09/02/2026
क्या आप Islamabad mosque attack की उस मस्जिद के भीतर का दृश्य कल्पना कर सकते हैं?
शुक्रवार की नमाज़, कतारों में खड़े लोग—कोई आँखें बंद कर इबादत में डूबा हुआ, कोई अपने बच्चे का हाथ पकड़े खड़ा।
ठीक उसी क्षण—एक विस्फोट।
Pakistan-की Islamabad mosque blast
पल भर में खून, धुआँ, क्षत-विक्षत शरीर।
कम से कम 31 लोग फिर कभी अपने घर नहीं लौटे।
वे न सैनिक थे, न राजनेता।
वे सिर्फ इंसान थे।
फिर भी किसी ने यह सोच लिया—कि उन्हें मार देना सवाब का काम है।
हम चाहें तो इस घटना को “Terrorism in the name of religion” कहकर टाल सकते हैं।
लेकिन तब एक भयावह सवाल अनुत्तरित रह जाएगा।
एक इंसान मानसिक रूप से कैसे Radical ideology को सही मन कर तैयार होता है कि वह अपने शरीर को बम बनाकर दूसरे इंसानों की हत्या करे?
कौन-सी शिक्षा उसे यह सिखाती है कि इबादतगाह के भीतर मौजूद लोग असल में दुश्मन हैं?
इस सवाल का जवाब किसी हथियारों की फैक्ट्री में नहीं है, न ही किसी गरीबी के आँकड़ों में।
जवाब है—सोच के स्रोत में।
जब कोई काम बार-बार, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में, एक ही तरह के तर्क के साथ होता है—
तो वह “व्यक्तिगत पागलपन” नहीं रहता।
वह एक वैचारिक पैटर्न बन जाता है।
इस्लामाबाद, काबुल, बग़दाद, नाइजीरिया—भूगोल बदलता है, लेकिन तर्क नहीं बदलता।
और वही तर्क बार-बार जाकर कुछ निश्चित शिक्षाओं पर टिक जाता है।
यहीं पर हमें क़ुरआन की कुछ आयतों को देखना पड़ता है,
जिनका सदियों से हिंसा को वैध ठहराने के लिए उपयोग किया गया है।
सूरा अत-तौबा, आयत 5—
जिसे इस्लामी सिद्धांत में “आयतुस सैफ़” या तलवार की आयत कहा जाता है:
فَإِذَا انسَلَخَ ٱلْأَشْهُرُ ٱلْحُرُمُ فَٱقْتُلُوا۟ ٱلْمُشْرِكِينَ حَيْثُ وَجَدتُّمُوهُمْ وَخُذُوهُمْ وَٱحْصُرُوهُمْ وَٱقْعُدُوا۟ لَهُمْ كُلَّ مَرْصَدٍ
अर्थात—
“जब पवित्र महीने समाप्त हो जाएँ, तो मुश्रिकों को जहाँ भी पाओ, मार डालो; उन्हें पकड़ो, घेरो और हर घात-स्थल पर उनके लिए घात लगाए बैठो।”
अब सवाल बहुत सीधा है।
अगर एक सामान्य इंसान बचपन से सुनता आए कि उसके धर्मग्रंथ में
“जहाँ भी पाओ, मार डालो”—ऐसी भाषा मौजूद है,
तो उसके अवचेतन में क्या बैठ जाएगा?
क्या यह आयत उसे सवाल करना सिखाती है, या आदेश मानना?
यहीं पर मौलवादी तुरंत एक जाना-पहचाना तर्क देते हैं।
वे कहते हैं—
“यह एक विशेष युद्ध के समय का आदेश था। आज के लिए नहीं।”
यह तर्क सुनने में अच्छा लगता है।
लेकिन थोड़ा गहराई में जाएँ, तो दरार साफ दिखती है।
अगर यह केवल एक ऐतिहासिक युद्ध का आदेश होता,
तो इसे एक ऐसे ग्रंथ में “आदेश” के रूप में क्यों लिखा गया,
जिसे शाश्वत और हर युग के लिए प्रासंगिक बताया जाता है?
अगर अल्लाह सर्वज्ञ हैं,
तो क्या वे नहीं जानते थे कि भविष्य में इसी आयत का उपयोग
लोगों की हत्या को जायज़ ठहराने के लिए किया जाएगा?
और अगर जानते थे—तो ज़िम्मेदारी किसकी है?
