Mohit Raman Mishra

Mohit Raman Mishra हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥

श्रीवृषभानुसुते वन्द्ये, श्रीराधा-मञ्जुश्यामे शुभे।कीर्तिते भुवनत्रय्ये कृष्णप्राणप्रिये सदा।।अर्थ: वृषभानु जी की दोनों ...
21/08/2026

श्रीवृषभानुसुते वन्द्ये, श्रीराधा-मञ्जुश्यामे शुभे।
कीर्तिते भुवनत्रय्ये कृष्णप्राणप्रिये सदा।।

अर्थ: वृषभानु जी की दोनों वंदनीय और कल्याणकारी पुत्रियों—राधा और मंजुश्यामा—की मैं वंदना करता हूँ, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं और सदैव श्री कृष्ण को प्राणों से भी प्यारी हैं।

🌹हरे मुरारे मधुकैटभारे गोपाल गोविन्द मुकुन्द शौरे ।🙏
यज्ञेश नारायण कृष्ण विष्णु निराश्रयं मां जगदीश रक्ष ॥🌹

*वृन्दावन इक सुन्दर जोरी।*

*खेलत जहाँ तहाँ बंशीवट, नन्दनन्दन वृषभानु किशोरी ॥*

*भुवन चतुर्दस की सब सुषमा, इन दोउन पर डारी भोरी।*

*स्याम सुभग वर कंचन गौरी, मनहुँ तड़ित घन माहिं बहोरी ॥*

*जै श्रीभट कहाँ लौं बरनौं, रसना एक नाहिं लख कोरी।।*

*श्री भट्ट जी कहते हैं कि वृन्दावन में श्री श्यामा-श्याम की एक अत्यंत सुंदर जोड़ी विराजमान है, जो बंशीवट के निकट निरंतर विहार (क्रीड़ा) करती है। चौदह लोकों की समस्त सुंदरता इन दोनों पर न्योछावर है। सांवले कृष्ण और गोरी राधा ऐसे लगते हैं मानो बादलों के बीच बिजली कौंध रही हो।*

सुख की वर्षा हो रही, मिटता दुख का ताप।लीन रहें निज कर्म में, करते हरि का जाप।।०१।।जो भजता हरि नाम को, कटता हर संताप।करते...
01/08/2026

सुख की वर्षा हो रही, मिटता दुख का ताप।
लीन रहें निज कर्म में, करते हरि का जाप।।०१।।

जो भजता हरि नाम को, कटता हर संताप।
करते जब सद्कर्म है, दूर रहे हर पाप।।०२।।

पावन मानव तन मिला, पाए हर सुख आप।
पर दुष्कर्मों से बचें, जो देता है श्राप।।०३।।

अमन, शान्ति, सुख, चैन से, रहना सीखें आप।
सभी दूसरे संग में, करके रहें मिलाप।।०४।।

उपकारी को पुण्य का, अपकारी को पाप।
यही धर्म का सार है, समझ लीजिए आप।।०५।।

मानव, दानव, देव सब, करते हरपल जाप।
ओम नाम लेकर सभी, बनते हैं निष्पाप।।०६।।

अपने जैसे हीं सदा, समझें सबको आप।
रहिए इतने में यहाँ, आप सदा निष्पाप।।०७।।

लेते हरि का नाम हों, करते पूजा जाप।
लेकिन भोगें कर्म फल, समझ लीजिए आप।।०८।।

हरि सुमिरन से बल मिलें, मिटे नहीं हर पाप।
कर्म फलाफल सत्य है, जो चाहें लें आप।।०९।।

अमर सदा सद्कर्म है, दुख देता है पाप।
सुख की इच्छा में सदा, बनें रहें निष्पाप।।१०।।

Mohit Raman Mishra

सुमति कक्ष सोहर-सुगंध महक रही।पारलौकिक-दीप्तीमय, शुभ्र-कान्ति-दिव्य सुवासमयी।सुषमा प्रस्फुटित 'मँजु' नैसर्गिक ज्योति, कण...
28/07/2026

सुमति कक्ष सोहर-सुगंध महक रही।
पारलौकिक-दीप्तीमय, शुभ्र-कान्ति-दिव्य सुवासमयी।
सुषमा प्रस्फुटित 'मँजु' नैसर्गिक ज्योति, कण-कण छिटक रही।
मानों सुरलोक दामिनी अवनि-तिमिर हरनि, हर्षित दमक रही।
चकित,चितव सगरौ बृज,अद्भुत बालक,जे इहिं लोक कौ नहीं।

प्रकट हु‌ए थे धराधाम में पूर्ण परात्पर श्रीभगवान।
परम दिव्य ऐश्वर्य-निकेतन,सुन्दरता-मधुरता-निधान॥
दुष्ट को निज धाम भेजकर, साधु-जनों का कर उद्धार।
किया धर्म का संस्थापन था, लेकर स्वयं दिव्य अवतार॥

वही पुण्य तिथि भाद्र-‌अष्टमी, कृष्णपक्ष मंगलमय आज।
सुरभित श्रद्धा-सुमन-राशि से सभी सजाकर मंगल साज॥
नन्दालय में आज महोत्सव वही हो रहा मधुर विशाल।
शीघ्र बुझा देगा जो भव-दावानल सहसा अति विकराल॥

हम भी सब मिल आज मनायें वही महोत्सव मंगलरूप।
भोगासक्ति-विनाशक, भव-बाधा-हर, दायक-प्रेम अनूप॥
प्रेम कृष्ण का, प्रेम कृष्ण में, स्वयं कृष्ण ही निर्मल प्रेम।
हमें मिले, बस, एकमात्र वह, वही हमारा योग-क्षेम॥

कृष्ण-नाम-गुण गा‌ओ अविरत प्रेमसहित नाचो तज लाज।
बनो कृष्णभक्त के भक्त के अनुगामी सहित समाज॥
मधुर मनोहर मंगलमय श्रीराधा-माधव का सब काल।
करते रहो स्मरण नित संतत, पल-पल होते रहो निहाल॥
(पद-रत्नाकर)

हरि अवतरे कारागार।
दिसि सकल भ‌इँ परम निरमल अभ्र सुषमा-सार।
लता बिटप सुपल्लवित पुष्पित नमत फल भार॥
सुखद मंद सुगंध सीतल बहत मलय बयार।
देवगन हरषत सुमन बरसत करत जयकार॥

बिनय करत बिरंचि नारद सिद्ध बिबिध प्रकार।
करत किंनर गान बहु गंधरब हरष अपार॥
संख-चक्र-गदा-नवांबुज लसत हैं भुज चार।
भृगुलता कौस्तुभ सुसोभित, कांति के आगार॥

नौमि नीरद नील नव तनु, गले मुकताहार।
पीत पट राजत, अलक लखि अलिहु करत पुकार॥
परम बिस्मित देखि दंपति छबिहिं अमित उदार।
निरखि सुंदरता अपरिमित लजत कोटिन मार॥

Mohit Raman Mishra

अति मलीन वृषभानुकुमारी।हरि-स्रमजल अंतर-तनु भीजे ता लालच न धुआवति सारी॥अधोमुख रहति उरध नहिं चितति ज्यों गथ हारे थकित जुआर...
24/07/2026

अति मलीन वृषभानुकुमारी।
हरि-स्रमजल अंतर-तनु भीजे ता लालच न धुआवति सारी॥

अधोमुख रहति उरध नहिं चितति ज्यों गथ हारे थकित जुआरी।
छूटे चिहुर, बदन कुम्हिलाने, ज्यों नलिनी हिमकर की मारी॥

हरि-संदेस सुनि सहज मृतक भई, इक बिरहिनि दूजे अलि जारी।
सूर स्याम बिनु यों जीवित है ब्रजवनिता सब स्यामदुलारी॥

