15/06/2026
प्राचीन काल में जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया, तो सबसे पहले कालकूट (हलाहल) नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि इतनी तीव्र थी कि समस्त ब्रह्मांड जलने लगा। सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष को पी लिया। उन्होंने विष को अपने कंठ (गले) में ही रोक लिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए।
विष को धारण करने के बाद, उसकी ऊष्मा और प्रभाव इतना अधिक था कि महादेव का शरीर तपने लगा। शिव जी ने विष के प्रभाव को शांत करने के लिए बहुत प्रयास किए, लेकिन हलाहल की शक्ति अपरंपार थी। शिव जी अचेत (बेहोश) होने लगे और उनका शरीर नीला पड़ने लगा। पूरा ब्रह्मांड शिव की इस स्थिति को देख कर भयभीत हो गया, क्योंकि यदि शिव को कुछ होता, तो सृष्टि का अंत निश्चित था।
उस समय आदि पराशक्ति ने 'तारा' के रूप में अवतार लिया। माँ तारा का यह स्वरूप मातृत्व और शक्ति का अद्भुत संगम था। माँ तारा ने एक विशाल रूप धारण किया और भगवान शिव को, जो उस समय विष के प्रभाव से बालक के समान असहाय महसूस कर रहे थे, अपनी गोद में उठा लिया।
माँ तारा ने शिव जी को अपने स्तन का दूध (अमृत तुल्य दुग्ध) पिलाया। माँ का दूध उस हलाहल विष की काट था। जैसे ही महादेव ने देवी के दुग्ध का पान किया, विष की जलन शांत हो गई और वे पुन: चेतना में लौट आए। माँ तारा ने अपनी ममता से महादेव के भीतर की उस भयंकर अग्नि को सोख लिया।
चूंकि देवी ने महादेव को मृत्यु के मुख से बाहर निकाला और उन्हें 'तारा' (तारने वाली या संकट से उबारने वाली), इसलिए उन्हें 'माँ तारा' कहा गया। इस घटना के बाद, शिव जी ने भी माँ तारा की स्तुति की और उन्हें ब्रह्मांड की रक्षक के रूप में स्वीकार किया।
माँ तारा के स्वरूप का महत्व
भय का नाश: माँ तारा को मुख्य रूप से 'तारिणी' कहा जाता है, जो संसार के कठिन सागर से अपने भक्तों को पार लगाती हैं।
नील सरस्वती: इन्हें ज्ञान की देवी का स्वरूप भी माना जाता है, जो अज्ञान के अंधेरे को दूर करती हैं।
साधना: तंत्र शास्त्र में माँ तारा की साधना अत्यंत फलदायी मानी गई है। विशेषकर शत्रुओं पर विजय, वाक्-सिद्धि और गंभीर रोगों से मुक्ति के लिए उनकी पूजा की जाती है।
पश्चिम बंगाल के तारापीठ और हिमाचल प्रदेश के तारा देवी मंदिर में इस कथा की गहरी मान्यता है।
यह कहानी हमें सिखाती है कि जब साक्षात ईश्वर (शिव) भी संकट में होते हैं, तो पराशक्ति अपनी ममता और शक्ति से उनका उद्धार करती हैं। माँ तारा केवल एक देवी नहीं, बल्कि वह शक्ति हैं जो असंभव को संभव बनाती हैं।
प्राचीन काल में जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया, तो सबसे पहले कालकूट (हलाहल) नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि इतनी तीव्र थी कि समस्त ब्रह्मांड जलने लगा। सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष को पी लिया। उन्होंने विष को अपने कंठ (गले) में ही रोक लिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए।