Vivek Jagran Beyond Belief

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12/02/2026

Mere Bhai o Mahakal hai kal ko palat dete Hain To Tera problem kya chij hai... Bolo har har Mahadev 🙏





क्या आप Islamabad mosque attack की उस मस्जिद के भीतर का दृश्य कल्पना कर सकते हैं?शुक्रवार की नमाज़, कतारों में खड़े लोग—...
09/02/2026

क्या आप Islamabad mosque attack की उस मस्जिद के भीतर का दृश्य कल्पना कर सकते हैं?
शुक्रवार की नमाज़, कतारों में खड़े लोग—कोई आँखें बंद कर इबादत में डूबा हुआ, कोई अपने बच्चे का हाथ पकड़े खड़ा।
ठीक उसी क्षण—एक विस्फोट।
Pakistan-की Islamabad mosque blast
पल भर में खून, धुआँ, क्षत-विक्षत शरीर।
कम से कम 31 लोग फिर कभी अपने घर नहीं लौटे।
वे न सैनिक थे, न राजनेता।
वे सिर्फ इंसान थे।
फिर भी किसी ने यह सोच लिया—कि उन्हें मार देना सवाब का काम है।
हम चाहें तो इस घटना को “Terrorism in the name of religion” कहकर टाल सकते हैं।
लेकिन तब एक भयावह सवाल अनुत्तरित रह जाएगा।
एक इंसान मानसिक रूप से कैसे Radical ideology को सही मन कर तैयार होता है कि वह अपने शरीर को बम बनाकर दूसरे इंसानों की हत्या करे?
कौन-सी शिक्षा उसे यह सिखाती है कि इबादतगाह के भीतर मौजूद लोग असल में दुश्मन हैं?
इस सवाल का जवाब किसी हथियारों की फैक्ट्री में नहीं है, न ही किसी गरीबी के आँकड़ों में।
जवाब है—सोच के स्रोत में।
जब कोई काम बार-बार, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में, एक ही तरह के तर्क के साथ होता है—
तो वह “व्यक्तिगत पागलपन” नहीं रहता।
वह एक वैचारिक पैटर्न बन जाता है।
इस्लामाबाद, काबुल, बग़दाद, नाइजीरिया—भूगोल बदलता है, लेकिन तर्क नहीं बदलता।
और वही तर्क बार-बार जाकर कुछ निश्चित शिक्षाओं पर टिक जाता है।
यहीं पर हमें क़ुरआन की कुछ आयतों को देखना पड़ता है,
जिनका सदियों से हिंसा को वैध ठहराने के लिए उपयोग किया गया है।
सूरा अत-तौबा, आयत 5—
जिसे इस्लामी सिद्धांत में “आयतुस सैफ़” या तलवार की आयत कहा जाता है:
فَإِذَا انسَلَخَ ٱلْأَشْهُرُ ٱلْحُرُمُ فَٱقْتُلُوا۟ ٱلْمُشْرِكِينَ حَيْثُ وَجَدتُّمُوهُمْ وَخُذُوهُمْ وَٱحْصُرُوهُمْ وَٱقْعُدُوا۟ لَهُمْ كُلَّ مَرْصَدٍ
अर्थात—
“जब पवित्र महीने समाप्त हो जाएँ, तो मुश्रिकों को जहाँ भी पाओ, मार डालो; उन्हें पकड़ो, घेरो और हर घात-स्थल पर उनके लिए घात लगाए बैठो।”
अब सवाल बहुत सीधा है।
अगर एक सामान्य इंसान बचपन से सुनता आए कि उसके धर्मग्रंथ में
“जहाँ भी पाओ, मार डालो”—ऐसी भाषा मौजूद है,
तो उसके अवचेतन में क्या बैठ जाएगा?
क्या यह आयत उसे सवाल करना सिखाती है, या आदेश मानना?
यहीं पर मौलवादी तुरंत एक जाना-पहचाना तर्क देते हैं।
वे कहते हैं—
“यह एक विशेष युद्ध के समय का आदेश था। आज के लिए नहीं।”
यह तर्क सुनने में अच्छा लगता है।
लेकिन थोड़ा गहराई में जाएँ, तो दरार साफ दिखती है।
अगर यह केवल एक ऐतिहासिक युद्ध का आदेश होता,
तो इसे एक ऐसे ग्रंथ में “आदेश” के रूप में क्यों लिखा गया,
जिसे शाश्वत और हर युग के लिए प्रासंगिक बताया जाता है?
अगर अल्लाह सर्वज्ञ हैं,
तो क्या वे नहीं जानते थे कि भविष्य में इसी आयत का उपयोग
लोगों की हत्या को जायज़ ठहराने के लिए किया जाएगा?
और अगर जानते थे—तो ज़िम्मेदारी किसकी है?
जैसे ही यह सवाल उठता है, तुरंत एक जाना-पहचाना जवाब आता है—
