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03/03/2026
بٹوارہ 1947 ایک خونی لکیر جس نے  دلوں کو تقسیم کردیا تحریر ریاض نور میو
03/03/2026

بٹوارہ 1947 ایک خونی لکیر جس نے
دلوں کو تقسیم کردیا تحریر ریاض نور میو

27/02/2026

4 رمضان المبارک، بروز جمعہ10 مئی 2019یہ وہ دن ہے جب میری پیاری والدہ محترمہ ہمیں ہمیشہ کے لیے چھوڑ کر اپنے خالقِ حقیقی س...
22/02/2026

4 رمضان المبارک، بروز جمعہ10 مئی 2019

یہ وہ دن ہے جب میری پیاری والدہ محترمہ ہمیں ہمیشہ کے لیے چھوڑ کر اپنے خالقِ حقیقی سے جا ملیں۔ رمضان کی بابرکت ساعتیں تھیں، سحری کا وقت تھا، دعاؤں اور رحمتوں کا لمحہ تھا… اور اسی مبارک گھڑی میں میری ماں اس دنیا سے رخصت ہو گئیں۔

آج بھی رمضان آتا ہے تو سحری کی وہ خاموشی، وہ یادیں، وہ محبت بھری آوازیں دل کو رُلا دیتی ہیں۔ ماں صرف ایک رشتہ نہیں، ایک دعا، ایک سایہ اور ایک مکمل دنیا ہوتی ہے۔
اے اللہ! میری والدہ کی کامل مغفرت فرما، ان کی قبر کو جنت کے باغوں میں سے ایک باغ بنا دے اور ہمیں ان کے لیے صدقۂ جاریہ بننے کی توفیق عطا فرما۔ آمین

فاتحہ و دعا کی درخواست— ریاض نور میو
Writing
4 रमज़ान मुबारक, बروز जुम्मा
10 मई 2019
यह वह दिन है जब मेरी प्यारी वालिदा मोहतरमा हमें हमेशा के लिए छोड़कर अपने ख़ालिक़-ए-हक़ीक़ी से जा मिलीं। रमज़ान की बरकत वाली घड़ियाँ थीं, सहरी का वक्त था, दुआओं और रहमतों का लम्हा था… और उसी मुबारक घड़ी में मेरी माँ इस दुनिया से रुख़्सत हो गईं।
आज भी रमज़ान आता है तो सहरी की वह ख़ामोशी, वह यादें, वह मोहब्बत भरी आवाज़ें दिल को रुला देती हैं। माँ सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं, एक दुआ, एक साया और एक मुकम्मल दुनिया होती है।
ऐ Allah! मेरी वालिदा की कामिल मग़फ़िरत फ़रमा, उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे और हमें उनके लिए सदक़ा-ए-जारीया बनने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। आमीन 🤲
फ़ातिहा व दुआ की दरख़्वास्त
— रियाज़ नूर मेव

مادری زبانوں کا عالمی دن 21 فروری
21/02/2026

مادری زبانوں کا عالمی دن 21 فروری

बँटवारा 1947: एक लकीर जिसने दिलों को बाँट दियालेखक: रियाज़ नूर मेव1947 उपमहाद्वीप के इतिहास का वह साल है जिसे याद करते ह...
19/02/2026