जैसे ही यह सवाल उठता है, तुरंत एक जाना-पहचाना जवाब आता है—
“ये सब गलत व्याख्याएँ हैं। इस्लाम शांति का धर्म है।”
लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि
हर हमले के बाद वही आयत, वही तर्क, वही बचाव सामने आता है।
इसका मतलब समस्या अलग-अलग नहीं है, संरचनात्मक है।
सबसे ज़्यादा घुमाई जाने वाली आयत है—
क़ुरआन की अत-तौबा 9:5।
فَإِذَا انسَلَخَ ٱلْأَشْهُرُ ٱلْحُرُمُ فَٱقْتُلُوا۟ ٱلْمُشْرِكِينَ حَيْثُ وَجَدتُّمُوهُمْ وَخُذُوهُمْ وَٱحْصُرُوهُمْ وَٱقْعُدُوا۟ لَهُمْ كُلَّ مَرْصَدٍ ۚ فَإِن تَابُوا۟ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَوُا۟ ٱلزَّكَوٰةَ فَخَلُّوا۟ سَبِيلَهُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
आजकल कई अंग्रेज़ी अनुवादों में यहाँ एक ब्रैकेट जोड़ दिया जाता है—
“kill the polytheists ˹who violated their treaties˺ wherever you find them…”
अब सवाल बहुत सीधा है—
यह “who violated their treaties”
क्या क़ुरआन की आयत का हिस्सा है,
या अनुवादक की व्याख्या?
असल अरबी आयत में
“संधि तोड़ने वाले मुश्रिक” जैसा कोई शब्द मौजूद ही नहीं है।
सिर्फ़ यह है—
“मुश्रिकों को जहाँ भी पाओ, मार डालो।”
तो फिर यह treaty वाली कहानी कहाँ से आई?
इस्लामी व्याख्या के अनुसार कहा जाता है—
मुहम्मद के समय कुछ अरब क़बीलों ने मुसलमानों से संधि की थी,
फिर उस संधि को तोड़ दिया था।
इसलिए यह आयत सिर्फ़ उन्हीं के लिए थी।
लेकिन यहीं असली दरार सामने आती है।
पहली बात—
अगर क़ुरआन सच में सिर्फ़ कुछ विशेष क़बीलों की बात कर रहा था,
तो उनके नाम, समय, संधि की शर्तें—
कुछ भी स्पष्ट रूप से क्यों नहीं लिखा गया?
क्या अल्लाह इतनी अस्पष्ट भाषा में बात करते हैं
कि 1400 साल बाद लोगों को तफ़सीर खंगालकर यह समझना पड़े
कि आख़िर किसे मारने का आदेश दिया गया था?
दूसरी बात—
इसी सूरा की आयत 9:2 में कहा जा रहा है—
“चार महीने धरती में घूम लो,
फिर जान लो कि तुम अल्लाह को परास्त नहीं कर सकते।”
क्या यह सिर्फ़
“कुछ संधि-भंग करने वाले क़बीलों” की भाषा है,
या सीधी धमकी?
और भी बड़ा सवाल—
अगर समस्या सिर्फ़ संधि तोड़ने की थी,
तो आयत के अंत में यह शर्त क्यों रखी गई—
“अगर वे तौबा करें, नमाज़ क़ायम करें, ज़कात दें, तो उन्हें छोड़ दो”?
संधि तोड़ने की सज़ा से बचने के लिए
किसी को धर्म परिवर्तन क्यों करना पड़े?
यह राजनीतिक अपराध की सज़ा है,
या धार्मिक अधीनता की शर्त?
यहीं पर मौलवादी आम तौर पर चुप हो जाते हैं।
क्योंकि यहाँ साफ़ हो जाता है—
समस्या treaty नहीं है, विश्वास है।
मुश्रिक होना ही मूल अपराध है।
और बचने का रास्ता सिर्फ़ एक—
इस्लाम क़बूल करना।
यही सोच आगे चलकर और भी आयतों में स्पष्ट हो जाती है।
सूरा अल-अनफ़ाल 8:12—
“काफ़िरों की गर्दनों पर वार करो,
और उनकी उँगलियों के हर जोड़ पर प्रहार करो।”
क्या यह सिर्फ़ रक्षात्मक युद्ध की भाषा है?
या दुश्मन को इंसान न मानकर
एक “टारगेट” के रूप में देखने का मानसिक प्रशिक्षण?
और भी बड़ा सवाल—
क्या इस आयत को क़ुरआन में कहीं स्पष्ट रूप से
रद्द या अमान्य घोषित किया गया है?
