12/11/2025
मधेश प्रदेशक राजनीतिक संकट :
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✍️ मुरली मनोहर मिश्र
(जनकपुर नागरिक समाज, जनकपुरधाम, धनुषा-नेपाल)
मिति २५ कार्तिक २०८२, धनुषा – मधेश प्रदेश फेरु एक बेर संवैधानिक आ राजनीतिक अस्थिरताक दौरमे प्रवेश कए रहल अछि। प्रदेश प्रमुख श्रीमती सुमित्रा सुवेदी भण्डारी द्वारा असंवैधानिक तरिकासँ नियुक्त नवनियुक्त मुख्यमन्त्री श्री सरोज कुमार यादवक शपथ ग्रहणक दिन मधेश भवनक बाहरे भेल झड़प केवल एकटा प्रशासनिक घटना नैइ, बल्कि लोकतान्त्रिक मर्यादाक गम्भीर उल्लंघनक प्रतीक सेहो बनि गेल अछि।
१. घटना आ परिस्थिति:
मधेश भवनक आगाँ सात दलीय गठबन्धनक नेतागण—जसपा, कांग्रेस, माओवादी केन्द्र, लोसपा, नेकपा (एकीकृत समाजवादी), जनमत पार्टी आ नागरिक उन्मुक्ति पार्टी—द्वारा नवनियुक्त मुख्यमन्त्रीक नियुक्तिक विरोधमे शान्तिपूर्ण प्रदर्शन कएल जा रहल छल। मुदा जखन श्री यादव शपथ ग्रहणक लेल भवनक भीतर गेलाह, त स्थिति तनावपूर्ण भ’ गेल। पुलिस द्वारा लाठीचार्ज आ प्रदर्शनकारी द्वारा पत्थरबाजीक कारण पाँच पुलिसकर्मी आ पाँच प्रदर्शनकारी घायल भ’ गेलाह।
२. संवैधानिकता बनाम सत्ता हस्तक्षेप:
मधेश प्रदेशक संविधानिक ढाँचा स्पष्ट रूपसँ कहैत अछि जे मुख्यमन्त्रीक नियुक्ति सदनमे बहुमत राखनिहार दल वा गठबन्धनक नेताकेँ करब आवश्यक अछि। मुदा पूर्व मुख्यमन्त्री जितेन्द्र सोनलक राजीनामा पश्चात् राजनीतिक समीकरण फेरल, आ बहुमतक दावी प्रस्तुत भेलाक बादो प्रदेश प्रमुखक निर्णय विवादास्पद देखायल।
यदि नियुक्ति संविधानक धारा १६८(३) अनुसार भेल अछि, त सदनक समर्थनक प्रमाण अनिवार्य छल। एहन परिस्थितिमे “संवैधानिक असावधानी” या “राजनीतिक हस्तक्षेप” दुनू में सँ किछु एकटा अवश्य रहल अछि, जाहिसँ लोकतान्त्रिक संस्थानक विश्वास कमजोर भेल।
३. प्रदेश प्रमुखक वैधानिक भूमिका:
प्रदेश प्रमुखक भूमिका निष्पक्ष आ संविधानसम्मत रहबाक चाही। मुदा वर्तमान घटनाक्रममे हुनकर कदमक प्रति सवाल उठायल जा रहल अछि—
* कि प्रदेश प्रमुख राजनीतिक दबावमे छलथिन ?
* कि नियुक्ति पहिनुकै सत्ता पक्षक योजना अनुसार भेल ?
* कि संवैधानिक प्रक्रिया पूरा कएल गेल छल वा केवल औपचारिकता निभायल गेल ?
एहि प्रश्नसभक उत्तर राज्यक लोक आ संविधान दुनूक सम्मानक लेल अत्यन्त आवश्यक अछि।
४. लोकतान्त्रिक असहिष्णुता आ हिंसात्मक प्रवृत्ति:
लोकतन्त्रक मूल आधार संवाद, सहमति आ संवैधानिक मर्यादा अछि। जहि ठाम विरोधक आवाज दमन करबाक संस्कृति जन्म ल रहल अछि, ओ सम्पूर्ण शासन व्यवस्थाक हेत खतरनाक संकेत अछि। शान्तिपूर्ण आन्दोलन संविधानसँ प्राप्त अधिकार अछि, मुदा ओ अधिकार जखन प्रशासनिक बलपूर्वक टकराइत अछि, त जनआस्था कमजोर होइत अछि।
५. अग्रगामी राजनीतिक निकास : सुझाव:
* संसदीय स्पष्टता:
-प्रदेशसभामे तत्काल विश्वासमत प्रक्रियाक माध्यमसँ सदनक वास्तविक मत जनसामने आउ।
* निष्पक्ष जाँच आयोग:
-झड़पक घटनाक निष्पक्ष अनुसन्धान कएल जाय, आ जिम्मेवार पक्षसभक विरुद्ध कारबाई होय।
* प्रदेश प्रमुखक पुनर्मूल्यांकन:
-प्रदेश प्रमुखक भूमिकाक संवैधानिक समीक्षा हेतु संघीय स्तरसँ स्पष्ट दिशानिर्देश बनाओल जाय।
* संवाद-आधारित समाधान:
-सात दलीय गठबन्धन आ सत्ता पक्ष बीच खुलल राजनीतिक संवादक माध्यम सँ मधेश प्रदेशक स्थायित्व सुनिश्चित कएल जाय।
* लोकतान्त्रिक शिक्षाक पुनर्जागरण:
-प्रदेशक प्रशासन, प्रहरी, आ दलगत कार्यकर्तामे लोकतान्त्रिक मर्यादा पालनक प्रशिक्षण आवश्यक अछि।
६. निष्कर्ष:
मधेश प्रदेशक हालिया घटनाक्रम केवल एक मुख्यमन्त्रीक नियुक्ति विवाद नैइ, बल्कि एकटा व्यापक संवैधानिक चेतावनी अछि, जे लोकतन्त्रक मूल्य, मर्यादा आ शालीनता संकटमे अछि।
प्रदेश प्रमुख, मुख्यमन्त्री, विपक्ष आ आन्दोलनकारी सभक जिम्मेदारी अछि जे ओ अपन आचरणसँ लोकतन्त्रमे विश्वास पुनः स्थापित करथि।
"राजनीति सत्ता प्राप्ति नैइ, बल्कि जनविश्वासक संवर्धन होयबाक चाही।"
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