बँटवारा 1947: एक लकीर जिसने दिलों को बाँट दिया
लेखक: रियाज़ नूर मेव
1947 उपमहाद्वीप के इतिहास का वह साल है जिसे याद करते हुए आज भी लाखों दिल भारी हो जाते हैं। भारत का विभाजन केवल एक राजनीतिक फैसला नहीं था, यह करोड़ों इंसानों की तकदीर का मोड़ था। एक लकीर खींची गई और सदियों से साथ रहने वाले लोग दो मुल्कों में बँट गए — पाकिस्तान और भारत।
मेरा परिवार भी उन लाखों परिवारों में शामिल था जिनकी ज़िंदगी इस फैसले से बदल गई।
बँटवारे से पहले हमारा पैतृक घर राजस्थान के ज़िले भरतपुर की तहसील कामां के गाँव नगला कुंदन में था। वह सिर्फ ज़मीन का एक टुकड़ा नहीं था, बल्कि हमारी पहचान, हमारी जड़ें और हमारे बुज़ुर्गों की अमानत था। मेरे दादा वहाँ नंबरदार थे, इज़्ज़त और सम्मान के साथ जीवन बिताते थे। विस्तृत ज़मीनें थीं, परिवार एकजुट था और भविष्य उज्ज्वल दिखाई देता था।
लेकिन इतिहास के एक फैसले ने सब कुछ बदल दिया।
हमारा परिवार दो दादाओं की औलाद पर आधारित था। बँटवारे की अफरा-तफरी में एक दादा हिंदुस्तान में रह गए और मेरे दादा तीन छोटे बच्चों को लेकर पाकिस्तान हिजरत कर आए। न कोई आख़िरी मुलाक़ात, न गले लगकर विदाई — सिर्फ अनिश्चितता, डर और जुदाई।
सोचता हूँ उस पल मेरे दादा के दिल पर क्या गुज़री होगी?
एक तरफ अपनी मिट्टी, अपना भाई, अपने पुरखों की कब्रें…
दूसरी तरफ बच्चों की हिफ़ाज़त और एक नए मुल्क में नई ज़िंदगी की चुनौती।
मेरा जन्म 1975 में हुआ, मगर ऐसा लगता है जैसे 1947 का दर्द मेरे भीतर भी सांस लेता रहा है। मेरी वालिदा हमें अक्सर रात को मेवात की कहानियाँ सुनाती थीं। वह बतातीं कि हमारा परिवार वहाँ किस तरह इज़्ज़त से रहता था, हमारे रिश्तेदार आज भी वहाँ आबाद हैं और हमारा गाँव शायद आज भी वैसा ही होगा जैसा छोड़कर आए थे।
इन कहानियों ने मेरे अंदर एक अजीब बेचैनी पैदा कर दी। मैं उन रिश्तेदारों से मिलना चाहता था जिन्हें कभी देखा नहीं था। मैं उस गाँव की गलियों में चलना चाहता था जिसे सिर्फ कल्पना में जानता था।
लेकिन हकीकत यह थी कि सरहदें बंद थीं, संसाधन सीमित थे और दोनों मुल्कों के रिश्ते अक्सर तनावपूर्ण रहे।
वक़्त गुजरता गया, मगर दिल की तड़प कम न हुई। फिर सोशल मीडिया का दौर आया। मैंने “रहबर मेवात” के नाम से एक प्लेटफॉर्म बनाया। यह केवल एक पेज या चैनल नहीं था, बल्कि एक मिशन था — बिछड़े परिवारों को मिलाने का मिशन।
मैं सिंध और पंजाब के उन इलाकों में गया जहाँ मेव समुदाय की बड़ी तादाद आबाद है। मैंने उन बुज़ुर्गों से मुलाक़ात की जिन्होंने बँटवारा अपनी आँखों से देखा था। मैं उनसे उनके पुराने गाँव, गोत्र, परिवार, दोस्तों और रिश्तेदारों के नाम पूछता। जब वे बोलते तो उनकी आवाज़ काँपती, आँखों में नमी होती और चेहरे पर यादों का दर्द साफ दिखाई देता।
मैंने इन तमाम कहानियों को एक कार्यक्रम की शक्ल दी जिसका नाम रखा “मेरा गाँव मेरी पहचान”। इस कार्यक्रम ने वह काम किया जो शायद सरकारी संस्थाएँ भी न कर सकीं। सरहद के दोनों तरफ बिछड़े परिवार एक-दूसरे तक पहुँचने लगे। सोशल मीडिया के जरिए संपर्क बहाल हुए, फोन कॉल हुईं, वीडियो कॉल हुईं और कई परिवार दशकों बाद फिर से जुड़ सके।
वे दृश्य शब्दों में बयान करना मुश्किल है जब एक माँ अपने बिछड़े भाई या बेटे की आवाज़ सुनते ही रो पड़ती थी। जब बहनें दशकों बाद एक-दूसरे का नाम लेकर पुकारती थीं। वे पल मेरे लिए सबसे बड़ी कामयाबी थे।
इसी जज़्बे के तहत मैंने बँटवारे के दर्द पर आधारित गीत भी रिकॉर्ड करवाए। उन गीतों ने लोगों के दिलों में छुपी यादों को आवाज़ दी। बहुत से लोग, जो अपने रिश्तों को लगभग भुला चुके थे, फिर से तलाश में निकल पड़े।
अल्लाह तआला का शुक्र है कि इस सफर में मेरा अपना परिवार भी फिर से जुड़ गया। संपर्क बहाल हुए, बातचीत शुरू हुई, उम्मीद जगी। लेकिन हालात ने एक बार फिर रास्ता रोक लिया। दोनों मुल्कों के रिश्तों में तनाव ने इस मानवीय संपर्क को प्रभावित किया। अब हमारे रिश्तेदार खुलकर बात भी नहीं कर पाते।
यह स्थिति दिल को दुख देती है। आखिर आम इंसानों का क्या कसूर है? वे तो सिर्फ अपने रिश्तों को ज़िंदा रखना चाहते हैं, अपने बुज़ुर्गों की यादों को सँजोना चाहते हैं।
मेरा यकीन है कि राजनीतिक हालात हमेशा एक जैसे नहीं रहते। जिस तरह इतिहास ने जुदाई देखी, वैसे ही वह मिलन भी देख सकता है। सरहदें अस्थायी होती हैं, रिश्ते स्थायी होते हैं।
मेरी दुआ है कि एक दिन हालात फिर बेहतर हों। लोग वीज़ा और डर के बिना एक-दूसरे से मिल सकें। मेवात के बिछड़े बेटे फिर एक-दूसरे को गले लगा सकें। और वह लकीर जो 1947 में खींची गई थी, कम से कम दिलों से मिट जाए।
यह सिर्फ मेरी कहानी नहीं, यह लाखों मेव परिवारों की कहानी है।
यह सिर्फ अतीत का मातम नहीं, भविष्य की उम्मीद भी है।
अल्लाह तआला से दुआ है कि वह हमारे बिछड़े रिश्तों को फिर से जोड़ दे।
— रियाज़ नूर मेव

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