नहीं किया गया।
इसलिए कोई भी, किसी भी समय,
इसे शाब्दिक अर्थ में ले सकता है।
ठीक वैसे ही जैसे
आईएस, अल-क़ायदा या अन्य संगठन लेते हैं।
एक और आयत देखें।
सूरा अल-अनफ़ाल, आयत 12:
سَأُلْقِي فِى قُلُوبِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ٱلرُّعْبَ فَٱضْرِبُوا۟ فَوْقَ ٱلْأَعْنَاقِ وَٱضْرِبُوا۟ مِنْهُمْ كُلَّ بَنَانٍ
अर्थ—
“मैं काफ़िरों के दिलों में भय डाल दूँगा।
फिर उनकी गर्दनों पर वार करो
और उनकी उँगलियों के हर जोड़ पर प्रहार करो।”
यहाँ फिर मौलवादी कहते हैं—
“यह रूपक है। गला काटने का मतलब मनोबल तोड़ना है।”
लेकिन क्या भाषा सच में इतनी अस्पष्ट है?
“गर्दन पर वार करो”,
“उँगलियों के जोड़ों पर वार करो”—
क्या यह कविता है,
या सीधा शारीरिक निर्देश?
अगर सृष्टिकर्ता की वाणी समझने के लिए
इतने घुमावदार रास्तों की ज़रूरत पड़े,
तो क़ुरआन खुद को
“मुबीन”—स्पष्ट—कहकर कैसे पेश करता है?
इन आयतों को पढ़कर ही कोई बम नहीं बाँधता—
यह बात सही है।
लेकिन यही आयतें एक ऐसा मानसिक वातावरण बनाती हैं
जहाँ “दूसरा” इंसान,
इंसान नहीं रह जाता।
वह बन जाता है—काफ़िर, मुश्रिक, दुश्मन।
और दुश्मन को मारने में अपराधबोध नहीं होता—
गर्व होता है।
अब खुद से सवाल पूछिए।
अगर किसी बच्चे को बचपन से सिखाया जाए—
“तुम अल्लाह के प्रिय बंदे हो,
और पास का इंसान अल्लाह का दुश्मन है”—
तो वह बच्चा बड़ा होकर कैसा इंसान बनेगा?
क्या वह सहानुभूतिशील होगा,
या खुद को श्रेष्ठ समझेगा?
यही सुपरियोरिटी कॉम्प्लेक्स
एक दिन उससे कहलवाता है—
“मैं सही हूँ, वे ग़लत हैं।
मैं मारूँ तो गुनाह नहीं।”
इस्लामाबाद की उस मस्जिद में बम फोड़ने वाला व्यक्ति
क्या किसी अलग ग्रह से आया था?
नहीं।
वह भी कभी बच्चा था।
उसने भी कभी कुछ सीखा था।
सवाल है—
उसने क्या सीखा?
अब यहीं पर तुलना की ज़रूरत आती है।
जहाँ कुछ आयतें इंसानों को बाँटती हैं—
मोमिन बनाम काफ़िर—
वहीं भारतीय दर्शन क्या सिखाता है?
श्रीमद्भगवद्गीता 6:30—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
अर्थ—
जो मुझे सर्वत्र देखते हैं और सब कुछ मुझमें ही देखते हैं,
मैं उनसे कभी अलग नहीं होता
और वे मुझसे कभी अलग नहीं होते।
यहाँ “वे” और “हम” नहीं है।
यहाँ न काफ़िर है, न दुश्मन।
यहाँ हर इंसान, हर प्राणी—
एक ही चेतना की अभिव्यक्ति है।
महाभारत के शांति पर्व में कहा गया है—
न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्वं ब्रह्ममिदं जगत्।
यह संसार एक अखंड सत्ता है।
मनुष्यों के बीच कोई मौलिक भेद नहीं है।
अब सोचिए—
जो दर्शन कहता है
“सब एक ही सत्य का हिस्सा हैं”,
क्या वहाँ से कभी आत्मघाती बम पैदा हो सकता है?
और जो दर्शन कहता है—
“कोई अल्लाह का प्रिय है, कोई अल्लाह का दुश्मन”—
क्या वहाँ से हिंसा का जन्म होना अस्वाभाविक है?
यह पोस्ट किसी धर्म को गाली नहीं देता।
यह पोस्ट एक आईना दिखाता है।
सवाल बहुत सरल है—
अगर कोई विचार बार-बार खून पैदा करता है,
तो उस विचार पर सवाल उठाना
क्या अपराध है?
या वही मानवता की ज़िम्मेदारी है?
अगर आज हम चुप रहे,
तो कल एक और मस्जिद,
एक और मंदिर,
एक और स्कूल—
सब सिर्फ़ समय का इंतज़ार कर रहे हैं।
सवाल है—
आप किस दर्शन के साथ खड़े होंगे?
उस दर्शन के साथ
जो इंसान को इंसान समझता है,
या उस दर्शन के साथ
जो इंसान को टारगेट समझता है?
सच कड़वा हो सकता है।
लेकिन चुप्पी उससे भी ज़्यादा ख़तरनाक है।
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