अर्थ:- अरी सखी, राधा तो अत्यंत मलीन दीखती है। श्रीकृष्ण के सत्विक प्रेमोद्रेक-जन्य पसीने से उसका हृदय और शरीर दोनों ही भीग उठे हैं। वह अपनी साड़ी इस लालच से नहीं धुलवा रही है कि इसमें श्रीकृष्ण के सात्विक प्रमोद्रेक-जन्य पसीने की गंध मिलती है। वह सदैव अपने मुख को नीचे किए हुए बैठी रहती है, ऊपर की ओर देखती ही नहीं। जैसे कोई जुआरी जुए में अपनी पूँजी हार कर उदासीन आनत मुख बैठा हो। राधा के बाल बिखरे हुए हैं, इसका मुख कुम्हलाया हुआ दिखाई पड़ता है—ऐसे मुख को देखकर लगता है कि जैसे कमलिनी तुषार पड़ने पर जल गई हो। वह श्रीकृष्ण के वियोग में पहले ही संतप्त थी, दूसरे जब उद्धव द्वारा श्रीकृष्ण का योग-साधना का संदेश सुना तो सहज ही मृतक तुल्य हो गई। सूरदास कहते हैं कि ऐसी दशा केवल राधा की ही नहीं है बल्कि श्रीकृष्ण की सभी प्रियतमाएँ वियोग की ऐसी दारुण पीड़ा को सहती हुई जीवित रह रही हैं।

Mohit Raman Mishra

हरि आप हरो जन री भीर।द्रोपदी री लाज राखी, आप बढ़ायो चीर।भगत कारण रूप नरहरि, धर्यो आप सरीर।बूढ़तो गजराज राख्यो, काटी कुण्...
21/07/2026

हरि आप हरो जन री भीर।
द्रोपदी री लाज राखी, आप बढ़ायो चीर।

भगत कारण रूप नरहरि, धर्यो आप सरीर।
बूढ़तो गजराज राख्यो, काटी कुण्जर पीर।

दासी मीराँ लाल गिरधर, हरो म्हारी भीर॥

स्याम म्हाने चाकर राखो जी,
गिरधारी लाला म्हाँने चाकर राखोजी।

चाकर रहस्यूँ बाग लगास्यूँ नित उठ दरसण पास्यूँ।
बिन्दरावन री कुंज गली में, गोविन्द लीला गास्यूँ।

चाकरी में दरसण पास्यूँ, सुमरण पास्यूँ खरची।
भाव भगती जागीरी पास्यूँ, तीनूं बाताँ सरसी।

मोर मुगट पीताम्बर सौहे, गल वैजन्ती माला।
बिन्दरावन में धेनु चरावे, मोहन मुरली वाला।

ऊँचा ऊँचा महल बणावं बिच बिच राखूँ बारी।
साँवरिया रा दरसण पास्यूँ, पहर कुसुम्बी साड़ी।

आधी रात प्रभु दरसण, दीज्यो जमनाजी रे तीरां।
मीराँ रा प्रभु गिरधर नागर, हिवड़ो घणो अधीराँ॥

Mohit Raman Mishra

जेहि पर कृपा करहिं जनुजानी।कवि उर अजिर नचावहिं बानी।।मोरि सुधारहिं सो सब भांती।जासु कृपा नहिं कृपा अघाती।।अर्थ:"जिस भक्त...
19/07/2026

जेहि पर कृपा करहिं जनुजानी।

कवि उर अजिर नचावहिं बानी।।

मोरि सुधारहिं सो सब भांती।

जासु कृपा नहिं कृपा अघाती।।

अर्थ:"जिस भक्त पर ईश्वर अपनी कृपा करते हैं और उसे अपना जन (दास/सेवक) मान लेते हैं, तो स्वयं सरस्वती (वाणी) उनके हृदय रूपी आँगन में नृत्य करने लगती हैं (अर्थात उनकी बुद्धि व वाणी अत्यंत सुंदर हो जाती है)। हे प्रभु! आप ही मेरी इस रचना (कविता) को सब प्रकार से सुधारते और सँवारते हैं। आपकी कृपा ऐसी है कि उससे 'कृपा' स्वयं भी कभी तृप्त नहीं होती—अर्थात आपकी कृपा का भंडार और आपकी महिमा अनंत और अटूट है।"

Mohit Raman Mishra

कोई कहियौ रे प्रभु आवन की।आवन की मन भावन की॥आप न आवै लिख नहिं भेजैबाण पड़ी ललुचावन की।ए दोउ नैण कहयो नहीं मानैनदिया बहैं...
18/07/2026