“ये सब गलत व्याख्याएँ हैं। इस्लाम शांति का धर्म है।”
लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि
हर हमले के बाद वही आयत, वही तर्क, वही बचाव सामने आता है।
इसका मतलब समस्या अलग-अलग नहीं है, संरचनात्मक है।
सबसे ज़्यादा घुमाई जाने वाली आयत है—
क़ुरआन की अत-तौबा 9:5।
فَإِذَا انسَلَخَ ٱلْأَشْهُرُ ٱلْحُرُمُ فَٱقْتُلُوا۟ ٱلْمُشْرِكِينَ حَيْثُ وَجَدتُّمُوهُمْ وَخُذُوهُمْ وَٱحْصُرُوهُمْ وَٱقْعُدُوا۟ لَهُمْ كُلَّ مَرْصَدٍ ۚ فَإِن تَابُوا۟ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَوُا۟ ٱلزَّكَوٰةَ فَخَلُّوا۟ سَبِيلَهُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
आजकल कई अंग्रेज़ी अनुवादों में यहाँ एक ब्रैकेट जोड़ दिया जाता है—
“kill the polytheists ˹who violated their treaties˺ wherever you find them…”
अब सवाल बहुत सीधा है—
यह “who violated their treaties”
क्या क़ुरआन की आयत का हिस्सा है,
या अनुवादक की व्याख्या?
असल अरबी आयत में
“संधि तोड़ने वाले मुश्रिक” जैसा कोई शब्द मौजूद ही नहीं है।
सिर्फ़ यह है—
“मुश्रिकों को जहाँ भी पाओ, मार डालो।”
तो फिर यह treaty वाली कहानी कहाँ से आई?
इस्लामी व्याख्या के अनुसार कहा जाता है—
मुहम्मद के समय कुछ अरब क़बीलों ने मुसलमानों से संधि की थी,
फिर उस संधि को तोड़ दिया था।
इसलिए यह आयत सिर्फ़ उन्हीं के लिए थी।
लेकिन यहीं असली दरार सामने आती है।
पहली बात—
अगर क़ुरआन सच में सिर्फ़ कुछ विशेष क़बीलों की बात कर रहा था,
तो उनके नाम, समय, संधि की शर्तें—
कुछ भी स्पष्ट रूप से क्यों नहीं लिखा गया?
क्या अल्लाह इतनी अस्पष्ट भाषा में बात करते हैं
कि 1400 साल बाद लोगों को तफ़सीर खंगालकर यह समझना पड़े
कि आख़िर किसे मारने का आदेश दिया गया था?
दूसरी बात—
इसी सूरा की आयत 9:2 में कहा जा रहा है—
“चार महीने धरती में घूम लो,
फिर जान लो कि तुम अल्लाह को परास्त नहीं कर सकते।”
क्या यह सिर्फ़
“कुछ संधि-भंग करने वाले क़बीलों” की भाषा है,
या सीधी धमकी?
और भी बड़ा सवाल—
अगर समस्या सिर्फ़ संधि तोड़ने की थी,
तो आयत के अंत में यह शर्त क्यों रखी गई—
“अगर वे तौबा करें, नमाज़ क़ायम करें, ज़कात दें, तो उन्हें छोड़ दो”?
संधि तोड़ने की सज़ा से बचने के लिए
किसी को धर्म परिवर्तन क्यों करना पड़े?
यह राजनीतिक अपराध की सज़ा है,
या धार्मिक अधीनता की शर्त?
यहीं पर मौलवादी आम तौर पर चुप हो जाते हैं।
क्योंकि यहाँ साफ़ हो जाता है—
समस्या treaty नहीं है, विश्वास है।
मुश्रिक होना ही मूल अपराध है।
और बचने का रास्ता सिर्फ़ एक—
इस्लाम क़बूल करना।
यही सोच आगे चलकर और भी आयतों में स्पष्ट हो जाती है।
सूरा अल-अनफ़ाल 8:12—
“काफ़िरों की गर्दनों पर वार करो,
और उनकी उँगलियों के हर जोड़ पर प्रहार करो।”
क्या यह सिर्फ़ रक्षात्मक युद्ध की भाषा है?
या दुश्मन को इंसान न मानकर
एक “टारगेट” के रूप में देखने का मानसिक प्रशिक्षण?
और भी बड़ा सवाल—
क्या इस आयत को क़ुरआन में कहीं स्पष्ट रूप से
रद्द या अमान्य घोषित किया गया है?
नहीं किया गया।
इसलिए कोई भी, किसी भी समय,
इसे शाब्दिक अर्थ में ले सकता है।
ठीक वैसे ही जैसे
आईएस, अल-क़ायदा या अन्य संगठन लेते हैं।
एक और आयत देखें।
सूरा अल-अनफ़ाल, आयत 12:
سَأُلْقِي فِى قُلُوبِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ٱلرُّعْبَ فَٱضْرِبُوا۟ فَوْقَ ٱلْأَعْنَاقِ وَٱضْرِبُوا۟ مِنْهُمْ كُلَّ بَنَانٍ
अर्थ—
“मैं काफ़िरों के दिलों में भय डाल दूँगा।
फिर उनकी गर्दनों पर वार करो
और उनकी उँगलियों के हर जोड़ पर प्रहार करो।”
यहाँ फिर मौलवादी कहते हैं—
“यह रूपक है। गला काटने का मतलब मनोबल तोड़ना है।”
लेकिन क्या भाषा सच में इतनी अस्पष्ट है?
“गर्दन पर वार करो”,
“उँगलियों के जोड़ों पर वार करो”—
क्या यह कविता है,
या सीधा शारीरिक निर्देश?
अगर सृष्टिकर्ता की वाणी समझने के लिए
इतने घुमावदार रास्तों की ज़रूरत पड़े,
तो क़ुरआन खुद को
“मुबीन”—स्पष्ट—कहकर कैसे पेश करता है?
इन आयतों को पढ़कर ही कोई बम नहीं बाँधता—
यह बात सही है।
लेकिन यही आयतें एक ऐसा मानसिक वातावरण बनाती हैं
जहाँ “दूसरा” इंसान,
इंसान नहीं रह जाता।
वह बन जाता है—काफ़िर, मुश्रिक, दुश्मन।
और दुश्मन को मारने में अपराधबोध नहीं होता—
गर्व होता है।
अब खुद से सवाल पूछिए।
अगर किसी बच्चे को बचपन से सिखाया जाए—
“तुम अल्लाह के प्रिय बंदे हो,
और पास का इंसान अल्लाह का दुश्मन है”—
तो वह बच्चा बड़ा होकर कैसा इंसान बनेगा?
क्या वह सहानुभूतिशील होगा,
या खुद को श्रेष्ठ समझेगा?
यही सुपरियोरिटी कॉम्प्लेक्स
एक दिन उससे कहलवाता है—
“मैं सही हूँ, वे ग़लत हैं।
मैं मारूँ तो गुनाह नहीं।”
इस्लामाबाद की उस मस्जिद में बम फोड़ने वाला व्यक्ति
क्या किसी अलग ग्रह से आया था?
नहीं।
वह भी कभी बच्चा था।
उसने भी कभी कुछ सीखा था।
सवाल है—
उसने क्या सीखा?
अब यहीं पर तुलना की ज़रूरत आती है।
जहाँ कुछ आयतें इंसानों को बाँटती हैं—
मोमिन बनाम काफ़िर—
वहीं भारतीय दर्शन क्या सिखाता है?
श्रीमद्भगवद्गीता 6:30—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
अर्थ—
जो मुझे सर्वत्र देखते हैं और सब कुछ मुझमें ही देखते हैं,
मैं उनसे कभी अलग नहीं होता
और वे मुझसे कभी अलग नहीं होते।
यहाँ “वे” और “हम” नहीं है।
यहाँ न काफ़िर है, न दुश्मन।
यहाँ हर इंसान, हर प्राणी—
एक ही चेतना की अभिव्यक्ति है।
महाभारत के शांति पर्व में कहा गया है—
न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्वं ब्रह्ममिदं जगत्।
यह संसार एक अखंड सत्ता है।
मनुष्यों के बीच कोई मौलिक भेद नहीं है।
अब सोचिए—
जो दर्शन कहता है
“सब एक ही सत्य का हिस्सा हैं”,
क्या वहाँ से कभी आत्मघाती बम पैदा हो सकता है?
और जो दर्शन कहता है—
“कोई अल्लाह का प्रिय है, कोई अल्लाह का दुश्मन”—
क्या वहाँ से हिंसा का जन्म होना अस्वाभाविक है?
यह पोस्ट किसी धर्म को गाली नहीं देता।
यह पोस्ट एक आईना दिखाता है।
सवाल बहुत सरल है—
अगर कोई विचार बार-बार खून पैदा करता है,
तो उस विचार पर सवाल उठाना
क्या अपराध है?
या वही मानवता की ज़िम्मेदारी है?
अगर आज हम चुप रहे,
तो कल एक और मस्जिद,
एक और मंदिर,
एक और स्कूल—
सब सिर्फ़ समय का इंतज़ार कर रहे हैं।
सवाल है—
आप किस दर्शन के साथ खड़े होंगे?
उस दर्शन के साथ
जो इंसान को इंसान समझता है,
या उस दर्शन के साथ
जो इंसान को टारगेट समझता है?
सच कड़वा हो सकता है।
लेकिन चुप्पी उससे भी ज़्यादा ख़तरनाक है।
आतंकवाद-विरोधी इस मिशन में
आप भी हमारे साथ जुड़िए।
हमें सपोर्ट करें।
इस संदेश को साझा करके
एक स्वस्थ समाज के निर्माण में योगदान दें।
अगर आपके मन में कोई सवाल हो,
तो सीधे कमेंट में लिखें।
धन्यवाद 🙏





01/02/2026

Are Non-Believers Worse Than Animals? | A Shocking Verse Explained | Vivek Jagran

We often call ourselves a civilized society.
But have we ever questioned what truly defines us — humanity or blind belief?

This video is NOT driven by hatred or emotion.
It is a rational analysis of how certain ideologies label human beings as “worse than animals” simply for believing differently.

📖 From a controversial Quranic verse
⚖️ To the inclusive philosophy of the Bhagavad Gita
🧠 From science and human progress
💔 To the psychological roots of extremism

This is not an attack on people.
This is a question to ideology.

“Hate the disease, not the patient.”
Extremism is a disease. Humanity is the cure.

If you believe questioning is not a crime,
If you believe humanity is above blind belief,
Then watch till the end.

Think. Question. Decide for yourself.

🔔 Follow for more rational discussions
📢 Share if you believe humanity comes first

Vivek Jagran | Beyond Blind Belief







19/01/2026

Jab bhagwan khud bachpan me pyar bantte hain…
Toh poori srishti muskurane lagti hai 💛
Chhote Gopal aur unka pyara bachda…
Prem, pavitrata aur bhakti ka anmol pal 🙏





বিভেদের বিষ বনাম মনুষ্যত্বের অমৃত — আপনার সন্তান কোন পথে?‎‎আমরা যদি নির্দিষ্ট কিছু প্রাচীন ধর্মীয় নির্দেশনার দিকে তাকাই...
13/01/2026

বিভেদের বিষ বনাম মনুষ্যত্বের অমৃত — আপনার সন্তান কোন পথে?

