुस्ती हजार न्यामत है’ और सुन्दर तथा सुडौल काया एक वरदान है, पर यह भी तो चिरस्थायी नहीं है। कई बूढ़े पंगु भी अपने में मस्त और सुखी पाये गये हैं जब कि बड़े-बड़े पहलवान, नौजवान और रूपगर्विता नारियां भी किसी रोग या दुर्घटना का शिकार होकर अपना महत्व खो बैठते हैं। सभी स्वस्थ पुरुष सुखी तो नहीं होते और न सभी आकर्षक सुन्दरियां पति की प्यारी ही होती हैं। जो वस्तु अपने को प्राप्य न हो उस ओर मनुष्य लपकता है। सुन्दरी युवती का पति भी दूसरी स्त्रियों के प्रति आकृष्ट होता देखा गया है।
युवावस्था में मित्रता, घनिष्ठता, विश्वास और भावुकता मिलकर प्रेम का रूप लेते हैं। मैं किसी का हो जाऊं किसी को अपना बना लूं, यह लालसा प्रेमी को दीवाना बना देती है। प्रेमिका के बिना उसे दुनिया सुनी लगती है। उसको पाकर वह निहाल हो जाता है। पर थोड़े दिनों में जब प्रेम का खुमार उतर जाता है, तब वे प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे के दोषों की कटु आलोचना करते नहीं थकते।
कभी-कभी यौवन का यह उन्माद प्रेम वासना की सुनहली गली को पार करके जब यथार्थता की भूमि पर से गुजरता है तो समझदार प्रेमी-प्रेमिकाएं अपना सन्तुलन नहीं खोते। एक दूसरे के गुणों की कद्र करते हैं। उनका प्रेम विश्वास और सहयोग का पुट पाकर गम्भीर और स्थायी हो जाता है। यह प्रेम की विजय न होकर उनकी समझदारी की जय होती है।
प्रेम में ईर्ष्या या अधिकार की भावना ही दुःख का कारण बनती है। सच्चा प्रेम किसी व्यवसाय में लगाई हुई पूंजी नहीं है कि जिसके बदले में प्राप्ति दिनों दिन बढ़ती जाए, न वह फिफ्टी- फिफ्टी का सौदा ही है। यहां तो देने में ही सुख है। लेने का जहां हिसाब लगाने बैठे कि प्रेम दुःख का कारण बन जाएगा।
लालसाओं का अन्त नहीं, एक के बाद एक बढ़ती ही जाती हैं। जिस बात की पूर्ति इन्सान अपने जीवन में नहीं कर पाता, उसकी पूर्ति वह अपनी संतान के जीवन में देखना चाहता है। निस्सन्तान व्यक्ति अपने वंश की बेल को समाप्त होते देख अत्यन्त दुःखी होता है। उसे इस बात से सन्तुष्टि नहीं होती कि मनुष्य का नाम उसकी सन्तान से नहीं सुकर्मों से अमर होता है। सन्तान जहां नाम चलाती है, वहां डुबोती भी है। गृहस्थियों की अनेक चिन्ताओं का कारण सन्तान ही होती है। बच्चे का पालन पोषण, उसकी तरक्की के लिए अनेक साधन जुटाने का काम क्या कम परेशानी का है?
सन्तान के पीछे मनुष्य कितने प्रलोभनों और दुर्बलताओं का शिकार बनता है। उद्देश्य और अनुशासन-हीन लड़के मां-बाप की जिन्दगी को दूभर करके रख देते हैं। इसलिए निस्सन्तान व्यक्ति को इस पहलू से विचार करते हुये आत्म-सन्तोष करना चाहिए। अपनी सन्तान नहीं तो दूसरों के बच्चों को प्यार दुलार कर वे अपने मन को प्रसन्न कर सकते हैं। किसी गरीब, पर योग्य बालक को अपना कर अपना जीवन सरस बना सकते हैं।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि कर्म करो पर फल की आशा मत करो। सुख पाने में नहीं त्यागने में है। सुख के पीछे बावले होकर दौड़ने में नहीं, अपितु कर्मशील होकर दुःख और मुसीबतों से जूझने में है। यदि आप दुःख को जीत लेते हैं, उसे अपने पर हावी नहीं होने देते तो आप सुखी हैं। आसक्ति से दूर रहकर दूसरों के लिए जिए। जो मनुष्य अपने परिवार को भूलकर दूसरों के लिए जीता है, उसी को जीने का सच्चा आनन्द मिलता है। मां-बाप इसी प्रेरणा के वशीभूत होकर अपने बच्चों के लिए जीते हैं। उसकी सफलता, सुख और आनन्द में उन्हें सन्तोष मिलता है।
इसी भावना को अधिक व्यापक बनाने का प्रयत्न करने से मनुष्य परिवार के दायरे से निकल कर समाजोपयोगी जीवन व्यतीत करने में समर्थ हो पाता है। माया मोह आर्थिक दृष्टिकोण, स्वार्थ, अर्थप्रधान नीति मनुष्य को जहां एक ओर स्वार्थी बनाती हैं, उसकी वृत्ति को संकुचित करती हैं, वहां दूसरी ओर दुःख की अनुभूति को तीव्र भी कर देती हैं। मनुष्य परिस्थितियों का दास बन जाता है और जीवन के वास्तविक सौन्दर्य से भी अनजान रह जाता है। उसकी दिलचस्पी, प्रेम, त्याग और सहयोग का दायरा संकुचित हो जाता है।
इन्सान दुर्बलताओं का पुतला है, वह परिस्थिति का दास बन जाता है इस तथ्य को स्वीकार करके मनुष्य को दूसरे को उदारता और सहानुभूति के साथ समझने की चेष्टा करनी चाहिए। आप जैसा व्यवहार अपने प्रति चाहते हैं, वैसा ही दूसरे के प्रति करें। अपने मन को टटोलें।
यदि आपकी आत्मा आपको चेतावनी देती है, तो उसे सुनें। अपराधी और अन्यायी चाहे समाज से बच जाए पर आत्मा की कचोट उसे चैन से नहीं रहने देगी। अपने को धोखा देना ही सबसे बड़ा धोखा है। पछतावे की अग्नि बड़ी दारुण होती है। उसमें तपे बिना आत्मा पवित्र नहीं हो सकती।
दूसरों से कुछ पाने में ही सुख नहीं है, देने में भी सुख है। किसी भूखे को खाना खिलाकर या किसी असहाय की मदद करके आपको जो आनन्द मिलता है, उसके आशीर्वाद से आपका जो आत्मिक बल बढ़ता है, वह कुछ कम नहीं है। ‘‘मैं भी दूसरों को सुखी बना सकता हूं, मेरे सहयोग की किसी को अपेक्षा है’’ यह भरोसा आत्म-विश्वास पैदा करता है।
जो इन्सान अपने को भूलकर दूसरों के लिए जीता है, उसको दुःख नहीं व्यापता। अधिकांश माताएं और पत्नियां अपने बच्चों व पतियों के लिए बड़े से बड़ा दुःख सहने को तैयार रहती हैं। उन्हें अपने खाने-पीने या आराम की परवाह नहीं रहती। इसीलिए माता का दर्जा पिता से अधिक ऊंचा माना गया है।
दुःख को जीतने के लिए हमें अपनी कमजोरियों को ही जीतना होगा। स्वार्थ, माया मोह, ईर्ष्या, क्रोध, द्वेष आदि से ऊपर उठकर ही मनुष्य दुःख के शिकंजे से छुटकारा पा सकता है।