कोई कहियौ रे प्रभु आवन की।
आवन की मन भावन की॥

आप न आवै लिख नहिं भेजै
बाण पड़ी ललुचावन की।

ए दोउ नैण कहयो नहीं मानै
नदिया बहैं जैसे सावन की॥

कहा करूँ कछु नहिं बस मेरो
पाँख नहीं उड़ जावन की।

मीरा कहै प्रभु कब रे मिलोगे
चेरी भई हूँ तेरे दाँवन की॥

अर्थ:-- अरे कोई कह दे कि प्रभु आ रहे हैं। कोई तो दिल ख़ुश करने वाली ख़बर सुना दे। न आप आए हैं, न ख़त भेजते हैं। कुछ ऐसी आदत पड़ गई है कि मुझे ललचाते रहते हैं। ये दोनों आँखें भी मेरा कहा नहीं मानतीं। क्या करूँ कुछ बस नहीं चलता। पंख भी नहीं है कि उनके पास उड़कर पहुँच जाऊँ? मीरा के प्रभु कब मिलोगे। मैं तुम्हारे पेंच में फँस गई हूँ।

Mohit Raman Mishra

नन्दस्य नन्दनं वन्दे नवनीतचोरम्।माखनचोरं च यशोदलालं गोपालम्॥इसका अर्थ है: "मैं नंद बाबा के पुत्र, ताज़ा मक्खन चुराने वाले...
16/07/2026

नन्दस्य नन्दनं वन्दे नवनीतचोरम्।
माखनचोरं च यशोदलालं गोपालम्॥
इसका अर्थ है: "मैं नंद बाबा के पुत्र, ताज़ा मक्खन चुराने वाले, माता यशोदा के लाड़ले और गौ-रक्षक (गोपाल) श्रीकृष्ण की वंदना करता हूँ"।

कर कोमल तारी दे मोहन द्वे भुज जोरि अधर रस लेत।
द्वारकेश प्रभु यह विधि क्रीडत तातें भलो भयो संकेत।

हरि नाम से नेह लाग्यो रे अब लाग्यो रे म्हारेहरि नाम से नेह लाग्योयो रसियो म्हारे मन में बस्यो ज्यूँ माला बिच तागो रेसब म...
14/07/2026

हरि नाम से नेह लाग्यो रे अब लाग्यो रे म्हारे
हरि नाम से नेह लाग्यो

यो रसियो म्हारे मन में बस्यो ज्यूँ माला बिच तागो रे
सब में बसत सब हि से न्यारो नहिं नेड़ो नहिं आगो रे

दासी 'मीराँ शरण श्याम की जीवन मरन भय भागो रे

भाग अभाग लिख्यौ जु विधि, ताकौ मोहि न ख्याल ।
अपने कर लिख लेत हौं, नाम तिहारौ भाल ॥
नाम तिहारौ भाल, भाग निजु याकौ मानों ।
याही की नित आस, आन सपने नहिं जानौं ॥
विषयन सौं न बिराग चित, नहिं चरणन अनुराग ।
तदपि भाल राधा प्रगट, हित भोरी कौ भाग ॥

Mohit Raman Mishra

विष्णु चरावत गाय फिरौ, चतुरानन ज्ञान भयौ निरज्ञानी।शम्भु सखि बन नाच नच्यौ, अरू इन्द्र कुबेर भरैं जहाँ पानी॥भानु थके वृषभ...
12/07/2026

विष्णु चरावत गाय फिरौ, चतुरानन ज्ञान भयौ निरज्ञानी।
शम्भु सखि बन नाच नच्यौ, अरू इन्द्र कुबेर भरैं जहाँ पानी॥
भानु थके वृषभानु की पौरहि, नन्दन चन्द्र कहौ किहि मानी।
राज करै ब्रजमण्डल कौ, वृषभानु सुता बनिकें ठकुरानी॥

प्रेम पन्थ कौ पैडो न्यारौ
कै जानै वृषभानु दुलारी कै जानै यह कान्हर कारौ।
दिन नहीं चैन रात नहीं निद्रा हृदय बसै जब प्राणन प्यारौ।।

जा तन लागी सो तन जानै दूर होत जग सारौ।
घायल की गति घायल जानै कछु चलै नहीं चारौ।।

नैन वाण की नौक चूमें विपरीत गति निर्धारौ।
मोहन प्यारे ऐसे रसिकन पै तन मन स्वर्वस वारौ।।

Mohit Raman Mishra

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