‎আমরা যদি নির্দিষ্ট কিছু প্রাচীন ধর্মীয় নির্দেশনার দিকে তাকাই, তবে দেখি সেখানে ভিন্ন মতাবলম্বীদের জন্য অত্যন্ত কঠোর এবং অসম্মানজনক ভাষা ব্যবহার করা হয়েছে। যেমন একটি জায়গায় বলা হয়েছে—
‎"যারা সত্যকে অস্বীকার করে (অবিশ্বাসী), তারা স্রষ্টার কাছে নিকৃষ্টতম জীব।" (সুরা আনফাল: ৫৫)

‎কেন এই চিন্তা সমাজের জন্য একটি 'সাইলেন্ট কিলার'?
‎এই ধরণের 'নিকৃষ্ট' ভাবনার দর্শন যখন একটি সমাজে ডালপালা মেলে, তখন তার প্রভাব হয় ভয়াবহ:
‎ একটি শিশুর মন কাদার মতো নরম। তাকে যদি ছোটবেলা থেকেই শেখানো হয় যে তার পাশের বাড়ির বন্ধুটি বা খেলার সাথীটি 'নিকৃষ্ট', তবে তার শৈশবের সারল্য নষ্ট হয়ে যায়। সে বড় হয়ে ওঠে এক চরম অসহিষ্ণু মানুষ হিসেবে, যার ভেতরে সহমর্মিতার বদলে ঘৃণা বাসা বাঁধে।

‎ যখন আপনি অন্যকে 'নিকৃষ্ট' ভাবেন, তখন তার সাথে আপনার আর কোনো মানবিক সম্পর্ক থাকে না। এটি সরাসরি সমাজে দাঙ্গা, ঘৃণা এবং অপরাধপ্রবণতা বাড়িয়ে তোলে। আধ্যাত্মিক উন্নতির বদলে এটি মানুষের মনে চরম অহংকার ও শ্রেষ্ঠত্ববোধ তৈরি করে।

‎এর ঠিক বিপরীতে আমাদের চিরন্তন ভারতীয় দর্শন বা শ্রীমদ্ভগবদ্গীতা (১২:১৩) কী শিক্ষা দিচ্ছে?
‎"অদ্বেষ্টা সর্বভূতানাং মৈত্রঃ করুণ এব চ।"
‎অনুবাদ: কোনো প্রাণীর প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করবে না, বরং সকল প্রাণীর প্রতি বন্ধুভাবাপন্ন এবং দয়ালু হবে।

‎এই দর্শনটি কোনো নির্দিষ্ট দলের জন্য নয়, বরং 'সর্বভূতানাং' বা পৃথিবীর প্রতিটি প্রাণের জন্য। এটি শেখায় যে প্রকৃত ধার্মিক সেই, যার হৃদয়ে শত্রু-মিত্র নির্বিশেষে সবার জন্য দয়া আছে। এই শিক্ষা একটি শিশুকে শেখায় জগতকে ভালোবাসতে, সবাইকে সম্মান করতে। এটিই প্রকৃত 'বসুধৈব কুটুম্বকম' বা বিশ্বভ্রাতৃত্ব।

‎একবার বুক হাত দিয়ে নিজেকে প্রশ্ন করুন— স্রষ্টা কি কখনো এমন হতে পারেন যিনি নিজের সৃষ্টিকে 'নিকৃষ্ট' বলে গালি দেবেন? নাকি তিনি এমন হবেন যিনি সবাইকে সমভাবে ভালোবাসতে শেখাবেন?
‎আপনার সন্তানকে আপনি ঘৃণা মেশানো ধর্ম শেখাবেন, নাকি ভালোবাসা মেশানো মনুষ্যত্ব? সিদ্ধান্ত আপনার।
‎আপনার বিবেক কি আজও নিশ্চুপ থাকবে?
‎এ বিষয়ে আপনার কি মতামত?




