18/08/2026
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दैत्यराज हिरण्यकशिपु का अत्याचार जब चरम पर पहुँच गया, तब अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने आधा सिंह और आधा मनुष्य का 'नरसिंह अवतार' धारण किया। उन्होंने संध्या के समय, चौखट पर अपने नाखूनों से हिरण्यकशिपु का पेट फाड़कर उसका वध कर दिया।
असुर का वध तो हो गया, लेकिन हिरण्यकशिपु के घोर पापों और उसके दुष्ट रक्त के स्पर्श के कारण भगवान नरसिंह का क्रोध शांत होने के बजाय और भयानक हो गया। उनका क्रोध इतना उग्र था कि वे पूरे ब्रह्मांड में गर्जना करने लगे। उनके मुख से निकलने वाली अग्नि की लपटों से तीनों लोक जलने लगे।
देवराज इंद्र, ब्रह्मा जी और सभी देवता भयभीत हो गए कि यदि नरसिंह देव का क्रोध शांत नहीं हुआ, तो पूरी सृष्टि इस महा-क्रोध की अग्नि में भस्म हो जाएगी।
जब कोई भी भगवान नरसिंह के पास जाने का साहस नहीं कर सका, तब ब्रह्मा जी के नेतृत्व में सभी देवता कैलाश पर्वत पर भगवान शिव की शरण में पहुंचे। देवताओं ने गुहार लगाई, "हे महादेव! रक्षा कीजिए। नारायण का नरसिंह स्वरूप इस समय अनियंत्रित क्रोध में है। केवल आप ही उन्हें शांत कर सकते हैं।"
भगवान शिव ने पहले अपने परम पराक्रमी अंश 'वीरभद्र' को भेजा। शिव जी ने वीरभद्र से कहा, "तुम जाओ और नरसिंह देव से अत्यंत विनम्रतापूर्वक शांत होने की प्रार्थना करो।"
वीरभद्र ने भगवान नरसिंह के पास जाकर हाथ जोड़कर स्तुति की और उनसे शांत होने का आग्रह किया। परंतु उस समय नरसिंह देव क्रोध के वश में थे, उन्होंने वीरभद्र की बात नहीं मानी और उन पर प्रहार कर दिया। वीरभद्र और नरसिंह देव के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया, जिसमें वीरभद्र पीछे हटने लगे।
जब वीरभद्र असफल हो गए और सृष्टि पर प्रलय का संकट और गहरा गया, तब भगवान शंकर ने स्वयं कुरुक्षेत्र की भूमि पर एक ऐसा रूप धारण किया जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। इस रूप को 'शरभ' या 'शरभावतार' कहा जाता है।
शरभ का स्वरूप कैसा था?
वह साक्षात आकाशगामी पक्षी, सिंह और मनुष्य का एक मिश्रित रूप था। उसके आठ पैर थे, पीठ पर दो विशाल पंख थे, मस्तक पर जटाएं और चंद्रमा था, और उनके नाखून व दांत वज्र के समान थे। वह शक्ति में नरसिंह देव से भी कई गुना विशाल और प्रचंड था।
जब शरभ रूपी शिव और नरसिंह रूपी विष्णु आमने-सामने आए, तो ब्रह्मांड का सबसे भयानक युद्ध शुरू हुआ।दोनों महाशक्तियां एक-दूसरे पर झपट पड़ीं।
भगवान नरसिंह ने अपने नाखूनों और दांतों से प्रहार किया, तो शरभ देव ने अपने आठ पैरों और विशाल पंखों की वायु से उन्हें बांधने का प्रयास किया।
यह युद्ध कई दिनों तक चलता रहा। शरभ ने अपने पंखों से नरसिंह देव को जकड़ लिया और उन्हें आकाश में उठा लिया।
धीरे-धीरे, भगवान शिव के इस प्रचंड रूप के तपोबल और उनके स्पर्श के कारण भगवान नरसिंह के भीतर का उग्र क्रोध समाप्त होने लगा। उन्हें आभास हुआ कि सामने कोई शत्रु नहीं, बल्कि स्वयं देवाधिदेव महादेव हैं जो उन्हें उनके वास्तविक सौम्य स्वरूप की याद दिला रहे हैं।
क्रोध शांत होते ही भगवान नरसिंह ने महादेव के सामने हाथ जोड़े और उनकी स्तुति की। उन्होंने अपने शरीर का त्याग करने का निर्णय लिया और अपनी त्वचा (चर्म) को भगवान शिव को आसन के रूप में समर्पित कर दिया (इसीलिए शिव जी नरसिंह की चर्म धारण करते हैं) और उनका तेज वापस वैकुंठ में नारायण में समा गया।
जब शरभ ने नरसिंह को जकड़ा, तो नारायण के भीतर से क्रोध का एक और अंतिम स्वरूप प्रकट हुआ, जिसे 'गण्डभेरुण्ड' (दो सिर वाला महा-पक्षी) कहा जाता है। अंत में ब्रह्मा जी ने बीच में आकर दोनों को शांत कराया और दोनों शक्तियों को यह अहसास दिलाया कि "हरि और हर (विष्णु और शिव) एक ही हैं, इनमें कोई भेद नहीं है।
!!जय श्री कृष्णा!!