16/08/2026
निशा का तम नहीं, अपनों का भ्रम सताता है। जग की कोई सभा नहीं, घर का प्रश्न चुभ जाता है। यह कविता उस युवती की व्यथा है जो जग जीतकर भी अपनी देहरी पर पराजित हो जाती है। https://www.writerspouch.org/post/भय-की-परछाइयाँ