‎ #বিবেক_জাগরণ #মনুষ্যত্ব #শিশুর_ভবিষ্যৎ #সত্যের_সন্ধানে #বিবেক_জাগাও

13/01/2026

महादेव की भक्ति में ही सच्ची शांति और शक्ति है ��
हर हर महादेव �

अगर आप भी भोलेनाथ के भक्त हैं तो � रिएक्शन जरूर दें और शेयर करें।

12/01/2026

� राम नाम में ही सब कुछ है �
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একটু ভেবে দেখুন তো—অন্ধবিশ্বাস আমাদের বিভাজন শেখায়, আর বিজ্ঞান বা যুক্তি আমাদের ঐক্যবদ্ধ করে।​পৃথিবীর সব প্রান্তের মানুষ...
26/12/2025

একটু ভেবে দেখুন তো—
অন্ধবিশ্বাস আমাদের বিভাজন শেখায়, আর বিজ্ঞান বা যুক্তি আমাদের ঐক্যবদ্ধ করে।
​পৃথিবীর সব প্রান্তের মানুষের জন্য ২ + ২ = ৪। এটিই যুক্তির শক্তি। কিন্তু কাল্পনিক বিশ্বাসের ভিন্নতার কারণে মানুষ একে অপরের থেকে আলাদা হয়ে যায়, এমনকি সংঘর্ষেও জড়িয়ে পড়ে।
​মানুষের তৈরি দেয়ালগুলো কি যুক্তির চেয়েও বড়?
নিচে আপনার মতামত জানান। আমরা কেবল জানতে চাই, আপনি কি মনে করেন?




‎ #চিন্তা_করুন #মানবিকতা

"অসাধারণ কোনো দাবির জন্য অসাধারণ প্রমাণের প্রয়োজন হয়।"​অন্ধকার ঘরে চোখ বন্ধ করে থাকলে যেমন আলো দেখা যায় না, তেমনি যুক্তি...
25/12/2025

"অসাধারণ কোনো দাবির জন্য অসাধারণ প্রমাণের প্রয়োজন হয়।"
​অন্ধকার ঘরে চোখ বন্ধ করে থাকলে যেমন আলো দেখা যায় না, তেমনি যুক্তি ছাড়া কোনো কিছুকে পরম সত্য বলে মেনে নিলে সত্যের সন্ধান পাওয়া যায় না। যা কিছু ধ্রুব সত্য, তা পরীক্ষার টেবিলে বা যুক্তির কষ্টিপাথরে হার মানবে না।
​আজ নিজেকে একটি প্রশ্ন করুন— আপনি যা বিশ্বাস করেন, তা কি সত্যিই প্রমাণিত? নাকি ছোটবেলা থেকে শুনে আসছেন বলেই তা আপনার কাছে সত্য?
​আসুন, অন্ধভাবে বিশ্বাস করার বদলে প্রশ্ন করতে শিখি। কারণ একটি সঠিক প্রশ্ন হাজার বছরের অন্ধকার দূর করতে পারে।

​ #বিবেকজাগরণ #অন্ধবিশ্বাস_বনাম_যুক্তি

আমরা কি সত্যিই আধুনিক?নাকি শুধু আধুনিকতার পোশাক পরে আছি?অসুস্থ হলে আমরা বিজ্ঞানের ওপর ভরসা রাখি।ল্যাবরেটরিতে তৈরি ওষুধ খ...
25/12/2025

আমরা কি সত্যিই আধুনিক?
নাকি শুধু আধুনিকতার পোশাক পরে আছি?

অসুস্থ হলে আমরা বিজ্ঞানের ওপর ভরসা রাখি।
ল্যাবরেটরিতে তৈরি ওষুধ খাই।
জীবন বাঁচাতে যুক্তিকে বেছে নিই।

কিন্তু জীবনের বাকি সিদ্ধান্তগুলোতে?
সেখানে কি আমরা একই যুক্তি ব্যবহার করি?
নাকি চোখ বন্ধ করে পুরনো প্রথা মেনে চলি?

বিজ্ঞান শেখায় প্রশ্ন করতে।
অন্ধবিশ্বাস শেখায় প্রশ্ন না করতে।

আপনি কোন পথে হাঁটেন?
যুক্তির পথে, নাকি অভ্যাসের?





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